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इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

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कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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गजानन माधव मुक्तिबोध की अप्रकाशित कविता

दस्तावेज

 

जब दुपहरी जिन्दगी पर...

गजानन माधव मुक्तिबोध की अप्रकाशित कविता

 

(गजानन माधव मुक्तिबोध को गुजरे 45 साल हो गये. लेकिन उनका लिखा काल को इस तरह थामता है, जैसे यह कल की ही रचना हो. 11 सितंबर 2009 को उनकी स्मृति में रायपुर में उनके परिवारजनों ने एक आत्मीय आयोजन किया, जिसमें मुक्तिबोध स्मृति नामक एक लघु पुस्तिका भी जारी की गयी. यहां प्रस्तुत है उसी पुस्तिका से एक अप्रकाशित कविता)

गजानन माधव मुक्तिबोध

 

जब दुपहरी जिन्दगी पर रोज सूरज
एक जॉबर-सा
बराबर रौब अपना गांठता-सा है
कि रोजी छूटने का डर हमें
फटकारता-सा काम दिन का बांटता-सा है
अचानक ही हमें बेखौफ करती तब
हमारी भूख की मुस्तैद आंखें ही
थका-सा दिल बहादुर रहनुमाई
पास पा के भी
बुझा-सा ही रहा इस जिन्दगी के कारखाने में
उभरता भी रहा पर बैठता भी तो रहा
बेरुह इस काले जमाने में
जब दुपहरी जिन्दगी को रोज सूरज
जिन्न-सा पीछे पड़ा
रोज की इस राह पर
यों सुबह-शाम खयाल आते हैं....
आगाह करते से हमें.... ?
या बेराह करते से हमें ?
यह सुबह की धूल सुबह के इरादों-सी
सुनहली होकर हवा में ख्वाब लहराती
सिफत-से जिन्दगी में नई इज्जत, आब लहराती
दिलों के गुम्बजों में
बन्द बासी हवाओं के बादलों को दूर करती-सी
सुबह की राह के केसरिया
गली का मुंह अचानक चूमती-सी है
कि पैरों में हमारे नई मस्ती झूमती-सी है
सुबह की राह पर हम सीखचों को भूल इठलाते
चले जाते मिलों में मदरसों में
फतह पाने के लिए
क्या फतह के ये खयाल खयाल हैं
क्या सिर्फ धोखा है ?....
सवाल है।

(संभावित रचनाकाल 1948-50, अप्रकाशित)

19.09.2009, 22.50 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

mithilesh rai (rai.mithilesh80@gmail.com) ratlam,M.P.

 
 I read the poem of Gajanan Muktibodh it so nice organized and unpublished muktibodh creation and its gives us a new way of thinking. Thank u a lot. 
   
 

अतुल (atul.august@gmail.com) दिल्ली

 
 मुक्तिबोध की रचनाओं में जीवन का सहज स्पंदन है जो जीने और सपने देखने पर मजबूर करती हैं . मेरी निजी राय में निराला के बाद यदि कविता में किसी का आतंक है तो वह मुक्तिबोध का ही है जो उनके जाने के पैन्तालिस साल बीत बाद भी महसूस किया जा सकता है.

वरना क्या कारण है की आज जो कविता लिखी जा रही है वह मुक्तिबोध की कविताओं का ही विस्तार लगती है. इससे यह सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि मुक्तिबोध के असमय जाने के बाद कविता में जो रिक्तता पैदा हुई वह अभी तक भरी नहीं है.

हे कवि तुझे मेरा प्रणाम
 
   
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