अपने पाखंड का सामना करें
बहस
अपने पाखंड का सामना करें
प्रीतीश नंदी
इन दिनों टीवी रेटिंग्स
को लेकर छिड़ी जंग पर काफी कुछ लिखा-पढ़ा जा रहा है. हर जगह बताया जा रहा है कि किस
तरह चैनल ऐसे शो ला रहे हैं, जिससे लोगों की आंखें उस पर टिक जाएं और वे उसी से
चिपके रहें.
हास्यास्पद रूप से नैतिक मसलों को उठाते हुए कहा जा रहा है कि टीआरपी की इस होड़
में कुछ न कुछ ऐसा है, जो बहुत गलत है. संकेत यह है कि जब चैनल वाले टीआरपी के
पीछे भागते हैं तो वास्तव में वे ज्यादा से ज्यादा विज्ञापन और धन के पीछे भी
भाग रहे होते हैं. यानी वे फायदे के लिए हमारी संस्कृति और मूल्यों से समझौता
कर रहे हैं. अब इसे दूसरे नजरिए से देखते हैं.
जब चैनल्स टीआरपी के पीछे भागते हैं तो वास्तव में वे दर्शकों की तारीफ पाना
चाहते हैं. वे यह जानने के गंभीर, समन्वित प्रयास करते हैं कि दर्शक वास्तव में
क्या देखना चाहते हैं, उन्हें क्या पसंद है और ऐसी कौन सी चीज है जो उन्हें टीवी
के सामने चिपकाए रखे तथा उठने न दे. ये चैनल वास्तव में वही कर रहे हैं जो समाज
विज्ञानी ज्यादा आडंबरी तरीके से करते हैं. वे यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि
लोग किस बात से आनंदित होते हैं, उन्हें किस पर भरोसा है और वे किसका अनुभव पाना
चाहते हैं.
टीआरपी हमें अनुभवजन्य शोध के आंकड़े मुफ्त में मुहैया कराती है, यह पता लगाने
के लिए कि आधुनिक भारत आखिर क्या है. वे नजरियों, रुझानों, विश्वासों और पसंद
को खोज रहे हैं. हमारे चैनल उस झूठ, पाखंड और तुच्छ-निर्थक बातों को उजागर कर
रहे हैं जिसे उन लोगों द्वारा बढ़ावा दिया जाता है जो अपने राजनीतिक या
व्यावसायिक फायदे के लिए सच के साथ खिलवाड़ करते हैं.
इसकी कुछ मिसालें यहां पेश हैं. कई बार हमें यह भरोसा दिलाया जाता है कि यह धर्म ही
है जो भारत को भारत बनाता है. भाजपा से लेकर समाजवादी पार्टी और यहां तक कि
कांग्रेस इस आधार पर उम्मीदवारों को उतारती है? क्या यह सही है? नहीं. आज धार्मिक व
आध्यात्मिक शो को दर्शक नहीं मिलते. अभिभावकों को अपने बच्चों को जबर्दस्ती मंदिर,
मस्जिद और चर्च ले जाना पड़ता है, लेकिन कोई भी इस बात को स्वीकार नहीं करना चाहता,
इसलिए वे झूठ को जिंदा रखते हैं.
राजनीतिक पार्टियां इसको लेकर फड़फड़ा रही हैं, लेकिन फिर भी नहीं बदलेंगी. नतीजतन
इनमें से कुछ लोगों ने इसे भुला दिया है और वे इसे दोबारा याद नहीं करना चाहते.
आधुनिक युवा भारत में परंपरावादियों द्वारा की जा रही धर्म की व्याख्या की किसी को
कोई परवाह नहीं है. वे अपने ही भीतर अपनी आस्थाएं तलाश रहे हैं. यहां तक कि एकता
कपूर के करवा चौथ वाले शो भी अब नहीं रहे. यह राजनीतिक पार्टियों द्वारा यह नई
विचारधाओं की खोज का समय है. बदलाव के लिहाज से क्या आर्थिक प्रगति पर बात नहीं की
जा सकती?
एक और झूठ जिसे हम लंबे समय से अपनाते चले आ रहे हैं, वह यह है कि सेक्स, रिलेशनशिप,
विवाह इत्यादि के मामले में हम बहुत ही रूढ़िवादी हैं. क्या ऐसा लगता है? आज पूरा
परिवार साथ बैठकर ऐसे शो को देख रहा है जो इस मिथक को तोड़ते हैं. भारतीयों को
सेक्स से लगाव है. उनके मन में हमेशा इसके प्रति जिज्ञासा रहती है. वे इसके बारे
में और ज्यादा जानना चाहते हैं, ज्यादा अनुभव करना चाहते हैं.
सदियों पहले वात्स्यायन इस बात को जानते थे. इसी तरह कालिदास, भर्तृहरि, अमारु जैसे
हमारे तमाम महान कवि और चिंतक भी यह जानते थे. हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों में अवैध
संबंधों का उल्लेख है और वास्तव में सब जगह के धर्मग्रंथों में भी ऐसा ही है, लेकिन
300 साल के मुगल और ब्रिटिश शासन में यह सब दफन हो गया. आज हम सेक्स का नया अवतार
देख रहे हैं. आज सेक्स गुप्त कोठरियों से निकल हमारी लोकप्रिय संस्कृति में दोबारा
प्रविष्ट हो रहा है. हमें इसे प्रोत्साहित करना होगा. इससे दुराचार और यौन अपराधों
में कमी आएगी, समाज से पाखंड दूर होगा और हमें प्रमोद मुथालिक जैसे लोगों से मुक्ति
मिलेगी.
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राखी सावंत की जाति से कहीं ज्यादा लोगों की रुचि उनकी
कमनीय काया में होती है. |
इन टीवी शो से हमने एक और सबक यह सीखा है कि हमारे जड़, भयावह आवरणों के पीछे सेंस
ऑफ ह्यूमर से भरपूर एक प्रफुल्लित दिमाग है, जो अच्छे व बुरे, फर्जी व असली, सही व
गलत में आसानी से भेद कर सकता है. टीवी पर रियलिटी शो में प्रतिभागी जो कहते या करते
हैं, उसके बारे में मैंने समाज के कमजोर और दीन-हीन लोगों को भी बेहद उल्लास और
समझदारी के साथ प्रतिक्रिया देते हुए देखा है.
इससे मुझे समझ में आया कि हमारे शासक इस देश, इसके लोग और उनकी बुद्धिमत्ता के स्तर,
उनकी पसंद-नापसंद, उनकी समझदारी, उनके सेंस ऑफ ह्यूमर के बारे में कितना कम समझते
हैं. वे जिस तरह के शो को प्रतिबंधित करना चाहते हैं, उन्हें पूरा परिवार एक साथ
बैठकर देख रहा है, उनका विश्लेषण कर रहा है और उनमें लोग जो कहते या करते हैं, उसके
बारे में सबक ले रहा है. यह देखना दिलचस्प है वे टीवी पर अच्छा या बुरा, जो भी देख
रहे हैं, उससे जीवन, प्यार और मूल्यों के प्रति उनके नजरिए में किस तरह बदलाव आ रहा
है, जो अमूमन बेहतरी के लिए होता है.
जो लोग इस बात पर जोर देते हैं कि जाति, समुदाय और धर्म से जुड़े मसले लोगों के वोट
हासिल करने के लिए बहुत जरूरी हैं, उन्हें इन शो में देखना चाहिए कि यहां सभी धर्म,
जाति, मूल्य वाले लोगों के बीच कितनी गर्माहट और बंधुत्व भाव है. इससे यह तथ्य सामने
आता है कि हम भारतीय वास्तव में किस कदर एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं. राखी सावंत
की जाति से कहीं ज्यादा लोगों की रुचि उनकी कमनीय काया में होती है.
उनके शो में भारत के अलग-अलग हिस्सों से आवेदक आए थे, जो अलग-अलग धर्म और संप्रदाय
से जुड़े थे. राखी स्वयं भी जितना भगवान कृष्ण को याद करती हैं, उतना ईसा मसीह को
भी. आपको राष्ट्रीय अखंडता का इससे बढ़िया और क्या उदाहरण मिल सकता है कि सभी धर्म,
जाति, क्षेत्र के लोग एक आइटम गर्ल को लुभाना और उससे शादी करना चाहते हैं? क्या
इससे आपको गर्व महसूस नहीं होता है? अब ऐसा शो भ्रष्ट कैसे हो सकता है? आखिर ऐसा शो
घटिया कैसे हो सकता है जो लोगों को सच बोलने की शिक्षा देता है, चाहे इसके लिए कुछ
भी खोना पड़े?
मेरा तर्क बिलकुल सीधा है. हम अपनी लोकप्रिय संस्कृति को अपना भविष्य, अपने ही
नैतिक मानक, अपनी पहचान तलाशने के लिए अकेला छोड़ दें. इससे वही होगा जो सभी
लोकप्रिय संस्कृतियों में होता है. हमें एक आवाज मिलेगी. हमें अपने सपनों को तलाशने
और उनके साथ जीने की आजादी मिलेगी. इससे हमें अपने पाखंड से छुटकारा मिलेगा और हम
अच्छे इंसान बनेंगे. यही एक स्वतंत्र मीडिया का काम है- हमें झूठ की बेड़ियों से
आजाद कराना.
06.08.2009, 00.30 (GMT+05:30) पर
प्रकाशित