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लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

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सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

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पहले शिवाजी को जाने शिवसेना

मुद्दा

 

पहले शिवाजी को जाने शिवसेना

राम पुनियानी

 

 

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों की घोषणा होने के साथ ही राज्य की राजनीति गरमा गई है. महाराष्ट्र में पिछले कुछ वर्षों में किसानों द्वारा आत्महत्या करने की अनेक घटनाएं हुईं हैं. इसके अतिरिक्त, महंगाई, बढ़ती बेरोजगारी और रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी कई दूसरी समस्याएं भी आम आदमी को परेशान कर रही हैं. ऐसा लगता है कि महाराष्ट्र की कुछ राजनैतिक पार्टियां इन मूलभूत मुद्दों को उठाने के बजाए, गड़े मुर्दे उखाड़कर और भावनाएं भड़काकर चुनाव जीतने की जुगत बैठा रही हैं.

शिवाजी


सितम्बर के पहले सप्ताह में मिरज, सांगली और आसपास के इलाकों में गणेशोत्सव के दौरान साम्प्रदायिक तनाव फैल गया. यह गौरतलब है कि गणेशोत्सव, महाराष्ट्र के प्रमुख त्यौहारों में एक है. ऐसे में इस तनाव ने एक बड़े वर्ग को प्रभावित किया.

गड़बड़ी तब शुरू हुई जब सांगली में गणेश विसर्जन के जुलूस के रास्ते में लगाए गए स्वागत द्वारों में से एक पर शिवाजी द्वारा अफजल खान को मारने के दृश्य की झांकी लगाई गई. पुलिस को ऐसा लगा कि इस झांकी से साम्प्रदायिक तनाव फैलने की आशंका है और उसने उस द्वार को हटवा दिया. इस निर्णय के विरोध स्वरूप कुछ गणेश मंडलों ने यह घोषणा की कि वे गणपति की मूर्तियों को तब तक विसर्जित नहीं करेंगे, जब तक वह स्वागत द्वार दुबारा लगा नहीं लगा दिया जाता. इस विवाद को लेकर हिंसा हुई, जिसमें एक व्यक्ति मारा गया और पांच घायल हुए.

भाजपा नेतृत्व ने स्वागत द्वार हटाने के सरकार के निर्णय की आलोचना की. शिवसेना ने यह घोषणा की कि वो अफजल खान को मारते हुए शिवाजी के चित्रों के पोस्टर पूरे राज्य में लगाएगी. शिवसेना के एक नेता ने यह भी कहा कि अगर शिवाजी न होते तो आज हम सब नमाज पढ़ते होते.

राज्य सरकार स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है परंतु अब तक यह मुद्दा एक बड़ा रूप ग्रहण कर चुका है. शिवाजी के नाम पर खड़े किए गए इस विवाद का हल निकालना मुश्किल हो गया है. कुछ साल पहले, लोकसभा चुनाव के दौरान, इन्हीं पार्टियों ने एक जुलूस निकालकर अफज़ल खान के मकबरे को तोड़ने की कोशिश की थी. सौभाग्यवश, आम जनता की जानकारी में समय रहते यह बात आ गई कि इस मकबरे का निर्माण स्वयं शिवाजी ने ही करवाया था परंतु इस मुद्दे ने भी उस समय बहुत तनाव फैलाया था.

शिवाजी से जुड़े मुद्दे महाराष्ट्र में हमेशा से बहुत संवेदनशील रहे हैं. महाराष्ट्र सरकार ने हजारों करोड़ रूपये खर्च कर अरब सागर में शिवाजी की मूर्ति लगाने का निश्चय किया है. यह मूर्ति अमरीका की स्टेच्यू आफ लिबर्टी की तर्ज पर होगी.

लेकिन जब शिवाजी को इस तरह महान साबित किया जा रहा हो तो यहां यह भी समझने की जरुरत है कि शिवाजी, जनता में इसलिए लोकप्रिय नहीं थे क्योंकि वे मुस्लिम-विरोधी थे या वे ब्राह्मणों या गायों की पूजा करते थे. वे जनता के प्रिय इसलिए थे क्योंकि उन्होंने किसानों पर लगान और अन्य करों का भार कम किया था.

शिवाजी के प्रशासनिक तंत्र का चेहरा मानवीय था और वह धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करता था. सैनिक और प्रशासनिक पदों पर भर्ती में शिवाजी धर्म को कोई महत्व नहीं देते थे. उनकी सेना के एक तिहाई सैनिक मुसलमान थे. उनकी जलसेना का प्रमुख सिद्दी संबल नाम का मुसलमान था और उसमें बड़ी संख्या में मुस्लिम सिद्दी थे.

दिलचस्प बात यह है कि शिवाजी की सेना से भिड़ने वाली औरंगजेब की सेना का नेतृत्व मिर्जा राजा जयसिंह के हाथ में था, जो कि राजपूत था. जब शिवाजी आगरा के किले में नजरबंद थे तब कैद से निकल भागने में जिन दो व्यक्तियों ने उनकी मदद की थी, उनमें से एक मुसलमान था जिसका नाम मदारी मेहतर था.उनके गुप्तचर मामलों के सचिव मौलाना हैदर अली थे और उनके तोपखाने की कमान इब्राहिम गर्दी के हाथ में थी. उनके व्यक्तिगत अंगरक्षक का नाम रूस्तम-ए-जामां था.

शिवाजी को न तो मुसलमानों से घृणा थी और न ही इस्लाम से. उनका एकमात्र उद्देश्य बड़े से बड़े क्षेत्र पर अपना राज कायम करना था. उन्हें मुस्लिम विरोधी या इस्लाम विरोधी बताना पूरी तरह गलत है.


शिवाजी सभी धर्मों का सम्मान करते थे. उन्होंने हजरत बाबा याकूत थोरवाले को जीवन पर्यन्त पेंशन दिए जाने का आदेश दिया था. उन्होंने फादर अंब्रोज की उस समय मदद की जब गुजरात में स्थित उनके चर्च पर आक्रमण हुआ. अपनी राजधानी रायगढ़ में अपने महल के ठीक सामने शिवाजी ने एक मस्जिद का निर्माण करवाया था जिससे उनके अमले के मुस्लिम सदस्य सहूलियत से नमाज अदा कर सकें. ठीक इसी तरह, उन्होंने महल के दूसरी ओर स्वयं की नियमित उपासना के लिए जगदीश्वर मंदिर बनवाया था.

अपने सैनिक अभियानों के दौरान शिवाजी का सैनिक कमांडरों को यह स्पष्ट निर्देश रहता था कि मुसलमान महिलाओं और बच्चों के साथ कोई दुर्व्यवहार न किया जाए. मस्जिदों और दरगाहों को सुरक्षा दी जाए और यदि कुरान की प्रति किसी सैनिक को मिल जाए तो उसे सम्मान के साथ किसी मुसलमान को सौंप दिया जाए.

एक विजित राज्य के मुस्लिम राजा की बहू को जब उनके सैनिक लूट के सामान के साथ ले आए तो शिवाजी ने उस महिला से माफी मांगी और अपने सैनिकों की सुरक्षा में उसे उसके महल तक वापस पहुंचवाया.

शिवाजी को न तो मुसलमानों से घृणा थी और न ही इस्लाम से. उनका एकमात्र उद्देश्य बड़े से बड़े क्षेत्र पर अपना राज कायम करना था. उन्हें मुस्लिम विरोधी या इस्लाम विरोधी बताना पूरी तरह गलत है. न ही अफजल खान हिन्दू विरोधी था. जब शिवाजी ने अफजल खान को मारा तब अफजल खान के सचिव कृष्णाजी भास्केर कुलकर्णी ने शिवाजी पर तलवार से आक्रमण किया था.

आज साम्प्रदायिक ताकतें शिवाजी से जुड़े मुद्दों का साम्प्रदायिकरण कर उनका अपने राजनैतिक हित साधन के लिए उपयोग कर रही हैं. साम्प्रदायिक चश्मे से इतिहास को देखना-दिखाना साम्प्रदायिक ताकतों की पुरानी आदत है. इस समय महाराष्ट्र में हम जो देख रहे हैं, वह इतिहास का साम्प्रदायिकरण कर उसका इस्तेमाल समाज को बांटने के लिए करने का उदाहरण है. समय का तकाजा है कि हम संकीर्ण भावनाओं से ऊपर उठें और राष्ट्र निर्माण के काम में संलग्न हों. हमें राजाओं, बादशाहों और नवाबों को किसी धर्म विशेष के प्रतिनिधि के तौर पर देखने के बजाए ऐसे शासकों की तरह देखना चाहिए जिनका एकमात्र उद्देश्य सत्ता पाना और उसे कायम रखना था.

 

23.09.2009, 15.05 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

नदीम अख्तर (nadeemjagran@gmail.com) रांची,, झारखंड

 
 राम पुनियानी साब को मेरा सलाम, नमस्कार। जिस स्तर की पत्रकारिता आज देश को बचा सकती है, बिल्कुल वैसा ही है आपका यह लेख। ऐतिहासिक संदर्भ में शिवाजी को जिस तरह आपने लोगों के सामने पेश किया है, वह अतुलनीय है, अद्भुत है, अद्वितीय है। मैं आलोक जी को धन्यवाद देता हूं कि उन्होंने इस लेख को प्रकाशित कर सवच्छ पत्रकारिता के उद्देश्यों को सफलीभूत होने की दिशा में कारगर कदम उठाया है। 
   
 

Rajnesh (rajnesh.reporter@gmail.com) patna

 
 the society needs these types of articles,and it is the duty of civil society members and those who are against Communism and in the favor of real democracy,advertise these type of articles on a very broad level. Thanks to Mr.Ram Punyani who regularly counters these fundamentalists action. 
   
 

anuraag raizada (anuraagraizada@gmail.com) jaipur

 
 समाज को विघटनकारियों से बचाने की दिशा में अच्छा लेख है ये. शिवाजी पर कोई श्रृंखला लिखें तो अच्छा होगा. 
   
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