मोदी के निशाने पर क्यों हैं मुसलमान
मुद्दा
मोदी के निशाने पर क्यों हैं मुसलमान
अजय प्रकाश,
नई दिल्ली से
बेस्ट बेकरी हत्याकांड की वजह से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा गुजरात का बड़ौदा
शहर सितंबर के पहले सप्ताह से एक बार फिर सुर्खियों में है. इस बार चर्चा किसी
नरसंहार या फर्जी मुठभेड़ की नहीं बल्कि फर्जी गिरफ्तारियों की है. यह रवैया तब है
जबकि इस तरह के मामलों में कई बार मोदी सरकार की फजीहत हो चुकी है और अदालतों में
पेशियां लगातार जारी हैं. ताजा मामला इशरत जहां मुठभेड़ का है, जिसमें उच्चतम
न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी करके पूछा है कि “जांच सीबीआई
को क्यों न सौंप दी जाये.” इशरत की मां शमीमा कौसर की याचिका की सुनवाई के दौरान 6
अक्तूबर को न्यायाधीश बीएन अग्रवाल और आफताब आलम की खंडपीठ ने यह नोटिस जारी किया
था.
सितंबर के पहले सप्ताह में पांच मुस्लिम युवकों को बड़ौदा सिटी वार्ड नंबर आठ से
अपराध शाखा और विशेष ऑपरेशन दस्ते ने गिरफ्तार किया था. गिरफ्तार किये गये जहीर
शेख, उस्मान गनी अब्दुल गफ्फार उर्फ नवाब, इकबाल मजीद भाई शेख, मुश्ताक इस्माइल शेख
और अमीन रज्जाक शाह का जुर्म क्या है, इसकी जानकारी उनके परिजनों को तीन से पांच
दिनों बाद उस समय मिल पायी जब बढ़ते हुए सामाजिक दबाव के चलते पुलिस ने मुलाकात
करायी.
पुलिसिया बयान के मुताबिक इन युवकों से देशी रॉकेट लांचर और अन्य असलहे बरामद हुए
थे. जांच अधिकारी जे आर गढ़िया का दावा है कि “ये सभी गणेश विसर्जन के दिन बड़े हमले
की तैयारी में थे.”
लेकिन बड़ौदा से दिल्ली पहुंचे गिरफ्तार लोगों के परिजनों ने ‘अनहद’ सामाजिक संगठन
की पहल पर मीडिया के सामने अपने बेटे-पतियों के निर्दोष होने की गुहार लगायी.
सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने फर्जी मुठभेड़ों और गिरफ्तारियों के पीछे
मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सांप्रदायिक नीति को ठहराया.
बड़ौदा के सामाजिक कार्यकर्ता यूसुफ भाई के अनुसार “इन गिरफ्तारियों के पीछे नगर
निकाय चुनावों से पहले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का एजेंडा छिपा हुआ है. मोदी की यह
रणनीति जाहिर हो चुकी है कि हर चुनाव से पहले किसी कीमत पर हिंदुओं के भीतर एक डर
बैठा देना है कि अगर वे नहीं रहे तो मुसलमान गुजरात को तबाह कर देंगे.”
गिरफ्तारों में से एक जहीर, मजदूरी का काम करता था. उसके घर वाले एक सितंबर से ही
कमाई का जरिया खो चुके हैं. छुड़ाने के लिए थाने, पुलिस, सामाजिक कार्यकर्ताओं और
नेताओं के आगे-पीछे घूम रहे अमीरूद्दीन सिर्फ इतना बता पाते हैं कि “बेटा जेल में
है और मेरी ड्राइवरी छूट गयी है, हम जियेंगे कैसे.” जहीर बेलदारी यानी हमाली का काम
करता था.
जहीर की मां हवालात में बेटे से मुलाकात को याद कर बार-बार फफक पड़ती हैं और कहती
हैं, “वह बिल्कुल पागल की तरह लगा. उस दिन खाने का सामान रखते ही ऐसे झपटा जैसे उसे
कभी खाना नहीं मिला हो.”
आतंकवादी बताकर जब पांच युवकों की गिरफ्तारी पुलिस ने की उस समय रमजान का महीना चल
रहा था और सभी रोजा पर थे. जाहिर है, जितने दिन पुलिस ने उन्हें अवैध हिरासत में
रखा, उतने दिन उन्हें खाना नहीं मिला या फिर धार्मिक वजहों से उन्होंने नहीं खाया
होगा.
सुप्रीम कोर्ट की वकील वृंदा ग्रोवर कहतीं हैं कि “ किसी को गिरफ्तार करने से पहले
खुद पुलिस इतने गैरकानूनी तरीकों को आजमा चुकी होती है कि वह खुद कठघरे में होती
है.” वकील ग्रोवर के मुताबिक, “इस मामले में पुलिस ने सादे वेश में गिरफ्तारी कर
सुप्रीम कोर्ट की अवहेलना तो की है, उसके बाद जांच के नाम पर पांच दिनों तक फार्म
हाउस में बंद कर अवैध हिरासत में रखा. सवाल है कि अगर यह काम कोई पुलिस करती है तो
गुंडे क्या करते हैं?”
पति की बेगुनाही की गुहार लेकर दिल्ली पहुंची इकबाल मजीद भाई शेख की पत्नी सोचती
हैं, काश वे तीन महीने बाद लंदन से बड़ौदा आये होते तो ये दिन न देखने पड़ते. इकबाल
पिछले तीन साल से लंदन में दर्जी का काम कर रहे थे और दो महीने पहले ही लौटे थे. वे
कहती हैं “ मुझे तो मोहल्ले वालों ने बताया कि पांच-सात लोग उन्हें उठा ले गये. चार
दिन तो पता ही नहीं चला कि वह कहां गये. पांचवें दिन रात के ग्यारह बजे जब मैं उनसे
मिली तो वे काले पड़ चुके थे. इतनी ताकत नहीं बची थी कि वह रो पायें. घिसटते हुए
मेरे पास आये थे.”
गुजरात जनसंहार के बाद सरकार गवाहों को तोड़ने, रिपोर्ट को अपने पक्ष कराने के लिए
जो हथकंडे अपनाती रही है, वह सब तमाम खबरों के जरिये जाहिर हो चुका है. उत्तर
प्रदेश के पूर्व पूलिस महानिरिक्षक एसआर दारापुरी कहना है कि “एक दौर में पुलिस के
जिन गुनाहों पर उच्चाधिकारी पर्दा डाला करते थे, अब सरकारें उन अपराधों का कवच बन
रही हैं.” फिलहाल इस मामले में अमीन रज्जाक शाह के घर वालों को थोड़ी राहत है कि वे
जेल से जमानत पर घर आ गये हैं.
चार पहिया गाड़ियों के मिस्त्री उस्मान गनी अब्दुल गफ्फार उर्फ नवाब को पुलिस ने 1
सितंबर को काम की जगह से ही उठा लिया था. उस्मान की तरह अन्य पांचों को भी पुलिस ने
काम की जगह से या घर से गिरफ्तार किया है. सबमें समानता यह है कि ये सभी रोजगार के
तौर पर खुद का कुछ काम करते हैं और सभी एक दूसरे से परिचित हैं.
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पिछले साल गणेश विसर्जन के दिन जुनैद पुलिस की गोली से मारा गया और पुलिस ने उसी को
अभियुक्त बना कर केस खत्म कर दिया. |
लेकिन सवाल है कि पुलिस ने इन्हीं पांचों को निशाना क्यों बनाया? जबकि इनमें से
किसी एक पर पहले से कोई मुकदमा दर्ज नहीं था. इस बारे में उस्मान के बड़े भाई
मोहम्मद नईम अंसारी बताते हैं, “इकबाल मजीद तीन साल बाद लंदन से लौटा था और उसके
ये सभी परिचित थे. लंदन में तीन साल रहने की वजह से इकबाल को वहां के दोस्त फोन
किया करते थे. ऐसे में पुलिस को कहानी बनानी आसान हुई कि इनके विदेशी आतंकवादियों
के साथ रिश्ते हैं.”
सच क्या है, यह जानने दिल्ली से गयी फैक्ट फाईंडिंग कमेटी की टीम में शामिल रहीं
'अनहद' संगठन की कार्यकर्ता शबनम हाशमी बताती हैं, “इलाके के लोगों से मिलकर लगा
कि नरेंद्र मोदी के लिए सांप्रदायिकता संजीवनी बन गयी है. बाकियों की क्या कहूं,
नौजवान इतने डरे हुए हैं कि इस बार गणेश विसर्जन के दिन शहर के सैकड़ों युवा थाने
में जाकर बैठ गये कि कहीं पुलिस उनको दंगाई बताकर मार न डाले या फिर उठाकर बंद न कर
दे.”
सोलह लाख की आबादी वाले बड़ौदा में वार्ड नं आठ वह जगह है, जहां बेस्ट बेकरी कांड
में सोलह लोगों को 2002 जनसंहार के बाद उन्मादियों ने जिंदा जला दिया था. वार्ड
नंबर आठ में 8 हजार मुस्लिम वोट और 19 हजार हिंदू वोट हैं. इसीलिए यह क्षेत्र हमेशा
सांप्रदायिक तनाव का केंद्र बना रहता है.
ऐसा नहीं कि सिर्फ हाल की गिरफ्तारियां ही सरकारी जुल्मतों की गवाह हों, बल्कि इससे
पहले 2006 में दो सौ साल पुरानी दरगाह तोड़ दी गयी थी और छह लोग पुलिस की गोली से
मारे गये. बड़ौदा जिला कांग्रेस उपाध्यक्ष और उपमहापौर मोहम्मद भाई वोहरा बताते
हैं, “हद तो यह है कि सरकार मरने वालों को ही अभियुक्त बना देती है. पिछले साल
गणेश विसर्जन के दिन जुनैद पुलिस की गोली से मारा गया और पुलिस ने उसी को अभियुक्त
बना कर केस खत्म कर दिया.”
14.10.2009, 10.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशित