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'चरनदास चोर' सलाखों के पीछेः 'डाकू घासीदास' पर मुकदमा चालू आहे...

बात निकलेगी तो...

 

'चरनदास चोर' सलाखों के पीछेः 'डाकू घासीदास' पर मुकदमा चालू आहे...

उदय प्रकाश

 


जब एक-एक कर सारे अंदेशे और बुरे सपने सच होने लगते हैं तो समय गहरे संकट का होता है. और कोई भी बड़ा संकट सिर्फ कलाओं या साहित्य या बौद्धिक वर्गों की बैठकी और लंबे अरसे से उन्हीं-उन्हीं नारों, मुहावरों और घोषणापत्रों पर टिकी राजनीतिक सत्ताओं के मठों-गुंबदों, शिखरों-गलियारों तक ही सिमटा नहीं रहता, उसकी परछाईं देर-सबेर सारे देश और वृहत्तर समाज पर गिरती है.

प्रतिबंध


भारतीय रंगमंच के कालजयी रंगकर्मी हबीब तनवीर के लगभग क्लासिक का दर्जा हासिल कर चुके नाटक 'चरनदास चोर' पर छत्तीसगढ़ की घोषित हिंदुत्ववादी भाजपा सरकार द्वारा अपने 'पुस्तक वाचन' कार्यक्रम में प्रतिबंध लगाने की ताज़ा घटना उसी बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक संकट का एक नया संकेत है, जिसकी लगातार पसरती-फैलती परछाईं आने वाले दिनों में न सिर्फ बहुतेरी कलाकृतियों, साहित्यिक रचनाओं पर अपनी परछाईयों का ग्रहण लगाएगी, बल्कि राजनीति के चले आते ढांचे और चरित्र के भीतर भी कई तरह के अदेखे तोड़-फोड़ करेगी.

हमारे समय की एक समस्या यह भी है, जो मेरे जैसे ऐसे लेखक के सामने बार-बार या लगभग हरबार उपस्थित होती है, जो प्रचलित राजनीति की भाषा और उसकी चालू प्रतिक्रियाओं से थोड़ा-सा अलग हट कर सोचता और बोलता है, कि कहीं उसको भी किसी सत्ताकेंद्रित राजनीतिक प्रणाली के किसी शिविर का शरणार्थी या किसी ताकतवर सांस्कृतिक गिरोह का भाड़े का सिपाही (मर्सिनरी) न घोषित कर दिया जाये. यह डर किसी भी स्वतंत्र लेखक के सिर के ऊपर मंडराने वाला आज के समय का एक बड़ा डर है. क्योंकि इस समय की भारतीय राजनीति में सक्रिय कोई भी दल ऐसा नहीं है, जो कहीं न कहीं सत्ताधारी न हो, जिसकी निगाहें सत्ता की ओर न टिकी हों और जिसने अपने-अपने राज्य या इलाके में अन्य लेखकों और रचनाओं पर प्रतिबंध न लगाए हों और सत्ताहीन नागरिकों और लेखकों को दंडित-उत्पीड़ित न किया हो.

यही वह डर है जिसके चलते मैं बिल्कुल शुरु में ही, आज की प्रचलित राजनीतिक शब्दावली में यह सरलीकृत और 'दो-टूक' बयान दे देता हूं कि मेरा पक्ष साफ-साफ ऐसे किसी भी प्रतिबंध के विरुध्द है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों के पक्ष में खड़े उन तमाम संगठनों और लेखकों-रंगकर्मियों के साथ आपके इस लेखक की भी सहमति है, जो छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार से तत्काल 'चरनदास चोर' पर लगाए गए इस प्रतिबंध को, अगर वह लगा है तो, हटाने की मांग करते हैं.


लेकिन ठीक इसके बाद ज़रूरत पैदा होती है उस बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक अंतर्विरोधों और टकराहटों से जनमे इस आसन्न संकट के समूचे परिसंदर्भ को समझने की, जिसकी परछाईं निकट भविष्य में हबीब तनवीर ही नहीं, मुंशी प्रेमचंद, निराला, तुलसीदास समेत कई अब तक लगभग महान मान लिए गये साहित्यकारों की अन्य कृतियों पर गिरेगी. ऐसे में क्या सिर्फ 'भर्त्सना', 'निंदा' और 'विरोध प्रस्ताव' की यह सुविधावादी और सरलीकृत राजनीतिक समझ और रणनीति पर्याप्त रहेगी? ज़ाहिर है, कत्तई नहीं, क्योंकि ये तरीके न सिर्फ बासी और खोखले हो चुके हैं, बल्कि अब वे ऐसे निपट उत्साही, गैर-ईमानदार और चतुर लोगों के हाथ के झुनझुने बन चुके हैं, जिसे वे जहां चाहते हैं, वहां बजा देते हैं, और जहां नहीं चाहते, वहां बिल्कुल नहीं बजाते.

'चरनदास चोर' पर 'पुस्तक वाचन' कार्यक्रम में प्रतिबंध की घटना ऐसी नहीं है, जिसे सिर्फ राजनीतिक घटना मान कर ठीक वैसी ही राजनीतिक प्रतिक्रिया की जाये और फिर दूसरे धड़े की राजनीति में अपनी वैधता बनाते हुए फिर से फायदा उठाने की चिर-परिचित कोशिश की जाये. अगर यह सिर्फ किसी एक पार्टी से जुड़ी कोई राजनीतिक घटना होती तो कुछ ही हफ्तों पहले मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार ने इसी नाटक के लेखक और निर्देशक हबीब तनवीर को उनके निधन के बाद इक्कीस बंदूकों की सलामी का राजकीय सम्मान क्यों दिया होता? आखिर वह कौन से कारण हैं कि दो पड़ोसी राज्यों -मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में, उसी भाजपा के शासन में, वही रचनाकार, एक जगह 'अभिनंदित' और दूसरी जगह 'प्रतिबंधित' हो जाता है ?

शायद इसकी एक वजह वह स्थानीय (टॉपिकल) दबाव है, जो छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में अलग-अलग तरह के सामाजिक-सांस्कृतिक परिसंदर्भ पैदा करता है. यह दबाव इन दोनों राज्यों की जनसांख्यिकी की अलग-अलग सांस्कृतिक और जातीय बनावट के अंतर्विरोधों के चलते पैदा होता है. आपको याद होगा, कुछ अरसा पहले जब तस्लीमा नसरीन को, चंद कट्टरपंथी मजहबियों की मांग पर, पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार ने कोलकाता छोड़ कर चले जाने का निर्देश दिया था, तब गुजरात और राजस्थान की हिंदुत्ववादी सरकारों ने उनके 'अभिनंदन' और 'पुनर्वास' की तैयारी कर ली थी. टाटा की नैनो परियोजना के साथ भी यही हुआ था. बंगाल में प्रतिरोध का जो स्थानिक दबाव था, वह गुजरात में नहीं दिखा और नैनो बंगाल के वाम 'विकास' के इलाके से हट कर गुजरात के सांप्रदायिक 'विकास' के इलाके में चला गया.

छत्तीसगढ़ में 'चरनदास चोर' पर 'पुस्तक वाचन' के दौरान प्रतिबंध सतनामी पंथ के मुखिया बालदास की मांग पर रमन सिंह की हिंदुत्ववादी भाजपा सरकार ने लगाया. मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश या राजस्थान आदि में यह स्थानिक दबाव काम नहीं करेगा, इसलिए वहां 'चरनदास चोर' के मंचन में या वाणी प्रकाशन से छपी इस किताब की खरीद और वितरण पर कोई समस्या संभवत: नहीं आएगी. उसी तरह जैसे 'परजानिया' जैसी फिल्म को गुजरात में प्रदर्शित नहीं होने दिया गया, लेकिन बाकी देश के अन्य राज्यों में उसे देखा गया. आनंद पटवर्द्धन या गौहर रज़ा की फिल्मों के साथ भी यही बात लागू होती है. अगर 'और अंत में प्रार्थना' पर फिल्म बनेगी, तो उसके साथ भी ऐसी ही कहानी दोहराई जाएगी.

बहरहाल, इस पूरे प्रसंग में यह देखना ज़रूरी होगा कि ये 'सतनामी' कौन हैं और ये बालदास कौन हैं, जिनकी धमकी के बाद मुख्यमंत्री रमन सिंह की हिंदुत्ववादी और सांस्कृतिक राष्ट्रवादी सरकार ने छत्तीसगढ़ में 'चरनदास चोर' पुस्तक को राज्य के पुस्तकालयों से बाहर किया और इसकी पाठचर्चा पर प्रतिबंध लगाया.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

p.c.rath (pckanker@gmail.com) raipur

 
 नाटक पर प्रतिबंध नहीं लगा है, इसकी घोषणा अधिकारिक रुप से छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा की जा चुकी है. 
   
 

jugnu shardeya (jshardeya@gmail.com) Jabalpur

 
 असहमति का अनादर भारतीय समाज की विशेषता बनती जा रही है । बहुत पहले ,शायद 1970 के दशक में एक फिल्म वाल्मिकी पर रोक लगी थी कि वह वाल्मिकी के चरित्र को गलत ढंग से पेश कर रही है क्योंकि दलित समाज अपने आप को वाल्मिकी का वंशज मानता है । न केवल दलित समाज बल्कि तथाकथित उच्च वर्ग भी न जाने कितनी प्रकार की गलतफहमियों में जीता है कि एक दिन वह किसी भी रचना पर रोक की मांग कर सकता है । हमारे वोट प्रेमी - सत्ता प्रेमी नेता मांग भी लेंगे । अभी तो चरनदास चोर ,कल को घासीराम कोतवाल की बारी आएगी । छत्तीसगढ़ सरकार को बधाई क्योंकि केवल सरकारी साहित्य ही पर रोक नहीं लग सकती है ।  
   
 

Abhijeet Sen (abhijeet4288@rediffmail.com) Raigarh

 
 Like any banned publication ,it provokes one to purchase it. 
   
 

Avinash Kumar (Avinash)

 
 Its a habit of some people to make issue out of nothing...  
   
 

Suresh Chandra NOIDA

 
 जर्मनी के पीटर मार्टीन की एक कविता "फर्स्ट दे कम" हम में से अधिकांश लोगों ने पढ़ी होगी, उसे फिर से दुहराने की जरुरत है-

जब नाज़ी कम्यूनिस्टों के पीछे आए,मैं खामोश रहा क्योकि मैं कम्यूनिस्ट नहीं था.

जब उन्होंने सोशल डेमोक्रेट्स को जेल में बंद किया मैं खामोश रहा क्योकि, मैं सोशल डेमोक्रेट नहीं था.
जब वो यूनियन के मजदूरों के पीछे आए मैं बिलकुल नहीं बोला क्योकि, मैं मजदूर यूनियन का सदस्य नहीं था.

जब वो यहूदियों के लिए आए मैं खामोश रहा क्योकि, मैं यहूदी नहीं था.

लेकिन,जब वो मेरे पीछे आए तब, बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था...
 
   
 

uday prakash GHAZIABAD

 
 Manisha ji, kindly have a look at Encyclopedia Britannica. It's also supported by the other source-references :''The earliest Satnamis were a sect of mendicants and householders founded by Birbhan in Narnaul in eastern Punjab in 1657.''
I would humbly suggest to look at the historical references than the philosophical ones.
 
   
 

ashok (ashokk34@gmail.com) gwalior

 
 क्या और कभी प्रतिबंध नहीं लगा है ? अगर हां, तो उसका भी विरोध क्या नहीं होना चाहिए ? 
   
 

मनीषा श्रीवास्तव NOIDA

 
 मुझे लगता है कि आपने पंजाब और छत्तीसगढ़ के सतनाम पंथ को एक समझने की भूल की है. छत्तीसगढ़ के सतनाम पंथ का पंजाब के सतनाम पंथ से कोई लेना-देना संभवतः नहीं है. दर्शनशास्त्र की विद्यार्थी होने के नाते जो मेरी जानकारी है, उसके मुताबिक छत्तीसगढ़ का सतनाम पंथ एक पृथक भक्ति आंदोलन का हिस्सा है. 
   
 

Sanjay Singh सहरसा, बिहार

 
 आपने सही कहा है कि जिस तरह से हम लोग चुप्पी साधे रहते हैं और जिस तरह से विरोध की राजनीति करते हैं, वह खतरनाक है. हमारे देश में लोकतंत्र मजाक बना दिया गया है और जिसकी जैसी मर्जी होती है, वह अपने अनुसार हर विषय की व्याख्या करता है. 
   
 

mihirgoswami (mgmihirgoswami) bilaspur c.g

 
 चलो इक बार फिर से बेवकूफ बन जाएं, हम दोनों.... पहला-लेखक औऱ दूसरा पाठक. कारण सरकार कभी ग़लत निर्णय नहीं लेती, इस बात को समझने की जरुरत है. अब जब बात साफ हो गई है तो सरकार का विरोध नहीं, विशेष सम्मान करना चाहिए. 
   
 

अलका एस नई दिल्ली

 
 प्रतिबंध चाहे किसी भी कारण से या कितना भी छोटा हो वह खतरनाक होता है. इससे अगर बचा जा सकता है तो समाज को बचना चाहिए. आपने सही मुद्दे की ओर इशारा किया है कि हमलोग सुविधाजनक तरीके से विरोध और समर्थन की राजनीति करते हैं जबकि ये वस्तुतः राजनीति से जुड़ा मामला नहीं है. 
   

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