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श्मशान किनारे की बस्ती

मुद्दा

 

श्मशान किनारे की बस्ती

दयाशंकर मिश्र, मंदसौर से लौटकर


 

मंदसौर से 70 किलोमीटर दूर बिश्निया में रहने वाले कुछ लोगों को अपना बाल कटवाने के लिए 12 किलोमीटर दूर श्यामपुर जाना होता है क्योंकि गांव का नाई उनके बाल काटने को तैयार नहीं होता. उन्हें चाय की दुकान पर तभी चाय मिलती है, जब वो अपना मिट्टी का कप-ग्लास या कोई और बरतन साथ लेकर जायें. यह भेदभाव बरसों से जारी है.

श्मशान में लड़की


बिश्निया देखने में दूसरे गांवों की तरह ही है. बस अंतर है तो उन वाल्मीकि परिवारों के कारण, जो गांव में 'परेशानी' का कारण बनते हैं. यह दूसरे दलित, आदिवासी परिवारों जैसी 'मिलजुलकर' रहने की सामाजिक अवधारणा में 'मिसफिट' हैं.

हम बहुमत आधारित व्यवस्था में रहते हैं, यानी सही या गलत का आधार 'न्याय' नहीं, बहुमत होता है. इसलिए इन चार परिवारों के 35 लोग किसी 'व्यवस्था' के फरियादी नहीं बन पाते. कोई 25 बरस पहले यह लोग गांव के बीच में ही रहते थे, लेकिन जब इनकी जमीन दूसरे 'बड़े' लोगों के हितों से टकराने लगी तो इन्हें 1990 में गांव से दूर बसा दिया गया. पट्टा भी दे दिया और उसके बाद इनके घर से ही सटी जमीन को 'श्मशान' बना दिया गया. सरपंच के चुनाव में तो यही मुद्दा हावी था कि जो भी सरपंच बनेगा उसे हर हाल में वाल्मीकि बस्ती के पास ही श्मशान बनाना होगा. चुनाव निपटे और 2005 में बकायदा इसे श्मशान घोषित कर दिया गया.

हालांकि यहां बनिया, कलार, सुनारों का ही अंतिम संस्कार किया जाता है. यह और बात है कि अपने घर से सटे इस श्मशान में वाल्मीकियों को यहां अंतिम संस्कार की मनाही है.

आमतौर पर हमारे यहां रिवाज है कि बच्चों को अंतिम संस्कार के समय साथ नहीं ले जाया जाता. इसके पीछे संभवतः यही सोच रही होगी कि इसका उनके बाल मन पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़े, लेकिन यहां वाल्मीकि परिवारों के बच्चे लाशों को जलते देखने के लिए विवश हैं. इनका बचपन उन सवालों से उलझने के लिए विवश है, जिनसे कुलीन बच्चों को दूर रखा जाता है. इन बच्चों पर इस पर्यावास का प्रभाव भी पड़ने लगा है.

गांव की 12 साल की सपना को ही लें. सपना ने 5 साल की उम्र में ही यहां लाशों को जलते देखा था. दुर्भाग्य से उसने पंद्रह दिन के भीतर ही यह दृश्य दो बार देख लिए, तब से ही उसका व्यवहार असामान्य हो गया. शायद यह कहना ठीक नहीं होगा कि उसके असामान्य व्यवहार के लिए श्मशान ही जिम्मेदार है, लेकिन चूंकि सपना को जन्मजात ऐसी कोई बीमारी नहीं थी और न ही इन दृश्यों को देखने के बाद उसे किसी तरह का इलाज मिला, इसलिए संभव है कि उसके दिमाग में अंतिम क्रिया के दृश्यों का दुष्प्रभाव पड़ा हो. वैसे जब यहां के परिवारों को दाह संस्कार की खबर मिलती है तो ये लोग बच्चों को लेकर दूर चले जाते हैं, लेकिन उस दिन ऐसा नहीं हुआ और सपना का बचपन बिखर गया.

वर्तमान में सपना की स्थिति विक्षिप्तों जैसी है.

जिन बच्चों को स्कूल के मटके से पानी पीने की मनाही हो, जो क्लास में सबसे पीछे बैठने के लिए मजबूर हों, जिनके मुख्य काम में छोटे सहपाठियों का पखाना उठाना शामिल हो, मरे हुए कुत्ते, बिल्ली को उठाने के लिए जिन्हें सबसे 'माकूल' समझा जाता हो, उन वाल्मीकि बच्चों का बीमार होना या मानसिक संतुलन खो देना मीडिया अपनी जगह नहीं बना पाता. चूंकि वाल्मिकी किसी भी तरह से किसी भी सरकार, जनमत को प्रभावित करने की हैसियत नहीं रखते, इसलिए उनकी चिंताएं किसी के माथे पर शिकन का कारण नहीं बन पातीं.

सपना की मां सुशीला बाई कहती हैं-“ रिन लेकर झाड़-फूंक करवाए हैं, डाक्टरी हमारे बस में नहीं है.”

अगर गलती से डाक्टर तक पहुंचे भी तो उसे बड़ी मुश्किल से ही मामला गंभीर लगता है. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के 'डाक्टर' साहब फरमाते हैं-“ हमारे पास बहुत मरीज हैं, उनके लिए सरकार मरी जा रही है, जबकि वे साले इसी के लायक हैं.” जाहिर है, ऐसे में इन वाल्मीकियों के पास झाड़-फूंक कराने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं है.

वाल्मीकि समाज के लोगों के लिए ईश्वर से गुहार लगाने के भी अवसर कम ही हैं. प्रचलित अर्थों में इसके लिए उन्हें मंदिरों में जाना पड़ेगा. लेकिन मंदिरों में तो आज भी वाल्मीकियों को प्रवेश की अनुमति नहीं है.

दरअसल वाल्मीकियों से विरोध के तमाम कारणों में से एक यह भी है कि छुआछूत के कारण सवर्ण समाज इनका उपयोग रोजमर्रा के कामकाज, खेती-किसानी में नहीं करता है. इसलिए इनकी जगह दूसरे दलित, जिनकी कामकाज में स्वीकार्यता हो; को अधिक तवज्जो दी जाती है. यानी मालिकों को उनकी पसंद की 'नस्ल' का चाकर चाहिए.

वाल्मीकियों के बारे में हमारे गांव-देहात में आज भी विश्वास है कि ये भारतीय वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था में सबसे निचली पायदान पर हैं, इसलिए इनसे किसी तरह का व्यवहार निषेध है. यह विचार हमारी ग्रामीण व्यवस्था में इस तरह प्रवाहित है कि दूसरी जातियों के दिमाग में उनकी 'श्रेष्ठता का सबक' सबसे पहला सबक है.

ललिता लोहटिया कहती हैं- “अगर हैंडपंप पर बर्तन भी धोखे से सवर्णों से छू जाएं तो बर्तनों के साथ 'हड्डियां' भी तोड़ दी जाती हैं. दूसरे समाज के बच्चे बचपन से ही इनकी 'मां और बहन' के लिए 'आदरसूचक' शब्द का प्रयोग करने लगते हैं.”

लेकिन मामला अकेले बिश्निया गांव का नहीं है. ऐसे सैकड़ों-हजारों गांव हैं, जहां वाल्मीकियों और इसी तरह के मैला ढोने वालों के लिए जीवन मुश्किल है, भारत और इंडिया से कटा-कटा, दूर-दूर, अश्पृश्य और श्मशान जैसा. जैसा बिश्निया गांव.

 

11.10.2009, 23.56 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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