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साफ माथे का समाज-अनुपम मिश्र

पुस्तक अंश

साफ माथे का समाज

अनुपम मिश्र

तैरने वाला समाज डूब रहा है

पुस्तक परिचय

साफ माथे का समाज

अनुपम मिश्र

 

यात्रा बुक्स| पेंगुइन बुक्स

203 आशादीप, 9 हेली रोड,

नई दिल्ली 110 001

 

कीमतः 160 रुपए

जुलाई (2004) के पहले पखवाड़े में उत्तर बिहार में आई भयानक बाढ़ अब आगे निकल गई है. लोग उसे भूल गए हैं. लेकिन याद रखना चाहिए कि उत्तर बिहार उस बाढ़ की मंजिल नहीं था. वह एक पड़ाव भर था. बाढ़ की शुरुआत नेपाल से होती है, फिर वह उत्तर बिहार आती है. उसके बाद बंगाल जाती है. और सबसे अंत में- सितम्बर के अंत या अक्टूबर के प्रारंभ में- वह बांग्लादेश में अपनी आखरी उपस्थिति जताते हुए सागर में मिलती है. इस बार उत्तर बिहार में बाढ़ ने बहुत अधिक तबाही मचाई. कुछ दिन सभी का ध्यान इसकी तरफ गया. जैसा कि अक्सर होता है, हेलीकॉप्टर आदि से दौरे हुए. फिर हम इसको भूल गए.

बाढ़ अतिथि नहीं है. यह कभी अचानक नहीं आती. दो-चार दिन का अंतर पड़ जाए तो बात अलग है. इसके आने की तिथियां बिल्कुल तय हैं. लेकिन जब बाढ़ आती है तो हम कुछ ऐसा व्यवहार करते हैं कि यह अचानक आई विपत्ति है. इसके पहले जो तैयारियां करनी चाहिए, वे बिल्कुल नहीं हो पाती हैं. इसलिए अब बाढ़ की मारक क्षमता पहले से अधिक बढ़ चली है. पहले शायद हमारा समाज बिना इतने बड़े प्रशासन के या बिना इतने बड़े निकम्मे प्रशासन के अपना इंतजाम बखूबी करना जानता था. इसलिए बाढ़ आने पर वह इतना परेशान नहीं दिखता था.

इस बार की बाढ़ ने उत्तर बिहार को कुछ अभिशप्त इलाके की तरह छोड़ दिया है. सभी जगह बाढ़ से निपटने में अव्यवस्था की चर्चा हुई है. अव्यवस्था के कई कारण भी गिनाए गए हैं- वहां की असहाय गरीबी आदि. लेकिन बहुत कम लोगों को इस बात का अंदाज होगा कि उत्तर बिहार एक बहुत ही संपन्न टुकड़ा रहा है इस प्रदेश का. मुजफ्फरपुर की लीचियां, पूसा ढोली की ईख, दरभंगा का शाहबसंत धान, शकरकंद, आम, चीनिया केला और बादाम और यहीं के कुछ इलाकों में पैदा होने वाली तंबाकू, जो पूरे शरीर की नसों को हिलाकर रख देती है. सिलोत क्षेत्र का पतले से पतला चूड़ा जिसके बारे में कहा जाता है कि वह नाक की हवा से उड़ जाता है, उसके स्वाद की चर्चा तो अलग ही है. वहां धान की ऐसी भी किस्में रही हैं जो बाढ़ के पानी के साथ-साथ खेलती हुई ऊपर उठती जाती थीं और फिर बाढ़ को विदा कर खलिहान में आती थीं. फिर दियारा के संपन्न खेत.

सुधी पाठक इस सूची को न जाने कितना बढ़ा सकते हैं. इसमें पटसन और नील भी जोड़ लें तो आप 'दुनिया के सबसे बड़े' यानी लंबे प्लेटफार्म पर अपने आप को खड़ा पाएंगे. एक पूरा संपन्न इलाका उत्तर बिहार आज दयनीय स्थिति में क्यों पड़ गया है? हमें सोचना चाहिए. सोनपुर का प्लेटफार्म. ऐसा कहते हैं कि यह हमारे देश का सबसे बड़ा प्लेटफार्म है. यह अंग्रोजों के समय में बना था. क्यों बनाया गया इतना बड़ा प्लेटफार्म ? यह वहां की संपन्नतम चीजों को रेल से ढोकर देश के भीतर और बाहर ले जाने के लिए बनाया गया था. लेकिन आज हम इस इलाके की कोई चिंता नहीं कर रहे हैं और उसे एक तरह से लाचारी में छोड़ बैठे हैं.

बाढ़ आने पर सबसे पहला दोष तो हम नेपाल को देते हैं. नेपाल एक छोटा-सा देश है. बाढ़ के लिए हम उसे कब तक दोषी ठहराते रहेंगे? कहा जाता है कि नेपाल ने पानी छोड़ा, इसलिए उत्तर बिहार बह गया. यह देखने लायक बात होगी कि नेपाल कितना पानी छोड़ता है. मोटे तौर पर हम कह सकते हैं कि नेपाल बाढ़ का पहला हिस्सा है. वहां हिमालय की चोटियों से जो पानी गिरता है, उसे रोकने की उसके पास कोई क्षमता और साधन नहीं है. और शायद उसे रोकने की कोई व्यवहारिक जरूरत भी नहीं है. रोकने से खतरे और भी बढ़ सकते हैं. इसलिए नेपाल पर दोष थोपना बंद करना होगा.

यदि नेपाल पानी रोकेगा तो आज नहीं तो कल हमें अभी की बाढ़ से भी भयंकर बाढ़ झेलने की तैयारी करके रखनी पड़ेगी. हम सब जानते हैं कि हिमालय का यह हिस्सा कच्चा है और इसमें कितनी भी सावधानी और ईमानदारी से बनाए गए बांध किसी न किसी तरह से प्रकृति की किसी छोटी सी हलचल से टूट भी सकते हैं. और तब आज से कई गुना भयंकर बाढ़ हमारे सामने आ सकती है. यदि नेपाल को ही दोषी ठहराया जाए तो कम से कम बिहार के बाढ़ नियंत्रण का एक बड़ा भाग- पैसों का, इंजीनियरों का, नेताओं का अप्रैल और मई में नेपाल जाना चाहिए ताकि वहां यहां की बाढ़ से निपटने के लिए पुख्ता इंतजामों के बारे में बातचीत की जा सके. बातचीत मित्रवत हो, तकनीकी तौर पर हो और जरूरत पड़े तो फिर मई में ही प्रधानमंत्री नहीं तो प्रदेश के मुख्यमंत्री ही नेपाल जाएं और आगामी जुलाई में आने वाली बाढ़ के बारे में चर्चा करके देखें.

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम बाढ़ के रास्ते में हैं. उत्तर बिहार से पहले नेपाल में काफी लोगों को बाढ़ के कारण जान से हाथ धोना पड़ा है. पिछले साल नेपाल में भयंकर भूस्खलन हुए थे, और तब हमें पता चल जाना चाहिए था कि अगले साल हम पर भी बड़ा संकट आएगा, क्योंकि हिमालय के इस कच्चे भाग में जितने भूस्खलन हुए, उन सबका मलबा वहीं का वहीं पड़ा था और वह इस वर्ष की बरसात में नीचे उतर आने वाला था.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Frank Huzur(frankhuzur@gmail.com)

 
 Beautiful piece of analysis! Must read for everyone! I learnt a lot, feel bad for the 'corruption calamity' not a natural calamity, which is devouring about five million defenceless, innocent, poor people of Bihar!
Those who propagate illusory myth about India saying India is Shining or Rising, should take a pause and ask from themesleves. Look within and ask yourselves is this shining India where a huge swathe of population is in throes of man-made disaster. Or, power elite of India doesn't want this chunk of population to make merry!
Flood fury in Bihar is shame on modern India!
 
   
 

Prashant dubey (prashantd1977@gmail.com)

 
 sathiyon
Salaam !
Maine is pustak ko padha hai, aur main choonki swayam sevi jagat se bhi hoon to main ye janta hoon ki " jo kathit vikas ki paribhasha abhi vidhyamaan hai, us par chintan aur vimarsh ki jaroorat hai." Mishra ji ne bahut hi saral kintu prabhavi tareeke se vishleshan kiya hai, kripya aap jaroor padhen. mera daawa hai aap ko bhaut kuchh milne wala hai.
 
   

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