जिन्ना को हीरो मत बनाइये
बात निकलेगी तो...
जिन्ना को हीरो मत बनाइये
एल एस हरदेनिया,
भोपाल से
आखिर क्या कारण है कि पहले लालकृष्ण आडवाणी और अब जसवंत सिंह, मोहम्मद अली जिन्ना
को एक सेक्युलर और महान नेता सिध्द करने में अपनी पूरी बौद्धिक ताकत लगा रहे हैं. इसमें कोई संदेह नहीं कि जिन्ना के जीवन में एक दौर ऐसा था, जब वे सेक्यूलर थे. उनकी
यह मान्यता थी कि भारत का भविष्य हिन्दू-मुस्लिम एकता में निहित है. उनके
धर्मनिरपेक्ष विचारों से प्रभावित होकर स्वतंत्रता आंदोलन की एक महान नेत्री, सरोजनी
नायडू ने जिन्ना को ‘हिन्दु मुस्लिम मैत्री का महान संदेशवाहक’ कहा था. एक समय था,
जब वे कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में से एक थे. एक समय ऐसा भी था जब वे गांधीजी के
प्रशंसकों में शामिल थे. जब गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से वापिस आए थे, उस समय उनके
स्वागत के लिये जो समिति बनाई गई थी जिन्ना को उसका अध्यक्ष बनाया गया था. परंतु
धीरे-धीरे जिन्ना के चिन्तन में अंतर आया.
इसी अंतर के चलते जिन्ना ने मुस्लिम लीग का नेतृत्व करने का अनुरोध स्वीकार कर लिया.
जिस दिन वे मुस्लिम लीग के नेता बने, उसी दिन उनका धर्मनिरपेक्ष चरित्र समाप्त हो
गया. यह सोचने की बात है कि एक ऐसा व्यक्ति, जो एक धर्म विशेष को मानने वालों के दल
में शामिल हो, भला सेक्युलर कैसे हो सकता है. क्या कोई व्यक्ति एक साथ मुस्लिम लीग
का नेता और सेक्युलर हो सकता है? क्या सेक्युलर होने की पहली शर्त किसी एक धर्म पर
आधारित राजनीति से दूर रहना नहीं है?
अपने इस बदले स्वरुप का औचित्य सिद्ध करने के लिये जिन्ना ने कांग्रेस को हिन्दुओं
की पार्टी और महात्मा गांधी को हिन्दुओं का नेता कहना प्रारंभ कर दिया था.
आज भी भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, वर्तमान मुस्लिम लीग को
सांप्रदायिक कहते नहीं थकते हैं. मैं जसवंत सिंह से यह जानना चाहता हूं कि यदि आज
की मुस्लिम लीग सांप्रदायिक है तो परंतत्र भारत की मुस्लिम लीग क्या सांप्रदायिक नही
थी और एक सांप्रदायिक राजनैतिक पार्टी का सबसे बड़ा नेता कैसे सेक्युलर हो सकता है?
यदि जिन्ना सेक्युलर नेता थे तो हमें हिन्दू महासभा, सावरकर और डॉ मुंजे सहित उसके
अन्य नेताओं को भी सेक्युलर करार देना होगा.
जिन्ना ने अपने (मुस्लिम) समाज के हितों की रक्षा की खातिर पूरे हिन्दू समाज को
सांप्रदायिक निरुपित किया था. सन् 1938 के बाद जिन्ना ने अनेक अवसरों पर कहा था कि
आजाद भारत में अल्पसंख्यकों के साथ हिन्दुओं का व्यवहार शत्रुतापूर्ण होगा. चूंकि
देश में हिन्दुओं का बहुमत रहेगा इसलिये अल्पसंख्यकों के साथ उनका व्यवहार आक्रामक
और भेदभावपूर्ण रहेगा. क्या पूरी हिन्दू कौम को सांप्रदायिक एवं आक्रामक बताना
जिन्ना के सेक्युलर होने का प्रतीक है? जिन्ना को सेक्युलर बताते हुए क्या जसवंत
सिंह यह भूल गए कि यदि विभाजन के बाद बड़ी संख्या में मुसलमान भारत में रह सके और आज
भी रह रहे हैं तो उसका श्रेय हिन्दुओं के सेक्युलर नजरिए को जाता है. यदि भारतीय
समाज का मूल चरित्र सेक्युलर नहीं होता तो हमारे संविधान निर्माताओं का भारत को एक
सेक्युलर राष्ट्र बनाने का निर्णय लागू करना संभव नहीं था. जिन्ना ने जिस हद तक
जाकर संपूर्र्ण हिन्दू समाज के चरित्र पर शंका प्रगट की थी, वह अपने आप में जिन्ना
के सांम्प्रदायिक होने का सुबूत है. जिन्ना का हिन्दुओं के प्रति दृष्टिकोण इतना
संकुचित था कि उसके कारण जिन्ना ने संसदीय प्रजातंत्र का ही विरोध किया था.
उन्होंने एक जगह कहा था, “भारत में संसदीय प्रजातंत्र स्थापित होने के लायक वातावरण
नहीं है. यहां के संसदीय प्रजातंत्र में अल्पसंख्यकों के हित सुरक्षित नहीं रह सकंगे.
इसके साथ ही, भारत में संसदीय प्रजातंत्र इसलिए भी स्थापित नहीं हो सकता क्योंकि
अधिकांश भारतीय अज्ञानी और निरक्षर हैं, जो सदियो में अंधविश्वास के वातावरण में रह
रहे हैं, जिनके आपसी संबंध दुश्मनी के हैं. इन कारणों से भारत में संसदीय
प्रजातंत्र किसी हालत में सफल नहीं हो सकता.”
जिन्ना की इस निराशाजनक चेतावनी के बाद भी 1950 में हमने स्वयं को संसदीय
प्रजातंत्र घोषित किया. उस समय से लेकर आज तक हमारे देश में समय पर चुनाव हो रहे
हैं और हमारी संसदीय संस्थाओं का अस्तित्व बना हुआ है.
सभी चुनावो में हमारे देश के कथित अज्ञानी व निरक्षर मतदाताओं ने अत्यंत बुद्धिमत्ता
व परिपक्वता से अपने मत का उपयोग किया है. आपातकाल के बाद हुए और सन् 2004 व 2009
के आम चुनावों में जिस संतुलित ढ़ंग से मतदाताओं ने अपने अधिकार का उपयोग किया वह
काबिले तारीफ है. इस तरह, कहा जा सकता है कि जिन्ना सेक्युलर तो थे ही नहीं वे
डेमोक्रेट भी नहीं थे.
अब इस पर विचार करना है कि पाकिस्तान के निर्माण के लिये कौन जिम्मेदार था. जसवंत
सिंह कहते हैं कि पाकिस्तान के निर्माण के लिये नेहरू और पटेल जिम्मेदार थे. क्या
जसवंत सिंह ने क्षण भर के लिए भी इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि यदि आजादी के आंदोलन
के दौरान हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग अस्तित्व में न होतीं तो क्या पाकिस्तान के
निर्माण की नींव की जमीन तैयार हो पाती? सबसे पहले हिन्दू महासभा और उसके बाद
मुस्लिम लीग ने धर्म के आधार पर देश को बांटने की पहल की थी. क्या हिन्दू महासभा ने
भारत में हिन्दू और मुस्लिम- दो राष्ट्र होने की बात नहीं कही थी? क्या इस बात को
भुलाया जा सकता है हिन्दू महासभा के सर्वमान्य नेता वीर सावरकर ने कहा था कि भारत
में उन्ही को रहने का अधिकार है जिनकी जन्मभूमि और पुण्यभूमि भारत में हो. इसका सीधा
सा अर्थ यह था कि चूंकि मुसलमानों की पुण्यभूमि यहां नहीं है, इसलिये उन्हें यहां
रहने का अधिकार नहीं है.
इस तरह के तर्कों से मुसलमानों के मन में यह बात उठी होगी कि अब हमें अपने लिए अलग
घर की तलाश कर लेनी चाहिए. इस घर की तलाश करने के लिए मुस्लिम लीग बनी और फिर जिन्ना
ने उसका नेतृत्व स्वीकार किया.
जिन्ना तो भारत छोड़कर लंदन में रहने लगे थे. हमारे देश के अनेक मुस्लिम नेता लंदन
जाकर उनसे मिले और उनसे मुसलमानों का नेतृत्व करने का अनुरोध किया. जिन्ना ने
मुसलमानों के लिये अलग घर ढूंढना प्रारंभ किया. इस उद्देश्य के लिये उन्होंने
डायरेक्ट एक्शन की घोषणा की. जिन्ना के भाषणों से देश में तनाव का वातावरण निर्मित
हुआ और अनेक जगह हिंसक घटनाएं हुईं.
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जिन्ना तो पूरी आबादी का आदान-प्रदान चाहते थे अर्थात
सारे मुसलमान पाकिस्तान जाएं और सारे हिन्दू भारत. यदि भारत इस प्रस्ताव को मान
लेता तो करोड़ों लोग बेघर हो जाते. ऐसा प्रस्ताव रखने वाला व्यक्ति कैसे सेक्युलर और
महान हो सकता है. |
जिन्ना ने घोषणा की कि उन्होंने मुसलमानों के लिए पृथक घर ढूढ़ लिया है, एक ऐसा घर
जिसके दो कमरों (पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान) की दूरी हजारों मील की थी.
जिन्ना ने मुसलमानों के लिये ऐसा देश बनाया जैसा देश दुनिया में कहीं नहीं था.
जिन्ना अपने अहं के गुलाम थे. वे अपने को गांधी से बड़ा बनाना चाहते थे -बिना गांधी
के गुणों के.
गांधी का मन एक बूंद खून देखकर द्रवित हो जाता था परंतु जिन्ना ने विभाजन के पूर्व
हुए खून-खराबे पर एक आंसू भी नहीं बहाया. जिन्ना तो पूरी आबादी का आदान-प्रदान चाहते
थे अर्थात सारे मुसलमान पाकिस्तान जाएं और सारे हिन्दू भारत. यदि भारत इस प्रस्ताव
को मान लेता तो करोड़ों लोग बेघर हो जाते. ऐसा प्रस्ताव रखने वाला व्यक्ति कैसे
सेक्युलर और महान हो सकता है, इसका उत्तर जसवंत सिंह को देना चाहिए . जसवंत सिंह
जिस तरह से पंडित नेहरु व पटेल को विभाजन के लिए उत्तरदायी मानते हैं. मेरी राय में
यह इतिहास की और ऐतिहासिक घटनाओं की बहुत ही सतही समझ है. मेरी राय में भारत को
विभाजित करने का सर्वाधिक दोष ब्रिटिश साम्राज्य का है.
ब्रिटेन समेत सभी साम्राज्यवादी देशों को सबसे ज्यादा खतरा सोवियत संघ से था. लगभग
उसी समय, चीन भी एक साम्यवादी देश के रुप में उभर रहा था. इन दोनों देशों की
घेराबंदी कैसे की जाये यह अमरीका व ब्रिटेन की चिंता का विषय था. ये दोनों देश जानते
थे कि नेहरु, पटेल और अन्य नेता भारत की भूमि को समाजवादी देशों के विरोध का अड्डा
नहीं बनने देंगे. परंतु उन्हें भरोसा था कि पाकिस्तान को इस संबंध में कोई आपत्ति
नहीं होगी, इसलिए वे हर हालत में भारत का विभाजन चाहते थे. बाद की घटनाओं ने उनके
भरोसे को सही साबित किया.
एक बात और कही जाती है कि नेहरु व पटेल ने विभाजन इसलिये स्वीकार किया क्योंकि वे
वृद्ध हो चुके थे, थक चुके थे, उन्हें सत्ता में आने की जल्दी थी. मैं नहीं मानता
कि उन्हें सत्ता में आने की जल्दी थी परंतु मैं यह अवश्य सोचता हूं कि यदि भारत को
आजाद होने में और देरी हो जाती और ये नेता इस दौरान स्वर्गवासी हो जाते तो इस देश
की स्थिति क्या होती. ये दोनों नेता आधुनिक भारत के निर्माता हैं. यदि पटेल ने
रियासतों का विलय नहीं करवाया होता तो भारत अपने इतिहास में सबसे बड़ा आकार नहीं पा
सकता होता. वहीं नेहरु ने राजनैतिक, आर्थिक व सामाजिक दृष्टि से एक आधुनिक भारत की
नींव डाली. इसलिए यदि जल्दी थी तो भी उसमें में कुछ बुराई नहीं थी. सच पूछा जाये तो
उस समय विभाजन की वास्तविकता को स्वीकार कर नेहरु व पटेल ने शेष भारत को बचा लिया,
जो शायद स्वतंत्रता पाने में और देरी करने से नहीं बचता.
जसवंत की किताब पर टिप्पणी करते हुए सुषमा स्वराज ने कहा कि भारत विभाजन के संर्दभ
में सरदार पटेल की आलोचना नहीं करना चाहिए. सुषमा स्वराज शायद भूल जाती है कि
विभाजन की वास्तविकता को स्वीकार करते हुए सरदार पटेल ने कहा था कि यदि शरीर के किसी
अंग में कैंसर हो जाता है तो उसे काटकर फेंक देना ही उचित होगा. उचित यही होगा कि
हम इतिहास की वास्तविकताओं से परे जा कर अपने तरीके से मुद्दों को स्थापित करने का
प्रयास करने के बजाये इतिहास से सीखने की कोशिश करें.
22.08.2009, 14.57
(GMT+05:30) पर प्रकाशित