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लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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अब और मुश्किल हुई खेती

मुद्दा

 

अब और मुश्किल हुई खेती

देविंदर शर्मा

 


अब कृषि और उत्पादन क्षेत्र पर जोरदार हमला होने वाला है. पहले ही खराब मानसून की मार झेल रहे भारतीय किसानों को अंतरराष्ट्रीय व्यापार की लहरों का सामना करना पड़ेगा. लोहे को ढाला जा चुका है. वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा जनता के बीच कुछ भी कहें, सच्चाई यही है कि विश्व व्यापार संगठन आज की तारीख में कृषि और उद्योग क्षेत्र में करार को अंतिम रूप दे चुका है. इस करार के साथ ही देश के साठ करोड़ किसानों और बहुआयामी लघु उद्योग का भविष्य तय हो गया है.

खेती की खराब हालत


इस बीच भारत अनावश्यक जल्दबाजी में द्विपक्षीय व्यापार समझौतों, जिसे मुक्त व्यापार समझौता कहा जाता है; पर हस्ताक्षर करने में व्यस्त है. हालांकि दस सदस्यीय एशियान देशों के साथ भारत के समझौते का केरल में पहले ही विरोध शुरू हो गया है. इस समझौते के कारण किसानों का पौधारोपण व्यवसाय समाप्त हो जाएगा.

वास्तव में, विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख पास्कल लैमी की बातें सच साबित होती नजर आ रही हैं. हाल ही में नई दिल्ली में डब्ल्यूटीओ मिनिस्ट्रीयल के उद्घाटन समारोह में उन्होंने कहा था कि दोहा वार्ता के 80 प्रतिशत मामलों को सुलझा लिया गया है तो वह सच बोल रहे थे.

अब बस इतना काम बाकी रह गया है कि इन दो समझौतों के पेंच कस दिए जाएं. वार्ताओं को फिर से शुरू करने के लिए भारत ने 35 देशों के वाणिज्य मंत्रियों और अधिकारियों को हाल ही में नई दिल्ली बुलाया था. इस वार्ता में विवादास्पद मुद्दों को हल करने के लिए कोई नया नजरिया पेश नहीं किया गया.

विशेष तौर पर कृषि और गैर कृषि बाजार में पहुंच बनाने के संबंध में दोहा वार्ता के मूलाधार और विस्तृत रूपरेखा पर सहमति बन चुकी है. भारत का जोर सेवा क्षेत्र तक सीमित है, जिसमें अस्थायी आईटी कर्मचारियों के लिए वीजा नियमों में ढील और आउटसोर्सिंग के लिए बाध्यकारी वचनबद्धता शामिल है. दूसरे शब्दों में, आईटी कर्मचारियों के लिए भारत कृषि और लघु उद्योगों की बलि चढ़ा रहा है.

भारतीय किसान यूनियन के एक प्रतिनिधिमंडल ने इस बात को जोरदार तरीके से उठाया है कि सेवा क्षेत्र के लिए कृषि को बलि का बकरा बनाया जा रहा है. इस प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली बैठक से एक दिन पहले आनंद शर्मा से मुलाकात की. इसने स्पष्ट किया कि विशेष उत्पाद और विशेष निगरानी उपाय से भारतीय किसानों के हित सुरक्षित नहीं रह पाएंगे.

विशेष उत्पाद श्रेणी में भारत कृषि की 700 उपजों में से केवल 12 की ही रक्षा कर सकता है. इनमें से भी केवल पांच में ही आयात शुल्क में कोई कटौती न करने का अधिकार है. शेष सात उत्पादों में 19 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से आयात शुल्क में कटौती करनी है, किंतु क्या इसकी कोई अहमियत रह गई है? इसका जवाब है- नहीं.

ऐसे देश में जहां प्रति वर्ष 260 फसलें उगाई जाती हैं, जिनमें बागवानी की किस्में भी शामिल है, विशेष उत्पाद केवल पांच-छह फसलों को ही बचा सकता है. प्रत्येक फसल की औसतन पांच-छह शुल्क दरें होती हैं. किंतु इससे कृषि पर छाया कुहासा नहीं छंटता. भारत पहले ही स्वत: उदारीकरण अपना चुका है, जिसके तहत गेहूं, चावल, मैदा, दलहन और कच्चे खाद्य तेलों पर आयात शुल्क शून्य कर दिया गया है. प्रसंस्कृत खाद्य तेल पर आयात शुल्क मात्र 7.5 प्रतिशत है, जबकि इसकी अधिकतम दर 300 प्रतिशत है.

इसमें हैरानी की बात नहीं है कि इस साल खाद्य तेलों का आयात 80 लाख टन पर पहुंच गया है, जबकि पिछले वर्ष 50 लाख टन खाद्य तेलों का ही आयात हुआ था. यह रकम इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों के किसानों के पास चली जाती है, जो खाद्य तेलों के प्रमुख निर्यातक देश हैं, जबकि अगर सरकार चाहती तो यह विपुल धनराशि भारत में ही रह जाती. यह राशि मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों के किसानों की जेब में जानी चाहिए थी.


निश्चित तौर पर इसमें असहमति की गुंजाइश नहीं है कि अगर 20,000 करोड़ रुपए सिंचित क्षेत्रों के किसानों की तरफ हस्तांतरित होते, जहां तिलहन की अधिक पैदावार होती है, तो इन इलाकों में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या में काफी कमी आ जाती.
हमें हांगकांग में मंत्रिस्तरीय बैठक में पास्कल लैमी के पूर्व में दिए गए बयान को नहीं भूलना चाहिए. उन्होंने कहा था कि विशेष उत्पाद ऐसी गाजर है, जो विकासशील देशों के किसानों को ललचाने के लिए उनके आगे लटकाई गई है. ये विशेष उत्पाद अस्थायी उपाय मात्र हैं और चरणबद्ध तरीके से समाप्त कर दिए जाएंगे.

विशेष निगरानी उपाय (एसएसएम) की अन्य श्रेणी, जिसे सस्ते निर्यात की बाढ़ रोकने के कवच के रूप पेश किया जा रहा है, इतनी जटिल है कि आयात की बाढ़ रोक पाने में इसकी सफलता को लेकर मुझे संदेह है. इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि जब विशेष उत्पाद और विशेष निगरानी उपायों (एसएसएम) को एक निश्चित कालखंड में हटा दिया जाना है तब भारत धनी और औद्योगिक देशों से कृषि अनुदान को चरणबद्ध रूप में समाप्त करने की मांग नहीं कर रहा है. न ही भारत ने अमेरिका और यूरोपीय संघ द्वारा कृषि को अन्यायपूर्ण सहायता प्रदान करने के खिलाफ कभी डब्ल्यूटीओ विवाद पैनल में अपील की है.

80 प्रतिशत कृषि समर्थन वाले ग्रीन बाक्स को कब हटाया जाएगा? क्या हम जानते हैं कि अमेरिका और यूरोपीय संघ ब्लू बाक्स के नाम पर दिए जा रहे अपने अनुदान कब समाप्त करेंगे? इसका जवाब यह है कि विकासशील देश कभी इस मांग पर अड़े ही नहीं हैं. यहां तक कि भारतीय वार्ताकार भी अनुदान का पिटारा बंद करने के इच्छुक नजर नहीं आते. इसका मतलब हुआ कि कुल मिलाकर भारत ने सुनिश्चित कर दिया कि विकसित देशों में वंशजों के लिए खेती सुरक्षित हो गई है. क्या यह भारतीय किसानों के साथ विश्वासघात नहीं है? क्या हमारे वार्ताकारों को इसके लिए दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए?

अमेरिका और यूरोप में कृषि अनुदान प्रति वर्ष 374 अरब डालर (करीब 17,950 अरब रुपए) है. असलियत में, अगर हम इसमें अंतर्निहित सहायता भी जोड़ दें तो यह राशि इससे कहीं अधिक हो जाती है. विकसित देश यह अनुदान खत्म नहीं कर रहे हैं. उल्लेखनीय है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ आर्थिक मंदी की चपेट में है. इस स्थिति में सेवा क्षेत्र के दरवाजे खोलने की कोई भी वचनबद्धता उनके लिए आत्महत्या के समान है.

अमेरिका और यूरोपीय संघ के देश चाहते हैं कि विकासशील देश कृषि और उद्योग क्षेत्र के अपने दरवाजे खोलकर उन्हें इस मंदी से उबार लें. भारत विकसित देशों के इन्हीं प्रयासों में सहायता प्रदान कर रहा है. एनएएमए वार्ता में भारत आयात शुल्क में 60 प्रतिशत की कटौती के लिए तैयार हो गया है, जबकि विकसित देशों ने महज 30 प्रतिशत कटौती ही की है. अब हमें मुश्किल समय के लिए कमर कस लेनी चाहिए. किसानों और श्रमिकों के भविष्य पर काला साया पड़ चुका है.

 

23.09.2009,1.30 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

KAPIL SHUKLA (kapil.shukla13@gmail.com) BILASPUR(C.G.)

 
 I do agree with Mr.Sharma. In today's recession period , where all over world every country is fighting to come out of the situation , we are helping those DEVELOPED countries to solve their problems. But in return what we will be getting that is HIDDEN !!!!

It is well known that our country has the AGRICULTURE BASED ECONOMY ,then also instead of focusing on the segment we are here compromising "Agriculture Industry" for SERVICE INDUSTRY(IT sector).All developed countries are securing their AGRICULTURE FUTURE.But we are securing our SERVICE SECTOR after having AGRICULTURE BASED ECONOMY.....

Why don't Government focus on "Food Security"????

Why don't Government Help Aggressively and Seriously on "NATIONAL FOOD SECURITY MISSION"??????

Why don't Government restudy and revise the SUBSIDIES given to farmers on Fertilizers , Seeds , Equipments and In irrigation Programme ?????

Why don't Government Focuses on Result Oriented and Target Oriented Subsidy Pattern ??????

Answers for all these questions are yet to be known.
 
   
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