आज भी मैला आंचल
मुद्दा
आज भी मैला आंचल
दयाशंकर मिश्र,
भोपाल से
यह 1993 की बात है, जब आज़ादी के 43 साल बाद भारत सरकार को लगा कि सर पर मैला ढोना
ठीक नहीं है और इसको बंद किया जाना चाहिए. इसके लिए बजाप्ता कानून बनाया गया. तय
किया गया कि मैला ढोने की अमानवीय प्रथा को किसी भी तरह 31 दिसंबर 2007 तक ज़रुर
खत्म कर दिया जायेगा. 14 साल का समय गुजर गया, फिर सरकार को होश आया कि यह प्रथा तो
खत्म हुई ही नहीं. फिर ऐलान किया गया कि 31 मार्च 2009 तक यह प्रथा पूरी तरह खत्म
कर दी जाएगी. लेकिन क्या ऐसा हो पाया ?
मध्य प्रदेश के अधिकांश शहर इसके जवाब में मौन साध लेंगे.
देश में बहुत से लोग इस बात पर यकीन नहीं करेंगे कि यहां 'कमाऊ शौचालय' भी रोजगार
का एक साधन हैं. 'कमाऊ शौचालय' शब्द का तात्पर्य भारत की परंपरागत शौचालय प्रणाली
से है, जिसे खास वर्ग के लोग ही साफ किया करते हैं. कमाऊ इसलिए क्योंकि इससे
नाममात्र की ही सही पर आय होती है.
मध्य प्रदेश देश के उन 13 राज्यों में से एक है, जहां 'मैला' कमाने या ढोने की
'जागीर' प्रथा आज भी जारी है. सरकारें इसे मानने को कभी तैयार नहीं होती. कलेक्टर
से बात करें तो वह आपके 'फिर' से उस स्थान तक पहुंचने से पहले ही सब कुछ 'ठीक' करा
देते हैं. इसलिए मैला ढोने के काम में देश भर में कितने लोग लगे हुए हैं, इसके बारे
में ठीक-ठीक कहना थोड़ा मुश्किल है. मप्र में मैला ढोने की परंपरा के उन्मूलन में
उल्लेखनीय काम करने वाली संस्था 'जन साहस' के अनुसार इस समय प्रदेश में मैला ढोने
वालों की संख्या 3842 है, जिसमें से पुरूषों की संख्या महज 228 है.
राज्य में मैला ढोने का काम हिंदुओं में वाल्मीकि और मुस्लिमों में हैला समुदाय के
लोग बरसों से कर रहे हैं. वाल्मीकि समाज के लोग सदियों से अब तक इस काम में जुटे
हुए हैं और बराबरी के तमाम नारों का सच ये है कि वाल्मीकि समाज के लोगों के लिए आज
भी हिंदुओं के साथ बैठकर खाना तो दूर मंदिरों में प्रवेश तक मुश्किल है. आज़ादी के
बाद पहली बार साल भर पहले मंदसौर के भील्याखेड़ी में वाल्मीकि समाज के लोग 'राम
मंदिर ' में प्रवेश कर पाए, वह भी पुलिस बल के साथ. अन्यथा वाल्मीकियों के बच्चों
को तो स्कूल में सबसे पीछे बैठने, छोटे बच्चों की गंदगी उठाने और मरे हुए जानवरों
को फेंकने के काम में ही लगाया जाता रहा है.
इसी तरह 'हैला' समाज की मस्जिदें अलग हैं. जहां नहीं हैं, वहां इनको सबके साथ नमाज
पढ़ने की इजाजत नहीं है. कुछ विशेष अवसरों पर अलग व्यवस्था की जाती है लेकिन उसमें
भी इनको जकात के लिए मस्जिद में घर से सामान नहीं लाने का फरमान जारी होता है. इनसे
रोटी-बेटी का व्यवहार तो बहुत दूर की बात है. उज्जैन में हिंदुओं के तीर्थ महाकाल
से कुछ किमी की दूरी पर एक पूरी बस्ती इसकी जिंदा मिसाल है, जिसे ‘हैलावाड़ी’ कहा
जाता है. सेंसेक्स की उछाल और मंदी से उबरने की खबरों के बीच आज भी हैला परिवार
‘बहिष्कृत’ जीवन जीने को अभिशप्त हैं.
लगभग एक दशक से मैला ढोने के विरोध में गरिमा अभियान चलाने वाले मोहम्मद आसिफ कहते
हैं- “ सामाजिक दायरे इतने जटिल हैं कि वहां लगभग 'गुलामी' का जीवन जीने वाले
सामाजिक बहिष्कार के डर से 'नारकीय' जीवन को नहीं छोड़ पाते. 'पखाने' की 'बू' से
ज्यादा उनके लिए समाज की कृत्रिम छांव महत्वपूर्ण है जो उन्हें समाज में रहने के
लिए मजबूर करती है. जरा सोचिए, भरी बरसात में भिनभिनाती मक्खियों, बदबू के बीच कैसे
'डलिए' में मैला उठाया जाता होगा. हममें से बहुतों को यह पढ़ते वक्त या चर्चा करते
समय ही उबकाई आने लगती है, तो जो इसे जी रहे हैं, उनका क्या हाल होता होगा? उनकी
पीड़ा कौन समझेगा ?”
राज्य और देश में वाल्मीकि और हैला समाज के लोगों की संख्या लाखों में है लेकिन वे
सब बिखरे-बिखरे हैं. उनके साथ हो रहे विषमतापूर्ण आचरण के लिए कोई भी जिम्मेदारी
नहीं लेना चाहता. भौतिक रूप से अब 'मैला' ढोने का काम सिमट रहा है. कच्चे शौचालय हट
रहे हैं लेकिन व्यवहार में हम कब 'मुक्त' होंगे! इसके लिए क्या प्रयास होना चाहिए,
यह किसी पॉलिटिकल एजेंडे का हिस्सा नहीं है, इसके लिए कोई रोडमैप नहीं हैं.
आधुनिक नेताओं में गांधी संभवत: पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने मैला ढोने वालों की
पीड़ा को समझा. गांधी ने 1901 में कोलकाता में राष्ट्र्र्रीय कांग्रेस के अधिवेशन
में स्वयंसेवकों से सफाईकर्मियों से काम नहीं करवाने को कहा. हालांकि स्वयंसेवकों
द्वारा इस बारे में खुद को असमर्थ बताने के बाद गांधीजी ने स्वयं मैला साफ करने की
पहल की. 1918 में जब उन्होंने साबरमती आश्रम की स्थापना की तो भी आश्रमवासियों को
स्वयं मैला साफ करने की सलाह दी. इस संदर्भ में उल्लेखनीय होगा कि पूर्व
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1984 में लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान यह रहस्य
खोला कि जब वे साबरमती आश्रम में रहा करती थीं तो उन्हें अपना मैला स्वयं साफ करना
पड़ता था.
गांधीजी ने एक बार कहा था “ संभव है कि मैं पुन: जन्म लूं. फिर भी, अगर ऐसा होता है
तो मैं चाहूंगा कि सफाईकर्मी के परिवार में जन्म लूं ऐसा करके मैं उन्हें सिर पर
मैला ढोने की अमानवीय, अस्वस्थकर और घृणित प्रथा से मुक्ति दिला सकूंगा.”
लेकिन संकट यही है कि जब तक हम 'मैला आंचल' दिलोदिमाग से साफ नहीं करते, यह परंपरा
टूटती नजर नहीं आती. देश के कानून और व्यवस्था इस अमानवीय प्रथा को लेकर जितनी
चिंता जताते हैं, उसमें लगता नहीं कि आने वाले सौ सालों में भी यह समस्या समाप्त हो
पाएगी. कितना अच्छा होता कि मेरे सारे अनुमानों को झुठलाते हुए यह प्रथा जल्दी खत्म
हो जाती !
11.10.2009, 23.54 (GMT+05:30) पर
प्रकाशित