पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
 पहला पन्ना > बात निकलेगी तो... > समाजPrint | Send to Friend | Share This 

जसवंत, जिन्ना और विभाजन का जिन्न

बात निकलेगी तो...


जसवंत, जिन्ना और विभाजन का जिन्न

राम पुनियानी

मोहम्मद अली जिन्ना पर जसवंत सिंह की हालिया किताब ने एक बार फिर विभाजन के जिन्न को बोतल से बाहर निकाल दिया है. विभाजन के लिए कौन जिम्मेदार था और कौन नहीं, कौन कम जिम्मेदार था और कौन ज्यादा-इन मुद्दों पर देश में बहस-मुबाहिसे का एक दौर सा शुरू हो गया है. इस किताब ने कितना बड़ा बवंडर खड़ा कर दिया है यह इससे स्पष्ट है कि इसके कारण भारतीय जनता पार्टी ने अपने तीन दशक पुराने, बड़े व सम्मानित नेता को बाहर का रास्ता दिखला दिया है.

मोहम्मद अली जिन्ना और महात्मा गांधी

जसवंत सिंह की किताब का लब्बोलुआब यह है कि जिन्ना एक धर्मनिरपेक्ष नेता थे, उन्हें भारत में अकारण ही खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और यह कि नेहरू और पटेल, न कि जिन्ना विभाजन के लिए जिम्मेदार थे. नेहरू और पटेल के कारण देश के दो टुकड़े हुए, देश में भारी खून-खराबा हुआ और उसी कारण आज तक भारत में मुसलमानों के साथ परायों जैसा व्यवहार होता है.

जहां तक मुसलमानों के साथ परायों जैसे व्यवहार का सवाल है, इसमें कोई संदेह नहीं कि मुसलमानों को उनके पराये होने का अहसास पहले भी होता था और आज भी होता है. इस स्थिति के लिए भाजपा कम जिम्मेदार नहीं है. मुसलमान हमेशा से भाजपा के निशाने पर रहे हैं और अगर उनके साथ सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में भेदभाव हो रहा है तो इसके लिए भाजपा भी कम दोषी नहीं है. मुसलमानों को पराया बनाने में भाजपा की आक्रामक नीतियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

जब भाजपा हिन्दू राष्ट्र की बात करती थी, उस समय जसवंत सिंह कहां थे? क्या वे उस पार्टी के एक महत्वपूर्ण नेता नहीं थे? मुख्यत:, भाजपा के कारण आज मुसलमान दूसरे दर्जे के नागरिक बन गए हैं. हम यह नहीं कहते कि मुसलमानों के दु:खों और परेशानियों का एकमात्र कारण भाजपा है परंतु यह भी साफ है कि भारतीय जनमानस में गहरे तक घर कर गईं आरएसएस की विचारधारा की जड़ें, मुसलमानों की मुसीबतों के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं. यद्यपि जसवंत सिंह शायद कभी खाकी हॉफ पेन्ट पहनकर आरएसएस की शाखा में नहीं गए परंतु वे उस पार्टी में महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं जिस पार्टी को संघ ने अपना एजेन्डा लागू करने के माध्यम के रूप में चुना है. क्या ऐसा नहीं लगता कि जसवंत सिंह की मुसलमानों के प्रति चिंता, घड़ियाली आंसू से अधिक कुछ नहीं हैं?

जहां तक जिन्ना की धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबध्दता का प्रश्न है, हम यह कैसे भूल सकते हैं कि जिस पार्टी के जिन्ना सर्वोच्च नेता थे, उस पार्टी का नाम ही मुस्लिम लीग था. सिर्फ यह तथ्य ही जिन्ना के सेक्युलरिज्म की पोल खोलने के लिए काफी है. यह सही है कि जिन्ना पश्चिमी संस्कृति में रचे-बसे थे. यह भी सही है कि उन्होंने अपने राजनैतिक कैरियर की शुरूआत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से की थी परंतु हम इस तथ्य को कैसे नकार सकते हैं कि बाद के दिनों में वे मुसलमानों के ''एकमात्र प्रवक्ता व हितरक्षक'' के रूप में उभरे. यह बात अलग है कि वे जिन मुसलमानों का प्रतिनिधि होने का दम भरते थे, उनमें गरीब और अपढ़ मुसलमान शामिल नहीं थे.

जिन्ना केवल मुसलमानों के श्रेष्ठि वर्ग के हितसंरक्षक थे. पाकिस्तान के कायदे-आज़म में व्यक्तिगत तौर पर कई गुण रहे होंगे और थे भी परंतु इससे वे धर्मनिरपेक्ष नहीं बन जाते. धर्मनिरपेक्ष कहलाने की एक आवश्यक शर्त यह है कि धर्म, उस व्यक्ति का निजी मसला रहे और उसके सार्वजनिक जीवन में धर्म की कोई भूमिका न हो. इस कसौटी पर जिन्ना कतई खरे नहीं उतरते. उन्होंने मुस्लिम लीग का नेतृत्व स्वीकार किया, जो एक ऐसी पार्टी थी जिसमें धार्मिक पहचान ही राष्ट्रीय पहचान का आधार थी.

अन्य कई ऐसे मुस्लिम नेता थे जिन्होंने केवल मुसलमानों का नेतृत्व करने की बजाए मिली-जुली भारतीय राष्ट्रीयता के पेरोकार, हमारे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ना बेहतर समझा. इनमें मौलाना अबुल कलाम आजाद, खान अब्दुल गफ्फार खान और रफी अहमद किदवई शामिल थे.

मुस्लिम लीग कभी सभी मुसलमानों की पार्टी नहीं बन सकी. अधिकांश गरीब मुसलमान, महात्मा गांधी और राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रशंसक और समर्थक बने रहे. यहां तक कि कई मुस्लिम धार्मिक नेता और बरेली और देवबंद के इस्लामिक शिक्षा के केन्द्र मिली-जुली भारतीय राष्ट्रीयता के हामी बने रहे. जिस मुस्लिम लीग को मुस्लिम जमींदारों और नवाबों ने अपने हितों की रक्षा के लिए बनाया था, उससे बाद में कुछ शिक्षित मुस्लिम भी जुड़ गए. लीग मुसलमानों के बीच अपनी सीमित पैठ के बावजूद पूरे मुसलमानों के हितों की रक्षक होने का दावा करती रही और कांग्रेस को हिन्दू पार्टी कहकर बदनाम करती रही. यह तब, जबकि कांग्रेस की नीतियां और कार्यक्रम पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष थे.

मुसलमानों के हित संरक्षण से बढ़ते-बढ़ते बात ''मुसलमान एक अलग राष्ट्र हैं'' तक पहुंच गई. हिन्दुओं के बारे में भी ठीक यही बात सावरकर और आरएसएस ने कहनी शुरू कर दी. यह कहा जाने लगा कि ''हिन्दू एक अलग राष्ट्र हैं'' और यह भी कि ''भारत एक हिन्दू राष्ट्र है''.
आगे पढ़ें

Pages:
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

ramesh kumar (rk140676.gmail.com) azamgarh

 
 भाजपा के पास idol की कमी है इसीलिए वो कभी भगत सिंह तो कभी आंबेडकर और कभी जिन्ना में अपना आदर्श खोज रही है. 
   
 

emteyazalam Ranchi

 
 जसवंत सिंह इतिहास के बारे मैं ज्यादा ज्ञान नहीं रखते हैं .वो सिर्फ बेकार की बकवास कर दिए हैं .उनको जिन्ना के नेशनल मुस्लिम गार्ड्स और डायरेक्ट एक्शन के बारे मैं कुछ भी नहीं मालूम होगा . नेशनल मुस्लिम गार्ड्स कायदे आजम के खुफिया हिदायत के मोताबिक सारे भारत मैं डायरेक्ट एक्शन के लिए सभी मजदूर युनिओन के मुस्लमान कर्मचरियों को ड्यूटी के बाद लाठी चलाना , कुश्ती करना और जुमे की नमाज के बाद कलकत्ता और बमबई की मस्जिदों में छुरा चलाना और बंदूख चलाना सिखाया जाता था. सारी मस्जिदों में यह तैय्यारियाँ १९४७ से की जा रही थी. सभी मुसलमानों का मस्जिद जाना अनिवार्य कर दिया गया था और नेशनल मुस्लिम गार्ड्स के केप्टेंस को हर हफ्ते अपनी सारी रिपोर्ट मुस्लिम लीग के ऑफिस में देनी होती थी.

इन सब बातों की पूरी रिपोर्ट माउंट प्लेजेंट, बंगला नंबर १०, मालाबार हिल्स, बम्बई जहाँ मुस्लिम लीग का हेड ऑफिस था में भेज दी जाती थी. इन सब बातों का एक ही मकसद था कि जहाँ पाकिस्तान बनना है उस इलाके को हिन्दुओं से खाली करा लिया जाये . इसके लिए जरुरी था कि हिन्दुओं को मार पिट कर ,डरा धमका कर वहां से भगा दिया जाये या उन सब को मुस्लमान बना दिया जाये और पाकिस्तान के लिए दो शहर बहुत जरुरी थे लाहोर और कलकाता . इसके आलावा भी बहुत सी बातें जो इतिहास कि परतों में खो गयी हैं और इन सब के पीछे सिर्फ एक ही कुराफाती दिमाग था जिन्ना का, जिसे कभी नहीं भूलना चाहिए .
 
   
 

Bsnshi Lal (vermabanshi@yahoo.in) ghaziabad

 
 भाजपा को पहले हिंदूवादी पार्टी माना गया था. केंद्र में सत्ता में आने के बाद भाजपा ने धारा 370, समान नागरिक कानून, राम मंदिर आदि से किनारा कर दिया. मैंने अपनी कविता में कंधार के बाद उनके शासन में लिखा था -
“मुझे ये मालूम होता, कि तुम्हारी बड़बोले बयानों के, पीछे छुपा है एक कायर दिमाग, तो सच कहता हूं तुम्हारी ताजपोशी से पहले अपने हाथों को कलम कर देता.”
वास्तव में भाजपा लीक से भटका हुआ मुसाफिर है.
 
   
 

vivek sanyal (vvksanyal@gmail.com) Mumbai

 
 बीजेपी के पास सांप्रदायिकता को छोड़कर कोई विषय ही नहीं है, ना कभी रहा है. तो उनके नेता क्या लिखेंगे... सत्ता से दूर हैं तो अभी और भी सत्यवादी बाहर आएंगे. 
   
[an error occurred while processing this directive]
 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in