पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

संघर्ष को रचनात्मकता देने वाले अनूठे जॉर्

पूर्वोत्तर व कश्मीर में घिरी केंद्र सरकार

भीड़ के ढांचे का सच खुल चुका

अंतिम सांसे लेता वामपंथ

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

पूर्वोत्तर व कश्मीर में घिरी केंद्र सरकार

भीड़ के ढांचे का सच खुल चुका

रिकॉर्ड फसल लेकिन किसान बेहाल

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
 पहला पन्ना > मुद्दा > राजस्थानPrint | Send to Friend | Share This 

थार का सरकारी अकाल

मुद्दा

 

थार का सरकारी अकाल

शिरीष खरे, बाडमेर, राजस्थान से लौटकर

 


थार में फिर अकाल के हालात बन पड़े हैं- इस समय की सबसे खतरनाक पंक्ति को सवाल की तरह कहा जाना चाहिए. दरअसल अकाल को बरसात से जोड़कर देखा जाता है और राजस्थान के अकालग्रस्त जिलों से लेकर जयपुर या दिल्ली तक नेताओं, अफसरों और जनता के बड़े तबके तक यही समझ बनी हुई है. कुछ तो जानबूझकर और कुछ मजबूरी में. लेकिन हकीकत यह भी है कि आस्ट्रेलिया या खाड़ी जैसे दुनिया के अनेक हिस्सों में तो और भी कम बरसात होती है मगर वहां अकाल का साया नहीं पड़ता. तो क्या भारत में अकाल की जड़े सरकारी अनदेखी से जुड़ी हैं ?

बाडमेर में अकाल

 

अंग्रेजी हुकूमत में अकाल से निपटने के लिए 'फेमिन कोड' (अकाल संहिता) बुकलेट बनी थी. हमारी सरकार आज तक उसी को लेकर बैठी है. आस्ट्रेलिया, अमेरिका, इंग्लैंड और सऊदी अरब जैसे देशों में अकालरोधी नीतियां हैं; भारत देश या राजस्थान प्रदेश में जहां 100 में से 90 साल सूखा पड़ता है, कोई नीति नहीं है.

 

बायतु, बाड़मेर के भंवरलाल चौधरी और उनके साथी कहते हैं- पानी, अनाज और चारे का न होना ही अकाल है. अगर पीने के लिए पानी, लोगों को अनाज और पशुओं को चारा मिल जाए तो फिर पानी गिरे या न गिरे, काहे का अकाल.

 

जाहिर है, अपनी सरकार लापरवाही छिपाने के लिए अकाल से बरसात को जोड़कर चलती है और जनता भी लकीर की फकीर बनी हुई है.

 

जयपुर से 500 किलोमीटर दूर, पाकिस्तान की सरहद से 100 किलोमीटर पहले, पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तानी जिले बाड़मेर में बायतु ब्लाक के कई अनदेखे गांव इस हकीकत को बयां कर रहे हैं. बायतु, लाहौर जाने वाली थार एक्सप्रेस का छोटा-सा पड़ाव है. वैसे तो सूखे की ज्यादातर योजनाएं यही के लिए बनती हैं, जो जयपुर से जोधपुर आते-आते खप जाती हैं और यहां के लोगों के हिस्से में रह जाती हैं अगले साल के मानसून वाले बादलों की आस.

अकाल का घर

बाड़मेर जिले में 100 सालों के आकड़े देखें तो 80 साल सूखे के काले साए में बीते. बाकी 20 सालों में से 10 साल सुकाल और 10 साल 50-50 वाला हिसाब-किताब रहा.

 

फसलों का उत्पादन देखें तो 100 में से 30 साल 0 (शून्य) प्रतिशत और 20 साल 10-20 प्रतिशत (बेहद मामूली) उत्पादन रहा. बाकी बचे 50 में से 20 साल 20-30 प्रतिशत, 10 साल 30-40 प्रतिशत, 10 साल 50-60 प्रतिशत और 10 साल 70 प्रतिशत तक उत्पादन हुआ.

 

पानी की जरूरत को देखें तो कुल जरूरत का 10 प्रतिशत भी पूरा नहीं हो पाता, बाकी 90 प्रतिशत की पूर्ति के लिए निजी टांके से 40 प्रतिशत, सरकारी टैंकरों से 10 प्रतिशत और खारे पानी से 20 प्रतिशत तक की भरपाई होती है. फिर भी 30 प्रतिशत का भारी अंतर रहता है, जिसका कोई स्त्रोत नहीं.

 

निजी टांके से जो 40 प्रतिशत पानी की भरपाई होती है, वह भी बरसात के भरोसे है. अगर बूंदे न बरसीं तो निजी टांके की भरपाई का प्रतिशत 40 से लुढ़ककर 5 प्रतिशत तक आ जाता है. तब खारे पानी की भरपाई 20 से 40 प्रतिशत तक बढ़ाना एक मजबूरी है.

 

इस बार मानसून फिर दगा दे गया. बंगाल की खाड़ी में कम दबाव वाले क्षेत्र के कमजोर होने से राजस्थान के 27 जिले भंयकर सूखे से ग्रस्त घोषित किए गए हैं. केंद्रीय रुक्ष क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, काजरी के मुताबिक इस साल 2002 से भी खतरनाक अकाल के हालात हैं. बाड़मेर सहित 6 जिलों में औसत से 60 फीसदी कम बरसात हुई जिससे बाजरा, पानी, कितना सूखा, कितनी उपज, कितनी आमदनी, गरीबी, बेकारी, पलायन, कर्ज, योजनाएं गुहार और मोठ की फसलें फिर खड़ी-खड़ी सूख रही हैं. नतीजतन अभी से हिसाब लगाया जा रहा है- कितना, फायदे, दावे, कायदे..... और वायदे!

 

सूखे का फायदा

1947 के बाद, 62 सालों में एक बार सूखे का स्थायी हल खोजने की कोशिश हुई थी.  राजीव गांधी के समय, पंजाब के हरिकेन बांध से जो इंदिरा-गांधी नहर गडरा (बाड़मेर) तक आनी थी, उसे भी केंद्रीय सत्ता में बैठी ताकतों ने अपने फायदे के लिए मोड़ लिया. नहर को गंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर से होकर करीब 800 किमी का रास्ता तय करना था, जैसे ही यह 300 किमी दूर बीकानेर पहुंची वैसे ही तत्कालीन कपड़ा मंत्री अशोक गहलोत (अबके मुख्यमंत्री) ने पाइपलाइन का रुख जोधपुर की कायलाना झील की तरफ करवा दिया. इससे पहला फायदा महाराजा गजोसिंह को हुआ और झील का पट्टा आज भी उन्हीं के नाम चढ़ा हुआ है. पानी पहुंचते ही  पर्यटन का उनका धंधा लहलहा उठा, होटल तो था ही, हुजूर ने वाटर रिसोर्स सेंटर के नाम पर महल भी बनवा लिया. अशोक गहलोत, जो खुद भी माली जाति और जोधपुर इलाके से हैं, उन पर माली लॉबी के दबाव में काम करने का आरोप लगा क्योंकि पाइपलाइन मोड़ने का दूसरा फायदा माली जाति के कुओं को रिचार्ज करने में हुआ. लिहाजा असली प्रभावितों की आंखे बेवफा बादलों को घूरती रह गई.

 

1990 में सरकार ने पैसा बटोरने के लिए हरे-भरे खेतों से कलकल बहती नहर की तस्वीर दिखाई थी. अपनी जिंदगी में भी हरियाली लाने के लिए लोगों ने सरकार से नहर के आसपास की जमीनें खरीदी थीं. पनावड़ा, मनावड़ी, भियाड़ और भीमड़ा के गांव वाले अब बताते हैं कि जिनके पास पैसा नहीं था, उन्होंने घर की औरतों के गहने तक बेचे और बोली लगा-लगाकर जमीनें खरीदी थीं. उन्होंने पांच एकड़ की रूखी जमीन के टुकड़े को एक लाख से 5 लाख रु. तक में खरीदा, जंगली झाड़-पेड़ उखाड़े और फिर उन्हें पहले मैदानों में और खेतों में बदला. मगर यह विडंबना ही है कि उस समय भी उन जमीनों की कीमत कुछ नहीं थी, आज भी कुछ नहीं है. वहां रेतीली आंधियों से सिर्फ रेत की नहरें बनती और बिगड़ती रही.

 

अकाल का हाल

उन्हें पीने के पानी की हरेक बूंद का ख्याल रहता है. महंगा पानी खरीदने से मजूरी का बड़ा हिस्सा पानी में जाता है. कन्नौड़, कोल्हू, अकड़दरा, चिड़िया जैसे कई गांवों में खारे पानी के टयूवबेल दिखते हैं, जो केवल यहीं दिखते हैं और यदा-कदा, टयूवबेल में बाकायदा सरकार के बिजली कनेक्शन लगे हैं. रेतीली मिट्टी में साल्ट ज्यादा होने से पानी रिसते-रिसते अपनी मिठास खो देता है. इसके बावजूद रेतीली जमीन के 250-300 फीट नीचे से खारे पानी को बरसात के मीठे पानी में मिलाकर लोग अपना गला गीला करते हैं. इन्हीं दिनों असंख्य आवारा और घरेलू जानवर असमय मौत के शिकार बनते हैं.

आगे पढ़ें

Pages:
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Jitendra Dave Mumbai

 
 I think Surendra Singh is absolutely right. 
   
 

Ajay kumar singh नोयडा

 
 शिरीष भाई, अकाल की यह हालत हमेशा से रही है और इसके पीछे सरकार का ही हाथ है, वही सरकार जो अपने को जनहितकारी बताते नहीं थकती. सुरेंद्र जी, आपने लगता है धूमिल जी की अकाल-दर्शन कविता नहीं पढ़ी. यह लंबी कविता है और मुझे इसकी कुछ पंक्तियां याद हैं-

उस मुहावरे को समझ गया हूँ
जो आज़ादी और गांधी के नाम पर चल रहा है
जिससे न भूख मिट रही है, न मौसम
बदल रहा है.

लोग बिलबिला रहे हैं (पेड़ों को नंगा करते हुए)
पत्ते और छाल
खा रहे हैं
मर रहे हैं, दान
कर रहे हैं.

जलसों-जुलूसों में भीड़ की पूरी ईमानदारी से
हिस्सा ले रहे हैं और
अकाल को सोहर की तरह गा रहे हैं.
झुलसे हुए चेहरों पर कोई चेतावनी नहीं है.
 
   
 

सुरेंद्र सिंह परिहार भीलवाड़ा

 
 सरकार क्या करती है, यब बात किसी से छुपी हुई नहीं है. राजस्थान के नजाति क्षेत्रीय विकास, तकनीकी शिक्षा मंत्री महेन्द्रजीतसिंह मालवीया ने पिछले हफ्ते तीजवड में जो कुछ कहा, वह सरकार की स्थिति को स्पष्ट करता है. अकाल के सवाल पर ये रहा मान्यवर मालवीया का प्रवचन- “ सरकार द्वारा क्षेत्रीय विकास के लिए कई प्रकार की योजनाएं चलाई जा रही है परंतु आमजनों द्वारा सरकारी योजनाओं में मन लगाकर कार्य नहीं किया जा रहा है और इसी कारण इसका अपेक्षित लाभ नहीं प्राप्त हो रहा है व विकास प्रक्रिया बाधित हो रही है.”

जब नेता और मंत्री इतनी बेशर्मी से आम जनता को अपनी विकास में बाधक घोषित कर देते हों, उनसे कोई भी उम्मीद बेमानी है.
 
   
[an error occurred while processing this directive]
 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in