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कहानी दीये के जीतने की

मुद्दा

 

कहानी दीये के जीतने की

दयाशंकर मिश्र, मंदसौर से लौटकर


 

आपने दीये और तूफान की कहानी सुनी होगी. लालीबाई बामनिया की कहानी भी ऐसी ही है. 20 बरस तक अपने सर पर मैला ढोने के बाद लालीबाई ने इस अमानवीय प्रथा को ठोकर क्या मारी, तूफान आ गया. लेकिन लालीबाई अड़ी रही. सर से एक बार मैले का टोकरा अगर उतार फेंका है तो दुबारा उसे सर पर नहीं रखूंगी.

लालीबाई


मंदसौर से केवन बारह किमी दूर धारियाखेड़ी की लालीबाई बामनिया ‘वाल्मीकि’ की कहानी सामंती 'तूफानों' से जीतने की कहानी है. लाली ने मैला ढोने का काम छोड़ा, पंचायत में 'वार्ड मेंबर' बनीं, जून 2007 में उस प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बनीं, जो नेपाल नरेश से मिलकर आया.

'मैला' ढोने वाले समाज को पास से देखने पर एक बात साफ समझ में आती है कि मैला ढोने का काम कर रहे समुदाय में जहां-जहां महिलाओं ने हिम्मत दिखाई, साहस का परिचय दिया, वहां 'तस्वीर' बदल गयी है. क्योंकि सबसे ज्यादा महिलाएं ही मैला ढोने का काम करती रही हैं.

लालीबाई का गांव ठाकुरों का गांव है. जहां अब तक उनकी दबंगई के निशान मिटे नहीं हैं. 1985 से 2003 तक लाली ने यहां बिना 'नागा' सेवा दी है. लाली के गांव में घूंघट के बिना निकलना, चप्पल पहनकर चलना तक मना था. धारियाखेड़ी में ब्याह कर आईं दूसरी महिलाओं की तरह लाली ने भी पहले मैला ढोने का काम नहीं किया था, क्योंकि मैला ढोने का काम ज्यादातर 'बेटियों' से नहीं करवाया जाता. यह काम तो बहुओं से ही करवाया जाता है. यही वजह है कि ज्यादातर महिलाएं शादी के बाद ही इस 'काम' में लगती हैं. लाली के साथ भी यही हुआ.

सास शुगराबाई ने अपनी 'जागीर' यानी जिन घरों से वह मैला ढोने का काम करती थीं, उन घरों का काम शादी के एक माह बाद ही लाली को सौंप दी थी. लाली उन दिनों को याद करते हुए कहती हैं, “ गांवों में ठाकुरों का जबर्दस्त प्रभाव था. हम वाल्मीकि लोगों के पास काम करने के अवसर नहीं के बराबर थे. हम या तो चमड़े, मृत जानवरों की खाल निकालने का काम करते थे या फिर ऐसी मजदूरी जिनमें 'अन्न' से जुड़ा कोई काम नहीं होता था.”

यानी घर बनाने, रख-रखाव का काम, खेत में फसल से पहले का काम. यह सब भी तब मिलता था जब 'पखाने' की सफाई नियमित रूप से होती थी. ऐसे में यह अनिवार्य था कि ठाकुरों के घरों की 'जजमानी' जारी रहे. इस जजमानी में छुपा था एक किस्म का 'इमोशनल' अत्याचार. जिसके पीछे छुपा रहता था 'नई बहू' से काम कराने का 'अनकहा सच'. जिसकी बीबी 'जजमानी' करने जाएगी, वह हमेशा सिर झुकाए रहेगा. इसके साथ ही उसका परिवार भी खुद को 'नीचा' महसूस करेगा.

एक सच यह भी कि 'उस' पर जब चाहे 'झपट्टा' मार सकते हैं, क्योंकि यहां नई बहू सबसे पहले 'धोंक' के लिए 'राबले', ठाकुरों के यहां जाती थी. 'धोंक' यानी ठाकुरों का 'आशीर्वाद'. इसके बाद ही वह गांव में खुशहाली से जीवन यापन कर सकेगी. यह बहुत पहले की बात नहीं है. लाली जैसी दूसरी नववधुओं पर ठाकुरों की नजरें हमेशा जमीं रहती थीं. थोड़ी-बहुत 'ऊंच-नीच' को वाल्मीकि परिवार के 'मर्द' भी गलत नहीं मानते थे, क्योंकि एक तो मानकर कुछ होता नहीं था, दूसरे 'जजमानी' से उनको थोड़ा-बहुत एक-दो आना मिलता रहता था, सो उस पर लात कौन मारना चाहेगा.

लाली ने जिस दिन पहली बार जागीर की जिम्मेदारी ली, तब से 20 बरस तक उन्हें सांस लेने की भी फुरसत नहीं मिली. इन 20 बरसों में उनके बच्चे हुए, परिवार बढ़ा, जिम्मेवारियां बढ़ीं लेकिन 'मैला' से मुक्ति नहीं मिली.

लाली की 'जिंदगी' में मीडिया, स्वयंसेवी संगठनों के सहयोग से आई जागरूकता से परिवर्तन आना शुरू हुआ. गांव में कभी-कभी आने-वाले अखबार और स्वयंसेवी संगठनों के प्रयासों से मैला ढोने की कुप्रथा के खत्म होने का विश्वास जागा. लाली को लगा कि अब तो सिर से मैले की डलिया उठा फेंके. लेकिन जब उन्होंने नई राह चलने की ठानी तो सबसे पहला विरोध घर से ही उभरा.

पति और ससुर ने कहा कि हमारे लिए जिंदा रहना मुश्किल हो जाएगा. लालीबाई ने काम क्या छोड़ा, परिवार के सदस्यों के साथ बिना बात गाली-गलौज और मारपीट का सिलसिला शुरु हो गया. लेकिन लाली नहीं मानी. हौसला था तो चुनाव में भी खड़ी हो गयीं और पंचायत की वार्ड मेंबर भी बन गईं. लेकिन लोगों को बर्दाश्त नहीं हुआ और पंचायत की वार्ड मेंबर बनने के बाद उनके घर में आग लगा दी गई, फसल 'काट' दी गई.

यह सब होने के बाद भी लालीबाई ने हिम्मत नहीं हारी और डलिया उठाने को राजी नहीं हुईं. इस बीच पंचायती राज के सकारात्मक महौल ने भी लाली की मदद की. उन्हें गांव में उतना समर्थन नहीं मिला, जितना मैला का काम छोड़ने के कारण आसपास के इलाकों के स्वयंसेवी संगठनों से मिला. धीरे-धीरे उनके समुदाय ने भी इस बात को महसूस किया कि 'जमाना' बदल रहा है. आज हालत ये है कि लालीबाई जैसे दूसरे बुलंद प्रयासों से अब धारियाखेड़ी में 'मैला' ढोने का काम लगभग समाप्ति की ओर है. 'लाली' अब गांव की गलियों से निकलकर दूसरों को 'लीक' तोड़ने की 'लालिमा' बांट रही हैं.

 

11.10.2009, 23.57 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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raina (raina.opera@gmail.com) agra

 
 मैं ऐसे ही लेखों के लिए रविवार पढ़ती हूं. खुद भी पत्रकारिता से जुड़ी हूं. लाली जैसी औरतें समाजिक बयार लाती हैं जिनमें पुरातन कुरीतियां बह जाती हैं. काश हर घर में एक लाली पैदा हो. 
   

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