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रेल के लिए ज़िंदगी रोक दी

मुद्दा

 

रेल के लिए ज़िंदगी रोक दी

शिरीष खरे, सूरत से

 

मीराबेन को अब नींद नहीं आती. क्यों ? उनके पास इसका सीधा जवाब है- “ अगर आदमी को फांसी पर लटकाना तय हो, मगर तारीख तय न हो तो उसे नींद कैसे आएगी ? ’’

मीरा बेन और उनके जैसे सूरत शहर के हजारों लोग इन दिनों परेशान हैं. परेशानी का सबब है उनका आशियाना, जिसे कभी भी, कोई भी सरकारी अमला तोड़ कर चल देता है.

सूरत की झोपड़पट्टी


समय के छोटे-छोटे अन्तराल से शहर की बाकी झोपड़ियों की तरह मुंबई-अहमदाबाद मेनलाइन की झोपड़ियों को तोड़कर गिराया जाना आम बात है लेकिन इस बात की जिम्मेवारी कोई नहीं लेना चाहता कि उसने झोपड़ियां तोड़ी हैं. शहर की झोपड़ियों के तोड़े जाने पर पुनर्वास और राहत जैसे मुद्दे जुड़ जाते हैं और इस बार झोपड़ियों को गिरानेवालों ने नया तरीका निकाला. झोपड़ी किसने तोड़ी, इस सवाल का जवाब सब जगह से एक-सा आता है- ‘हमने नहीं उसने’. महापालिका के पास भी यही जवाब है और रेलवे के पास भी.

सवाल सिर्फ एक सूरत का नहीं है, देशभर में रेलवे पट्टियों के दाएं-बाएं बसी असंख्य झोपड़ियों का यही हाल है. इन्हें भी पुनर्वास की वाजिब व्यवस्था चाहिए, जो कि न ‘रेलवे की नीति’ में दर्ज है और न ‘राष्ट्रीय पुनर्वास की नीति’ में.

यहां कतारगांव से लगे अशोकनगर, उत्कलनगर, शांतिनगर, मिलिंदनगर, इंदिरानगर, मफतनगर, सहारा दरवाजा, शिवाजीनगर से लेकर उदना, अपनानगर, नरहरि, अंबेडकरनगर, महावीर मार्केट, संतोषीनगर, भीमनगर, संगम टेकरी जैसी 18 से ज्यादा झोपड़पट्टियों के 12 हजार से ज्यादा रहवासी जब माटी में मिले झोपड़े का सवाल उठाकर ‘महापालिका’ और ‘रेलवे’ के पास पहुंचते हैं तो दोनों पहले तो ‘डेमोलेशन की जानकारी नहीं’ होने की बात कहते हैं, फिर जब मालूम चलता है तो एक-दूसरे को ‘कसूरवार’ ठहराते हैं. इस तरह डेमोलेशन के वक़्त 'दोनों आफिस वालों के आपसी कोर्डिनेशन' जैसे अगले सवाल लोगों की जवाब पर ही अटके रह जाते हैं.

जाहिर है अगर दोनों ने ही डेमोलेशन नहीं किया तो उनमें से एक भी मुआवजा क्यों देगा ? और यह कोई प्राकृतिक आपदा भी नहीं कि उम्मीदों को सरकारी पंख ही लग जाए ??

सवाल दर सवाल हैं

यहां रेलवे और महापालिका की जमीन के बीच में कम से कम 150 झोपड़ियां ऐसी भी फसी है जिसको लेकर रेलवे का दावा है कि वह महापालिका की जमीन पर हैं, महापालिका को पूरा भरोसा है कि वह रेलवे की जमीन पर हैं. याने जब तक साबित नहीं होता तब तक के लिए सारे भगवान के भरोसे पर हैं. और साबित होने की कोई तारीख नहीं है.

हालांकि अपनी जिम्मेवारी से बचने के लिए रेलवे और महापालिका, दोनों ही इस कोशिश में हैं कि अपने को इससे कितना अधिक दूर रखा जाए. महापालिका का कहना है कि क्योंकि झोपड़पट्टी वाला हिस्सा रेलवे की जमीन पर है, इसलिए हम पानी तक नहीं दे सकते. लेकिन थोड़े से फासले पर मफतनगर, संगम टेकरी के लिए महापालिका पानी पहुंचाता है. और जब मफतनगर, संगम टेकरी से शौचालय, आंगनबाड़ी, स्कूल के सवाल उठते हैं तो फिर वही जबाव होता है- “आप रेलवे की जमीन पर हो”.

ये और बात है कि महापालिका के चुनाव में वोट लेने का जब सवाल उठता है तो इस तरह के सारे जवाब शून्य में विलीन हो जाते हैं. दिलचस्प ये भी है कि यहां के ज्यादातर रहवासी बुनियादी सहूलियतों की लालसा में टैक्स देना चाहते हैं लेकिन महापालिका लेना नहीं चाहता. मतलब केवल वोट के सवाल पर इन झोपड़पट्टी के लोग ‘महापालिका के लोग’ हैं, अन्यथा ‘रेलवे के लोग’. देखा जाए तो झोपड़ियों तक रोशनी पहुंचाना, कायदे से महापालिका का फर्ज है मगर फायदे के मद्देनजर यह काम प्राइवेट कंपनी संभाले हुए हैं. इसी प्रकार इन इलाकों में सरकार के बजाय स्वैच्छिक संस्थाएं आंगनबाड़ियां चलाती हैं.

11 फरवरी 2009 को, सरकारी कामकाज के समय याने सुबह 10 से 1 और दोपहर 2 से 5 तक, रेलवेपट्टी के दोनों तरफ की 400 झोपड़ियां तोड़ी गईं. अंबेडकरनगर के ठाकुरभाई बताते हैं- “ डेमोलेशन दस्ते में 3 बुल्डोजर, 125 के आसपास पुलिस के जवान, 50 के आसपास रेलवे सुरक्षा गार्ड, बहुत सारे रेलवे के अधिकारी, कर्मचारी थे. आगे-आगे डेमोलेशन, उसके पीछे-पीछे महापालिका वाले नल, गटर के पाईप और बिजली के तार काटते जाते थे.”

लोग इस बात को लेकर उत्सुक थे कि अगले दिन झोपड़ियां कहां तोड़ी जाएंगी. लेकिन यह सवाल अनुत्तरित रह गया. अंबेडकरनगर जैसी झोपड़पट्टी के तमाम रहवासियों की तरह अंजू बेन भी इस उम्मीद में थीं कि कोई-न-कोई आएगा, तोड़-फोड़ रोक ही देगा. हर साल वोट लेने वालों से यह उम्मीद तो थी ही. लेकिन अगले दिन की सुबह के साथ तमाम उम्मीदों की भी उम्र टूटी और अंबेडकरनगर का ठिकाना उखाड़ फेका गया. सैकड़ों सिर के ऊपर से दुनिया, दुनिया की चाहरदीवारी में रखी मामूली सुख देने वाली सुविधाएं एक झटके में मिट्टी में मिल गईं.

कोई हमदम ना रहा
अंजू बेन के घर-गृहस्थी के तार तो टूटे ही, घरवाला भी टूट गया. अंजू बेन का पति सूरज यादव अच्छा खासा आटो चालक था, सप्ताह भर पहले ही उसने कोई 1500 रुपये लगाकर आटो की मरम्मत भी करवाई थी. लेकिन उस रोज झोपड़पट्टी तोड़ने वालों ने उसके साथ मारपीट की और आटो भी ले उड़े. सूरज ने अगली सुबह पुलिस की टेबल पर अपने आटो का सवाल रखा, जबाव मिला- अब वह एक सरकारी संपत्ति है.

सूरज तब से अब तक लापता है. कहते हैं कि वह यूपी में किसी जगह है, उसने फिर कभी सूरत न लौटने की कसम खाई है. वह कहता है कि यहां है ही क्या, न घर, न आटो, एक औरत है तो वह भी पागल.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Radha Chamoli (radhavin2006@gmail.com) new delhi

 
 आप सही कह रहे हैं. ये एक सूरत की नहीं, सारे देश की यही कहानी है. हमारे नेता लोग सिर्फ लोगों को एक वोट की तरह देखते हैं. वोट लिया और भूल गये. उन लोगों के लिए कोई जिम्मेदारी वो नहीं समझते. इतने गंभीर मुद्दे को उठाने के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई. 
   
 

naina mubai

 
 शिरीष स्टोरी अच्छी है. आपने अच्छे मुद्दे को अच्छे ढंग से सामने रखा है. रेल मंत्रालय और राज्य सरकार को कोई रास्ता निकालना चाहिए. सोशल वेलफेयर विभाग के साथ मिलकर बुनियादी सहूलियत के लिए कदम उठाने चाहिए. 
   
 

मीनाक्षी पाटले Nagpur

 
 In 2006, Railways identified 46 locations, majority in Old Delhi, where presently 7,254 slums have encroached on land bordering railways tracks and after that railways had handed over Rs 9.9 crore to the MCD in 2003 to use as a corpus fund to relocate and rehabilitate residents of about 4,500 offending slums.

why this railways is not doing same in the matter of Surat ?
 
   
 

Pravin kumar singh पटना

 
 यह अकेले सूरत का किस्सा नहीं है. पूरे देश में यही होता है. गरीबों को हमेशा बताया जाता है कि उनके लिए इस धरती पर कोई जगह नहीं है.आज कल तो कारपोरेट के लिए झोपड़ियों को उजाड़ा जा रहा है और कोई उस पर आवाज़ नहीं उठाता.

शिरीष भाई, आपने बहुत गंभीर मुद्दा उठाया है. आपको बहुत बधाई.
 
   
 

Makarand Badwani

 
 Good work.Please write second story Part-2 on the same issue and investigate the steps being taken after your story and include comments of senior government officers. 
   

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