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रोशनी हैं बेटियां
बात
निकलेगी तो...
रोशनी हैं बेटियां
कुमुद सिंह
किस्सा पिछली दीपावली का है. घाघरा-चोली पहने इठला कर चलती नन्हीं बिटिया ने जब
अपनी तोतली जबान से पूछा-“मां मैं भी कललूं लोशनी(रोशनी)”, कानों में मानो
मिश्री-सी घुल गई. बिटिया का मुख चूमते हुए उसे अपनी गोद में बिठाकर हम दीपक में
रोशनी करने लगे.
बात सामान्य तरीके से वैसे ही कही गई थी, जैसे इस उम्र के बच्चे करते हैं,
लेकिन न जाने क्यों लगा, जैसे आज पूजा से पहले ही लक्ष्मी, सरस्वती,दुर्गा के
साक्षात् उपस्थित होकर कुछ संदेश दिया है. क्या है वह अनकहा?
मन बार-बार उस सवाल को सुलझाने का प्रयास करने लगा. दीपावली सभी घरवालों और
पास-पड़ोस के लोगों के साथ मनाई, मिठाई का आदान-प्रदान, फुलझड़ी-अनार का मजा सब
चलता रहा, लेकिन मन निरंतर उसी ‘अनकही’ पर अटक गया. लोगों से मिलना-मिलाना भी
चलता रहा.
तभी कालोनी में थोड़े दिन पहले ही रहने आए सोलंकी परिवार से परिचय हुआ. फिर
हमेशा की तरह महिलाओं के सवाल शुरू हो गए-पति क्या करते हैं. घर में कौन-कौन
है. कितने बच्चे हैं. श्रीमती सोलंकी (क्योंकि अभी तक उनका नाम नहीं पूछा गया
था) ने बहुत दबी जवान से जवाब दिया-दो बेटियां ही हैं जी. अचानक श्रीमती गुप्ता
का स्वर सहानुभूतिपूर्व हो गया-“अरे-रे... बेटा नहीं है,.. बेचारी. एक हमारे
यहां देखो. मेरे तीन बेटे, दो बेटों के यहां दो-दो बेटे, तीसरे के अभी एक बेटा
है, सोचते हैं एक बेटी हो जाए तो कन्यादान का पुण्य भी कमा लेंगे. अरे भई तुम
तो एक बेटे के लिए जरूर सोचो. अरे जांच करा लेना, बेटा तो होना ही चाहिए.
कुलदीपक के बिना कुल कैसे चलेगा?”
वे लगातार बोले जा रही थीं और श्रीमती सोलंकी सिर नीचा किए ऐसे खड़ी थीं जैसे
अक्षम्य अपराध किया हो. मेरा मन आक्रोशित हो उठा. उन्हें कुछ कहूं, उससे पहले
बिटिया पर निगाह चली गई. देखा हवा के झोंके से एक दीपक को वो लड़खड़ा रही थी,
बिटिया उसे दोनों हाथों से बचाने की कोशिश कर रही थी और सफल होने पर कोई गर्व
किए बिना चुपचाप उठ कर इधर-उधर घूमने लगी. न जाने क्यों आज बार-बार उसके मासूम
चेहरे में लक्ष्मी-दुर्गा-सरस्वती कुछ कहती नजर आ रही थीं.
फिर श्रीमती गुप्ता की बात याद आ गई कि- बेटी पूरे खानदान में एक हैं तो भी
बहुत है, क्योंकि कन्यादान का पुण्य कमाने को एक ही बहुत है. कब पहचानेंगी ये
महिलाएं अपनी शक्ति को, कब तक ये खुद के बेटी होने पर और बेटी को जन्म देने पर
स्वयं को अपराधी समझती रहेंगी? कब तक बेटी को दान की वस्तु बना कर रखेंगी? कब
तक बेटों की मां गर्वीलें स्वर में और बेटियों की मां दबी जबान में बोला
करेंगी? समय बदल रहा है. देश-दुनियां में काफी विकास हो रहा है. मानव चांद पर
बस्ती बसाने जा रहा है, लेकिन नहीं बदली तो बेटियों के प्रति हमारी सोच और
स्वयं स्त्री का खुद को कमतर समझना.
मन उड़ने लगता है, जब सुनीता विलियम अंतरिक्ष में उड़ती है या फिर कोई गंगा गांव
की सरपंच बन सुशासन की राह पर चल पड़ी है, लेकिन उतनी ही ऊंचाई से नीचे धड़ाम से
गिरता है, जब एक भारत की सशक्त बेटी सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर कहती हैं कि
अगले जन्म में बेटी होना नहीं चाहती. उनके एक ही वाक्य से हट गया उस विकास के
दावे से पर्दा, जिसका हम ढिंढोरा पीटकर खुश होते हैं.
मन चीखने को करता है, जब बेटियों का कत्ल करने के बाद हरियाणा में लोग वोट के
बदले बहू मांग रहे हैं, जब खबर आती है कि बुंदेलखण्ड में लोग अपनी धर्मपत्नी को
बेच रहे हैं, जब देश के कई हिस्सों में लोग बेटियों की खरीद-फरोख्त कर अपने
बेटों के लिए बीवियों का इंतजाम कर रहे हैं. इतने पर भी चेत नहीं रहे हैं लोग.
बेटियों की लगातार घटती संख्या हमारे समाज पर लगे दाग को गहरा और गहरा कर रही
है और समाज चुप है. सबसे ज्यादा चिंतनीय है, मां का चुप रहना. कवि दुष्यंत के
शब्दों में- हो गयी है पीर पर्वत सी, पिघलनी चाहिए.
मैंने महिलाओं के बीच होने वाली बातचीत को थोड़ा बदलने की दृष्टि से श्रीमती
शर्मा से पूछा – “आपकी बिटिया कैसी है? उसने इस बार पीएमटी की परीक्षा दी थी,
क्या रहा रिजल्ट?” श्रीमती शर्मा बिना किसी अफसोस के बोली-“ हां, परीक्षा में
बहुत अच्छे नम्बर आए थे लेकिन उसके पापा ने कहा खर्चा बहुत आएगा, अभी उसकी शादी
में भी देना पड़ेगा, फिर बेटा भी अगली बार पीईटी की परीक्षा देगा, उसको बहुत आगे
तक पढ़ाना है, उसके लिए भी पैसा बचाना है.”
मैने आश्चर्य से पूछा –“बिटिया ने कुछ कहा नहीं.”
वो बोलीं- “क्या कहेगी. दो-चार दिन रोती रही फिर समझ गई. सीता जैसी है जी मेरी
बेटी-सीधी सादी. जैसा उसके पापा और भाई कहते हैं, वैसा ही करती है.”
उनकी बातों से मुझे झुंझलाहट हुई. मैने कहा- “आप सीता के विषय में क्या जानते
हैं कि सीता बेचारी बहुत सीधी थी, जैसा भी रहना पड़ा रहीं. गलत जानकारी है आपको.
सीता बेचारी नहीं थीं.”
सभी महिलाएं एकदम सकपका कर मेरी ओर देखने लगीं और दूर खड़े पुरुष भी नजदीक आ गए
और मुझे आश्चर्य से देखने लगे.
असल में बहुत कम लोग इस बात को जानना चाहते हैं कि सीता बेचारी नहीं सुशिक्षित,
संस्कारी बेटी हैं. वो शक्ति का स्वरूप हैं. जिस धनुष को श्रीराम ने जवानी में
तोड़ा, उसे सीता ने उस वक्त तोड़ दिया था, जब उनकी उम्र गुड़ियों से खेलने की थी.
सीता कमजोर नहीं, श्रीराम से ज्यादा शक्तिशाली थीं. भगवान राम ने तो स्वयं
स्वीकार किया है कि सीता ही उनकी शक्ति है. और सीता बेचारगी के कारण नहीं चली
थीं राम के संग हर परिस्थिति में. वो सीता को मातृपक्ष से मिले संस्कार थे,
जिसने उन्हें जीवनसाथी का सही अर्थ समझाया था. जिसने उन्हें इरादों से इतना
मजबूत बनाया था कि राम का जीवन भर साथ निभाने के उनके निर्णय को जंगल के कंटीले
रास्ते भी नहीं डिगा पाये, और सबसे बड़ी बात सीता तन-मन के साथ मस्तिष्क से भी
बहुत मजबूत थीं तभी अपने स्वाभिमान के चोटिल होने पर श्रीराम से अथाह प्रेम
होने के बावजूद उन्होंने राम के पास लौटने के बजाय धरती में समाने का रास्ता
चुना.
धरती में समाने का अर्थ खत्म होना नहीं था बल्कि व्यापक होना था ताकि इस धरती
पर जन्मने वाली हर बेटी स्वाभिमानी,शक्तिशाली, संस्कारी हो. ऐसे में हमें समझने
की जरुरत है और बेटी की शक्ति को पहचानने की भी. अगर अब भी हम नहीं जागे तो
हमारी बेटियां यूं ही कोख में और संसार में मारी जाती रहेंगी और हम बेटियों की
चीख को दीवाली के पटाखों के शोर में अनसुना करते रहेंगे.
बातचीत का सिलसिला लंबा चला और आखिर में लगा कि मेरे आसपास खड़ी महिलायें शायद
पहली बार बेटी होने के महत्व को जान रही थीं. पास ही में मेरी बिटिया इन सब
बातों से अनजान अपने रोशन किए हुए दीपों को निहारते-निहारते सो गई थी, उसके
चेहरे पर सीता-सा तेज नजर आ रहा था. उधर उसके रोशन किए दीपक अमावस की स्याह रात
को भरपूर चुनौती देते लग रहे थे. मुझे ठीक-ठीक याद है, पूरे साल भर हमारी
कॉलोनी में बेटियों के महत्व पर गाहे-बगाहे चर्चा होती रही और बेटियों के हर
कदम पर घर वाले उनके हौसले को सलाम करते रहे.
इस बार दीपावली में आप भी अपनी बिटिया के बारे में गंभीरता से सोचिएगा, बेटे
अगर घर का दीप हैं तो रोशनी है बेटियां.
लेखिका कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध जनजागृति के
लिए प्रतिबद्ध संस्था सरोकार की सचिव हैं
16.10.2009, 00.50 (GMT+05:30) पर
प्रकाशित
| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | rabbi new delhi | | | | जैसा आप सोचती हैं काश सब ऐसा ही सोचने लगे. | | | | | |
| | kamanabillore (krbillore@gmail.com) mumbai | | | | आपके विचार बहुत ही संवेदनशील हैं. किसी ने क्या खूब कहा है बेटियों के लिए –
“ओस की बूंद होती हैं बेटियां, पापा की दुलारी होती है बेटियां बेटियां प्यारी सी होती है, बेटियां मां के स्पर्श की कोमल होती हैं रोशन करेगा बेटा तो बस एक ही कुल को, दो-दो कुल की लाज होती हैं बेटियां हीरा अगर है बेटा तो सच्चा मोती होती हैं बेटियां, कांटों पर चलकर राह में फूल बिछाती है बेटियां कहने को तो पराई अमानत होती है, पर बेटों से बढ़कर अपनी होती हैं बेटियां“ | | | | | |
| | col narayan parwani (nariparwani@yahoo.com) bhopal | | | | such eye opening articles will certainly help in changing attitude of parents towards girl child . | | | | | |
| | संजय कुमार दुबे Safat, 13014, Kuwait | | | | आपका लेख बहुत महत्वपूर्ण है. शर्त ये है कि हमारा पुरुष समाज इस पर ध्यान दे. वरना बातें तो पिछले कई सालों में बहुत लंबी-चौड़ी हुई हैं, लेकिन उसका असर कितना होता है ? कुछ असर हो, कुछ बात बने. | | | | | |
| | Himanshu (patrakarhimanshu@gmail.com) Noida | | | | आपने बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है. पुरुषों की कई-कई पीढ़ियों ने बेटियों के साथ जो-जो अत्याचार किये हैं, उसके सामने दूसरे सारे अपराध कम पड़ जाएंगे. बेटियों को धरती पर आने से रोकना, आ जाएं तो उसे प्रताड़ित करना.... ना जाने कितनी सदियों तक यह सब कुछ होता रहा. हमें कम से कम आज तो चेत जाना ही चाहिए. | | | | | |
| | Sananda Tiwari ,Near Kathgodam Railway Station, Nainital, India | | | | Dear Kumud, The scene is changing. Here’s some good news. There has been a positive trend in the attitude of parents towards the girl child in North India.
Compared to boys, girls “do not face any blatant discrimination” any more in terms of education, health and nutrition facilities being provided to them, reveals a new survey, adding that some amount of subtle prejudice against girl children does still exist in society. The survey, conducted by the Women’s Studies and Development Centre of Delhi University, covered 7, 200 respondents comprising parents and the first girl child of many a family.
The Centre compiled the project report on “Attitudinal difference towards girl child in selected districts in six States of North India” and collated data for all the six centres in Haryana (Kurukshetra), Punjab (Nawan Shehar), Himachal Pradesh (Shimla), Jammu and Kashmir (Jammu) and Rajasthan (Jaipur). These six centres were further divided into rural and urban samples.
“The general trend we have seen is that there has been a lot of improvement in the past many years. There is less of gender discrimination. For instance, the distribution of quantity of food is same in the family. But at the same time, when it comes to quality of food, boys are favoured more,” says Nilima Srivastava, reader at WSDC and principal project coordinator.
“Three-fourths of the sample of girls from all districts said that they found no difference in rearing between them and their brothers. However, rural girls are discriminated more with regard to food and nutrition and exposure to the outside world, while urban girls bear more household work demands,” she adds.
In terms of enrolment, attendance and retention of girls in schools, both boys and girls have nearly the same high percentages of enrolment.
In all the six regions, majority of parents feel that education is important for both boys and girls.
In Jaipur, for instance, 100 per cent parents in both rural and urban survey samples said education is important for children regardless of their gender.
Rural girls are more likely to be at the receiving end in cases of financial constraints.
A high 51.50 per cent of fathers in Jaipur (about 67 per cent from the rural sample) accepted that in the eventuality of any economic hardship they would withdraw their daughter from school.
A positive finding was that a high percentage of parents and girl children themselves are votaries of economic independence for girls. | | | | | |
| | Sujoy Sen , Kolkata | | | | Keep it up Kumud ji. *Currently, 60 million girls are reported as “missing” as a result of infanticide, sex selective abortions, and neglect.
* At least 130 million girls alive today have undergone Female Genital Mutilation, and 2 million more are at risk every year.
* It is reported that at least 5,000 women and girls are murdered each year for “honor’s sake” by members of their own families.
* United Nation statistics, national reports and studies initiated by non-governmental organizations repeatedly show that girls, as a group, have lower literacy rates, receive less health care, and more impoverished than boys.
These are the shame for indian. | | | | | |
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