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बड़े भैया- शैलेन्द्र चौहान

संस्मरण

बड़े भैया

शैलेंद्र चौहान

बड़े भैया कुछ ऐसे बोलते मानो शहद टपकता हो, सँभल-सँभल कर धीरे-धीरे, एकदम संजीदगी से. पीपल खेड़ा गाँव के पोस्टमास्टर थे वे. उन दिनों थोड़ी बहुत ही डाक आती थी गाँव में और एक डाकख़ाने से कोई चार-पाँच गाँवों की डाक बँटती थी. चार-पाँच गाँवों की डाक एक थैले में, मुश्किल से चार-पाँच किलो वजन, बड़े भैया थैले पर लगी लाख की मोहर तोड़ते, थैले पर बँधी रस्सी खोलते , डाक निकालते और हरेक गाँव की डाक अलग-अलग करते, पीपल खेड़ा, अकलेरा, अटारीखेजड़ा, जमुआकलां, जमुआखुर्द वगैरह फिर मनीआर्डर, रजिस्ट्री वगैरह का हिसाब करते.

 

डाक छाँटते-छाँटते वे चक्की पर आटा पीसने में मगन छैंकू से बतियाते, आटा पिसाने आए गाँव वालों को उनकी और आसपास की डाक दे देते और समझाते कि “ फ़लाँ की चिट्ठी है इसे याद से दे दिओ”. बच्चे, बूढ़े और जवान सभी से वे विनम्र सहजता से बातें करते. बड़े भैया तमोली थे यानी चौरसिया यानी पान, तंबाकू, सुपारी वगैरह के व्यवसायी पर उन्होंने अपना पुश्तैनी धंधा छोड़ रखा था. वे मेरे पिता से कहते “ मजा नईं रओ अब पान-सुपारी के धंधा में जाई से चक्की डाल दई है, चार पैसा आ जात हैं.”


हम, यानी मैं, मेरी माँ और पिता बड़े भैया के मकान में एक कमरे में रहते थे. मकान के पिछले हिस्से में बड़े भैया का परिवार रहता था उनकी पत्नी, पाँच बच्चे और एक छोटा भाई, आगे की तरफ वाले कमरे में हमारा परिवार. बीच में छोटा सा ऑंगन था, ऑंगन में एक सँकरा पर पक्का कुँआ था जो अक्सर पानी निकालने के बाद लकड़ी के ढक्कन से ढ़ंक दिया जाता था. ऑंगन के बाद बरामदा, जो काफी लंबा था उसी बरामदे में बाएँ हाथ पर चक्की लगी हुई थी. उनका डाकख़ाना भी बरामदे में ही था, मैं भी उसी बरामदे में खेला करता था. मेरी उम्र तब कोई तीन और चार वर्ष के बीच रही होगी.


बहुत साफ-साफ तो सब कुछ याद नहीं पड़ता फिर भी मोटी-मोटी स्मृतियाँ मेरे मन पर किसी स्थिर चित्र की तरह अंकित हैं. ये स्मृतियाँ बहुत दिनों तक चमकते हुए चित्र की तरह रहीं पर वक्त की धूल ने धीरे-धीरे इन्हें मध्दम बना दिया. रोज दस ग्यारह बजे के लगभग मैं बड़े भैया को डाक छाँटते देखा करता, शायद उस वक्त तक डाक का थैला उनके पास पहुँच जाता था. डाक का थैला लाने वाले को भी मैं पहचानने लगा था, वह एक दुबला पतला व्यक्ति था, उम्र उसकी हद से हद पच्चीस-छब्बीस रही होगी.

 

वह पहले थैला रखता फिर मनीआर्डर फार्म और पैसे देता फिर रजिस्ट्री. बड़े भैया मनीआर्डर के पैसे गिनकर और रजिस्ट्री देखकर एक कागज पर दस्तख़त करते तब वह डाक लाने वाला नमस्ते करके चल जाता. मुझे बड़े भैया का डाक छाँटना बहुत अच्छा लगता था. इसका कारण था डाक में चिट्ठियों के साथ कुछ चित्रों वाले पैंफलेट भी आते या चार-आठ पेज की छोटी साइज की पुस्तिका जैसी चीज होती जिनके पीछे वाले पन्नों पर घड़ियों के श्वेत श्याम चित्र छपे होते थे. घड़ियों के वे फोटो मुझे बहुत आकर्षित करते थे. हाथ घड़ी मेरे लिए बहुत बड़े आकर्षण की चीज थी. कभी-कभी बड़े भैया ऐसा एकाध पैंफलेट या पुस्तिका मुझे पकड़ा देते, तब मेरी प्रसन्नता का ठिकाना न रहता. घड़ियों के फोटो मेरे लिए बहुत ही आनंद की वस्तु होते, मैं उन्हें लिए-लिए घूमता, बार-बार देखता और घड़ी करके कमीज या निक्कर की जेब में रखे रहता. दो एक दिन तक मेरा पूरा ध्यान उन्हीं चित्रों पर लगा रहता.

 

कभी-कभी बड़े भैया मुझे एक-दो पैसे देने की भी कोशिश करते पर उन दिनों एक तो मैं पैसे का कोई महत्व नहीं समझता था, दूसरे माँ ने किसी से भी पैसे या खाने-पीने की कोई चीज लेने के लिए एकदम मना किया हुआ था और इसे एक खराब आदत बताया था सो मैं पैसे लेने से एकदम मना कर देता और उनसे दूर भाग जाता. तब हारकर बड़े भैया मीठी गोलियाँ ले आते और मेरी जेब में यह कह कर ठूँस देते कि 'माँ कुछ नहीं कहेगी, मैं माँ को बोल दूँगा'. बड़े भैया की दी हुई गोलियों से मैं बहुत खुश न होता. मैं वे गोलियाँ ले जाकर माँ को दिखाता, माँ यह तो अवश्य कहतीं कि तुमने क्यों ले ली पर बड़े भैया का वह बेहद सम्मान करतीं सो डाँटती नहीं थीं. हाँ किसी और से कुछ न लेने की ताकीद अवश्य कर देतीं. आगे पढ़ें

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Shikhar Jain(shikhar60@aol.com)

 
 Shailendra Chauhan un kuchh gine chune hindi lekhakon me se hain jo apani zameen aur zadon se bahut shiddat se jude hain varana kise aaj phurasat hai ki kisi Bade_bhaiya ko yaad kare. 
   
 

Suraj Paliwal(surajpaliwal@gmail.com)

 
 Yah ek bahut achchha jaatiya samsamaran hai. Shailendra ne apane bachapan ke gramya privesh ko bahut sadhe hue dhang se jeevant kar diya hai. Lekhak aur aap ko is hetu badhaee. Aise samsamaran aur tippaniyan chhapate rahen. 
   
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