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नरेगा यानी लूट की छूट

मुद्दा

 

नरेगा यानी लूट की छूट

ग्लैडसन डुंगडुंग, रांची से

 

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून यानी नरेगा का मतलब अगर पता करना हो तो आपको झारखंड के लातेहार जिले में जाना चाहिए. आप चाहें तो पलामू भी घूम सकते हैं और गढ़वा भी और...! सच तो ये है कि आप अपनी सुविधा से झारखंड के किसी भी इलाके में नरेगा का हाल जान सकते हैं, जिसके बारे में अब एक जुमला बहुत मशहूर हो चुका है- “नरेगा जो करेगा, सो मरेगा.”

अस्पताल में तापस सेन

अस्पताल में तापस सोरेन


राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून 2005 ग्रामीण क्षेत्र में रहनेवाले भूमिहीन, मजदूर एवं लघु कृषक परिवारों के आजीविका को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से रोजगार अभाव के समय 100 दिनों की रोजगार उपलब्ध करने के लिए बनाया गया था. लेकिन झारखण्ड में नरेगा का अर्थ कुछ और ही बन गया है. नरेगा की वजह से तापस सोरेन, तुरिया मुंडा और ललित मेहता जैसे कई लोगों को अपनी जान गवांनी पड़ी, ज़िससे राज्य में हलचल मच गई तथा 'नरेगा जो करेगा सो मरेगा'' जैसा नारा झारखण्ड के गांव-गांव में छा गया.

सरकारी पदाधिकारी, ठेकेदार और बिचौलियों के गंठजोड़ को देखते हुए अब यह मान लिया गया है कि अगर नरेगा से जुड़ना है तो चुपचाप जो मिल रहा है, उसी में संतोष करना होगा. अगर गलती से कोई सवाल उठाता है तो उसे जान से हाथ धोना पड़ेगा.

अब तो सरकार और नौकरशाह भी खुलकर बोल रहे हैं कि नरेगा के पैसों की लूट हो रही है. लेकिन इस लूट को कैसे रोकना है, यह कोई नहीं बता रहा है. यह देखना महत्वपूर्ण है कि कैसे नरेगा ग्रामीणों का रोजगार योजना बनने के बजाये सरकारी पदाधिकारी, ठेकेदार और बिचौलियों के लिए लूट योजना बन कर रह गई है.

नरेगा कार्यक्रम का प्रथम चरण 2 फरवरी 2006 को देश भर के 200 जिलों में प्रारंभ किया गया था, जिसमें झारखण्ड के 20 जिले भी शामिल थे. इसके बाद दूसरे एवं तीसरे चरण में झारखण्ड के और 2-2 जिलों को इसमें शामिल कर राज्य के पूरे 24 जिलों में नरेगा को लागू किया गया.

भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा उपलब्ध आंकड़ा के अनुसार नरेगा के तहत झारखण्ड में 15 सितंबर, 2009 तक 8.73645 लाख लोगों को 314.57 लाख दिन का रोजगार उपलब्ध कराया गया है, जिसमें 15.1 प्रतिशत (47.49 लाख) दलित, 42.6 प्रतिशत (134.02 लाख) आदिवासी एवं 32.7 प्रतिशत (102.87 लाख) महिलाओं को रोजगार दिया गया है.

भारत सरकार ने नरेगा के तहत झारखण्ड सरकार को 1397.37 करोड़ रूपये का आवंटन किया है, जिसमें से मात्र 37.1 प्रतिशत (518.87 करोड़) रूपये ही खर्च हो सका है. इसके तहत 114009 कार्य लिया गया जिसमें से मात्र 22.8 प्रतिशत (26062) कार्य पूरा किया गया है तथा 77.2 प्रतिशत (87947) कार्य अभी तक जारी है, जिससे यह साफ पता चलता है कि राज्य में नरेगा अभी भी कछुआ चाल से ही चल रही है.


नरेगा के कछुआ चाल को समझने के लिए आंकड़ों के गणित को थोड़ा और विस्तार से समझने की जरूरत है. भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय की रिर्पोट दर्शाती है कि वितीय वर्ष 2008-2009 में झारखण्ड में कुल ग्रामीण परिवारों की संख्या 3736526 थी, जिसमें 1655281 परिवार गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करते हैं. इनमें से कुल 2710647 परिवारों को नरेगा के तहत 100 दिनों का रोजगार देने की योजना थी. इसके लिए भारत सरकार ने झारखण्ड सरकार को 180580.1 लाख रूपये आवंटित किया था तथा विगत वर्ष की उपलब्ध राशि को मिलाकर कुल आवंटित राशि 236337.4 लाख रूपये थी.

राज्य सरकार ने इसके तहत 3375992 जॉब कार्ड जारी किया, लेकिन सिर्फ 46.69 प्रतिशत (1576348) परिवारों को ही रोजगार दिया गया, जिसमें से सिर्फ 56.77 प्रतिशत (134171.7 लाख रूपये) राशि ही खर्च किया गया तथा 102165.7 लाख रूपये बचा रहा जिससे और 10 लाख लोगों को 100 दिन का काम दिया जा सकता था.

वित्तीय वर्ष 2009-2010 का आकलन करने से पता चलता है कि इस वर्ष नरेगा के तहत 2864120 परिवारों को काम देने की योजना है, जिसके लिए भारत सरकार ने 45333.29 लाख रूपये आवंटित किया है तथा विगत वर्ष की शेष राशि को जोड़कार कुल 148153.9 लाख रूपये आवंटित हैं.

राज्य सरकार ने अब तक 3494390 लोगों को जॉब कार्ड जारी किया है लेकिन सिर्फ 25 प्रतिशत (873645) परिवारों को ही रोजगार दिया गया है, जिसमें 35.02 प्रतिशत (51887.28 लाख रूपये) राशि खर्च की गयी है और 96266.57 लाख रूपये शेष है. लेकिन इस राशि से भी गरीबों को राहत मिलने की उम्मीद कम है क्योंकि कुछ ही महीने में विधानसभा का चुनाव होना है, जिसमें सारे सरकारी पदाधिकारी व्यस्त हो जायेंगे. जाहिर है, इसके बाद नरेगा का काम खटाई में पड़ सकता है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

manoj kumar sharma (manojsharma.1024@yahoo.com) rajasthan

 
 श्रीमान महोदय जी, आपको यह सूचित करके बड़ा दुःख हो रहा है कि राजस्थान सरकार ने ग्राम-पंचायत में ठेके से जो कंप्यूटर ऑपेरटर की स्कीम चलाई है, वह बड़ी ही बेहूदी ढंग की है. इसके द्वारा राज्य सरकार ठेकेदार को 6500/- रुपये पास कर रही है और कंप्यूटर ऑपेरटर को मात्र 4300/ रुपये देने की बात की जा रही है. क्या यह बात ठीक है? क्या इसके द्वारा एक बेरोजगार युवक का शोषण नहीं हो रहा है? और सरकार चुपचाप तमाशा देख रही है. ऐसा क्यों? मंत्रियो को अपनी वोट बैंक की पड़ी है. लेकिन मंत्री जी को यह पता नहीं है कि उनका राज 5 साल का होता हा.प्रति पांच साल का गुणक 20*5=100.
इसका उदाहरण यह कि एक इन्सान की उम्र 100 साल आंकी गयी है. जब इन्सान 60 को पार कर रहा होता है तब उसे पता चलता है कि अब उससे कुछ नहीं होने वाला.
ऐसे ही सरकार 3 साल तक यानि 3*20=60 साल का कार्यकाल में कुछ भी नहीं करती लेकिन जैसे ही 4 साल का अंकाड़ा पार करना होता है, तब उसे पता चलता है कि हमारा बुढ़ापा आना शुरु हो गया है.
इसलिए सरकार से गुजारिश करूँगा कि वो प्रत्येक ग्राम पंचायत के कंप्यूटर ऑपेरटर को सही वेतन और भत्ता दिलाये क्योंकि 4300/-रुपये में लगभग 30000/-की मशीन भी ऑपरेटर की होती है. आपने यह कहावत सुनी होगी कि नंगा नहायेगा क्या और निचोड़ेगा क्या?
 
   
 

अवनीश राय दिल्ली

 
 नरेगा वास्तव में सरकारी धन के लूट का सबसे बड़ा उदाहरण बन गया है। नरेगा में लूट कैसे होती है और किसकी - किसकी मिलीभगत से ये घोटाले होते हैं, इसपर मैंने अपने ब्लॉग में भी लिखा है. 
   
 

सुदीप श्रीवास्तव लंका, वाराणसी, उत्तर प्रदेश

 
 झारखंड में नरेगा के तहत केवल 27 प्रतिशत लोगों को काम मिला है, यही आंकड़ा पूरी परियोजना की सच्चाई को सामने रख देता है. 
   
 

Ajay Prakash New Delhi

 
 आपने भले झारखंड में नरेगा को लेकर सच्चाई बताई हो लेकिन देश की राजधानी तो आकंठ भ्रष्ट है और उसे इससे कोई मतलब नहीं। एक ओर नरेगा की योजनाओं में जहां भ्रष्टाचार की शिकायतें मिल रही हैं, वहीं दूसरी ओर इस योजना में झारखंड की स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में अच्छी आंकी गयी है।

राष्ट्रीय स्तर पर प्रति परिवार रोगार उपलब्ध कराने के मामले में झारखंड का दूसरा स्थान है। झारखंड में परिवारों में से साढ़े चौदह लाख लोगों को 36 दिन का रोगार उपलब्ध कराया गया। पहला स्थान राजस्थान का है। वहां 5271168 परिवारों को रोगार दिया गया। 100 दिनों तक रोगार उपलब्घ कराने में राज्य का तीसरा स्थान है। यहां 388परिवारों को सौ दिनी रोगार उपलब्ध कराया गया। राशि खर्च करने और मस्टर रोल भरने में भी यह तीसरे स्थान पर है। कुल मानव दिवस सृजित करने में राज्य चौथे स्थान पर है। यहां 33454410 मानव दिवस सृजित किये गये। केंद्रीय सहायता प्राप्त करने में झारखंड पांचवें स्थान पर है। झारखंड को 157304.570 लाख राशि प्राप्त हुई है।
 
   
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