हैलावाडी यानी इस रात की सुबह नहीं
मुद्दा
हैलावाडी यानी इस रात की सुबह नहीं
दयाशंकर मिश्र,
उज्जैन से लौटकर
कल्पना करें कि आपको किसी जगह से बजबजाता हुआ मैला यानी पखाना निकाल कर किसी टोकरी
में रखना है और फिर उस टोकरी को अपने सिर पर रख कर शहर की सड़कों से होते हुए उसे
ले जाकर फेंकना है ....!!!
अपने कंप्यूटर स्क्रिन पर यह सब कुछ पढ़ते हुए हम में से अधिकांश लोग एक अजीब-सी
वितृष्णा से भर जाएंगे. कहीं-कहीं घृणा और विभत्सता के गड्ड-मड्ड होते भाव यह भी
पूछ सकते हैं कि इस तरह के सवाल का क्या मतलब ? लेकिन यह सवाल हैलावाडी में रहने
वाले लोगों के लिए लाख टके का है, जिसे हर कोई नज़र अंदाज कर देता है.
उज्जैन का नाम दिमाग में आते ही हम में से अधिकांश लोगों के जेहन में महाकाल का नाम
कौंधता है. श्रद्धा और आस्थाओं का तीर्थ. लेकिन इसी उज्जैन में कुछ ऐसा भी है, जिसे
जानना हमें बेहद असहज बना देता है.
महाकाल से लगभग 4 किलोमीटर दूर 'हैलावाडी' है. एक ऐसी बस्ती, जिसमें से अधिकांश
लोगों का पेशा मैला ढोना है. इस बस्ती के नागरिक मुस्लिम होने के बाद भी श्रेष्ठ
मुसलमानों के लिए अश्पृश्य हैं. इस्लाम के भीतर इस तरह की अश्पृश्यता की जानकारी कम
ही लोगों को है.
कोई पांच हजार की आबादी वाले हैलावाडी में एक-एक करके ऐसे मुसलमान बसते गए, जो मैला
ढोने का काम करते थे. हिंदुओं में वाल्मिकियों की तरह ही मुस्लिमों में 'हैलाओं' का
जीवन है यानी दोनों ही अपने-अपने धर्मों में अश्पृश्य हैं. बस्ती में दो मस्ज़िदें
हैं लेकिन यहां इबादत के लिए दूसरे मुसलमान नहीं आते.
हैलावाड़ी में भी ज्यादातर महिलाएं ही मैला ढोने का काम करती हैं. इनमें से बहुत-सी
महिलाओं को उनके शौहर ने छोड़ दिया है. किसी ने दूसरी शादी कर ली तो किसी ने एक
'बेटा' नहीं होने पर बरसों से साथ छोड़ रखा है.
साहिबा बी की पांच बेटियां हैं. हर बार गर्भवती होने पर उनके शौहर और परिवार के लोग
बहुत खुश होते थे लेकिन एक-एक कर के पांच बेटियों के जन्म ने साहिबा बी को हाशिये
पर ला दिया और फिर एक दिन सब ने उनका साथ छोड़ दिया. साहिबा के पास एक खंडहरनुमा घर
है, जिसमें इस समय बमुश्किल दो ही कमरे बचे हैं. इन्हीं कमरों में उनका परिवार रहता
है. साहिबा के पास जागीर के 15 घर हैं. जागीर के घर यानी ऐसे घर, जहां से उन्हें
मैला ढो कर ले जाना होता है.
साहिबा को पता है कि राज्य में स्वयंसेवी संस्थायें मैला ढोने वाली महिलाओं को इस
अमानवीय परंपरा से मुक्ति दिलाने के लिए ‘गरिमा अभियान’ चला रही हैं. साहिबा यह भी
जानती हैं कि मैला ढोने पर पाबंदी लगी है. लेकिन वह यह धंधा छोड़ना नहीं चाहती.
उन्हें 15 घरों का मैला ढोने के बाद बदले बासी रोटियां, तीज त्योहारों की जूठन और
महीने के 3-40 रूपए मिल जाते हैं. उनका सीधा सवाल है कि वो मैला ढोने का काम छोड़
देंगी तो आखिर घर चलाने के लिए पैसे कहां से आयेंगे ?
वे कहती हैं- “ इन सबसे गुजारा तो नहीं होता लेकिन हां, सहारा बना रहता है.” जागीर
से उन्हें जरूरत के वक्त सौ-पचास की उधारी और फटे-पुराने कपड़े मिल जाते हैं. साहिबा
ने पहले तय किया था कि वह अपनी बेटियों से यह 'काम' नहीं करवाएंगी लेकिन जब घर में
रोटी के लाले पड़ने लगे तो उन्होंने धीरे-धीरे बेटियों से भी मैला ढोने का काम
करवाना शुरु कर दिया.
पूरी हैलावाड़ी में आपको इस काम के पैरोकारों की कमी नहीं मिलेगी. यहां कई घर ऐसे
हैं, जिनकी आय 25-50 रुपये से अधिक नहीं है. बस्ती के पुरूषों को इस काम में कोई
बुराई नजर नहीं आती.
मो आरिफ ने बीए किया है और वे नगर-निगम में दैनिक वेतनभोगी हैं. लेकिन आरिफ को मैला
ढोने के काम में कोई बुराई नजर नहीं आतीं. वह कहते हैं- “ मेरी बीबी फरीदा यह काम
करती है. हालांकि शादी के पहले वह मैला नहीं ढोती थी. लेकिन हमारे यहां रिवाज है,
उसे तो निभाना ही पड़ेगा.” इस बात में ज्यादातर पुरूषों की हामी है.
हैलावाडी के लोगों को लगता है कि मैला ढोने का काम बंद होने पर जो थोड़ी बहुत मदद
अभी 'जागीर' से मिलती है, वह बंद हो जाएगी. साथ ही जिनके यहां काम बंद कर देंगे वे
दुश्मन हो जाएंगे. इसलिए भलाई इसी में है कि इसे जारी रखा जाए. यानी वैकल्पिक
रोजगार की कमी 'मैला' ढोने वालों की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है.
साहिबा से मिलाने वाला युवक अली, साहिबा का भतीजा है. अली की मां भी पहले यह काम
करती थीं लेकिन कुछ समय के बाद अली ने अपनी मां से मैला ढोने का काम बंद करवा दिया
और खुद मैला ढोने के विरोध में जुट गया.
अली एक एनजीओ में नौकरी कर परिवार का लालन-पालन कर रहा है. लेकिन जब भी वह साहिबा
के पास आता है, साहिबा खुद की उम्र और दूसरा काम नहीं मिलने का तर्क रख देती है.
ऐसी महिलाओं की यहां बड़ी संख्या है. हैलावाड़ी में भूरी बी, जमीला, जुबेरा बी, शमीम
बानो मानो कुछ उदाहरण हैं, जिन्हें अपना सम्मान घर की दहलीज पर रखकर आना होता है,
ताकि घर का गुजारा हो सके.
मैला उठाने पर पाबंदी है. इसलिए महिलाएं इस काम को करते हुए भी स्वीकारने के लिए
सहज तैयार नहीं होती. उन्हें लगता है कि इससे कच्चे शौचालय वाले घरों पर कार्रवाई
हो सकती है, जो उनके लिए मुसीबत का सबब बन सकती है.
इस दिशा में होने वाले सरकारी प्रयास भी बहुत सारे विरोधाभासों से भरे हुये हैं.
अव्वल तो कच्चे शौचालय खत्म करने की दिशा में ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है.
अगर ये कच्चे शौचालय न रहें तो फिर मैला ढोने का मुद्दा सामने आएगा ही नहीं. इसके
अलावा सरकार उन्हीं परिवार के बच्चों को छात्रवृति देती है, जिनके माता-पिता मैला
ढोने का काम करते हैं. जैसे ही वे मैला ढोने का काम बंद कर देते हैं, सरकार भी मदद
करना बंद कर देती है. मतलब ये कि सरकारी मदद की पहली शर्त ही यही है कि मैला ढोने
की परंपरा जारी रहे.
मैला ढोने वाले अधिकांश परिवार पारंपरिक रुप से यह अमानवीय काम करते आ रहे हैं.
हमारा समाज जिस तरह से उनके साथ अश्पृश्यता का व्यवहार करता है, उसमें मैला ढोने
वाले लोगों के लिये कोई और काम मिलना असंभव न भी हो तब भी कोई आसान तो नहीं माना जा
सकता और इस दिशा में तमाम तरह के सरकारी प्रयास विफल भी रहे हैं और नाकाफी भी.
देखना यही होगा कि 31 मार्च 2009 तक मैला ढोने की प्रथा समाप्त करने का सरकारी
दावा, टांय-टांय फिस्स होने के बाद आखिर किस नये नारे की शक्ल में सामने आता है.
11.10.2009, 23.55 (GMT+05:30) पर
प्रकाशित