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शिक्षा को बाजारू मत बनाइए

मुद्दा

 

शिक्षा को बाजारू मत बनाइए

संदीप पांडे

 

नौ अक्टूबर, 2009, को सैम पित्रोदा ने शिकागो में आईआईटी के पूर्व छात्रों के एक सम्मेलन में यह बताया कि भारत सरकार उच्च शिक्षा पर एक विधेयक ला रही है. इस सम्मेलन में उच्च शिक्षा राज्यमंत्री सुश्री पुरंदेश्वरी मुख्य अतिथि के रूप में शरीक हुईं. आईआईटी के हजारों पूर्व छात्र, जिनमें से आज कई ऊंचे पदों पर या निजी कम्पनियों के मालिक हैं, विभिन्न आईआईटी के निदेशक वगैरह सम्मेलन में भाग लेने पहुंचे थे.

 

सैम पित्रोदा ने बताया कि भारत जल्दी ही अपने विश्वविद्यालयों की संख्या 400 से बढ़ाकर 1500 करने वाला है, 30 नए केन्द्रीय विश्वविद्यालय, आठ नए आईआईटी और 14 नए सृजनात्मक विश्वविद्यालय, जिसमें से हरेक अलग विषय पर केन्द्रित रहेगा, शुरू करने जा रहा है. उन्होंने बताया कि सरकार के अलावा निजी-सार्वजनिक भागीदारी के माध्यम से भी इस क्षेत्र में कुछ पूंजी निवेश होगा. शायद सरकार शिक्षा को भी अर्थव्यवस्था के एक क्षेत्र की तरह से देख रही है और उसके बाजारीकरण के रास्ते खोल रही है. कपिल सिब्बल ने तो कह ही दिया है कि वे शिक्षा के क्षेत्र में वह कर के दिखाएंगे, जो मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में हासिल किया है.

आप भारत के किसी भी शहर में चले जाइए तो शहर से किसी भी दिशा में बाहर निकलने के मार्ग के दोनों तरफ तमाम निजी प्रौद्योगिकी, प्रबंधन, चिकित्सा, खासकर दंत विज्ञान, के संस्थान कुकरमुत्तों की तरह खुल गए हैं. यदि इनमें पढ़ने व पढ़ाने वालों से साक्षात्कार हो जाए तो हम सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि कहीं हमने शिक्षा की मौलिक अवधारणा से ही तो कोई समझौता नहीं कर लिया है? एक जमाना था जब इस देश में मदनमोहन मालवीय या सर सैयद अहमद जैसे ज्ञानी लोग उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना किया करते थे.

अब तो ईंट-भट्ठा मालिक व निर्माण का काम करने वाले ठेकेदार, जिनकी खुद की कोई शैक्षणिक योग्यता नहीं है, शिक्षण संस्थाओं की नींव डाल रहे हैं. इसलिए नहीं कि उनकी शिक्षा को लेकर कोई दृष्टि है, बल्कि वे विशुद्ध रूप से शिक्षा के व्यवसाय को एक दुधारू गाय के रूप में देख रहे हैं. यह ऐसा धंधा है, जिसमें नुकसान का तो कोई खतरा नहीं, सिर्फ फायदा ही फायदा है. कई संस्थान तो सीधे-सीधे राजनेताओं के हैं, जो इन्हें अपनी राजनीति के वित्तपोषण के लिए इस्तेमाल करते हैं. जब पहले से स्थापित आईआईटी में पढ़ाने वाले प्रोफेसरों की संख्या में 20 प्रतिशत की कमी है तो हम कैसे उम्मीद करते हैं कि इन निजी शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ाने वाले आसानी से मिल जाएंगे?

भारत में सिर्फ नौ प्रतिशत बच्चों उच्च शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश कर पाते हैं. असल में भारत के कुल 19 करोड़ बच्चों में से मात्र चार करोड़ ही ऐसे विद्यालयों में जा पाते हैं, जिनमें शिक्षा का स्तर कुछ ठीक है. इनमें से अधिकांश विद्यालय निजी हैं. शेष बच्चों या तो शिक्षा व्यवस्था के ही बाहर हैं क्योंकि वे बाल दासता के शिकार हैं अथवा वे ऐसे सरकारी विद्यालयों में जाते हैं, जहां शिक्षक पढ़ाते ही नहीं. ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार को भारत के अधिकांश गरीब बच्चों की शिक्षा की कोई फिक्र ही नहीं है. या यह भय है कि सब बच्चों उच्च शिक्षा हासिल करेंगे तो वह सभी शिक्षितों को रोजगार कहां से मुहैया कराएगी? यह बात ध्यान देने योग्य है कि बेरोजगार सिर्फ शिक्षित ही कहलाता है.

हालात कितने खराब हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछली उत्तर प्रदेश सरकार ने बेरोजगारी भत्ता तय किया था 500 रु़ और पिछले विधानसभा चुनावों में मुलायम सिंह यादव का महत्वपूर्ण चुनावी वायदा था बेरोजगारी भत्ते को दोगुना करने का. एक बड़ी संख्या में बेरोजगार आपराधिक, आतंकवादी व नक्सलवादी संगठनों में शामिल होने के लिए आसानी से उपलब्ध हो सकते हैं. अत: सरकार ने अपरोक्ष रूप से यह तय किया है कि वह अपने बच्चों को अशिक्षित या कम शिक्षित ही रखेगी ताकि बड़ी संख्या में बेरोजगार उसके लिए समस्या बन कर खड़े न हो जाएं.

वर्तमान समय में देश में जितने उच्च शिक्षा संस्थान हैं, उनकी क्षमता से पढ़ने वालों की संख्या कम है.

 

प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था को मजबूत करके ही एक जीवंत उच्च शिक्षा के कार्यक्रम की कल्पना की जा सकती हैं. एक सुदृढ़ इमारत के लिए मजबूत नींव जरूरी है.

सरकार यदि अपनी घोषणानुसार उच्च शिक्षा क्षेत्र में विस्तार करती है तो अहम सवाल यह है कि इन संस्थानों में पढ़ने व पढ़ाने वाले कहां से आएंगे? अमेरिका में भी उच्च शिक्षा में वहां के नागरिक रुचि नहीं लेते. इसलिए वह चीन, ताईवान, दक्षिण कोरिया, भारत, आदि, तीसरी दुनिया के देशों के छात्रों को उच्च शिक्षा के कार्यक्रमों में वजीफे के साथ अपने निजी विश्वविद्यालयों में दाखिला देता है. किन्तु इन विश्वविद्यालयों में छात्रों को आकर्षित करने के लिए इन निजी संस्थानों की उच्च गुणवत्ता बना कर रखी गई है. भारत के अधिकांश शैक्षणिक संस्थानों की गुणवत्ता ऐसी नहीं है कि हम विदेशी छात्रों को ही आकर्षित कर इन संस्थानों की क्षमता का पूरा उपयोग कर सकें.

जब तक हम अपनी प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त नहीं करते तथा सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया नहीं कराते, हमारे उच्च शिक्षा के कार्यक्रम का विस्तार नहीं हो सकता. इस दिशा में हाल ही में पारित नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम से भी कोई उम्मीद दिखाई नहीं पड़ती. केन्द्र की सभी सरकारों ने 1968 की कोठारी आयोग की सिफारिश कि इस देश में समान शिक्षा प्रणाली लागू हो, जिसमें पड़ोस के विद्यालय की एक अंतर्निहित अवधारण है तथा शिक्षा का बजट सकल घरेलू उत्पाद का 3.5 प्रतिशत से बढ़ा कर छह प्रतिशत किया जाए को लगातार नकारा है. जिसकी वजह से देश में दो किस्म की शिक्षा की व्यवस्था है - एक गरीबों के बच्चों के लिए तथा दूसरी अमीरों के बच्चों के लिए.

इन सिफारिशों को लागू करना एक राजनीतिक निर्णय होगा, जिसका शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा देने वाली शक्तियों ने हमेशा विरोध किया है. हमें इसके लिए संसाधन खड़े करने पड़ेंगे. यदि देश में ढ़ांचागत क्षेत्र और सभी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर पूंजीनिवेश हो रहा है तो सवाल यह उठता है कि प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में क्यों नहीं? जरूरत पड़ने पर शिक्षा के राष्ट्रीयकरण पर भी विचार किया जाना चाहिए ताकि सभी बच्चों को एक जैसी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके. एक लोकतंत्र जिसमें सरकार एक समतामूलक समाज की स्थापना हेतु संकल्पबद्घ हो इतनी तो उसकी बच्चों के प्रति जिम्मेदारी बनती है.

प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था को मजबूत करके ही हम एक जीवंत उच्च शिक्षा के कार्यक्रम की कल्पना भी कर सकते हैं. एक सुदृढ़ इमारत के लिए मजबूत नींव जरूरी है.

 

12.11.2009, 10.07(GMT+05:30) पर प्रकाशित

सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Durgesh Thakur (shatabditimes@rediffmail.com) Kawardha

 
 बहुत ही अच्छा लेख है, मेरी शुभकामनाएं. 
   
 

siddhartha () gorakhpur

 
 बहुत ही अच्छा लेख है, मेरी शुभकामनाएं. 
   
 

sumit sharma (sumit.yaas@gmai.com) bilaspur

 
 प्राथमिक स्तर में शिक्षा बिल्कुल ही खराब है, जिसकी एक वज़ह हैं पुरानी सोच रखने वाले शिक्षक, जो नई चीज़ों को ग्रहण नहीं कर पाते. इसी वजह MGML पूरी तरह से फेल हो गया.  
   
 

vivek sanyal (vvksanyal@gmail.com) Mumbai

 
 भारत की सबसे ज्यादा सदस्यता वाली स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) ने 1988 से नई शिक्षा नीति के विरुद्ध संघर्ष शुरु किया था और शिक्षा को बुनियादी अधिकार में शामिल करने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी, जो कि 2008 में साकार हुई और शिक्षा को बुनियादी अधिकार में शामिल कर लिया गया.

ऐसा ही आंदोलन सबको शिक्षा, सबको काम के लिए भी जारी है...उम्मीद करते हैं, हम कामयाब होंगे.

लेखक को जनवादी चिंतन के लिए बधाई.
 
   
 

Arvind pant (pantarvind71@yahoo.com) joshimath [chamoli] uttrakhand

 
 संदीप जी, इस देश की शिक्षा व्यवस्था दोहरे मापदंडो पर खड़ी है. एक तरफ लगभग 2 से 3% अंग्रेजी पढ़े लोग देश के भाग्यविधाता हैं और शेष शोषित. इस देश का विशान मानव संसाधन एक व्यापक क्रांति की प्रतीक्षा में चुपचाप सोया है, कि कब कोई कृष्ण बनकर हमारा उद्धार करेगा.

राजनीतिक सोच सिर्फ इस बात की है कि पूर्ववर्ती सरकारों के फैसलों को उलट कर अपनी कुंठा को तृप्त कर देना ऐसा शिक्षा के क्षेत्र में हो रहा है जबकि इसके लिए एक व्यापक दृष्टि की आवश्यकता है.
 
   
 

Vinod Dongre. Chhattisgarh

 
 शिक्षा विकास का आधारस्तम्भ है. शिक्षा के साथ इस तरह का खिलवाड़..? वाकई यह तो बेहद चिंताजनक है. क्या सचमुच देश के शीर्षस्थ लोग और देश को चलाने वाली शक्तियां नहीं चाहती कि देश के सभी लोग शिक्षित हों..? 
   
 

sunita thakur delhi

 
 Very nice article. But it would be more useful if we can talk about the education values and the education results on todays generation.
 
   
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