किरण के हौसले को सलाम
मुद्दा
किरण के हौसले को सलाम
दयाशंकर मिश्र,
देवास से लौटकर
देवास के भौंरासा
की किरण ने भी कभी नहीं सोचा था कि उसके जीवन में भी रोशनी की कोई किरण आएगी और
उसका जीवन भी बदलेगा. 11 साल की उम्र में शादी और 17 साल की उम्र में गौने के बाद
किरण जैसे ही ससुराल आई, उसकी दुनिया बदल गई.
मेहंदी के रंग फीके पड़ने से पहले ही किरण के हाथ में 'जागीर' थमा दी गई थी. 'जागीर'
वाल्मिकी समाज में एक प्रथा है, इसके तहत सास अपनी बहुओं को अपने जागीरदारों के
यहां मैला ढोने का काम विरासत में सौंपती है.
देवास जिला मुख्यालय से 22 किमी दूर नगर पंचायत भौंरासा की बसाहट है. किरण महू
के वाल्मीकि समुदाय में जन्मीं, जो सदियों से मैला ढोने के काम में जुटा हुआ
है. हालांकि किरण के घर में कई पीढ़ियों से यह काम बंद है. समुदाय में कम उम्र
में शादियों की कुप्रथा के चलते जब वह ससुराल पहुंची तो कुछ दिन तो रस्मो-रिवाज
में बीते लेकिन महीने भर बाद ही एक दिन सास ने कहा- चलो तुमको 'जागीर' दिखा
लाएं.
किरण ने यह काम कभी किया नहीं था, लेकिन उसके लिए यह शब्द नया भी नहीं था. किरण
बताती हैं- “मैंने सास को पूरी हिम्मत से जवाब दिया- अम्मा, हमारे यहां यह काम
नहीं होता.”
किरण की सास को इस जवाब की उम्मीद नहीं थी. उन्होंने साफ कह दिया कि इस घर में
रहना है तो यह सब तो करना पड़ेगा. शाम को जब पूरा परिवार साथ बैठा तो सास ने
करम पीटना शुरू कर दिया. उनका तर्क था कि जब वो इतने सालों से मैला ढोने का काम
कर रही हैं तो भला किरण को यह काम करने में क्या परेशानी है ?
किरण के पति और ससुर भी कुछ इसी तरह के विचार रखते थे. इस तरह अम्मा को वीटो
मिल गया. दूसरे दिन सुबह जब काम पर जाने का समय हुआ और किरण ने इंकार किया तो
सास का सब्र टूट गया. उन्होंने किरण के बाल पकड़े और पीठ पर दो-चार तगड़े हाथ धर
दिए. किरण फिर भी नहीं मानी. वह रोज पिटती और रोज ठान लेती कि मैले से दूर ही
रहना है. इसी बीच संयोग से एक रोज उसे मायके वाले लेने आ गए और अम्मा को
रस्मोरिवाज के चलते किरण को भेजना पड़ा, लेकिन जाते-जाते उन्होंने कह दिया-
जल्दी आना अब जागीरी का बोझ हमसे उठाया नहीं जाता.
किरण जैसे-तैसे मायके पहुंची और मां से जा लिपटी. पिता को रोते हुए किस्सा
सुनाया. लेकिन उसे वैसी सांत्वना मिली नहीं, जैसी उम्मीद थी. हफ्ते महीने बीत
गए. किरण नहीं आई तो किरण को भेजने के लिए दबाव बढ़ता गया और एक दिन घर वालों ने
यह कहकर विदा कर दिया कि “तुम्हारी जिंदगी अब उनके हुक्म पर चलेगी.”
ससुराल में अम्मा ने पहले ही कमर कस ली थी. दो रोज बाद उन्होंने कहा, चलो जगीर
देख आएं. डबडबाई आंखों के साथ किरण उनके साथ हो ली. पहले दिन का जिक्र करते
वक्त किरण का गला आज भी रुंध जाता है, उनकी आंखें नम हो जाती हैं- “ अगले दिन
काम पर जाने का वक्त आ गया. अम्मा आगे बताती जातीं, जे हमारी बहू है, आज से
इसके नाम की रोटी बढ़ा देना. मैला ढोने के बदले पारिश्रमिक के रूप में रोटियां
और महीने के पांच-दस रुपए ही मिलते थे.”
इसके बाद अचानक अम्मा बीमार हो गईं, उनका उठना तक मुश्किल हो गया. अब जजमानों
के यहां से बुलावे आने लगे, लोग घर आकर गालियां देने लगे- क्या यहीं आकर हग
जाएं. अंतत: अम्मा की जीत हुई.
परिवार ने कहा कि अगर यहां रहना है तो काम तो करना ही पड़ेगा, बैठकर तो रोटी तोड़
नहीं सकती. जागीरी शुरू हो गई. टोकरी, बदबू घर -घर के पखाने. यही दिनचर्या हो
गई.
किरण कहती हैं- “सुबह छह-सात बजे से दोपहर हो जाती जागीर समेटते-समेटते.
कभी-कभी तो टोकरा इतना भारी हो जाता कि मुझ पर ही गिर जाता. लोग चिल्लाने लगते,
गाली देने लगते. महीनों मैं बीमार रहती, उल्टियां थमने का नाम नहीं ले रहीं थी.
इतना सब कुछ इसलिए क्योंकि हमें बासी रोटियां मिल जातीं थी, तीज त्योहार के
मौके पर भारी जूठन मिलता था और दस-बीस रुपए इनाम के मिल जाते थे. इस तरह एक दो
नहीं बल्कि पंद्रह बरस बीत गए.”
धीरे-धीरे दुख गहरे अवसाद में बदल गया. आंसू बाहर निकलने की जगह मन में ही
निराशा,दर्द बनकर थम गए. किरण के लिए मैला ढोना रोजमर्रा की जिंदगी का दुखद
हिस्सा बन गया.
मैला ढोने वाले समाज में महिलाओं से ही यह काम करवाना बेहद साधारण घटना है. एक
बार यह सिलसिला शुरू हो जाए तो फिर इसका छूटना मुश्किल हो जाता है. यहां यह भी
समझना जरूरी है कि मैला ढोने का काम करने वालों में अधिकतर महिलाएं ही हैं. इस
बात की गवाही आंकड़े भी देते हैं. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मप्र के शहरों और
ग्रामीण इलाकों में मैला ढोने वालों की कुल संख्या 3482 है, जिसमें से मात्र
228 पुरुष हैं.
मैला उठाते हुए किरण को 15 बरस हो चुके थे, जागीर उसकी जिंदगी का हिस्सा बन
चुकी थी. हालांकि बाहर से आने वाले कभी-कभार यह बताते थे कि मैला उठाने का काम
धीरे-धीरे बंद हो रहा है. इस तरह की खबरें उसके मन में आशा का संचार करतीं कि
एक दिन वह भी इससे मुक्त हो जाएगी. किरण के मन में एक ही बात थी कि कम से कम
उनके बच्चों को तो यह सब नहीं करना पड़े.
एक दिन जब किरण 'जागीर' से लौट रही थी तो उन्होंने किसी से सुना कि गरिमा
अभियान वाले मैला प्रथा के खिलाफ रैली निकाल रहे हैं. असल में गरिमा अभियान के
तहत राज्य की नौ स्वयंसेवी संस्थायें मैला ढोने की परंपरा को खत्म करने की दिशा
में काम कर रही हैं और अब तक इन संस्थाओं के प्रयास से मध्य-प्रदेश के 19 जिलों
में कोई 2800 महिलाओं ने मैला ढोने के अमानवीय काम से मुक्ति पायी है.
किरण को भी लगा कि गरिमा अभियान के रास्ते से उनकी मुक्ति हो सकती है. वे
जनसंस्था के आसिफ भाई से मिलीं. आसिफ ने उनको भरोसा दिलाया. किरण इस पेशे को
छोड़ने के लिए पूरी तरह तैयार थी लेकिन किरण के ससुर और पति को समझाना अब भी
सबसे मुश्किल काम था, क्योंकि इनको गांव के सामाजिक बहिष्कार का डर सता रहा था.
यह डर बिना वजह नहीं था. इससे पहले जब भी कभी किसी ने इस तरह की कुछ करने की
सोची, उसके खिलाफ षडयंत्रों का सिलसिला शुरू हो जाता था, लेकिन किरण अब कोई
समझौता करने को तैयार नहीं थी. उसने आसिफ के 'जनसाहस' के साथ मिलकर 'टोकरियां'
जलाईं और धीरे-धीरे अपने समाज को यह समझाने का प्रयास किया कि तस्वीर बदलने के
लिए 'विरोध' करना,सहना पड़ेगा.
डलिया जलाने के बाद किरण ने गेहूं की कटाई, निंदाई और मजदूरी करना शुरू कर
दिया. इस तरह के काम मिलने में पहले तो बहुत परेशानियां आईं लेकिन धीरे-धीरे सब
सामान्य होता गया. यह सब करते दो-चार बरस बीते तो आठवीं पास किरण को भौंरासा
में आंगनवाड़ी खुलने की खबर मिली. उसने वहां सहायिका के लिए आवेदन किया. यहां
जनपद पंचायत व नगर पंचायत में उसकी राह में अनेक रोड़े अटकाए गए लेकिन किरण डटी
रही और उसने जिला पंचायत तक अपनी अर्जी पहुंचाई.
सामाजिक संस्थाओं ने इस संघर्ष में भी किरण का भरपूर साथ दिया और दो माह बाद
नियुक्ति पत्र उसके घर आ गया.
इन दिनों किरण आंगनवाड़ी सहायिका के रूप में भौंरासा में ही कार्यरत हैं.
हालांकि थोड़ा बहुत सामाजिक बहिष्कार और विरोध आज भी जारी है, लेकिन यह सब किरण
को निराश नहीं करता, उसके इरादों को और अधिक मजबूत बनाता है.
11.10.2009, 23.58 (GMT+05:30) पर
प्रकाशित