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जिन्ना ज़िम्मेवार
बात पते की
जिन्ना ज़िम्मेदार
कनक तिवारी
भाजपा के वरिष्ठ नेता
जसवंत सिंह की विवादग्रस्त बना दी गई किताब ‘ जिन्ना: भारत विभाजन के आईने में’ ने
कई संवैधानिक, राजनीतिक और सामाजिक सवाल इसलिए खड़े कर दिए हैं क्योंकि भाजपा के
शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें इस किताब की वजह से पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया
है. अपने मौखिक निष्कासन आदेश में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने यह तो नहीं बताया
कि जसवंत सिंह ने अपनी ताजा किताब में ऐसा क्या लिख दिया है, जिसे कथित रूप से
पार्टी लाइन का उल्लंघन कहा गया. लेकिन राजनीतिक हल्कों में चर्चा के अनुसार मोटे
तौर पर जिन्ना को लेकर की गई उनकी पुनर्विचार की समझ तथा भारत-पाक विभाजन के संदर्भ
में सरदार पटेल की भूमिका को गलत तरह से चित्रित किया जाना भाजपा के दृष्टिकोण से
मेल नहीं खाता. यह अलग बात है कि कुछ समय से जसवंत सिंह कुछ अन्य नेताओं की तरह
शीर्ष नेतृत्व की आंख की किरकिरी बने हुए थे और शायद पार्टी उन्हें हटाने का मन
बनाती जा रही थी.
इस लेख का मकसद भाजपा नेतृत्व की जसवंत सिंह के संदर्भ में आलोचना करना नहीं है
क्योंकि वह उनकी पार्टी का अंदरूनी मामला है. जसवंत प्रकरण से लेकिन राष्ट्रीय
महत्व के दो बड़े सवाल उठ खड़े होते हैं. पहला यह कि क्या एक राजनीतिक व्यक्तित्व
को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के अंतर्गत दी गई अभिव्यक्ति की आजादी का
अधिकार असीमित नहीं है? और क्या उसे उसकी राजनीतिक पार्टी के नेतृत्व द्वारा
परिसीमित किया जा सकता है जिससे एक नागरिक के रूप में उसके मौलिक अधिकार छीन
लिए जाएं?
दूसरा अहम सवाल यह है कि भारत पाक विभाजन को लेकर जो बड़े खिलाड़ी थे-मसलन लॉर्ड
माउंटबेटन, महात्मा गांधी, मोहम्मद अली जिन्ना, जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभ
भाई पटेल-क्या इनके राजनीतिक आचरण की दुबारा जांच करने की कोई जरूरत, उपादेयता
या वांछनीयता है और यदि जसवंत सिंह सहित अन्य लेखकों ने इसे अपनी समझ के अनुसार
बूझने का प्रयत्न किया है तो क्या उनके हलक में अनुशासन का डंडा ठूंस देना
चाहिए?
भारत-पाक विभाजन इस महाद्वीप और महादेश की इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक त्रासदी
है. विभाजन यदि नहीं होता तो हिंदुस्तान हिंदू-मुस्लिम गंगा-जमुनी संस्कृति का
दुनिया को सबसे बड़ा संदेश दे सकता था. ऐसा भी नहीं है कि विभाजन रोका नहीं जा
सकता था. लेकिन यह भी सच है कि यदि इतिहास में विभाजन घटित हो ही गया तो उसको
लेकर संभावनाओं के गाल बजाने से भी क्या कुछ हासिल होने वाला है.
भारत-पाक विभाजन को लेकर
जो भी उपलब्ध साहित्य है, उसमें महात्मा गांधी, मौलाना आजाद और डा. राममनोहर लोहिया
जैसे राजनीतिक व्यक्तित्वों की किताबों में बहुत से संदेश मिलते हैं. लेकिन सबसे
ज्यादा सीधी और प्रामाणिक जानकारी मशहूर पत्रकार द्वय लैरी कॉलिन्स और दॉमिनिक लॉ
पियरे की किताबों ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ और ‘माउंटबेटन एंड दि पार्टिशन ऑफ इंडिया’
में मिलती है. भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का प्रामाणिक इतिहास लिखने वाले
इतिहासविद् ताराचंद ने भी अपनी राय इस संबंध में कायम की है. बेहद चलताऊ ढंग से और
बेहद संक्षेप में लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी पुस्तक ‘माइ कंट्री, माइ लाइफ’ में
विभाजन के मुद्दे का स्पर्श किया है लेकिन उसमें कोई गवेषणात्मक तथ्य नहीं हैं.
अपनी पुस्तक ‘इंडिया विन्स फ्रीडम’ में मौलाना आजाद ने बेहद संजीदा ढंग से इस
मुद्दे को तार्किक आधार पर परिभाषित करने की कशिश की है. मौलाना का यह कथन मान लेने
में कोई बुराई नहीं है कि वे पूरी जिंदगी विभाजन के विरोधी रहे.
दरअसल विभाजन की पृष्ठभूमि का खुलासा और विचारण किए बिना लार्ड माउंटबेटन के भारत
के वाइसरॉय और गवर्नर जनरल की नियुक्ति के बाद जो घटनाएं 22 मार्च 1947 से तेजी से
घटना शुरू हुईं, उनमें ही विभाजन के निर्णय ने जन्म ले लिया. मौलाना फरमाते हैं कि
माउंटबेटन ने अपनी चाल के लपेटे में सबसे पहले सरदार वल्लभभाई पटेल को ले लिया,
जिन्होंने न केवल भारत का विभाजन स्वीकार किया बल्कि उस विचार पर वे ज्यादा अडिग
होते गए. मौलाना की समझ से उसका सबसे बड़ा कारण यह था कि वाइसरॉय की कार्य परिषद में
कांग्रेस की सद्भावनाजन्य गलती के कारण मुस्लिम लीग के लियाकत अली खान को वित्त
विभाग के सदस्य की हैसियत से नामांकित कर दिया गया. यह भी सरदार पटेल के कारण
क्योंकि वे गृह विभाग अपने लिए चाहते थे.
लियाकत अली खान की हठधर्मी और टांग अड़ाने की नीति के कारण बाकी विभागों का काम देख
रहे कांग्रेस सदस्यों की कार्यक्षमता पर विपरीत असर पड़ने लगा. सरदार पटेल ने तो
झल्लाकर यहां तक कहा कि वे मुस्लिम लीग की मदद के बिना एक चपरासी तक की नियुक्ति
नहीं कर सकते. मौलाना के अनुसार सरदार पटेल ने यह समझ लिया था कि किसी भी हालत में
कांग्रेस मुस्लिम लीग के साथ सरकार चलाने जैसा जोखिम नहीं उठा सकती थी. इसलिए
यथार्थ को समझते हुए विभाजन को स्वीकार करने के अलावा कांग्रेस के पास कोई विकल्प
नहीं था.
मौलाना ने अलबत्ता यह नहीं बताया कि क्या इस संबंध में सरदार पटेल और नेहरू की कोई
आपसी सहमति या समझ स्वयमेव विकसित हो गई थी. लेकिन यह ज़रूर कहा कि सरदार पटेल को
अपनी तरफ मिलाने के बाद माउंटबेटन ने अपनी सारी ताकत जवाहरलाल नेहरू को पटाने में
खर्च कर दी. यही नहीं लेडी माउंटबेटन ने नेहरू पर अपनी ऐसी मोहिनी बिखेरी कि वे
पूरी तौर पर विभाजन के पक्ष में खड़े हो गए. यह भी लेकिन मौलाना ने लिखा कि शुरुआत
में जब उन्होंने नेहरू से विभाजन के संदर्भ में सरदार पटेल के आचरण की शिकायत की तो
नेहरू उखड़ गए और उन्होंने पूरी ताकत और शिद्दत के साथ विभाजन के विचार का विरोध
किया. लेकिन बाद में धीरे धीरे लार्ड माउंटबेटन ने उन्हें अपने झांसे में लिया और
नेहरू और पटेल मिलकर कांग्रेस की ओर से विभाजन के पैरोकार बन गए.
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मौलाना आजाद ने गांधीजी
को लेकर भी अपनी वेदना प्रकट की है. उनके अनुसार गांधीजी मांउटबेटन के हिंदुस्तान
आने के तत्काल बाद उनसे मिले थे और विभाजन के खिलाफ अपनी राय दी थी. लेकिन पटेल और
नेहरू के रुख को जानने के बाद गांधीजी में बकौल मौलाना वह जोश नहीं रह गया था जिसे
विभाजन के विचार के खिलाफ मुखर होना चाहिए था. जिस गांधी ने कहा था कि विभाजन उनकी
लाश पर होगा, उनका नरम रुख मौलाना की समझ में नहीं आया. आजाद ने यह साफ लिखा है कि
गांधी के विचारों में यह परिवर्तन सरदार पटेल के दबाव के चलते आया. मौलाना आजाद की
सलाह के अनुसार गांधीजी ने पहले तो यह सहमति व्यक्त की कि मोहम्मद अली जिन्ना को ही
अविभाजित भारत की सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर लिया जाए जिससे एक बड़ी राजनीतिक
दुर्घटना को टाला जा सके. लेकिन नेहरू और पटेल ने इसका पुरजोर विरोध किया और
गांधीजी को अपना सुझाव वापस लेना पड़ा.
‘इंडिया विन्स फ्रीडम’ के अनुसार गांधीजी के रुख की नरमी का कारण उनसे सरदार
पटेल की दो घंटे की मुलाकात थी जिसमें सरदार पटेल ने बंद कमरे की गुफ्तगू में
गांधीजी को विभाजन की अनिवार्यता के बारे में आश्वस्त किया. देश और इतिहास यह
नहीं जानते कि सरदार पटेल ने आखिर गांधीजी को क्या समझाया होगा, जिसके अनुसार
भारत का विभाजन एक हकीकत में बदले जाने को लेकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग का
नेतृत्व आखिरकार एक हो गए. हालांकि इसको समझना बहुत कठिन भी नहीं है.
इसमें कोई शक नहीं कि मौलाना आजाद ने भी मुस्लिम लीग और जिन्ना को भारत विभाजन
का मुख्य दोषी बताया है. लेकिन साथ-साथ यह भी कहा है कि शीर्ष कांग्रेस नेतृत्व
से ऐसी कुछ गलतियां भी हुई हैं जिनका खमियाजा देश, इतिहास और भविष्य को भुगतना
पड़ा. यदि ये गलतियां नहीं हुई होतीं अथवा उन्हें सुधारने की सार्थक कोशिशे की
गईं होतीं तो विभाजन के अभिशाप से बचा जा सकता था.
लालकृष्ण आडवाणी ने मोटे तौर पर पहले मुस्लिम लीग और जिन्ना और उसके बाद
कांग्रेस को भारत-विभाजन का दोषी बताया है. लीग और जिन्ना को कोसने से भाजपा का
वोट बैंक बढ़ता है. इसलिए ऐसा करना भाजपा के लिए सदैव ही मुनासिब होता है.
कांग्रेस को कोसने से भी भाजपा का वोट बैंक बढ़ता ही बढ़ता है-इसमें कहां शक है.
चलते-चलते अंग्रेजों के खिलाफ भी यदि ‘फूट डालो और राज करो’ जैसी नीति का एकाध
वाक्य में आडवाणी उल्लेख करते हैं-तो उसे ही वे राष्ट्रवाद भी समझ लेते हैं.
आडवाणी अलबत्ता डा. राममनोहर लोहिया की पुस्तक ‘भारत विभाजन के अपराधी’ से खुद
को सहमत घोषित करते हैं. वे लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय द्वारा 1964 में जारी
उस संयुक्त बयान की ताईद भी करते हैं, जिसमें भारत पाक महासंघ बनाने का सपना या
संकल्प अभिव्यक्त किया गया था.
यक्ष प्रश्न यह है कि स्वयं को देश का भावी प्रधानमंत्री प्रचारित करने वाले और
विभाजन के शिकार रहे आडवाणी ने तफसील और तर्कों के आधार पर अपनी आत्मकथा में उन
व्यक्तियों और कारणों को क्यों नहीं ढूंढ़ा जिसका खमियाजा इस महादेश के हर
निवासी को भुगतना पड़ा. यह तो माना जा सकता है कि आडवाणी ने जिन्ना और नेहरू
जैसे अपने राजनीतिक विरोधियों के कुनबे से असहमत होते हुए सरकार पटेल की भूमिका
की भी जांच की होगी. उन्होंने डा. लोहिया की किताब का जिक्र तो किया लेकिन
मौलाना आजाद की किताब का क्यों नहीं? किस्सा तो यह भी मुख्तसर है कि घनश्य़ाम
दास बिड़ला ने ही डा. लोहिया से अनुरोध किया था कि वे मौलाना आजाद की ‘इंडिया
विन्स फ्रीडम’ की तथ्यात्मक तथा तार्किक समीक्षा प्रकाशित करें और इस वजह से
लोहिया ने एक स्वतंत्र पुस्तक ही लिख दी.
इतिहासविद् ताराचंद ने भी यही कहा है कि विभाजन पूर्व के हिंदुस्तान की पूरी
नकेल मोहम्मद अली जिन्ना के चतुर हाथों में आ गई थी. अविभाजित भारत के
मुसलमानों का उनके नेतृत्व में पक्का यकीन स्थापित हो जाने के बाद जिन्ना ने
सामूहिक नेतृत्व के बदले वन मैन आर्मी की तरह आचरण किया और समर्थकों ने उन पर
लगातार विश्वास कायम रखा. एक चतुर वकील होने के नाते जिन्ना के सामने गांधी,
नेहरू और पटेल वगैरह के साथ लॉर्ड माउंटबेटन के तर्क भी निरुत्तर हो जाते थे.
तर्कों में परास्त दिखने पर जिन्ना हठवादी मनु मुद्रा अख्तियार कर लेते थे और
लगातार सारे प्रस्तावों को नकारते जाते थे.
जिन्ना की जिद पाकिस्तान की बुनियाद बनी और वह हिंदू मुसलमान के दरकते रिश्ते
की भी. बहुत चतुराई से जिन्ना ने केबिनेट मिशन योजना का विरोध किया और अंग्रेज
वाइसरॉय के समझाने पर अंतरिम सरकार में अपने पांच प्रतिनिधि शामिल भी किए और
तुरंत उलटवार किया कि मुस्लिम लीग न तो हिंदू बहुमत की संविधान सभा में शिरकत
करेगी और न ही वह पाकिस्तान बनाने का अपना संकल्प मुल्तवी करेगी. जिन्ना के
चक्रव्यूह में कांग्रेस तो कांग्रेस ब्रिटिश हुक्मरानों को भी फंसा हुआ देखकर
इतिहास हैरान होता रहता है और सोचता है कि कैसे अंगरेजों ने पूरी दुनिया में
अपना साम्राज्य स्थापित किया होगा. यदि बहुत से जिन्ना होते तो क्या होता?
‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ लिखते वक्त कॉलिन्स और लॉ पियरे को जो सरकारी और दूसरे
दस्तावेज खंगालने पड़े उनका वजन कोई नौ सौ किलो था. इसमें से एक रहस्य उनके हाथ
लगा कि जिन्ना को तपेदिक की असाध्य बीमारी हो गई थी और जिन्ना को डॉक्टरों ने
बता रखा था कि उनका जीवन बमुश्लिकल छह सात महीनों का ही बचा है. शायद कांग्रेस
के नेताओं को यह गोपनीय जानकारी नहीं रही होगी. ब्रिटिश हुक्मरानों को जिन्ना
की बीमारी का कुछ तो भान था लेकिन उसकी गंभीरता का नहीं.
अपनी दूसरी पुस्तक में कॉलिन्स और लॉ पियरे माउंटबेटन से लिए साक्षात्कार का
उल्लेख करते हुए कहते हैं कि माउंटबेटन ने भी यह स्वीकारा था कि उन्हें जिन्ना
की इस असाध्य बीमारी और डॉक्टरों द्वारा की गई भविष्यवाणी की कोई जानकारी नहीं
थी. माउंटबेटन ने यह भी कहा कि यदि उन्हें जानकारी होती तो शायद जिन्ना को
अंतिम निर्णय लेने में कुछ अरसा के लिए टाला भी जा सकता था. आखिरी वाइसरॉय का
यह कहना था कि ब्रिटिश हुकूमत और वे वास्तव में भारत का विभाजन नहीं चाहते थे
और उन्होंने लगातार कोशिश की कि किसी तरह विभाजन से बचा जाए. लेकिन वे जिन्ना
के अड़ियल रुख की वजह से नाकामयाब हो गए.
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माउंटबेटन विकल्प में यह भी कहते हैं कि शायद ऐसा नहीं भी हो सकता था क्योंकि
जिन्ना को तो अपनी बीमारी और संभावित मौत के बारे में सही-सही जानकारी रही
होगी. वाइसरॉय इस विकल्प से भी इंकार नहीं करते कि डॉक्टरों ने शायद जिन्ना को
उनकी गंभीर बीमारी और संभावित बची हुई जिंदगी के बारे में कुछ भी नहीं बताया
हो. इसके बावजूद जिन्ना वह संघर्ष कर रहे थे जिसके फलस्वरूप उन्हें पाकिस्तान
का संस्थापक राष्ट्रपति बनने का इतिहास ने अवसर दे ही दिया.
जहां तक गांधीजी का सवाल है उन्होंने 10 मार्च 1947 को पटना की प्रार्थना सभा
में यह भारी मन से स्वीकार किया था कि मुसलमान पाकिस्तान चाहते हैं, जिससे
मुसलमान पाकिस्तान में और हिंदू हिंदुस्तान में हुकूमत कर सकें. उन्होंने कहा
कि यह समझ नहीं आता कि धार्मिक और राजनीतिक मतभेद होने पर युद्ध क्यों किया ही
जाना चाहिए. अगले दिन की प्रार्थना सभा में उन्होंने कहा कि जिन्ना उनके मित्र
हैं. यदि जिन्ना उनके सामने शर्त रखें कि या तो गांधी पाकिस्तान का निर्माण
कबूल करें अथवा जिन्ना उनकी हत्या कर देंगे, तो वे मर जाना कबूल करेंगे.
उन्होंने यह भी कहा कि यदि उन्हें आश्वस्त कर दिया जाए कि पाकिस्तान का निर्माण
एक आदर्शवादी परिकल्पना है और हिंदू उसमें बाधाएं खड़ी कर रहे हैं तो वे हिंदुओं
के घरों की छतों पर खड़े होकर घोषणा करेंगे कि पाकिस्तान बन जाना चाहिए.
नई दिल्ली की 7 अप्रेल 1947 की प्रार्थना सभा में गांधी ने मुसलमानों को यह
विनम्र चेतावनी भी दी कि यदि मुसलमान हिंदुओं और सिक्खों से लड़कर पाकिस्तान
बनाना चाहते हैं तो वह निरा पागलपन होगा. उन्होंने कांग्रेस को भी चेतावनी दी
कि उसे हिंदू और मुसलमान दोनों का समुचित प्रतिनिधित्व करना चाहिए.
गांधी ने कहा कि वे ऐसे हिंदुस्तान या पाकिस्तान की कल्पना नहीं कर सकते जहां
अल्पसंख्यकों के अधिकार सुरक्षित नहीं हों. लेकिन गांधी के मन में भी पाकिस्तान
बनने का डर पैठ गया था. गांधी इतने विचलित थे कि उन्होंने यह तक कह दिया कि यदि
मुसलमान ताकत के जोर पर हिंदुस्तान चाहते हैं तो वह संभव नहीं होगा भले ही
प्यार से वे पूरा हिंदुस्तान मांग लें.
9 अप्रेल 1947 की प्रार्थना सभा में नई दिल्ली में यह कहते हुए गांधी ने आगे
कहा था कि वे तो जिन्ना को अविभाजित भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में देखना
चाहेंगे किंतु शर्त यही होगी कि उनकी मंत्रिपरिषद में हिंदुओं, मुसलमानों
पारसियों और अन्य कौमों का समान प्रतिनिधित्व हो. यही बात गांधी ने 10 अप्रेल
को भी कही और कांग्रेस कार्य समिति ने इस मुद्दे पर विचार विमर्श किया.
उन्होंने बंगाल के विभाजन के सिलसिले में यहां तक कहा कि यदि मुस्लिम लीग चाहे
तो उनके साथ आने के लिए वह बंगाल के हिंदुओं से अपील कर सकते हैं.
रायटर के प्रतिनिधि डून कैम्पबेल को 5 मई 1947 के इंटरव्यू में गांधी ने
दृढ़तापूर्वक कहा कि वे व्यक्तिगत तौर पर भारत विभाजन के खिलाफ हैं और इससे देश
में पनप रही सांप्रदायिक समस्या का कोई हल नहीं निकलेगा. अरुणा आसफ अली और अशोक
मेहता के इस प्रश्न का कि क्या पाकिस्तान बनाने का कोई विकल्प है गांधीजी ने
कहा कि उसका एकमात्र विकल्प अविभाजित अखंड भारत ही है. उन्होंने कहा कि यदि
विभाजन के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया गया तो कठिनाइयों का समुद्र हमें डुबा
देगा. अविभाजित भारत का सिध्दांत ही हमें सब कठिनाइयों के पार लगा सकता है.
उन्होंने खेद सहित कहा कि इस मामले में कांग्रेस खुद को असहाय पा रही है. उस
लंबी बातचीत में लेकिन महात्मा का आत्मविश्वास डगमगाता हुआ भी दिखाई पड़ा और
गांधीजी ने खुद को कांग्रेस के समर्थन के अभाव में बिल्कुल एकाकी पाया. यह
इंटरव्यू गांधी के जीवन की त्रासद कथाओं में एक है, जब उन्होंने जयप्रकाश
नारायण, अरुणा आसफ अली और अत्च्युत पटवर्धन जैसे समाजवादी नेताओं की खुलकर
तारीफ की.
अपनी नाकाम कोशिशों के चलते 7 मई 1947 की प्रार्थना सभा में गांधी ने एक बार
फिर कहा कि यदि मुसलमान पाकिस्तान बनाना ही चाहते हैं तो वे बातचीत के जरिए
गांधीजी को आश्वस्त तो करें. ऐसा ही उन्हें दूसरों को भी आश्वस्त करने के बारे
में सोचना चाहिए. लेकिन यदि वे दबाव डालकर मेरा समर्थन चाहते हैं तो वह किसी भी
हालत में उन्हें नहीं मिल पाएगा.
8 मई 1947 को पटना जाते हुए रेलगाड़ी में गांधी ने लार्ड माउंटबेटन को पत्र लिखा
कि यदि ब्रिटिश हुकूमत किसी भी तरह भारत विभाजन का एक पक्षकार होगा तो उसे
इतिहास की दुर्घटना समझा जाएगा. उन्होंने कहा कि यदि पाकिस्तान को बनना ही है
तो वह ब्रिटिश हुकूमत की वापसी के बाद हिंदुओं और मुसलमानों के आपसी सद्भाव के
आधार पर भले ही सोचा जाए. वाइसरॉय को घेरते हुए गांधी ने ब्रिटिश हुकूमत की
आलोचना की कि वह अपनी सार्वभौम ताकत के चलते इस मुद्दे का उस भावना के साथ हल
नहीं निकाल पा रहा है जो उसका प्राथमिक उत्तरदायित्व है.
गांधी की भारत-विभाजन-व्यथा बरकरार रही. 12 जून 1947 की प्रार्थना सभा में थक
हारकर गांधी ने यहां तक कह दिया कि शायद इसमें ईश्वर की ही इच्छा है, जो हिंदू
और मुसलमान दोनों की परीक्षा ले रहा है कि हम एक दूसरे के प्रति कितने उदार
हैं. गांधी ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय को एक
समान संस्थाएं समझने पर जोर दिया. गांधी की असहमति, हताशा और भविष्य की
संभावनाओं के कई बिंदु भारत पाक संबंधों को लेकर गांधी वांग्मय में झिलमिलाते
रहते हैं. उन्होंने केवल मुस्लिम लीग को ही दोषी नहीं समझा बल्कि हिंदुओं को भी
समझाइश दी. उन्होंने कहा कि वे असहाय महसूस कर रहे हैं लेकिन वक्त बताएगा कि
गांधी में साहस की कमी नहीं थी. उन्होंने कहा कि यदि बहुसंख्यक लोग धैर्य से
काम लें तो पाकिस्तान बनाने का जुनून धीरे धीरे खत्म भी हो सकता है क्योंकि
सच्चा पाकिस्तान तो सच्चा हिंदुस्तान ही है. यही बात गांधी अपनी प्रार्थना
सभाओं में बार बार दोहराते रहे.
मुस्लिम लीग, कांग्रेस नेतृत्व और ब्रिटिश शासन से निराश होने के बाद गांधी का
भरोसा अपने उन नैतिक अनुयायियों में ही रह गया था, जो उनकी प्रार्थना सभाओं को
गांधी विचार की गंगोत्री समझते रहे होंगे. भले ही अपनी नैतिक ताकत के बावजूद वे
भारतीय राजनीति को प्रभावित नहीं कर पाने की असमर्थता से भी परिचित रहे होंगे.
गांधी को सदैव यह संदेह रहा कि क्या कांग्रेस कार्य समिति ने पाकिस्तान निर्माण
के सिध्दांत को यथार्थ के पूरे वास्तविक आकलन के बाद ही किया होगा.
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अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' की राजनीति से विक्षुब्ध होकर गांधी ने
जयप्रकाश नारायण वगैरह समाजवादियों से 27 मई 1947 को बातचीत करते हुए कहा कि
यदि विभाजन को अपनी छाती पर ढोना ही है तो दो भाइयों के बीच कोई तीसरा पक्ष
हस्तक्षेप करने के लिए क्यों बुलाया जाए. अंतत: 2 जून 1947 को कांग्रेस
कार्यसमिति की बैठक के अपने भाषण में गांधीजी ने फिर साफ किया कि वे विभाजन
संबंधी कार्यसमिति के प्रस्ताव से यद्यपि सहमत नहीं हैं, फिर भी वे अपनी वजह से
कार्य समिति के सामने कोई अडंग़ा नहीं खड़ा करना चाहते. जवाहरलाल नेहरू ने गांधी
के अनुरोध को ध्यान में रखकर कांग्रेस कार्यसमिति का संशोधित प्रस्ताव वाइसरॉय
को भेजा.
विभाजन के ठीक पूर्व महज प्रार्थना सभाओं में सिमट गए बापू बार-बार अपनी नैतिक
स्थिति को लगभग छटपटाते हुए साफ करते हैं. वे बार-बार कहते हैं कि उन्हें
विभाजन कतई कबूल नहीं है और यह भी कि वे बुरी तरह लाचार हैं. यहां तक कि 9 जून
1947 को उनसे मिलने आए लोगों के सामने गांधी फट पड़ते हैं कि उनके विरोध के
बावजूद भारत का विभाजन हो ही रहा है. गांधी के अनुसार जिस तरह विभाजन किया जा
रहा है वह और भी ज्यादा दुखदायी है. इस अवसर पर गांधी उनके विरुद्ध हो गए जनमत
का भी उल्लेख करते हैं. गांधी ने साफ कहा कि यदि देश का बहुमत उनके साथ होता तो
वे किसी भी कीमत पर भारत का विभाजन नहीं होने देते. लेकिन उन्हें ऐसा लगता है
कि देश में एक ऐसी भावना फैल गई है कि विभाजन तो किया ही जाना चाहिए. इसलिए
अपनी लाचारी को साफ साफ स्वीकार करते हुए गांधी इस पूरे घटनाक्रम को अपनी
राजनीतिक पराजय के जहर के घूंट के रूप में निगलते प्रतीत होते हैं.
बाबरी मस्जिद कांड के वक्त भी क्या देश में ऐसा ही विषाक्त राजनीतिक माहौल नहीं
था जब यह साफ-साफ दिखाई पड़ने पर भी कि संविधान के प्रावधानों का खुला उल्लंघन
हुआ है लोग बाबरी मस्जिद के गिराए जाने को एक उल्लास पर्व की तरह मना रहे थे.
उन्होंने खुलकर कहा कि सरदार पटेल और नेहरू यह ऐलान करते हैं कि गांधी को
स्थिति की वास्तविक समझ नहीं है. उन दोनों को यह तक पसंद नहीं आया कि यदि
विभाजन होना ही है तो वह अंग्रेजों के जाने के बाद हो. इसलिए गांधी को वह सुझाव
वापस भी लेना पड़ा. गांधी की असमर्थता को विस्तार में लिखे जाने की इसलिए भी
जरूरत है जिससे उन्हें विकृत चरित्र के रूप में नहीं समझा जाए.
14 जून 1947 को अखिल
भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्यों को संबोधित करते हुए गांधी ने उन परिस्थितियों पर
रोशनी डाली जिनकी वजह से कार्य समिति ने भारत विभाजन के प्रस्ताव को स्वीकार किया.
गांधी ने इशारा भी किया कि यदि सदस्य चाहें तो कार्य समिति के प्रस्ताव को रद्द कर
सकते हैं. हालांकि उन्होंने कार्य समिति की विवशताओं का सहानुभूतिपूर्वक उल्लेख भी
किया. कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व का यह असमंजस भारत के इतिहास में एक दुखद
परिच्छेद के रूप में लिखा जाएगा.
ऐसा नहीं है कि भारत विभाजन का प्रश्न लॉर्ड माउंटबेटन के वाइसरॉय बनने के बाद ही
पहली बार कांग्रेस के जेहन में आया था. रामगढ़ में 15 मार्च 1940 को कांग्रेस कार्य
समिति की बैठक में गांधी ने यह पूछा था कि यदि कांग्रेस के सामने हिंदू भारत और
मुस्लिम भारत के रूप में विभाजन किए जाने की मांग हो तो उस समय कांग्रेस की क्या
स्थिति होनी चाहिए. गांधी ने यह साफ कहा कि देश अभी सविनय अवज्ञा आंदोलन के लिए
तैयार नहीं है.
गांधी ने कहा कि यदि वे संघर्ष आरंभ करते हैं तो बदले में जनता को कुचला जा सकता
है. उन्होंने कांग्रेस से हट जाने का भी प्रस्ताव किया था. 28 सितंबर 1944 को गांधी
ने फिर कहा था कि मुस्लिम लीग मुसलमानों का सबसे ज्यादा प्रतिनिधिक संगठन है लेकिन
मुस्लिम लीग के बाहर मुसलमानों की एक बहुत बड़ी संख्या ऐसी है जो लीग के विचारों से
सहमत नहीं थी और जिसे दो राष्ट्रों के सिध्दांत में विश्वास नहीं था. महात्मा गांधी
को यह बताया गया कि जो मुसलमान मुस्लिम लीग से सहमत नहीं हैं, उन्हें सचमुच
मुसलमानों का समर्थन प्राप्त नहीं है. इसके उत्तर में महात्मा गांधी ने कहा कि
यद्यपि मुस्लिम लीग मुसलमानों का सबसे बड़ा प्रतिनिधिक संगठन है फिर भी मैं अन्य
लोगों का तिरस्कार नहीं कर सकता कि उन्हें मुसलमानों का समर्थन प्राप्त नहीं है.
एक राजनीतिक पार्टी अपने विधान के तहत अपने सदस्य को पार्टी से बाहर निकाल सकती है.
उसे संवैधानिक आधारों पर चुनौती नहीं दी जा सकती क्योंकि ऐसा निष्कासन बिना कारण
बताए भी किया जा सकता है. लेकिन यदि भाजपा जसवंत सिंह की किताब को लेकर यह कहे कि
उसमें व्यक्त विचार पार्टी लाइन के विपरीत हैं, तो निष्कासन की वैधता पर सवाल भले
ही नहीं उठाया जाए लेकिन पार्टी के सोच की वैधता, संवैधानिकता और स्वीकार्यता पर
सवाल देश का हर नागरिक खड़ा कर सकता है. यदि जसवंत सिंह की पुस्तक में तथ्य
तोड़े-मरोड़े नहीं गए हैं-बल्कि दस्तावेजी सबूतों से लैस हैं-तो भाजपा में इतना नैतिक
साहस होना चाहिए कि वह देश को बताए कि पुस्तक में क्या गर्हित है जो एक शीर्ष
राजनेता को इस तरह दंडित कर सकता है.
आडवाणी ने खुद अपनी पुस्तक में भारत विभाजन के बिंदु का केवल सरसरी तौर पर उल्लेख
किया है. मौलाना आजाद, डा. लोहिया और उनसे ज्यादा महात्मा गांधी के बारे में यह
नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने तथ्यों के साथ छेड़छाड़ की होगी. स्वयं लॉर्ड माउंटबेटन
के इंटरव्यू और तत्कालीन राजनीतिक दस्तावेजों में जो सच कैद होकर रह गया है, वह कुल
मिलाकर जसवंत सिंह की पुस्तक का उपहास नहीं करता. तब यह सवाल खड़ा होता है कि कथित
तौर पर क्या जसवंत सिंह को जिन्ना का महिमा मंडन और सरदार पटेल की छवि का अवमूल्यन
करने के नाम पर इसलिए दंडित किया गया है जिससे सामान्य तौर पर देश के हिन्दू वोटों
और खासतौर पर गुजरात के हिन्दू वोटों का फिर से ध्रुवीकरण हो जाए.
मजाक यह है कि जो पुस्तक गुजरात में मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रतिबंधित करते
हैं, वही भाजपा शासित अन्य राज्यों में प्रतिबंधित नहीं है. इससे यही राजनीतिक
त्रैराषिक सिध्द होती है कि गुजरात के हिंदू वोट ही भारत पाक विभाजन की ऐतिहासिकता
के अभिशापों पर लगाए जाने वाले मरहम की तरह समझे जा रहे हैं. जाति, धर्म, संप्रदाय,
प्रदेश और भाषा वगैरह के अधिकारों के आधार पर यदि इतिहास को विकृत करने की कोशिश की
जाएगी तो उस पैमाने पर जसवंत सिंह का निष्कासन अवैध और असंवैधानिक है. वह राजनीतिक
शुचिता का भी उदाहरण नहीं है. यही तो फासीवाद है., हिटलर भी तो कुछ ऐसी ही हरकतें
करता था.
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कॉलिन्स और लॉ पियरे ने 1982 में अपनी पुस्तक ‘माउंटबेटन एण्ड दि पार्टिशन ऑफ
इंडिया’ प्रकाशित की. यह पुस्तक लार्ड माउंटबेटन समेत भारत के विभाजन संबंधी कुटिल
ब्रिटिश राज की रहस्य परतों की एक एक गांठ खोलती है. माउंटबेटन ने अपनी लंबी
इंटरव्यू श्रृंखला में तमाम तरह की कलाबाजियों का प्राथमिक साक्ष्य दिया है और
स्वीकारोक्तियां भी की हैं. वैसे तो माउंटबेटन को मार्च 1948 तक भारत को आजादी देने
या सत्ता हस्तांतरित करने का समय दिया गया था. लेकिन माउंटबेटन को बहुत जल्दी थी.
भारत आने के पहले लार्ड वैवेल ने माउंटबेटन के कान फूंके थे कि गांधी तो एक
प्यारा आदर्शवादी व्यक्ति है और जरूरत पड़ने पर वह अपनी शक्ति उपवास के जरिए
बटोर लेता है. वैवेल के अनुसार जिन्ना एक बकवादी व्यक्ति है. वह शिक्षा दीक्षा
और आचरण से पूरा अंग्रेज है. माउंटबेटन ने अपनी रणनीति का खुलासा करते हुए
वी.पी. मेनन जैसे उन भारतीय सलाहकारों का जिक्र भी किया जिसका माउंटबेटन ने
इस्तेमाल किया और मेनन का तो खासतौर पर सरदार पटेल को पटाने में. माउंटबेटन
नेहरू के खासमखास कृष्ण मेनन से भी परिचित थे और उनकी नेहरू के लिए महत्ता को
समझते थे.
इस वाइसरॉय ने गांधी, नेहरू, पटेल, लियाकत अली खान और जिन्ना को भारतीय राजनीति
का नियंत्रक बताते हुए उनमें पांच समानताएं भी ढूंढ़ी थीं. पहली यह कि वे सभी
प्रौढ़ थे और एक दूसरे से बहस करते रहते थे. दूसरी यह कि उन्हें स्वतंत्रता
चाहिए थी और उसके लिए वे संघर्ष कर सकते थे. तीसरी यह कि वे अंग्रेजी बुद्धि
द्वारा प्रशिक्षित कुशल वकील थे. चौथी यह कि जो बात उन्हें बताई जानी थी उसके
लिए ही तो वे पूरे जीवन संघर्ष करते रहे थे. और पांचवीं यह कि उन पांचों के लिए
राजनीति ही उनका जीवन थी. उन्हें निजी जिंदगी से कोई मतलब नहीं था.
माउंटबेटन ने यह स्वीकार किया कि सबसे पहले उनकी अथॉरिटी को सरदार पटेल ने ही
चुनौती दी. वे अत्यंत कठोर थे और उन्होंने माउंटबेटन को बेहद कड़ा नोट भेजा था.
उनके लेखे पटेल एक दबंग और रोबीले व्यक्ति थे. उनसे निपटने के लिए माउंटबेटन को
अपने त्यागपत्र तक की धमकी देनी पड़ी. उसके बाद पटेल से उनकी दोस्ती हो गई. यह
माउंटबेटन का आकलन था कि पटेल को अपनी ढलती उम्र (लगभग 73 वर्ष) का अहसास था और
इसलिए उन्हें नेहरू के मुकाबले सत्ता के हस्तांतरण की शीघ्रता थी. (एक अलग
संदर्भ में देसी रियासतों के विलीनीकरण के बाद सरदार पटेल ने यह जरूर कहा था कि
काश वे कुछ वर्ष छोटे होते तो भारत को एक मजबूत बुनियाद पर खड़ा कर सकते थे.)
माउंटबेटन ने यह भी साफ किया है कि भारत-पाक विभाजन के मुद्दे की चाबी गांधी के
पास नहीं जिन्ना के हाथों में थी. लोगों में यह भ्रम अलबत्ता फैलता रहा कि या
तो गांधी गलतियां कर रहे हैं या नेहरू. वह सारा संशय लेकिन दो व्यक्तियों के
कारण फैलता रहा जो जिन्ना और पटेल थे. जिन्ना तो एक तरह से फ्रांस के चार्ल्स
डि गाल की तरह थे. सबको फुसलाया जा सकता था लेकिन जिन्ना को नहीं. भारत विभाजन
करने की हड़बड़ी का एक मुख्य कारण माउंटबेटन ने यह भी बताया कि उनकी अंतरिम
मंत्रि परिषद में छह सदस्य मुस्लिम लीग, छह सदस्य कांग्रेस और तीन अन्य तो थे,
लेकिन हर मुद्दे पर वे तीन अन्य सदस्य कांग्रेस का ही साथ देते थे. वह स्थिति
मुस्लिम लीग को नागवार गुजरती थी.
जसवंत सिंह की किताब 'जिन्ना इंडिया पार्टीशन' (हालांकि मुझे संयोगवश हिन्दी
अनुवाद ही मिल पाया है) को सरसरी तौर पर पढ़ने से उसमें ऐसा कुछ नजर नहीं आता जो
भाजपा के तथाकथित दृष्टिकोण के खिलाफ हो. यह भी कि वह पुस्तक गुजरात सरकार
द्वारा प्रतिबंधित करने के लायक हो. भाजपा ने देश को कभी भी यह लिखित सबूत नहीं
दिया है कि विभाजन के बारे में उसका दृष्टिकोण क्या है और यह भी कि विभाजन को
लेकर संघ परिवार का गांधी, जिन्ना, नेहरू और सरदार पटेल सहित अंग्रेजों के बारे
में क्या सोच है. ऐसे में जसवंत सिंह को जिस तथाकथित चट्टान पर बिठा दिया गया
है, वह तो भाजपा के लिए बर्फ की सिल्ली है जिसका पानी रोज पिघल रहा है और एक
दिन भाजपा का यह तर्क महल पानी की तरह बह जाएगा. तिकड़म यह भी है कि गुजरात को
छोड़कर भाजपा शासित किसी भी राज्य में जसवंत सिंह की पुस्तक को प्रतिबंधित नहीं
किया गया है. यह भाजपा के दोमुंहेपन को उजागर करता है. क्या गुजरात की भाजपा
पूरे देश की भाजपा से अलग है. सिर धुनने वाली बात तो यह भी है कि महात्मा
गांधी, जवाहरलाल नेहरू और मौलाना आजाद जैसे सूरमाओं की पार्टी के गुजरात के
कांग्रेसियों ने पुस्तक को प्रतिबंधित करने के नरेन्द्र मोदी के निर्णय का
समर्थन किया है. अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी है कि भाजपा के कौरव दरबार में
पांडवों की तरह चुप है.
गुजरात में गांधी के विचारों की शासकीय दुर्गति हो रही है-इसमें तो कोई संदेह
नहीं है. वहां राष्ट्रभाषा हिंदी को संभ्रांत मंचों पर गुजराती और अंग्रेजी के
बाद तीसरी प्राथमिकता मिल रही है. धर्मों और जातियों के बीच फैला सांप्रदायिक
जहर गुजरात में अब भी सक्रिय भूमिका में है. यह सब तो देश को मालूम है. लोहिया
मजाक में कहते थे कि हमारा देश तो राष्ट्र है उसका एक प्रदेश महाराष्ट्र. और
उससे छोटा इलाका सौराष्ट्र. गांधी ने इसकी उलटबांसी कर दी. वे सौराष्ट्र में
पैदा हुए. महाराष्ट्र में उन्होंने आश्रम की स्थापना की और राष्ट्र की राजधानी
में शहीद हो गए. उनकी राष्ट्र की अस्मिता को बरबाद करने के आरोप में एक
महाराष्ट्रीयन ने हत्या की लेकिन संघ परिवार का मुख्यालय महाराष्ट्र में होने
के बावजूद वह उनके विचारों की हत्या नहीं कर पाया. यह काम सौराष्ट्र के जिम्मे
संघ परिवार ने कर दिया है. वहां गांधी के विचारों की लगातार हत्या हो रही है.
असल में जसवंत सिंह ने कुछ ऐसी गलतियां की हैं, जिसका उन्हें अतिरिक्त खमियाजा
भुगतने का फतवा भाजपा ने जारी किया है. अपनी पुस्तक में जसवंत सिंह ने महात्मा
गांधी की प्रशंसा भी की है. गांधी की राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक सदस्य ने
हत्या की है. गांधी को भाजपा और संघ परिवार ने खंडित स्वतंत्रता के संदर्भ में
जी भरकर कोसा है. खासतौर पर पाकिस्तान को वित्तीय सहायता देने के प्रश्न पर.
वही मुख्यत: उनकी हत्या का कारण भी बना.
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संघ परिवार की
सांप्रदायिकता के चलते गांधी गुजरात में अप्रतिहत स्थिति में नहीं हैं. पोरबंदर तक
तस्करों का स्वर्ग बन गया है. गुजरात में सारे देश के मुकाबले इस तरह के घृणित
अपराध हो रहे हैं जिन्हें बापू अपनी भाषा में पाप कहते थे. फिर भी भाजपा
हिंदू-मुस्लिम नफरत की बुनियाद पर ही गुजरात में अपनी स्थिति मजबूत रखे हुए है.
यहां तक कि भाजपा के सबसे
ज्यादा सेक्युलर दिखने वाले बकौल गोविंदाचार्य 'मुखौटे' अटल बिहारी वाजपेयी ने बहुत
दबावों के कारण नरेन्द्र मोदी को गुजरात के श्रृंखलाबध्द दंगों के बाद राजधर्म का
पालन करने की सलाह दी थी. लेकिन बेचारे वाजपेयी यह नहीं जानते थे कि विभाजन की
विभीषिका झेल चुके लालकृष्ण आडवाणी के पट्ठे नरेन्द्र मोदी को उनकी पार्टी में
राजधर्म नहीं निबाहने के बावजूद धर्मराज का खिताब दे दिया गया था. बहरहाल जसवंत
सिंह ने भारत विभाजन के संदर्भ में हिंदू महासभा वगैरह के जमावड़े को लेकर उनकी
तथाकथित राष्ट्रवादी भूमिका का खुलासा क्यों नहीं किया?
जसवंत सिंह बेचारे कैसे
करते. तत्कालीन संघ परिवार ने भारत की आजादी के आंदोलन में सावरकर जैसे कुछ लोगों
के अपवाद के अतिरिक्त शिरकत ही कहां की है? पाकिस्तान के निर्माण के संदर्भ में संघ
परिवार की क्या भूमिका थी, इसे डा. लोहिया ने अपनी पुस्तक 'विभाजन के अपराधी' में
व्यक्त किया है. लोहिया की विश्वसनीयता पर आज तक कोई सवाल संघ परिवार ने खुद नहीं
उठाया है. इसलिए उसे इतिहास के सच के रूप में स्वीकार कर लिया जाना चाहिए.
लोहिया लिखते हैं “कट्टर
हिंदूवाद द्वारा विभाजन के विरोध का कोई मतलब नहीं था, और न ही हो सकता था क्योंकि
देश का विभाजन करने वाली शक्तियों में एक शक्ति वही कट्टर हिंदूवाद थी. वह वैसी ही
थी जैसे कोई खूनी खून करने के बाद उस गुनाह के धक्के से पीछे हटता है.”.....इसके
बारे में कोई गलती नहीं होनी चाहिए. जिन्होंने अखंड भारत-अखंड भारत जोर-जोर से
चिल्लाया यानी वर्तमान जनसंघ और हिंदूवाद की विचित्र अहिंदू भावना वाले उसके पुरखों
ने, अगर करतूतों के परिणाम की दृष्टि से देखें न कि उनकी नीयत की दृष्टि से, तो देश
का विभाजन करने में उन्होंने ब्रिटिश और मुस्लिम लीग की मदद की है. उन्होंने एक ही
देश के अंदर मुसलमान को हिंदू के करीब लाने का कोई जरा-सा भी काम नहीं किया.
उन्होंने दोनों को एक-दूसरे से अलग करने का करीब-करीब हर काम किया. इस तरह का अलगाव
ही विभाजन की जड़ बना. अलगाव के दर्षन को स्वीकार करना और, साथ ही साथ, अखंड भारत की
अवधारणा करना खुद को धोखा देने का गंदा काम है. हिंदुस्तान में मुसलमानों का विरोधी
पाकिस्तान का दोस्त है. जनसंघी और हिंदू ढब के सभी अखंड भारती पाकिस्तान के दोस्त
हैं......”
“मौलाना आजाद की अंग्रेजी किताब इंडिया विन्स फ्रीडम को मैंने थोड़ा-थोड़ा कर-कर ही
सही, पर पूरा पढ़ा है......समुदायों और राष्ट्रों के आचरण के संबंध में इस किताब ने
मुझ पर एक अमिट छाप छोड़ी है......इसमें कोई शक नहीं कि मौलाना आजाद एक अच्छे
मुसलमान थे और श्री जिन्ना उनके जितने अच्छे मुसलमान न थे......मौलाना मुस्लिम
हितों के जिन्ना से बेहतर साधक थे लेकिन मुसलमानों ने उनकी सेवा को ठुकरा
दिया......मौलाना ने उस मोहिनी या गुप्त विद्या को प्रगट करने की परवाह नहीं की है
जिससे गांधी जी बदल गए. वे अकेले ही आखिर तक विभाजन के विरोधी रहे. समूचा किस्सा
बेलज्जत झूठ है......देश में इस ख्याल को बढ़ाने दिया गया है कि श्री नेहरू पर लेडी
माउंटबैटन का कुछ दुष्ट प्रभाव था. इतिहास की गप-गोष्ठियां वास्तव में इस झूठ को
सही बना सकती हैं. इतने बरसों तक जो सामयिक गप लड़ाई जा रही थी, उसे इतिहास बनाने की
पहली कोशिश मौलाना आजाद ने की है......इन दोस्तियों पर कोई राजनैतिक अर्थ आरोपित
करना अनुचित होगा..... लार्ड माउंटबेटन के रोल को नीति-निर्माता का रोल कहने में
मौलाना आजाद ने निश्चय ही गलती की है. लार्ड माउंटबैटन उनके ओहदेदारों द्वारा उनके
लिए बनाई गई नीतियों पर नि:संदेह कुशलतापूर्वक अमल करते थे......लार्ड माउंटबेटन का
रोल इस मानी में सचमुच बड़ा था कि उन्होंने अपनी सरकार द्वारा बनाई गई नीतियों पर
बखूबी अमल किया, पर वह महान न था.”
नेहरू परिवार की बुराई तो संघ परिवार का स्वस्तिवाचन है. इसलिए सोनिया और राहुल
गांधी तक आते आते वह स्वस्तिवाचन जसवंत सिंह की किताब में बिखर गया है. उनके
अतिरिक्त, अरुण शौरी और सुधींद्र कुलकर्णी चाहे जैसे हों, आखिर बुद्धिजीवी तो हैं.
बुद्धिजीवी अगर बंधे बंधाए पानी में ही नहाएगा तो उसे तालाब के बदले झील बेहतर नजर
आती है. सफल वकील होने के बावजूद अरुण जेटली और सुषमा स्वराज वगैरह ने बुद्धिजीवी
होने का मर्तबा कहां हासिल किया है?
जसवंत सिंह ने दूसरी गलती यह की कि उन्होंने नेहरू की संवेदनशीलता की भी तारीफ की
है. गांधी पर तो वे आसक्त भी नजर आते हैं. यह वह मर्मस्थल है जिस पर चोट पहुंचने से
भाजपा नेतृत्व ने फन काढ़कर उन्हें डसने की कोशिश की है. सरदार पटेल को लेकर जसवंत
सिंह ने ऐसा कुछ नहीं लिखा, जो विभाजन के खेल के ऊपर लिखित वास्तविक खिलाड़ियों ने
नहीं लिखा. राजनाथ सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा तो वह दर्शक समूह है जो साठ वर्ष
पुरानी फिल्म को जसवंत सिंह द्वारा निर्मित दिग्दर्शित रीलों में देख रही है. उस
फिल्म में मौलाना आजाद के अतिरिक्त विभाजन के विरोधी डा. लोहिया भी दिखाई पड़ते हैं.
यह वही लोहिया हैं जिन्होंने गैर कांग्रेसवाद का नारा देकर आखिरकार संघ परिवार को
सत्ता में पहुंचने की सीढ़ी उपलब्ध कराई थी.
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इसके अतिरिक्त सरदार पटेल ने संविधान सभा में पाकिस्तान और मुसलमानों की भूमिका को
लेकर जो कटाक्ष किए हैं वे तिलमिलाने वाले हैं. एक देशभक्त के रूप में सरदार पटेल
की अद्वितीय स्थिति है. खुद लोहिया गांधी से उनके अंतरंग संबंधों के मद्देनजर एक
चश्मदीद गवाह की तरह लिखते हैं..... “इसी मीटिंग में श्री नेहरू और सरदार पटेल ने
गांधी जी के साथ असभ्य और टुच्चेपन का व्यवहार किया. उन दोनों के साथ मेरी कुछ झड़प
हो गई. उनमें से कुछ की मैं चर्चा करूंगा. अपने अधिष्ठाता के प्रति इन दो चुनिंदा
चेलों के अत्यधिक अशिष्ट व्यवहार से मुझे जैसे पहले आश्चर्य हुआ था, वैसे अब भी
आश्चर्य होता है, हालांकि आज उसे मैं कुछ बेहतर समझ सका हूं.
इस चीज में कुछ
मनोविकार था. ऐसे लगता था कि वे किसी चीज के लिए ललक गए हैं, और, जब कभी उन्हें
इसकी गंध मिलती कि गांधी जी उनको रोकने लगेंगे, वे जोर से भौंकने
लगते......मौलाना ने सरदार पटेल के प्रति अपने विद्वेष को भरपूर उड़ेल दिया है.
यह बिल्कुल स्वभाविक था. सरदार पटेल अपने राजनैतिक हेतुओं में जितने असंदिग्ध
हिंदू थे मौलाना आजाद उतने ही मुस्लिम थे......श्री आजाद और श्री पटेल के बीच
की कलह उनके सहकर्मियों के बीच के सामान्य रिश्तों के अनुरूप ही है......श्री
पटेल शायद उतने ही तुच्छ, व्यक्तिवादी और प्रतिहिंसात्मक थे, जितने कि श्री
आजाद या श्री नेहरू, लेकिन वे इनसे कहीं अच्छी धातु के बने थे. राजविद्या के
क्षेत्र में उनके विस्तार का कोई मुकाबला न था. जहां उनका अधम 'स्व' जुड़ा न
होता, वे परिपूर्ण कुशलता और साहस के साथ काम करते थे, जैसा कि उन्होंने देशी
राज्यों के मामले में किया......मैं नहीं समझता कि श्री नेहरू या श्री आजाद इस
काम को कर पाते. अपने सहकर्मियों के बौनेपन के कारण श्री पटेल इतने अतुलनीय
विराट लगते थे. ऐसा नहीं कि उनकी उपलब्धि कठिन या असाध्य थी. सामान्य काल की
औसत प्रतिभा में श्री पटेल जैसी कुशलता और साहस का कोई विशेष
उल्लेख न होता.”
नेहरू, जिन्ना और सरदार पटेल का तटस्थ और वस्तुपरक मूल्यांकन भारत-पाक विभाजन
के संदर्भ में इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों ने कर ही दिया है. जसवंत सिंह ने
तो केवल उसका अनुसरण और समर्थन दस्तावेजों के आधार पर किया है. जिन्ना की
सांप्रदायिकता को उभारने की अद्भुत शक्ति में कितना ही खलनायकत्व क्यों न रहा
हो, अंतत: जिन्ना ने सबको धता बताकर पाकिस्तान तो बनवा ही लिया. इसमें भी कहां
शक है कि पहले सरदार पटेल और फिर नेहरू विभाजन के समर्थकों की सूची में शामिल
हैं. यदि भाजपा को केवल गुजरात में ही अपना भगवा ध्वज फहराने में अंतिम इच्छा
शेष रह गई हो, तो इस पार्टी के पालनहार की भूमिका क्या भगवान राम से हटकर सरदार
पटेल को सौंपने की कोई तैयारी है? वल्लभभाई पटेल ने यदि उन व्यावहारिक
परिस्थितियों के कारण विभाजन का समर्थन करने का निश्चय किया जिसका रहस्योद्घाटन
उन्होंने महात्मा गांधी को अपनी दो घंटे लंबी मुलाकात में किया होगा तो उसका
विवरण खुद गांधी और पटेल ने भविष्य की पीढ़ियों को नहीं बताया.
यह भी दिलचस्प है कि गुजरात हाई कोर्ट ने जसवंत सिंह की पुस्तक को प्रतिबंधित
करने के आदेश को रद्द कर दिया और सुप्रीम कोर्ट भी उस पर अपनी मुहर चस्पा कर दे
तब जसवंत सिंह के निष्कासन का क्या होगा. क्या यह नहीं माना जाएगा कि जसवंत
सिंह ने संविधान सम्मत आचरण किया है और इस अपराध के कारण भाजपा ने उन्हें
निष्कासित किया है. इतिहास संविधान से अलग होता है. भाजपा ने आज तक जितना
साहित्य प्रकाशित किया है, उसमें पूरे संघ परिवार के विचारों को शामिल कर लिया
जाए तब भी जसवंत सिंह के खिलाफ जनता की अदालत में रजत शर्मा जैसे एंकर की
भूमिका हथियाते हुए भाजपा कोई चार्ज शीट दाखिल नहीं कर सकती. बकौल ए.जी. नूरानी
अपनी क्लासिक कृति 'कांग्रेस का इतिहास' में तो यहां तक लिखा है कि मुस्लिम लीग
और हिन्दू महासभा का गठबंधन भारत-पाक विभाजन के वर्षों पहले सिंध प्रांत के
मंत्रिमंडल में पैदा हो गया था.
अपने उपसंहार में जसवंत सिंह ने भाजपा की लाइन का ही समर्थन किया है और भूमिका
में भी ऐसे ही सवालों को उछाला है. क्या पार्टी लाइन का समर्थन करने से भी किसी
नेता को पार्टी से निकाला जा सकता है? भाजपा तो नहीं बताएगी क्योंकि बकौल अरुण
शौरी 'हम्प्टी डम्प्टी' के नेतृत्व में उसे तो गिरना ही गिरना है. सब लोग मिलकर
भी उसे बचा नहीं सकेंगे. यह जरूर हुआ है कि जसवंत सिंह भारत-पाक विभाजन पर लिखी
गई पुस्तकों के एक नए रचयिता के रूप में शामिल हो गए हैं. उन्होंने जानबूझकर भी
कई विवादास्पद सवालों को छोड़ दिया है.
कई जगह पूर्ववर्ती लेखकों द्वारा की गई कठोर टिप्पणियों को ढीला करने की कोशिश
भी की है. यदि भाजपा जसवंत सिंह की प्रतिपादित थ्योरी (गो कि वह थ्योरी नहीं
पुनरावृत्ति है) से तो उसे मौलाना आजाद, राममनोहर लोहिया, लैरी कॉलिन्स और
दौमिनिक लॉ पियरे बल्कि महात्मा गांधी की भी इस संदर्भ में खुलकर आलोचना करनी
चाहिए. इससे एक साथ गुजरात के कांग्रेसियों, जनता दल यूनाइटेड, समाजवादी पार्टी,
राष्ट्रीय जनता दल, कम्युनिस्ट पार्टियों सहित सभी मुस्लिम संगठनों वगैरह को उन
पर हमला करने का अवसर तो मिले.
जसवंत सिंह ने अपनी
पुस्तक में खूंखार आतंकवादियों के भेष में जिन्ना जैसे किसी आतंकवादी की तर्कों के
हवा महल में बैठकर रिहाई नहीं की है और न ही निर्दोष नागरिकों को बचाने के नाम पर
उन्होंने कोई नीतिगत निर्णय लिया है. भाजपा ने इस पुस्तक की बिक्री में अप्रत्यक्ष
मदद की है. इसलिए इसके प्रकाशक को भी उनका धन्यवाद अदा करना चाहिए. हर पढ़ा लिखा
बुद्धिजीवी इसमें जिन्ना के जिन्न को ढूंढ़ रहा है, जिसे भाजपा अपनी बोतल में बंद
समझती है. काश! भाजपा इस पुस्तक के उन पन्नों को वक्त की दीवार पर चिपका सके जो देश
के हितों के खिलाफ उसे नजर आते हों. यदि जसवंत सिंह का लेख भारतीय जनता के खिलाफ नहीं
है तो क्या भाजपा उसको भी अपनी पार्टी का शगल बनाएगी.
भारत-पाक विभाजन की चिता की आग में अब तो सभी लोग रोटियां सेंक रहे हैं. राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रमुख सुदर्शन आजादी के पहले के जिन्ना को सेक्युलर बताते
हैं. वे गांधी जी को विभाजन का जिम्मेदार बताते हुए याद दिलाते हैं कि बापू ने कहा
था कि पाकिस्तान उनकी लाश पर ही बनेगा लेकिन वह उनके जीते जी बन गया. जो जिन्ना
पाकिस्तान के निर्माण के लिए जिम्मेदार रहा है, वह तो कथित रूप से सेक्युलर था और
गांधी जो उस जिन्ना को रोक नहीं सके बल्कि अपने शिष्यों नेहरू और पटेल को भी, उन्हें
सुदर्शन जिम्मेदार ठहरा रहे हैं.
विभाजन के बाद राष्ट्रीय
स्वयं सेवक संघ से जुड़े व्यक्ति ने बापू की हत्या करके क्या उन्हें उनका वचन याद
दिलाया? मुझे तो लगता है कि विभाजन को लेकर डा. राममनोहर लोहिया का यह कथन सबसे
ज्यादा प्रामाणिक, समावेषी और विचार योग्य है “ जिन बुनियादी कारणों की वजह से
विभाजन हुआ, वे ये हैं: पहला, ब्रिटिश कपट; दूसरा, कांग्रेस नेतृत्व की ढलती उमर;
तीसरा हिंदू-मुस्लिम दंगों की वस्तुपरक अवस्था; चौथा, जनता में साहस और धैर्य की कमी;
पांचवां, गांधी जी की अहिंसा; छठवां, मुस्लिम लीग की पृथकवादिता; सातवां, जो अवसर
मिलें उनका फायदा उठाने की अक्षमता और; आठवां, हिंदू अहंकार.”
30.08.2009, 20.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | navin (shivatubewell@gmail.com) raipur | | | | nehru & jinnah both are responsable for partition | | | | | |
| | kashif ali gorakhpur | | | | सबका अपना अपना नज़रिया है. जसवंत के साथ जो हुआ वो ठीक नहीं है. आखिर उन्होंने क्या लिख दिया जिससे उन्हें पार्टी से निकालना पड़ा. लगता है जिस तरह भाजपा का सितारा उदय हुआ था उसी तरह अब डूब रहा है. | | | | | |
| | Pramode Mallik Delhi | | | | Jinnah was responsible for partition that left a great country bleeding for ever. He was a secular man in the bigger part of his life. He was not a Muslim in true sense as he did not follow its day to day teachings. He used to eat pork, drink good quality wine, never kept roza, did not go on Haz. He was a western educated modern man, who was far removed form his religion.
But this man changed completely after 1937, when his Muslim League lost the central legislative assembly elections miserably. Muslim League did not win a single seat in Sindh, North Western Province, it won one seat in Punjab in the seats reserved for Muslims. It lost to Congress hands down.
This jolted Jinnah. He realised that his party had no grass root support base, no mass appeal. It was party of Muslim nawabs and landlords, it was a party of aristocracy. On the other hand Congress was a party of general people, some rajas joined it, but transformed themselves according to the ethics of the party and its supremo. Ghandhi.
Jinnah wanted to convert Muslim League into a party with grass root base, but he had no vision, no programme and no thinkers for this. The local satraps and their small parties in Muslim dominated areas were taunting the party. So, Jinnah turned to narrow minded, wrong interpretation of Islam. He tried to sell the idea of Islam is in danger. This got clicked. In the following elections, League won majority of seats in all Muslim dominated areas.
He never looked back. He floated the tow two-nation theory and was so much adamant that he said in the most unambiguous words that he would be satisfied with nothing less than a separate nation for Muslims.
The Cabinet Mission gave to proposals-one in May 1946 and the other one month later. Jinnah was ready top accept the federation of states and groups of states carved out on the basis of religion with a very weak centre. But his intention was to keep the centre weak so that the the group of Muslim-dominated state could get separated at the right time. He pressed for the second proposal of dividing the country on communal line.
As the Congress rejected both the proposals, he refused to make any compromise. He blackmailed Gandhi and other leaders of the party of unleashing communal frenzy and start civil war. He was quite serious on this. The man who was once hailed as symbol of Hindu-Muslim unity, called on for Direct Action Day. About 5,000 people were killed and another 15,000 were wounded in the communal fire that was started by goons of League on August 16 and ws kept burning for three days.
This was enough strong proof that Jinnah and his henchmen had the capacity of starting a civil war. Nehru and other leaders surrendered to this blackmail.
Congress and its leaders should be held responsible for not being able to stop the tide of communal frenzy and counter the expansion of League.
Majority of Muslims were against the partition, but they were marginalised. Jinnah got a nation for Muslims, but a vast majority of them decided to not go with him stay with India.
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| | Md. Kashif Yunus Patna | | | | Jinah was an honest person and he always tok care of people to whom he represented. He was neither Pro nor against the creation of pakistan. His only concern was the welfare of Indian Muslim. And when Nehru & Gandhi refused to give what he was asking for Indian Muslims, he went with the option of Pakistan. Nehru & Patel supported the idea, bcz they were afraid that if muslims will leave in India, India will again become a Muslim state.
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| | Kiran Patel | | | | Jaswant has not got his facts right. It was Patel who held back privy to Jinnah, if he were to agree to partition. But Gandhi went onto fast to let Jinnah have his way. The following clearly claifies Patel's stand for one INDIA. Only traitors are out to destroy the fabric of mother INDIA.'I Must Speak the Truth’ Many people misunderstood Patel. There was false propaganda that he did not like Muslims. On the 6th of January 1948, speaking in Lucknow, he said, "There is a cry that I am against Muslims. But I am their true friend. I cannot beat about the bush. I cannot dissemble. Let no one try to have his two feet in two different boats. Let every one choose one boat. Let us all, who belong to India, swim or sink together."
The Sardar's plain words made some people angry. They complained to Gandhiji. What Sardar Patel said at that time shows the superbself-confidence of this mighty man: "I cannot speak anything but the truth. I cannot turn back on my duty, just to please some one." | | | | | |
| | Chander K. Azad Kashmir | | | | Aey sarzameen-i-pak Zarrey terey hein aaj sitaron sey tabnak Roshan heh kehkashan sey kahin aaj teri khak." ("Oh land of Pakistan, each particle of yours is being illuminated by stars. Even your dust has been brightened like a rainbow."`)
These are lines from Pakistan's first national anthemÿwritten by Jagannath Azad, a Lahore-based Hindu, acceding to the wishes of Mohammad Ali Jinnah, the country's founder and first Governor-General.
As the debate about Jinnah's secular August 1947 vision of his country rages on, this little known fact will be of public interest. Days before his death in 2004,Azad recalled the circumstances under which he was asked by Jinnah to write Pakistan's national anthem: "In August 1947, when mayhem had struck the whole Indian subcontinent, I was in Lahore working in a literary newspaper. All my relatives had left for India and for me to think of leaving Lahore was painful. I decided to take a chance and stay on for some time. My Muslim friends requested me to stay on and took responsibility of my safety. On the morning of August 9, 1947, there was a message from Pakistan's first Governor-General, Mohammad Ali Jinnah. It was through a friend working in Radio Lahore who called me to his office. He told me `Qaid-e-Azam wants you to write a national anthem for Pakistan.' I told them it would be difficult to pen it in five days and my friend pleaded that as the request has come from the tallest leader of Pakistan, I should consider his request. On much persistence, I agreed.
Why him? "The answer to this question," Azad said , "has to be understood by recalling the inaugural speech of Jinnah Sahib as Governor General of Pakistan. He said: `You will find that in the course of time, Hindus will cease to be Hindus and Muslims will cease to be Muslims, not in the religious sense because that is the personal faith of each individual, but in the political sense as citizens of the state.'
It is for historians and analysts to judge what made Jinnah Sahib make this speech. But clearly as understood by the speech was the fact he wanted to create a secular Pakistan, despite the fact the whole continent, particularly the Punjab province, had seen a human tragedy in the form of communal massacres. Said Azad, "Even I was surprised when my colleagues in Radio Pakistan, Lahore approached me. I asked them why Jinnah Sahib wanted me to write the anthem. They confided in me that `Qaid-e-Azam wanted the anthem to be written by an Urdu-knowing Hindu.' Azad goes on to say, "Through this, I believe Jinnah Sahib wanted to sow the roots of secularism in a Pakistan where intolerance had no place."
The national anthem written by Jagannath Azad was sent to Jinnah, who approved it in a few hours. It was sung for the first time on Pakistan Radio, Karachi (which was then the capital of Pakistan).
The song written by Jagannath Azad served as Pakistan's national anthem for a year and a half. After Jinnah's death, a song written by the Urdu poet Hafiz Jallundhari was chosen as the national anthem. | | | | | |
| | Bina Sarwar (bsarwar1@yahoo.co.uk) | | | | We know that Jinnah was an unlikely contender for a `Muslim leader'. But in Pakistan, there will be no public mention of his non-fasting during Ramzan or ignorance about the Muslim prayer. Jinnah's marriage to the Zoroastrian Rati Petit is similarly glossed over. Jinnah joined Congress in 1906, remained a member after joining the All India Muslim League (AIML) in 1913, and brokered the Congress-League Lucknow Pact of 1916. Ever the constitutionalist, he played a key role in the formation of the All India Home Rule League pushing for India's recognition as a British dominion, like Ireland or New Zealand. How did this `architect of Hindu-Muslim unity', as Sarojini Naidu termed him, end up founding a `Muslim country'?
Jinnah's differences with the Congress developed after the arrival on the scene of the populist M.K. Gandhi, coincidentally also a Guajarati lawyer. Jinnah, believing that independence could be achieved through constitutional means alone, opposed Congress adopting Gandhi's non-violent civil disobedience movement to gain swaraj (self-rule) and the use of religious symbols to achieve this end — the Hindu symbols used by Gandhi or the Muslim slogans raised by Muhammad Ali and Shaukat Ali Jauhar. He was aghast when Congress, prompted by Gandhi, decided to join the Indian Khilafat Movement as a means to boost the anti-imperial, nationalist movement in India. Many saw this as a defining point of Hindu-Muslim unity. Jinnah disagreed. He termed the Khilafat as communal and religiously divisive, resigned from the Congress and turned his attention to the Muslim League and the political enfranchisement of Indian Muslims whom he increasingly saw as his constituency. | | | | | |
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