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वेदांता को कितना जानते हैं आप

मुद्दा

 

वेदांता को कितना जानते हैं आप

अभिषेक श्रीवास्तव, नई दिल्ली से



पिछले महीने कोरबा में गिरी जानलेवा चिमनी वाले कांड को, जिसे अब तक समूचे मीडिया में बालको कांड का नाम दिया जा रहा है, आखिर किसने अंजाम दिया है? ज़ाहिर है, कंपनी तो बालको ही है, लेकिन इसे कोरबा कांड कहने के पीछे एक सैद्धांतिक वजह है.

आधिकारिक रूप से 41 मजदूरों की जान ले चुकी इस दुर्घटना को समूचे मीडिया में बालको कांड के नाम से पुकारा गया. बालको कभी भारत सरकार का उपक्रम था, अब नहीं है. इसके मालिक हैं अनिल अग्रवाल, जो अरबों डॉलर की लंदन में सूचीबद्ध कंपनी वेदांता-स्टरलाइट के मालिक हैं. तो दुर्घटना को बालको के नाम से जोड़ना एक मनोवैज्ञानिक छवि पैदा करता है कि यह दुर्घटना एक सरकारी कंपनी में हुई है.

कोरबा वेदांता


पहले साफ कर लें कि ऐसा नहीं है. बालको के 51 फीसदी शेयर अनिल अग्रवाल की स्टरलाइट ने 2001 में ही 551 करोड़ रुपये चुका कर खरीद लिए थे, जब कंपनी के पास कुल नकदी 447 करोड़ रुपये ही बची थी. तो सबसे पहली बात, इस दुर्घटना की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी बालको के प्रबंधन यानी वेदांता-स्टरलाइट कंपनी पर बनती है.

कमल मुरारका की जीडीसीएल
ज़रा और पीछे जाएं. इस निर्माण स्थल पर दिए गए ठेकों के बारे में पता करें, तो पता चलता है कि यहां का काम एक चीनी कंपनी सेपको और एक भारतीय कंपनी गैनन डंकरले को दिया गया था. दुर्घटना होते ही इन कंपनियों के अधिकारी वहां से खिसक लिए थे. प्रशासन ने चीनी कंपनी के 76 अधिकारियों के वापस चीन जाने का पूरा प्रबंध तक कर डाला था, लेकिन केंद्र सरकार के एक आदेश के चलते उन्हें रुकना पड़ा.

ज़रा गैनन डंकरले के बारे में भी जान लें. यह 300 करोड़ रुपये की कंपनी उन्हीं उद्योगपति कमल मुरारका की है, जो कभी सांसद थे और हिंदी का लोकप्रिय अखबार चौथी दुनिया चलाते थे. आज भी मुंबई का आफ्टरनून और पुनर्प्रकाशित चौथी दुनिया इन्हीं का है. दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित गैनन डंकरले के दफ्तर में अब चौथी दुनिया चलता है, लेकिन वहां अब भी कंपनी के अवशेष मिल जाएंगे. अब कंपनी का ऑफिस ओखला चला गया है.

कोरबा कांड के ठीक बाद गृह मंत्रालय ने बालको की बची 49 फीसदी हिस्सेदारी की स्टरलाइट द्वारा खरीद पर रोक लगा दिया. 2001 में जब स्टरलाइट ने बालको का 51 फीसदी खरीदा था, तो उस सौदे में एक कॉल ऑप्‍शन भी था कि एक निश्चित अवधि के भीतर स्टरलाइट अन्य हिस्से को भी बालको से खरीद सकती है. इसकी समय सीमा मार्च 2004 तय की गई थी, लेकिन कंपनी के मूल्यांकन को लेकर मतभेद पैदा हो गए जब स्टरलाइट ने 1099 करोड़ रुपये में बालको के 49 फीसदी शेयरों की खरीद का प्रस्ताव फेंका. उसके बाद से मामला अटका पड़ा था.

चिदंबरम यानी वेदांता के डायरेक्टर
सवाल उठता है कि कंपनियों के बीच खरीद-फरोख्त के मामलों पर गृह मंत्रालय का क्या अख्तियार है? क्या गृह मंत्रालय कानूनी तौर पर किसी कंपनी के अधिग्रहण पर रोक लगाने का तकनीकी अधिकार रखता है? हो सकता है दुर्घटना से जुड़ा कोई उपबंध हो जिसमें यह संभव हो, लेकिन इसके पीछे मूल वजह मौजूदा गृह मंत्री पी. चिदंबरम का होना है.

बता दें कि पी. चिदंबरम वेदांता समूह के निदेशक बोर्ड में रह चुके हैं. आर. पोद्दार की लिखी किताब ‘वेदांताज़ बिलियंस’ में बताया गया है कि चिदंबरम वेदांता रिसोर्सेज़ के निदेशक के तौर पर भारी-भरकम तनख्वाह लेते थे. सालाना 70,000 डॉलर उन्हें एक गैर-कार्यकारी निदेशक के तौर पर कंपनी से मिलते थे. यह बात 2003 की है. उस दौरान स्टरलाइट के शेयरों में चिदंबरम के रहते 1000 फीसदी का उछाल आया था.

गृह मंत्री बनने से पहले पिछली सरकार में जब चिदंबरम वित्त मंत्री थे, तो उन्होंने वेदांता समूह की औरंगाबाद स्थित कंपनी स्टरलाइट ऑप्टिकल टेक्नोलॉजिस्ट्स लिमिटेड के केंद्रीय उत्पाद और कस्टम शुल्क के रूप में बकाया भारी राशि को वसूलने से अपने कदम वापस खींच लिए थे.

इसकी वजह यह थी कि जब कंपनी ने कर की अपनी देनदारी से संबंधित कार्यवाही पर रोक लगाने के लिए बॉम्बे उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी, तो चिदंबरम और उनकी पत्नी ने स्टरलाइट का मुकदमा लड़ा था, जिसके बाद कोर्ट ने 13 अगस्त 2003 को याचिका को खारिज कर दिया था. चिदंबरम एक बार वेदांता को कर देनदारी से अपने वित्तमंत्रित्व काल में राहत दिलवा चुके हैं. अब गृह मंत्री होने के नाते वह 41 मजदूरों की हत्या से रंगे कंपनी के हाथों को साफ करने की कवायद में हैं. आश्चर्य नहीं कि इस घटना के लगभग 40 घंटे के भीतर चिदंबरम छत्तीसगढ़ में थे. ये और बात है कि उनके दौरे को नक्सल ऑपरेशन से जोड़ कर प्रचारित किया गया.

जब मीडिया और विधायिका दोनों कंपनी की मुट्ठी में हों, तो ज़ाहिर है न्यायपालिका को साथ लिए बगैर कृकुत्यों को पूरी तरह जायज़ नहीं ठहराया जा सकता.

शायद इसीलिए उड़ीसा में खनन संबंधी एक मामले में वेदांता के पक्ष में 2007 और 2008 में फैसला सुनाने वाले सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एस एच कपाड़िया ने पिछले हफ्ते जब अधिवक्ता प्रशांत भूषण द्वारा हितों के टकराव संबंधी आरोपों का जवाब दिया, तो वेदांता द्वारा इस देश के चारों स्तंभों को खरीद लेने की कहानी मुकम्मल हो गई.

न्यायपालिका भी घेरे में
उड़ीसा में बॉक्साइट खनन और अल्युमिनियम परिशोधन परियोजना को वेदांता समूह की एक कंपनी को देने संबंधी फैसला सुनाने वाले न्यायमूर्ति कपाड़िया कंपनी के शेयरधारक हैं. प्रशांत भूषण के आरोपों के जवाब में उन्होंने पिछले हफ्ते कहा था कि उन्होंने अपनी शेयरधारिता की बात कोर्ट में बता दी थी, लेकिन संबद्ध किसी भी पक्ष ने भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली विशेष वन खंडपीठ के सामने आपत्ति नहीं दर्ज कराई.

विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और प्रेस चारों स्तंभों को खरीद कर दरअसल संदेश यही दिया जा रहा है कि पूंजी की राह में सिर्फ एक ही विकल्प है- या तो बिक जाओ या फिर मर जाओ.


अजीब बात यह है कि जिन तीन पक्षों ने वेदांता की परियोजना को चुनौती दी थी, उनमें से कोई भी उनसे सहमत नहीं था, जबकि कपाड़िया इस बात को खा गए. तीन याचियों बिस्वजीत मोहंती, प्रफुल्ल सामंत रे और एकेडमी ऑफ माउंटेन एनविरॉनिक्स का पक्ष ज़ाहिर तौर पर उन पक्षकारों से महत्वपूर्ण था, जो वैसे भी वेदांता के समर्थक थे.

कपाड़िया ने स्टरलाइट में अपने शेयरों की बात 26 अक्टूबर 2007 को सामने लाई थी, जब वह फैसला लेने के आखिरी चरण में थे. ज़ाहिर है, एक ऐसे मोड़ पर शेयरधारिता की बात को सामने लाना और याचियों को आपत्ति उठाने का मौका न देना हितों के टकराव का ही मामला बनता है. इसके अलावा स्टरलाइट के कई अन्य मामले भी हैं जिनमें न्यायमूर्ति कपाड़िया ने फैसला सुनाया है. उनमें एक स्टरलाइट द्वारा चेन्नई के कस्टम आयुक्त के खिलाफ की गई अपील का मामला है, जिसे न्यायमूर्ति कपाड़िया की अध्यक्षता वाली एक खंडपीठ ने बरकरार रखा था.


कुल मिला कर हम देख सकते हैं कि किस तरीके से एक उद्योगपति अपने हितों के लिए किसी देश के तीनों अंगों को इतनी आसानी से साध लेता है. विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और प्रेस चारों स्तंभों को खरीद कर दरअसल संदेश यही दिया जा रहा है कि पूंजी की राह में सिर्फ एक ही विकल्प है- या तो बिक जाओ या फिर मर जाओ.

अस्पष्ट जवाबदेही कानूनों के चलते भोपाल गैस कांड का क्या हश्र हुआ, हम सब देख ही रहे हैं. आज बालको के बहाने कम से कम कोरबा कांड पर तो बात भी हो जा रही है, वरना सिंगरौली में अगस्त में हुई औद्योगिक दुर्घटना की क्या किसी ने सुध ली? स्टरलाइट जैसी तमाम अपराध कथाओं से देश पटा पड़ा है. क्या कोई सुन रहा है?

 

20.10.2009, 02.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Manoj Pandit (pt_manoj@yahoo.com) Rajkot

 
 Dear Abhishekji,

It is good, real story. It is nice that few like you exposing even the person holding in these days at higher level. Be must there and do such wonderful job. I appreciate your courage.

Thanks & regards, Manoj Pandit
 
   
 

shrikant kale udaipur

 
 आपका लेख पढा. वेदांता समूह का चक्कर देश को किस ओर ले जायेगा, ये तो सिर्फ नेता जानते हैं क्योंकि नेता अपनी कुर्सी के लिये और वेदांता समूह अपने फायदे के लिये कुछ भी कर सकता है. 
   
 

harshbardhan ranchi

 
 आपने सच्चाई सामने लाई धन्यवाद. ऐसे राजनेता को कड़ी सजा देनी चाहिए. सेवा अब नहीं रही, सिर्फ धंधा बना दिया है. 
   
 

आलोक प्रकाश पुतुल (editor@raviwar.com)

 
 हमें खेद है कि हमारी असावधानी के कारण पत्रकार साथी अभिषेक श्रीवास्तव के खिलाफ की गई व्यक्तिगत और आपत्तिजनक टिप्पणी रविवार पर स्थान पा गई. हम यह मानकर चल रहे हैं कि इस आपत्तिजनक टिप्पणी को अब तक हज़ारों पाठक पढ़ चुके होंगे, ऐसे में इस टिप्पणी को हटाने से गलत संदेश जाता. इसलिए हमने टिप्पणी को यथावत रहने दिया है और साथी अभिषेक श्रीवास्तव का पत्र भी प्रकाशित किया है. 
   
 

अभिषेक श्रीवास्‍तव (guru.abhishek@gmail.com) दिल्‍ली

 
 एसपी सिंह जी,

मैं आपसे निजी तौर पर परिचित नहीं. मैंने रविवार पर आपकी टिप्‍पणी देखी. गुज़ारिश है कि पूरा सच जाने बगैर सार्वजनिक टिप्‍पणियां न किया करें. आपकी सूचना हेतु बताए दूं कि मैंने :-

1. 17 फरवरी 2009 से 7 मार्च 2009 तक चौथी दुनिया में काम किया था. यानी महज 20 दिन.

2. अपने 20 दिनों के काम के दौरान चौथी दुनिया ने मुझे सिर्फ 10 दिनों का पैसा दिया था. अखबार का एक मजदूर होने के नाते इस दस दिन के वेतन पर मुझे कोई वैचारिक दिक्‍कत नहीं. और बाकी के वेतन के लिए मैंने उनसे मांग भी नहीं की क्‍योंकि मेरी उसमें कोई दिलचस्‍पी नहीं रह गई थी.

3. मैं चौथी दुनिया मुरारका के नाम पर नहीं, उसकी पुरानी विरासत के नाम पर गया था. 20 दिनों में सच्‍चाई जानने के बाद मैं वहां से लौट आया और अब तक बेरोजगार हूं. आपकी सूचना के लिए वहां के ठीक बाद लिखी अपनी पोस्‍ट का लिंक दे रहा हूं जो मीडियाखबर पर छपी थी. http://www.mediakhabar.com/topicdetails.aspx?mid=35&tid=786
एक और लिंक है... http://mediayug.blogspot.com/2009/03/blog-post.html

4. इसे आप मेरी अज्ञानता भले कह सकते हैं कि पुनर्प्रकाशित चौथी दुनिया का आकलन मैंने पुरानी विरासत से कर लिया. लेकिन मुरारका को मेरा अन्‍नदाता भगवान कहने जैसा सरलीकरण न करें.

कोई भी पत्रकार अपनी विश्‍वसनीयता के सहारे ही जीता है. आलोक पुतुल जी समेत कई लोग चौथी दुनिया में मेरे काम करने की समूची प्रक्रिया के बारे में पहले से जानते हैं, लेकिन जिन्‍हें नहीं पता, वे आपकी टिप्‍पणी पढ़ कर गलत लीक पर जा सकते हैं.

हम लोग जो कुछ भी लिखते हैं, उसके पीछे जीवन की एक बुनियादी ईमानदारी होती है. क़पया सुनी-सुनाई अधूरी बातों की पुष्टि सीधे पूछ के कर लिया करें.

आपको विवेकवान समझ कर आग्रह ही कर सकता हूं, बाकी आपकी धारणा का सवाल है. आपको कोई कष्‍ट हो तो मुझसे बात भी कर सकते हैं.

सादर,
अभिषेक श्रीवास्‍तव
 
   
 

sp singh (spsingh@gmail.com) delhi

 
 पाठकों के लिए यह भी जानना जरूरी है कि इस लेख को लिखने वाले अभिषक श्रीवास्तव जी भी कभी मोरारका जी के अखबार चौथी दुनिया में बेहद अच्छे तनख्वाह में ऊंचे पोस्ट पर काम कर चुके हैं। लेकिन तब मोरारका जी अभिषेक जी के लिए अन्नदाता भगवान की तरह थे।  
   
 

ABDUL ASLAM (aslamimage@rediffmail.com) BILASPUR

 
 अभिषेक जी, वेदांता 23/9 कांड के साथ आपकी रिपोर्ट पढ़ कर अच्छा लगा. सबी मायने में कलम तो ऐसे ही चलनी चाहिए. क्या मैं आपका ईमेल जान सकता हूं. बधाई 
   
 

prashant tripathi (prashanttripathi1@indiatimes.com) delhi

 
 सच्चाई की जीत किसी भी कीमत पर होती है. स्तम्भ कोई भी हो अगर उसका आधार गलत है तो वो ज्यादा दिन तक खडा नही हो सकता. चाहे वो कितने भी पावरफुल हों. आपने इस लेख के माध्यम से जो जानकारी दी है मै उसका आभारी हूं. और इंतजार कर रहा हूं उस समय का जब सच्चाई की जीत हो. 
   
 

chandra kumar dubey (ck.2010@rediffmail.com) bilaspur

 
 अच्छी रिपोर्ट है. लगे रहिए. 
   
 

anurag (anurag9feb@gmail.com)

 
 बेहतरीन, इस का जमकर प्रचार करें.  
   
 

harsh panday (harsh_pandey07@rediffmail.com) bilaspur

 
 वेदांता की असलियत औऱ सरकारी तंत्र की नाकामी उजागर करने के लिए बधाई. देखकर अच्छा लगा कि कलम की धार अब भी कहीं तो बरकरार है. वरना अब लिखने से पहले स्याही छीन ली जाती है. 
   
 

टे च श (tcsg.hindi@gmail.com) दिल्ली

 
 मेरी परमप्रिय भाषा हिन्दी में समाचार देने के लिए धन्यवाद। चिदंबरम जैसे सफेदपोश धूर्त को अपनी करनी पर लज्जा आनी चाहिए। एलीजाबेथ के ऐसे ही प्रिय शिष्य मेरे प्यारे देश भारतवर्ष को खोखला करने में लगे हैं। हमें ऐसे हिन्दी विरोधी छद्मधारियों से सावधान रहने की आवश्यकता है। 
   
 

ashish pandey (ajaybindas08@yahoo.com) ambikapur c.g.

 
 Amazing fact give by u. Please continue searching on this topic again. Thanks for posting 
   
 

UPENDRA VAHINIPATHI (sun_bilaspur@rediffmail.com) BILASPUR CHHATISGARH

 
 आप बधाई के पात्र हैं. बहुत बढ़िया रिपोर्ट. 
   
 

mohanbhaya (mohanbhaya@gmail.com) RAIPUR

 
 Your report is good, this things happens regularly till when all live in this country know that they are INDIAN....and there work to built INDIA.. 
   
 

अरविंद शेष (arvindshesh@gmail.com) नई दिल्ली

 
 अब देखिए कि जो मामले ऊपर से देखने में बिल्कुल प्राकृतिक (अप्रश्नेय)लगती हैं, उसकी परतें कितनी वीभत्स हैं। साफ धवल चेहरे के साथ प्रवाचक आशीर्वादी मुद्रा में घूमते हमारे देश के कर्णधार किस हद तक गिरे हुए हैं। हम बड़ी आसानी से किसी मुद्दे को सुनते-पढ़ते हैं, और आगे बढ़ जाने देते हैं। लेकिन वे कितनी-कितनी त्रासद कहानियां अपने भीतर छिपाए होती हैं, यह किसकी निगाह में आ पाता है।

अभिषेक जी, आपने पहले भी बहुत बहुत सारे जालों को साफ करते हुए मुग्ध (भावुकता के कोण से कह रहा हूं)किया है, इस रिपोर्ट पर आपको तो बधाई दे सकता हूं, लेकिन अफसोस भी यहीं है कि सब कुछ सामने आने पर भी क्या सब कुछ यों ही चलता रहेगा।
 
   
 

Piyush Pant (panditpant@gmail.com) New Delhi

 
 Excellent analysis! A timely and worthy exposure of the shameless nexus between our eliet rulers and big business and their dirty game of selling out the country to transnational corporates. Such kind of raporting and analysis is the need of the time and will revive the past glory of Indian journalism. 
   
 

विजय प्रताप (pratapvijai@gmail.com) कोटा

 
 "विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और प्रेस चारों स्तंभों को खरीद कर दरअसल संदेश यही दिया जा रहा है कि पूंजी की राह में सिर्फ एक ही विकल्प है- या तो बिक जाओ या फिर मर जाओ."
पूरे देश में यही हालत हैं. खोजपूर्ण रिपोर्ट के लिए बधाई.
 
   
 

zia q

 
 आप बधाई के पात्र हैं. बहुत बढ़िया रिपोर्ट. 
   
 

vishwadeepak delhi

 
 कारपोरेट,राजनेता,न्यायपालिक और प्रेस के अदृश्य भाईचारे की कलई खोलती रिपोर्ट।  
   
 

vishwadeepak

 
 कारपोरेट, राजनेता, न्यायपालिका और प्रेस का जो अदृश्य भाईचारा है, उसकी गांठें आपने खोली हैं. इस नेक्सस को नंगा करने वाली और रिपोर्ट्स आनी चाहिए. एकदम सटीक और लाजवाब. 
   
 

shree prakash (samvadik@gmail.com) indore

 
 important information and excellent analysis! 
   
 

शिरीष मुंबई

 
 आपने बहुत बढ़िया शोध किया है. हर वाक्य अहम जानकारी और वजह के साथ आगे जाता है. आपने एक सरल और महत्वपूर्ण विश्लेषण किया है.

इस तरह से जान पड़ता है कि पूंजी की लालची ताकतों ने, अपनी व्यवस्था के ख़ास भागों में किस तरह से कब्जा जमा लिया हैं. इसके साथ-साथ इस खेल के व्यूह को भी समझने का मौका मिलता है. बालको कांड की जमीनी रपट के बाद, उस पर किया गया यह विश्लेषण पूरे समूचे चित्र को बड़े रूप में प्रस्तुत करता है. तंत्र के ऐसे ही खेल और खिलाड़ियों को पहचाने और उन्हें सार्वजनिक करने की जरूरत है. फिलहाल ऐसी ही रपट और ऐसे ही विश्लेषण की जरूरत है.
 
   
 

अविनाश (avinashonly@gmail.com) नयी दिल्‍ली

 
 व्‍यवस्‍था की कई कंटीली परतों को साफ करने वाला बहुत सटीक विश्‍लेषण। इस लेख का प्रचार करें। 
   
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