जसवंत, जिन्ना और विभाजन का जिन्न
बात निकलेगी तो...
जसवंत, जिन्ना और विभाजन का जिन्न
राम पुनियानी
मोहम्मद अली जिन्ना पर जसवंत सिंह की हालिया किताब ने एक
बार फिर विभाजन के जिन्न को बोतल से बाहर निकाल दिया है. विभाजन के लिए कौन
जिम्मेदार था और कौन नहीं, कौन कम जिम्मेदार था और कौन ज्यादा-इन मुद्दों पर देश
में बहस-मुबाहिसे का एक दौर सा शुरू हो गया है. इस किताब ने कितना बड़ा बवंडर खड़ा कर
दिया है यह इससे स्पष्ट है कि इसके कारण भारतीय जनता पार्टी ने अपने तीन दशक
पुराने, बड़े व सम्मानित नेता को बाहर का रास्ता दिखला दिया है.
जसवंत सिंह की किताब का लब्बोलुआब यह है कि जिन्ना एक धर्मनिरपेक्ष नेता थे, उन्हें
भारत में अकारण ही खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और यह कि नेहरू और
पटेल, न कि जिन्ना विभाजन के लिए जिम्मेदार थे. नेहरू और पटेल के कारण देश के दो
टुकड़े हुए, देश में भारी खून-खराबा हुआ और उसी कारण आज तक भारत में मुसलमानों के
साथ परायों जैसा व्यवहार होता है.
जहां तक मुसलमानों के साथ परायों जैसे व्यवहार का सवाल है, इसमें कोई संदेह नहीं कि मुसलमानों को उनके पराये होने का अहसास पहले भी
होता था और आज भी होता है. इस स्थिति के लिए भाजपा कम जिम्मेदार नहीं है. मुसलमान
हमेशा से भाजपा के निशाने पर रहे हैं और अगर उनके साथ सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों
में भेदभाव हो रहा है तो इसके लिए भाजपा भी कम दोषी नहीं है. मुसलमानों को पराया
बनाने में भाजपा की आक्रामक नीतियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.
जब भाजपा हिन्दू राष्ट्र की बात करती थी, उस समय जसवंत सिंह कहां थे? क्या वे उस
पार्टी के एक महत्वपूर्ण नेता नहीं थे? मुख्यत:, भाजपा के कारण आज मुसलमान दूसरे
दर्जे के नागरिक बन गए हैं. हम यह नहीं कहते कि मुसलमानों के दु:खों और परेशानियों
का एकमात्र कारण भाजपा है परंतु यह भी साफ है कि भारतीय जनमानस में गहरे तक घर कर
गईं आरएसएस की विचारधारा की जड़ें, मुसलमानों की मुसीबतों के लिए काफी हद तक
जिम्मेदार हैं. यद्यपि जसवंत सिंह शायद कभी खाकी हॉफ पेन्ट पहनकर आरएसएस की शाखा
में नहीं गए परंतु वे उस पार्टी में महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं जिस पार्टी को संघ
ने अपना एजेन्डा लागू करने के माध्यम के रूप में चुना है. क्या ऐसा नहीं लगता कि
जसवंत सिंह की मुसलमानों के प्रति चिंता, घड़ियाली आंसू से अधिक कुछ नहीं हैं?
जहां तक जिन्ना की धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबध्दता का प्रश्न है, हम यह कैसे
भूल सकते हैं कि जिस पार्टी के जिन्ना सर्वोच्च नेता थे, उस पार्टी का नाम ही
मुस्लिम लीग था. सिर्फ यह तथ्य ही जिन्ना के सेक्युलरिज्म की पोल खोलने के लिए काफी
है. यह सही है कि जिन्ना पश्चिमी संस्कृति में रचे-बसे थे. यह भी सही है कि
उन्होंने अपने राजनैतिक कैरियर की शुरूआत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से की थी परंतु
हम इस तथ्य को कैसे नकार सकते हैं कि बाद के दिनों में वे मुसलमानों के ''एकमात्र
प्रवक्ता व हितरक्षक'' के रूप में उभरे. यह बात अलग है कि वे जिन मुसलमानों का
प्रतिनिधि होने का दम भरते थे, उनमें गरीब और अपढ़ मुसलमान शामिल नहीं थे.
जिन्ना केवल मुसलमानों के श्रेष्ठि वर्ग के हितसंरक्षक थे. पाकिस्तान के कायदे-आज़म
में व्यक्तिगत तौर पर कई गुण रहे होंगे और थे भी परंतु इससे वे धर्मनिरपेक्ष नहीं
बन जाते. धर्मनिरपेक्ष कहलाने की एक आवश्यक शर्त यह है कि धर्म, उस व्यक्ति का निजी
मसला रहे और उसके सार्वजनिक जीवन में धर्म की कोई भूमिका न हो. इस कसौटी पर जिन्ना
कतई खरे नहीं उतरते. उन्होंने मुस्लिम लीग का नेतृत्व स्वीकार किया, जो एक ऐसी
पार्टी थी जिसमें धार्मिक पहचान ही राष्ट्रीय पहचान का आधार थी.
अन्य कई ऐसे मुस्लिम नेता थे जिन्होंने केवल मुसलमानों का नेतृत्व करने की बजाए
मिली-जुली भारतीय राष्ट्रीयता के पेरोकार, हमारे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ना बेहतर
समझा. इनमें मौलाना अबुल कलाम आजाद, खान अब्दुल गफ्फार खान और रफी अहमद किदवई शामिल
थे.
मुस्लिम लीग कभी सभी मुसलमानों की पार्टी नहीं बन सकी. अधिकांश गरीब मुसलमान,
महात्मा गांधी और राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रशंसक और समर्थक बने रहे. यहां
तक कि कई मुस्लिम धार्मिक नेता और बरेली और देवबंद के इस्लामिक शिक्षा के केन्द्र
मिली-जुली भारतीय राष्ट्रीयता के हामी बने रहे. जिस मुस्लिम लीग को मुस्लिम
जमींदारों और नवाबों ने अपने हितों की रक्षा के लिए बनाया था, उससे बाद में कुछ
शिक्षित मुस्लिम भी जुड़ गए. लीग मुसलमानों के बीच अपनी सीमित पैठ के बावजूद पूरे
मुसलमानों के हितों की रक्षक होने का दावा करती रही और कांग्रेस को हिन्दू पार्टी
कहकर बदनाम करती रही. यह तब, जबकि कांग्रेस की नीतियां और कार्यक्रम पूरी तरह से
धर्मनिरपेक्ष थे.
मुसलमानों के हित संरक्षण से बढ़ते-बढ़ते बात ''मुसलमान एक अलग राष्ट्र हैं'' तक
पहुंच गई. हिन्दुओं के बारे में भी ठीक यही बात सावरकर और आरएसएस ने कहनी शुरू कर
दी. यह कहा जाने लगा कि ''हिन्दू एक अलग राष्ट्र हैं'' और यह भी कि ''भारत एक
हिन्दू राष्ट्र है''.
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मुसलमानों के हित संरक्षण से
बढ़ते-बढ़ते बात ''मुसलमान एक अलग राष्ट्र हैं'' तक पहुंच गई. हिन्दुओं के बारे में
भी ठीक यही बात सावरकर और आरएसएस ने कहनी शुरू कर दी. यह कहा जाने लगा कि ''हिन्दू
एक अलग राष्ट्र हैं'' और यह भी कि ''भारत एक हिन्दू राष्ट्र है''. जिन्ना के इस
दावे में कोई दम नहीं था कि सभी मुसलमानों के हित समान थे. क्या अशरफ और अरज़ल
मुसलमानों के हित समान थे? क्या रईस मुस्लिम जमींदारों और गरीब मुसलमान बुनकरों के
हितों में तनिक सी भी समानता थी? कतई नहीं.
इसी तरह, सावरकर और संघ जिन ''हिन्दू हितों'' की बात कर रहे थे वे कौन से हिन्दू
थे? मोटे तौर पर संघ व सावरकर हिन्दुओं के उसी आर्थिक-सामाजिक वर्ग के पोषक थे जिस
वर्ग के मुसलमानों की पैरोकार मुस्लिम लीग थी.
जिन्ना के 12 अगस्त 1947 के ''सेक्युलर भाषण'' से इस तथ्य को नहीं झुठलाया जा सकता
कि मुस्लिम लीग में ऐसे साम्प्रदायिक तत्वों का बोलबाला था जो पाकिस्तान को एक
मुस्लिम राष्ट्र बनाने के लिए कटिबध्द थे और यह उन्होंने किया भी. जिन्ना के
नेतृत्व में ही मुस्लिम लीग ने सन् 1940 के लाहौर प्रस्ताव के जरिए मुसलमानों के
लिए पाकिस्तान नाम से अलग देश बनाए जाने की मांग की थी. मात्र इसलिए कि जिन्ना नमाज
नहीं पढ़ते थे या उन्हें शराब से परहेज नहीं था, उन्हें धर्मनिरपेक्ष नहीं कहा जा
सकता. केवल पश्चिमी रहन-सहन के कारण वे सेक्युलर नहीं कहला सकते. अपने राजनैतिक और
सार्वजनिक जीवन में किसी व्यक्ति का आचार-व्यवहार ही उसे धर्मनिरपेक्ष या
साम्प्रदायिक बनाता है.
विभाजन के लिए कौन जिम्मेदार था-मुस्लिम लीग या फिर नेहरू व पटेल-इस विषय पर अक्सर
बहुत सतही ढंग़ से विचार किया जाता है. हमारे सामने केवल इतना प्रश्न नहीं है कि
विभाजन की त्रासदी का कौन नायक था और कौन खलनायक.
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राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन सभी धर्मों, जातियों,
क्षेत्रों और दोनों लिंगों के लोगों को एक साथ जोड़ने का हामी था. यह नीति न तो
हिन्दू महासभा और न ही मुस्लिम लीग को पसंद थी |
इस मुद्दे पर विचार करते समय धर्म-आधारित राष्ट्र में विश्वास करने वाले राजनैतिक
दलों व संगठनों और ब्रिटिश सरकार की भूमिका पर भी हमें गहराई से चिंतन करना होगा.
पाकिस्तान में ''हिन्दू कांग्रेस'' की हठधर्मिता को विभाजन के लिए दोषी ठहराया जाता
है. हमारे देश में मुस्लिम लीग और जिन्ना को खलनायक बतलाया जाता है. घृणा की
राजनीति का प्रणेता, आरएसएस- महात्मा गांधी को सबसे अधिक दोषी मानता है.
संघ और हिन्दू महासभा के विचार, नाथूराम गोड़से के भाषणों
और महात्मा गांधी की हत्या करने के उसके कृत्य से, स्पष्ट हैं. इन संगठनों का मानना
है कि गांधीजी ने मुसलमानों का तुष्टिकरण किया जिससे उनकी हिम्मत बढ़ गई और वे इतने
आक्रामक हो गए कि अपने लिए अलग देश मांगने लगे. साम्प्रदायिक शक्तियों की इस
विवेचना में उनकी स्वयं की व ब्रिटिश सरकार की भूमिका की कहीं चर्चा नहीं होती.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन सन् 1885 में उद्योगपतियों, व्यवसायियों, शहरी
शिक्षित वर्ग और संगठित श्रमिक वर्ग ने एक मंच पर आकर किया था. इन सभी वर्गों का उस
समय उदय हुआ ही था. जिन वर्गों का सूरज अस्त हो रहा था वे थे जमींदार और राजा-नवाब.
इन वर्गों ने सन् 1888 में युनाईटेड इंडिया पेट्रियाटिक एसोसिएशन नामक संगठन बनाया.
इस संगठन में काशी के राजा और ढ़ाका के नवाब कंधे से कंधा मिलाकर काम करते थे. यहीं
से हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग के निर्माण की नींव पड़ी.
बांटो और राज करो की अपनी नीति के तहत, ब्रिटिश सरकार ने
सन् 1906 में मुस्लिम लीग को मुसलमानों के प्रतिनिधि के तौर पर मान्यता दे दी. उस
समय लीग के अधिकांश सदस्य मुसलमानों के उच्च आर्थिक-सामाजिक तबके से आते थे. उनके
मन में अरजल और अफजल जैसे निम्न जाति के मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं थी. इसी
तरह, सन् 1915 में अस्तित्व में आई हिन्दू महासभा भी हिन्दू श्रेष्ठि वर्ग का संगठन
थी. नीची जातियों के और हाथों से काम करने वाले हिन्दुओं से हिन्दू महासभा को कोई
लेना-देना नहीं था.
हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग के एजेन्डा लगभग समान थे और वे एक सी भाषा बोलते थे.
दोनों संगठनों में पुरूषों का वर्चस्व था. दोनों संगठन केवल धार्मिक पहचान को महत्व
देते थे. जाति और लिंग भेद समाप्त करने में दोनों की ही कोई दिलचस्पी नहीं थी.
उन्हें सिर्फ अपने-अपने धर्मों के कुलीन तबके से मतलब था. यही कारण है कि हिन्दू
महासभा और मुस्लिम लीग, दोनों ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से दूरी बनाकर रखी.
राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन सभी धर्मों, जातियों क्षेत्रों और दोनों लिंगों के
लोगों को एक साथ जोड़ने का हामी था. यह नीति न तो हिन्दू महासभा और न ही मुस्लिम लीग
को पसंद थी.
जिन्ना केवल संवैधानिक सुधारों के जरिए स्वराज पाना चाहते थे. वे स्वतंत्रता आंदोलन
में आम जनों की भागीदारी के हामी नहीं थे. हिन्दू महासभा और आरएसएस भी, लीग की तरह,
स्वतंत्रता आंदोलन से दूर रहे. सावरकर ने सबसे पहिले हिन्दू राष्ट्र और उसकी
राजनीति (हिन्दुत्व) की अवधारणा प्रस्तुत की और इसे बाद में संघ ने अपना लिया. लीग
और हिन्दू साम्प्रदायिक संगठनों के विचार एक-दूसरे से बहुत मिलते थे.
सावरकर ने जिन्ना के उस वक्तव्य की सराहना की थी जिसमें
जिन्ना ने कहा था कि भारत में दो राष्ट्र हैं-हिन्दू और मुस्लिम. सावरकर ने उसमें
यह अवश्य जोड़ा कि चूंकि भारत में हिन्दू राष्ट्र की प्रधानता है इसलिए मुस्लिम
राष्ट्र को उसके अधीन रहना होगा. लीग और हिन्दू महासभा-आरएसएस के विचारों में जो
एकमात्र अंतर था वह यह था कि जहां लीग हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच समानता चाहती
थी वहीं संघ, मुस्लिम राष्ट्र को हिन्दू राष्ट्र के अधीन रखने का हामी था.
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हिन्दू साम्प्रदायिक तत्व कई
हिस्सों में बंट गए. कुछ हिन्दू महासभा में थे, कुछ आरएसएस में और कुछ ने कांग्रेस
में घुसपैठ कर ली. इसके विपरीत, मुस्लिम साम्प्रदायिक तत्व एक ही झंडे तले बने रहे
और बाद में उन्हें मुसलमानों के शिक्षित वर्ग के एक हिस्से का समर्थन भी हासिल हो
गया.
विभाजन के पीछे के कारणों को हमें इस पृष्ठभूमि में समझना होगा. मुस्लिम लीग और
हिन्दू महासभा-आरएसएस अपने-अपने ''राष्ट्रों'' पर नियंत्रण स्थापित करना चाहती थीं.
कांग्रेस और राष्ट्रीय स्वाधीनता
आंदोलन का लक्ष्य
स्वतंत्रता पाना और सामंती व्यवस्था से मुक्त होकर एक प्रजातांत्रिक समाज की
स्थापना करना था. लक्ष्यों की इसी विभिन्नता के चलते पंडित नेहरू ने 1937 में
मुस्लिम लीग के सदस्यों को उत्तरप्रदेश की सरकार में शामिल करने से इंकार कर दिया
था. चुनाव में हार के बावजूद लीग की यह मांग थी कि उसे सरकार में जगह दी जाए.
पंडित नेहरू का तर्क था कि चूंकि उत्तरप्रदेश सरकार भूमि सुधार और अन्य प्रगतिशील
कदम उठाना चाहती है, ऐसे में जमींदारों को मंत्री कैसे बनाया जा सकता है. पंडित
नेहरू, लीग को मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि मानने के लिए तैयार नहीं थे. ठीक उसी
तरह, जिस तरह वे हिन्दू महासभा और आरएसएस को हिन्दुओं का हितैषी और प्रवक्ता नहीं
मानते थे.
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सामन्ती मूल्यों को जिन्दा रखने के लिए हिन्दू महासभा,
मुस्लिम लीग और संघ जैसे साम्प्रदायिक दलों और संगठनों ने ही देश के विभाजन की नींव
रखी |
केबिनेट मिशन की योजना को कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने स्वीकार कर लिया था. इस
योजना के अनुसार एक ऐसा भारत बनाया जाना था जिसमें केवल प्रतिरक्षा, संचार, विदेशी
मामले व मुद्रा से जुड़े हुए विषयों पर केन्द्र सरकार का
नियंत्रण रहता व अन्य सभी मसलों पर राज्य सरकारें निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र
होतीं. संभवत: कुछ समय बाद नेहरू और पटेल को यह महसूस हुआ कि एक कमजोर केन्द्र, देश
के औद्योगीकरण, विकास और अधोसंरचना के निर्माण के लक्ष्यों को पूरा नहीं कर सकेगा.
सतही तौर पर देखने से ऐसा लग सकता है कि विभाजन के लिए नेहरू और पटेल जिम्मेदार थे
परंतु यह सही नहीं है. बंटवारे की नींव ब्रिटिश सरकार ने रख दी थी. हमारे विदेशी
शासकों ने जमींदारों, शोषकों व दोनों धर्मों के साम्प्रदायिक तत्वों को भरपूर
संरक्षण दिया. यही कारण था कि मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा पर कभी सरकार की गाज
नहीं गिरी जबकि राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के नेताओं को अपनी उम्र के कई साल जेलों
में काटने पड़े.
आडवाणी और जसवंत सिंह का जिन्ना का प्रशंसक होने का कारण स्पष्ट है. जिन्ना ने
द्विराष्ट्र सिध्दांत प्रतिपादित किया और अलग मुस्लिम राष्ट्र का सफलतापूर्वक
निर्माण किया. आडवाणी और जसवंत सिंह भी हिन्दू राष्ट्र बनाने का सपना देखते रहे हैं
परंतु यह सपना आज तक केवल सपना ही है. स्वाभाविकत: उनके और उनके जैसे धर्म-आधारित
राजनीति करने वाले अन्य नेताओं के लिए जिन्ना एक नायक हैं जो अपने लक्ष्य पाने में
सफल रहे. विचारधारा के स्तर पर आडवाणी और जसवंत सिंह अपने आपको जिन्ना के काफी
नजदीक पाते होंगे. जिन्ना की तरह वे भी धर्म-आधारित राष्ट्र के पैरोकार हैं.
आडवाणी और जसवंत सिंह को यह भी लगता होगा कि जिन्ना को विभाजन करवाने के आरोप से
बरी कर वे कांग्रेस और नेहरू को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं. यह स्पष्टत: भाजपा के
लिए उपयोगी है. परंतु इसमें एक समस्या है. समस्या यह है कि जहां तक स्वतंत्रता के
ठीक पहले की राजनीति का सवाल है, नेहरू और पटेल को एक-दूसरे से अलग करना बहुत
मुश्किल है. अगर नेहरू को दोषी करार दिया जाता है तो पटेल भी आरोपों के घेरे से
नहीं बच सकते. और पटेल को दोषी ठहराना, भाजपा के समर्थकों के एक बड़े हिस्से को कतई
रास नहीं आता.
आरएसएस की शाखाओं में विभाजन का ठीकरा, जिन्ना और गांधी व
नेहरू के सिर पर फोड़ा जाता है. ऐसे में जिन्ना की प्रशंसा से आरएसएस की शाखाओं का
पाठयक्रम गलत सिध्द हो जाएगा. इन दो कारणों से भाजपा दुविधा में फंस गई और उसे
जसवंत सिंह को पार्टी से निकालने पर मजबूर होना पड़ा. आडवाणी इसलिए बच निकले क्योंकि बीमार वाजपेयी का स्थान
लेने के लिए पार्टी के पास उनके अलावा कोई और नेता नहीं था.
इतिहास हमें बहुत से सबक सिखाता है. जिन्ना की प्रशंसा उनके कांग्रेस से जुड़ाव के
दिनों और 12 अगस्त 1947 को पाकिस्तान की संसद में दिए गए उनके भाषण के आधार पर की
जा रही है. जिन्ना को उनकी समग्रता में नहीं देखा जा रहा. ठीक इसी तरह, मध्यकालीन
इतिहास के साम्प्रदायिकीकरण करने वाले तत्व भी राजाओं को उनके धर्म के आधार पर
देवता या राक्षस की श्रेणियों में विभाजित करते रहे हैं. मजदूरों, किसानों और आम
आदमी का तो शायद इन साम्प्रदायिक इतिहासविदों के लिए कोई वजूद ही नहीं था. यही
स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास के साथ भी किया जा रहा है.
इस बात पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है कि किस प्रकार सामन्ती मूल्यों को
जिन्दा रखने के लिए हिन्दू महासभा, मुस्लिम लीग और संघ जैसे साम्प्रदायिक दलों और
संगठनों ने विभाजन की नींव रखी थी. यह कुछ वैसा ही है जैसा बंबईया फिल्मों में होता
है. विलेन में एक भी अच्छाई नहीं होती और हीरो में कोई बुराई ढूढ़े नहीं मिलती.
दुर्भाग्यवश, यथार्थ इससे बहुत अलग होता है. असली दुनिया में न तो कभी गल्ती न करने
वाले नायक होते हैं और न हमेशा पाप में रत दुष्टबुद्धि खलनायक.
29.08.2009,
18.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशित