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भगत सिंह के बारे में कुछ अनदेखे तथ्य

बहस

 

भगत सिंह के बारे में कुछ अनदेखे तथ्य

कनक तिवारी



मैं भगतसिंह के बारे में कुछ भी कहने के लिए अधिकृत व्यक्ति नहीं हूं. लेकिन एक साधारण आदमी होने के नाते मैं ही अधिकृत व्यक्ति हूं, क्योंकि भगतसिंह के बारे में अगर हम साधारण लोग गम्भीरतापूर्वक बात नहीं करेंगे तो और कौन करेगा. मैं किसी भावुकता या तार्किक जंजाल की वजह से भगतसिंह के व्यक्तित्व को समझने की कोशिश कभी नहीं करता. इतिहास और भूगोल, सामाजिक परिस्थितियों और तमाम बड़ी उन ताकतों की, जिनकी वजह से भगतसिंह का हम मूल्यांकन करते हैं, अनदेखी करके भगतसिंह को देखना मुनासिब नहीं होगा.

भगत सिंह

 
पहली बात यह कि कि दुनिया के इतिहास में 24 वर्ष की उम्र भी जिसको नसीब नहीं हो, भगतसिंह से बड़ा बुद्धिजीवी कोई हुआ है? भगतसिंह का यह चेहरा जिसमें उनके हाथ में एक किताब हो-चाहे कार्ल मार्क्स की दास कैपिटल, तुर्गनेव या गोर्की या चार्ल्स डिकेन्स का कोई उपन्यास, अप्टान सिन्क्लेयर या टैगोर की कोई किताब-ऐसा उनका चित्र नौजवान पीढ़ी के सामने प्रचारित करने का कोई भी कर्म हिन्दुस्तान में सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों सहित भगतसिंह के प्रशंसक-परिवार ने भी लेकिन नहीं किया. भगतसिंह की यही असली पहचान है.

भगतसिंह की उम्र का कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति क्या भारतीय राजनीति का धूमकेतु बन पाया? महात्मा गांधी भी नहीं, विवेकानन्द भी नहीं. औरों की तो बात ही छोड़ दें. पूरी दुनिया में भगतसिंह से कम उम्र में किताबें पढ़कर अपने मौलिक विचारों का प्रवर्तन करने की कोशिश किसी ने नहीं की. लेकिन भगतसिंह का यही चेहरा सबसे अप्रचारित है. इस उज्जवल चेहरे की तरफ वे लोग भी ध्यान नहीं देते जो सरस्वती के गोत्र के हैं. वे तक भगतसिंह को सबसे बड़ा बुद्धिजीवी कहने में हिचकते हैं.

दूसरी शिकायत मुझे खासकर हिन्दी के लेखकों से है. 17 वर्ष की उम्र में भगतसिंह को एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता में 'पंजाब में भाषा और लिपि की समस्या' विषय पर 'मतवाला' नाम के कलकत्ता से छपने वाली पत्रिका के लेख पर 50 रुपए का प्रथम पुरस्कार मिला था. भगतसिंह ने 1924 में लिखा था कि पंजाबी भाषा की लिपि गुरुमुखी नहीं देवनागरी होनी चाहिए.

यह आज तक हिन्दी के किसी भी लेखक-सम्मेलन ने ऐसा कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया है. आज तक हिन्दी के किसी भी बड़े लेखकीय सम्मेलन में भगतसिंह के इस बड़े इरादे को लेकर कोई धन्यवाद प्रस्ताव पारित नहीं किया गया है. उनकी इस स्मृति में भाषायी समरसता का कोई पुरस्कार स्थापित नहीं किया गया. इसके बाद भी हम भगतसिंह का शहादत दिवस मनाते हैं. भगतसिंह की जय बोलते हैं. हम उनके रास्ते पर चलना नहीं चाहते. मैं तो लोहिया के शब्दों में कहूंगा कि रवीन्द्रनाथ टेगौर से भी मुझे शिकायत है कि आपको नोबेल पुरस्कार भले मिल गया हो. लेकिन 'गीतांजलि' तो आपने बांग्ला भाषा और लिपि में ही लिखी. एक कवि को अपनी मातृभाषा में रचना करने का अधिकार है लेकिन भारत के पाठकों को, भारत के नागरिकों को, मुझ जैसे नाचीज व्यक्ति को इतिहास के इस पड़ाव पर खड़े होकर यह भी कहने का अधिकार है कि आप हमारे सबसे बड़े बौद्धिक नेता हैं. लेकिन भारत की देवनागरी लिपि में लिखने में आपको क्या दिक्कत होती.

मैं लोहिया के शब्दों में महात्मा गांधी से भी शिकायत करूंगा कि 'हिन्द स्वराज' नाम की आपने अमर कृति 1909 में लिखी वह अपनी मातृभाषा गुजराती में लिखी. लेकिन उसे आप देवनागरी लिपि में भी लिख सकते थे. जो काम गांधी और टैगोर नहीं कर सके. जो काम हिन्दी के लेखक ठीक से करते नहीं हैं. उस पर साहसपूर्वक बात तक नहीं करते हैं. सन् 2009 में भी बात नहीं करते हैं. भगतसिंह जैसे 17 साल के तरुण ने हिन्दुस्तान के इतिहास को रोशनी दी है. उनके ज्ञान-पक्ष की तरफ हम पूरी तौर से अज्ञान बने हैं. फिर भी भगतसिंह की जय बोलने में हमारा कोई मुकाबला नहीं है.

तीसरी बात यह है कि भगतसिंह जिज्ञासु विचारक थे, क्लासिकल विचारक नहीं. 23 साल की उम्र का एक नौजवान स्थापनाएं करके चला जाये-ऐसी संभावना भी नहीं हो सकती. भगतसिंह तो विकासशील थे. बन रहे थे. उभर रहे थे. अपने अंतत: तक नहीं पहुंचे थे. हिन्दुस्तान के इतिहास में भगतसिंह एक बहुत बड़ी घटना थे. भगतसिंह को इतिहास और भूगोल के खांचे से निकलकर अगर हम मूल्यांकन करें और भगतसिंह को इतिहास और भूगोल के संदर्भ में रखकर अगर हम विवेचित करें, तो दो अलग अलग निर्णय निकलते हैं.

मान लें भगतसिंह 1980 में पैदा हुए होते और 20 वर्ष में बीसवीं सदी चली जाती. उसके बाद 2003 में उनकी हत्या कर दी गई होती. उन्हें शहादत मिल गई होती. तो भगतसिंह का कैसा मूल्यांकन होता. भगतसिंह 1907 में पैदा हुए और 1931 में हमारे बीच से चले गये. ऐसे भगतसिंह का मूल्यांकन कैसा होना चाहिए.

भगतसिंह एक ऐसे परिवार में पैदा हुए थे जो राष्ट्रवादी और देशभक्त परिवार था. वे किसी वणिक या तानाशाह के परिवार में पैदा नहीं हुए थे. मनुष्य के विकास में उसके परिवार, मां बाप की परवरिश, चाचा और औरों की भूमिका होती है. भगतसिंह के चाचा अजीत सिंह एक विचारक थे, लेखक थे, देशभक्त नागरिक थे. उनके पिता खुद एक बड़े देशभक्त नागरिक थे. उनका भगतसिंह के जीवन पर असर पड़ा. लाला छबीलदास जैसे पुस्तकालय के प्रभारी से मिली किताबें भगतसिंह ने दीमक की तरह चाटीं. वे कहते हैं कि भगतसिंह किताबों को पढ़ता नहीं था. वह तो निगलता था.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

JAIDEEP SINGH (jaideepforever1988@gmail.com) BARABANKI

 
 U R GREAT MR. KANAK, THANKS FOR TELLING US ABOUT BHAGHAT SINGH. BHAGHAT SINGH IS GREAT.... 
   
 

sandeep aggarwal () new delhi

 
 कनक जी ये भगत सिंह के जीवन का अछूता पहलु है. हम लोग आज भी इस भगत सिंह को एक क्रन्तिकारी के रूप में याद करते हैं पर ये भूल जाते हैं कि उनके जैसा विचारक, समाज का हित चिन्तक ही था जिसने गाँधी जी के विचारों से ऊपर उठकर पूर्ण स्वराज्य का नारा दिया. देश के युवा आज भी उन्हें अपना आदर्श मानते हैं. 
   
 

shyam yadav (sfigwalior@gmail.com) Gwalior

 
 दुनिया के मजदूरों एक हो, आज भी इस नारे की आवश्यकता है. 
   
 

Anand Matanhail (anand.punia@yahoo.com) Jhajjar(Haryana)

 
 Bhagt Singh were great will be and are.Those are also great who thought about the heroes of nation deeply and heartily. 
   
 

alok (writeralok@gmail.com) Mumbai

 
 भगत सिंह के बारे में अब तक लिखा हुआ यह सबसे बेहतरीन लेख था. आपको हार्दिक बधाई. 
   
 

RAJ YADAV (jarwalraj.1987@gmail.com) BEHROR

 
 कनक जी के आभारी हैं, जो उन्होंने देश की आन और शान भगत सिंह जी के बारे में बताया. मुझे बड़ा दुःख हो रहा कि कॉमनवेल्थ गेम के चक्कर में सरकार ने इस महान शक्ति को भुला दिया. 
   
 

Raj Aaryan (raj.aryan01@yahoo.com) Bhagalpur, Bihar

 
 I love shsheed e aajam more than my life. But other big names of that time who changed the equation badly of modern India. & now this is time to change. Inqulab alive forever !! 
   
 

Dr Sanjay Tyagi (drsanjaytyagi@mail.com) Bijnor

 
 कनक जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद युवा पीढी को नींद से जगाने के लिये आप जैसे लेखक की आवश्यक्ता है  
   
 

avinash kumar deepak (avideep0326@gmail.com) jamshedpur

 
 देश में फिर से क्रांति होगी. इंतजार करें. 
   
 

डॉ.चन्द्रकुमार जैन (chandrakumarjain@gmail.com) राजनांदगाँव

 
 आपने शहीदे आज़म भगतसिंह के जीवन के कई अनछुए पहलुओं को जानने व समझने की ज़रुरत पर तर्क सिद्ध विवेचन किया है. दरअसल इतिहास के पाठों की एकरस आवृत्ति की आदी हो चुकी पीढ़ी को ऐसे ही मार्गदर्शन की दरकार है, पर सोचने पर सोचने का दौर न जाने क्यों सिमटता-सा जा रहा है... बहरहाल आपने भगतसिंह के बरअक्स दीगर बहुत से सवाल उठाये हैं...जिनमें
किसी इतिहास सिद्ध व्यक्तित्व के व्यापक मूल्यांकन के सार्थक संकेत-सूत्र भी समाहित हैं.
 
   
 

Vivek (pansare.v@gmail.com)

 
 इंकलाब जिंदाबाद था, है और रहेगा. 
   
 

VIKESH (bikeshsingh555@gmail.com) VARANASI

 
 आपने जो लिखा है वो काबिले तारीफ है सब गांधी जी को याद करते है लेकिन जो देश की युवाओ की आवाज़ बने उनकी जयन्ती तक किसी को याद नहीं. 
   
 

अनुराग (anuraag.arora@gmail.com) खुर्जा

 
 बहुत बहुत धन्वाद आपका कनक जी आपके द्वारा दी गयी जानकारी जन जन को पहुँचनी चाहिये. मैं अपने सभी मित्रों और संबंधियों को इस जानकारी से अवगत कराउँगा.

 
   
 

K.S BRAR (kulvinderbrar92@yahoo.com) PILIBANGAN

 
 कनक जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया, कि आपने हमें भगत सिंह जी के इस पहलू के बारे में बताया. आज के युवाओं को इसकी बहुत ज़रूरत है. 
   
 

nishant raghav (nragahv@gamail.com) noida

 
 प्रयास अच्छा है, बशर्ते एक बार फिर से अलख जगाई जाए, जिससे नवविचारो का आदान-प्रदान हो और राष्ट्र की बेहतरी की बात हो, जात-पात, क्षेत्र से उठकर सभी सबसे पहले राष्ट्र की बात करें. कुछ ऐसा करे यही शहीद-ए-आज़म को श्रद्धांजलि होगी.

उन्होंने देवनागरी लिपि की बात भी देश को जोड़ने के लिए की थी. उनका अभिप्राय सबको एक मंच पर लाना और सभी के विचारो को अपनी राष्ट्रभाषा में सब तक पहुचना था,लेकिन अफ़सोस है की अब भी कुछ जाहिल भाषा और क्षेत्र में फंसे है और उन्हें अपना हीरो बताते है. खैर कनक जी आप बधाई के पात्र है..
 
   
 

J.M.Rai (jmrai.mech@gmail.com) Mahudi,Gandhinagar

 
 I feel very proud of Sahide Azam Sardar Bhagat Singh,Who had daring to throw bomb in assembly central hall.I have visited that place in parliament & feel proud.I will again give our sincere Namaste to our beloved freedom fighter.I will remember always & feel all peoples of country will remember him with great proud. 
   
 

mahendra (mahendra.jangir85@yahoo.in) jaipur

 
 भगत सिंह आज होते तो देश सफल होता. जितना भ्रष्टाचार है, वह नहीं होता. 
   
 

hemant (haaher@gmail.com) nashik

 
 इंकलाब जिंदाबाद था, है और रहेगा. 
   
 

raman sharma (raman_sharma31@rediffmail.com) Noida

 
 Thanks, to see more about bhagat singh ji. He is my hero. 
   
 

nahar rana (naharran@gmail.com) ambala

 
 इंकलाब जिंदाबाद "जय भगत" काश आप आज भी होते. 
   
 

Sandeep (rathi4100@gmail.com) Rohtak

 
 Thank you आपके इन विचारों के लिए. 
   
 

Digrajsinh (digrajsinh@yahoo.com) Gujarat(India)

 
 भगतसिंह के विचार आज भी कई युवाओ के दिल में दबे है ज़रूरत है उन्हें बहार निकलने की.
आओ सब मिल के भगतसिंह के विचार दुनिया भर में फैलाये, मैं मानता हूँ की विचारो को फ़ैलाने के मीडिया सबसे अहम् भूमिका अदा करता है, आओ कुछ न कुछ भगतसिंह के बारे में लिखते रहे. "भगतसिंह अमर रहो"
 
   
 

Mona Khare (kharemona@rediffmail.com) Harda, M.P. India

 
 आपके लेख के लिये हार्दिक शुभकामनाएं. आपने हमें भगत सिंह जी के नये पहलू से अवगत कराया. बहुत-बहुत धन्यवाद. हम भारतीयों की आंखें खोलना बहुत जरुरी है. भविष्य में भी आपसे इसी तरह से भारतीयता से ओतप्रोत लेखों की उम्मीद रहेगी. 
   
 

Raktim asansol

 
 But why should all indian accept debnagari script.When we bengali for many centuries already have our bengali script.the south indian people have there very original dravidian script.Then why accept debanagari.This would be nothing but hindi colonialism. 
   
 

Dr Suresh Kumar Delhi

 
 This the good beginning to share the sacrifices of our freedom fighters with young generations. The youth need to know the real meaning of independence and pay respect to our martyrs accordingly.  
   
 

Dr. JaiGopal Sharma Delhi

 
 बेबाक लेख....शहीद-ए-आज़म को शत शत नमन...मै भगत सिंह जी को अपना आदर्श मानता हूँ काफ़ी अमर शहीद का साहित्य भी पढ़ा है पर लेख आँखें खोलने वाला है..लेखक को कोटिश बधाई... जय हिंद .. 
   
 

Durgesh Thakur (shatabditimes@rediffmail.com) Kawardha(Chhattisgarh)

 
 कनक जी, भगतसिंह पर आपका लेख पढ़ कर अच्‍छा लगा। बेहतर लेख है एक नए तथ्‍य की ओर आपने ध्‍यान दिलाया है। बहुत-बहुत बधाई. 
   
 

pran sharma (sharmapran4@gmail.com) coventry,uk

 
 माना कि सरदार भगत सिंह ऐसी क्रांति कर गए जिसको भुलाया नहीं जा सकता लेकिन असेंबली में बम धमाका करने के बाद अपने आप को पकड़वाना उनकी रिपब्लिकन पार्टी के लिए घातक साबित हुआ. भगत सिंह का अपने आप को पकड़वाना क्या गांधीवादी फिलॉसफी का प्रभाव नहीं था? क्या लेखक महोदय इस पर प्रकाश डालेंगे? 
   
 

अशोक कुमार पाण्डेय (ashokk34@gmail.com) ग्वालियर

 
 भगत सिंह सच्चे क्रांतिकारी थे. इतना सब उन्होंने दिमाग बडा करने नहीं दुनिया बदलने के लिये लिखा था.
 
   
 

Arvind pant (pantarvind71@yahoo.com) joshimath [chamoli] uttrakhand

 
 कनक जी, शहीद-ए-आज़म भगत सिंह भारतीय इतिहास ही नहीं संपूर्ण विश्व के क्रांतिकारी दस्तावेज़ हैं. उन्हें किसी सरकारी और गैर-सरकारी प्रायोजित पुरस्कार और नाम की आवश्यकता नहीं है. वे संपूर्ण संवेदन दिलों में आज भी धड़कते हैं. आपका लेख उसकी प्रतिध्वनि है. 
   
 

नागेन्द्र शर्मा (nsarma40@gmail.com) गोलाघाट 785621 असम

 
 कनकजी, आपने भगत सिंह के जीवन के जिस पहलू पर प्रकाश डाला है वह नितांत मौलिक है। इस ओर किसी का भी ध्यान नही गया। इसी तरह हर बार नया कुछ देते रहें यही कामना है। 
   
 

Rajesh C. Bali (bilsbali@yahoo.com) Jalandhar

 
 Sir, I hardly read Hindi articles but this one was marvelous. It was full of Bhagat Singh's that thinking which very few people might be aware of.

Thank you Tiwari ji for enlightening me about this great martyr and many others like me who know Bhagat Singh ji by books only.

Regards
Rajesh Bali
 
   
 

radha (radhavin2006@gmail.com) r.k.puram new delhi

 
 बहुत ही अच्छा लेख है. लेखक को बहुत-बहुत बधाई. 
   
 

जय सिंह (singhjaisingh@gmail.com) दिल्‍ली

 
 कनक जी, भगतसिंह पर आपका लेख पढ़ कर अच्‍छा लगा। भगतसिंह के विचारों को नई परिस्थितियों में समझकर उसपर अमल करने का एक प्रयास हम नौजवान भारत सभा नामके संगठन के माध्‍यम से कर रहे हैं। शहीद भगतसिहं और उनके साथियों के वास्‍तविक विचारों और सपनों को जन-जन तक पहुंचाने के प्रयास में कई पुस्‍तकें और पर्चे प्रकाशित किए हैं और झोलों में रखकर गॉंवों और शहरों के लोगों के बीच उनका वितरण किया है। इसके अलावा नौजवान भारत सभी सृजनात्‍मक कामों में भी संलग्‍न रहती है और मजदूरों, नौजवानों और आम नागरिकों के आंदोलनों में शिरकत भी करती है। नीचे मैं कुछ लिंक दे रहा हूं जहां आप हमारे विचार, हमारे द्वारा प्रकाशित पुस्‍तकें और हमारे कामों, योजनाओं के बारे में जान सकते हैं। मुझे पूरी उम्‍मीद है कि हम किसी न किसी काम में साझीदार हो सकते हैं। कृपया एक बार हमारा विचार जरूर पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएं। शहीद भगतसिंह और उनके साथियों के विचारों और सपनों के प्रचार-प्रचार के लिए नौजवानों द्वारा चलाई जाने वाली एक देशव्‍यापी यात्रा : http://smritisankalp.blogspot.com. भगतसिंह और उनके साथियों के सम्‍पूर्ण उपलब्‍ध दस्‍तावेज, भगतसिंह की जेल नोटबुक सहित अन्‍य क्रान्तिकारी साहित्‍य के लिए : http://janchetnaa.blogspot.com/ देखें। आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा। 
   
 

laxminarainsharma (laxminarain.sharma@yahoo.com) kotputli (jaipur-Rajasthan)

 
 लेख वास्तविक है. बेबाक विचार हैं और भारतीयता की झलक साफ दिखाई गई है. आंखें खोलने के लिए ऑपरेशन की आवश्यकता है. लेख के लिए हार्दिक शुभकामनाएं. आशा है आप भविष्य में भी ऐसे ही लेख लिखेंगे. रविवार को भी हार्दिक धन्यवाद. 
   
 

हरियश राय (hariyashrai@gmail.com) अइहमदाबद

 
 बेहतर लेख है एक नए तथ्‍य की ओर आपने ध्‍यान दिलाया. हरियश राय 
   
 

mihirgoswami (mgmihirgoswami@gmail.com) bilaspur c.g

 
 आपने स्वयं लिखा है कि आप निराश लोगों में से एक हैं. आपने भगतसिंह जी से लेकर आज तक अपने सारे विचार लिखे. जब कभी आशा औऱ उम्मीद की किरण आई तब आप भारत की जनसंख्या नियंत्रण और रोजगारन्मुखी शिक्षा के विषय में अपने विचार जो कार्यान्वित हो सके लिखेंगे. 
   
 

mini aligarh

 
 कनक जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया, कि आपने हमें भगत सिंह जी के इस पहलू के बारे में बताया. आज के युवाओं को इसकी बहुत ज़रूरत है. 
   
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