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इसका, उसका, सबका पेटेंट

मुद्दा

 

इसका, उसका, सबका पेटेंट

देविंदर शर्मा

अगली बार चिकन टिक्का का आर्डर करें तो जरा रुकें और सोचें. पाकिस्तान में जन्मे ब्रिटिश सांसद मोहम्मद सरवर मसालेदार चिकन टिक्का पर पेटेंट हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं. उनका दावा है कि इसका आविष्कार स्काटलैंड के शहर ग्लासगो में 1970 में हुआ था. उन्होंने ब्रिटिश संसद के निचले सदन में प्रस्ताव पेश किया है और यूरोपीय संघ से समर्थन की मांग की है कि ग्लासगो को इस व्यंजन के आविष्कार का मूल अधिकार देने में सहयोग करे. है न यह चौंकाने वाली बात. फिर भी मैं हैरान नहीं हूं.

पेटेंट कानून

वास्तव में मेरी चिंता का विषय परंपरागत भोजन और व्यंजनों तथा अन्य तमाम वैज्ञानिक उपलब्धियों पर एकाधिकार नियंत्रण के वैश्विक प्रयासों को लेकर है.

विश्व बौद्धिक संपदा संगठन की आम सभा हाल ही में संपन्न हुई है, जिसमें पेटेंट कानून को सुगम बनाने पर चर्चा हुई. पेटेंट सहयोग संधि के नाम पर डब्लूआईपीओ ऐसा प्रस्ताव आगे बढ़ा रहा है, जो अगर पारित हो गया तो यह सुनिश्चित हो जाएगा कि जिस पेटेंट को तीन देशों द्वारा स्वीकृति प्रदान कर दी जाएगी, वह अंतरराष्ट्रीय पेटेंट के रूप मान्य हो जाएगा.

मेरी नजर में यह प्रस्ताव विकासशील देशों के लिए बहुत घातक है. यह विकासशील देशों को वैज्ञानिक उपलब्धियों से वंचित करने का हथियार बन जाएगा और वैज्ञानिक शोध तथा प्रौद्योगिकी विकास पर विकसित व औद्योगिक देशों का कब्जा हो जाएगा. विकासशील देश इन देशों के लिए काम करने का केंद्र बनकर रह जाएंगे. पहले ही अनेक उदाहरण सामने हैं, जहां विकसित देशों ने तकनीकी विकास में सहयोग देने से इनकार कर दिया है.

डब्लूआईपीओ जो प्रयास कर रहा है उसका मतलब है दुनिया में एकल पेटेंट कानून लागू करना. ऐसे में पेटेंट राष्ट्रीय संपदा नहीं रह जाएगा. दूसरे शब्दों में, इसका मतलब होगा कि विकासशील देश पेटेंट के लिए मानदंड निर्धारित नहीं कर पाएंगे. नई व्यवस्था के तहत दुनिया में किसी भी तीन स्थानों पर मौजूद पेटेंट कार्यालय की परीक्षण रिपोर्ट के आधार पर पेटेंट दे दिया जाएगा. इस रिपोर्ट को अंतरराष्ट्रीय पेटेंट की मान्यता के तौर पर स्वीकार किया जाएगा.

पेटेंट का पूरा खेल भद्दे स्तर तक पहुंच गया है. वैश्विक पेटेंट जल्द ही अंतरराष्ट्रीय मानक बन जाएंगे, फिर भी हैरानी की बात है कि इस मुद्दे पर सार्वजनिक बहस नहीं छिड़ी है. भारत में पेटेंट राजनीतिक मुद्दा नहीं है. हमने पूर्व के उन उदाहरणों से आंखें फेर ली हैं जिनमें विशुद्ध भारतीय नीम और हल्दी का पेटेंट कराने के प्रयास किए गए थे. इसके अलावा कई अन्य भारतीय व्यंजनों और खाद्यान्नों को भी एकाधिकार नियंत्रण का लक्ष्य बनाया जा चुका है.

यह स्पष्ट करना जरूरी है कि वैश्विक पेटेंट का दायरा केवल चिकन टिक्का और बाल्टी तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विकास की तमाम गतिविधियों तक इसका विस्तार रहेगा. हम देश के आर्थिक विकास में इन पेटेंट की अहमियत नहीं समझ रहे हैं. परंपरागत व्यंजनों के मामले में भी, आप संभवत: पहले ही यह सुन चुके होंगे कि जापान ने भारतीय मसालों के पेटेंट हासिल करने के लिए कैसे-कैसे प्रयास किए. नेस्ले ने पहले ही वेज पुलाव का पेटेंट हासिल कर लिया है. इसी दौरान ब्रिटिश शहर बर्मिंघम ने बाल्टी व्यंजनों पर यूरोपीय संरक्षण पाने का आवेदन किया है.

कोई भी यह देख सकता है कि परंपरागत पाककला और ज्ञान पर एकाधिकार पाने के लिए विश्वव्यापी दिलचस्पी प्रदर्शित की जा रही है. केवल तकनीकी श्रेष्ठता ही नहीं, बल्कि हमारा परंपरागत ज्ञान और उत्पाद विकसित देशों के हाथों में जा रहे हैं. बाल्टी व्यंजनों के लिए पेटेंट संरक्षण पाने की कोशिश एक मूर्खतापूर्ण विचार है.

मैंने हमेशा यह महसूस किया है कि बाल्टी व्यंजन किसी ऐसे उद्यमशील शेफ का विचार रहा होगा जो भारतीय व्यंजनों को कढ़ाही में परोसने की परंपरागत शैली से कुछ अलग करना चाहता होगा. मैंने यूरोप में ही यह देखा है कि भारतीय व्यंजनों को बाल्टी में परोसा गया. भारत में हम अभी भी कढ़ाही का ही सहारा लेते हैं.

अब यदि खाद्य उद्योग में एकाधिकार पाने के लिए इस स्तर पर प्रयास किए जाएंगे तो मुझे पूरा विश्वास है कि कोई न कोई कढ़ाही के लिए भी पेटेंट हासिल करने की सोच रहा होगा.

दिल्ली के एक होटल के शेफ जईमुद्दीन अहमद के हवाले से एक खबर में बताया गया है कि चिकन टिक्का बनाने की कला उनके परिवार में एक पीढ़ी से दूसरी में स्थानांतरित हुई. वह कहते हैं कि चिकन टिक्का मसाला मुगल काल के शाही खानसामा रहे हमारे पूर्वजों की प्रामाणिक मुगलई डिश है.

वैसे मैं पेटेंट की पद्धति के खिलाफ हूं, लेकिन अच्छा होता कि जईमुद्दीन ने चिकन टिक्का पर पेटेंट हासिल कर लिया होता. मुझे लगता है कि अब समय आ गया है, जब हमें विकसित देशों को उनके ही खेल में मात देनी चाहिए. भारत को पेटेंट के खतरों के प्रति सचेत होना चाहिए. मानव संसाधन विकास मंत्रालय तथा विज्ञान एवं तकनीक मंत्रालय को वाणिज्य मंत्रालय के सहयोग से लोगों में जागरूकता उत्पन्न करने तथा भारतीयों को अपनी परंपरागत कला पर पेटेंट हासिल करने के लिए प्रोत्साहित करने का अभियान छेड़ना चाहिए.

कुछ साल पहले दक्षिण भारत के एक प्रमुख होटल ने इडली वडा, मसाला डोसा आदि पर पेटेंट प्राप्त किया था. कृषि-व्यावसायिक उत्पादों के लिए ये पेटेंट सात वर्ष तक रहे और इसके बाद समाप्त हो गए. चूंकि एक देश को दिए गए पेटेंट किसी अन्य देश को नहीं दिए जा सकते, इसलिए इडली वडा, मसाला डोसा और ऐसे ही दूसरे व्यंजन किसी अन्य देश के पेटेंट कब्जे में नहीं जा सकते. नि:संदेह उस भारतीय होटल की पहल एक बुद्धिमानी भरा कदम था. अन्य भारतीयों को इसका अनुकरण करना चाहिए. आशा है कि भारत को चिकन टिक्का पर स्काटिश दावे के खिलाफ वैसी लड़ाई नहीं लड़नी पड़ेगी, जैसी उसे हल्दी पर हक हासिल करने के लिए लड़नी पड़ी.

14.10.2009, 23.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

डॉ. लाल रत्नाकर (ratnakarlal@gmail.com) Ghaziabad

 
 पेटेंट का खेल और दुनिया की तकनीकी नज़र- इसमे कोई दो राय नहीं कि विकसित देश सदा से विकासशील देशों के षडयंत्र के शिकार रहे है. मेरे ज्ञान से हमेशा तिकड़म ही महानतम नहीं बनाता. हिंदुस्तान ''यद्यपि धर्मनिरपेक्ष देश होते हुए भी अकेले हिन्दू देश नहीं है यदि हो भी जाय तो '' इस देश के उन तमाम हिन्दुओं की प्रतिभा का पेटेंट उन सुविधा संपन्न कुछ जातिओं को मिल जाता है, जो जमींदार है या गुंडे है. पार्लियामेंट से विधान सभा तक, मायावती से मुलायम तक पैसे का खेल और सत्ता का पेटेंट!

टिक्का का पेटेंट कोई ले ले पर आनंद तो वही लेंगे जिन्हें वह बनाना आता होगा. पाक कला हो या कोई कला, हमेशा से बनवाने वाला ही अधिकारी रहा है.
 
   
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