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एक मास्टर, जो गुरु भी है गोविंद भी...

मिसाल-बेमिसाल

 

एक मास्टर, जो गुरु भी है गोविंद भी...

संदीप कुमार, बगोदर, झारखंड से लौटकर


बहुत दूर से ऐसा नजारा दिखाई देता है जो निगाहों को खटकता भी है और अपनी तरफ खींचता भी है. एक पेड़ के नीचे कुछ बच्चे बैठे हैं. सामने स्लेट और कॉपी किताबें हैं. साइकिल के सहारे एक ब्लैक बोर्ड टिका हुआ है. कुछ बच्चे मास्टर साहब को घेरकर खड़े हैं. अपना होमवर्क दिखा रहे हैं. दरअसल यह एक स्कूल है जो झारखंड के एक छोटे से गांव पिपराडीह के बिरहोरटंडा में हर रोज यूं ही जमता है. आदिम जनजाति बिरहोर के कुछ परिवारों का ये एक छोटा-सा टोला गिरिडीह जिले के उग्रवाद प्रभावित बगोदर प्रखंड का एक सुदूर इलाका है. बहुत मुमकिन है देश में कई जगहों पर इसी तरह से स्कूल चल रहे होंगे. लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि जिले के शिक्षा महकमा का दावा है कि यहां एक भी स्कूल बगैर भवन के नहीं है.


पिपराडीह बिरहोरटंडा में यदि खुले में सही यह स्कूल चल रहा है और बच्चे पढ़ रहे हैं तो इसके लिए आपको शुक्रिया अदा करना चाहिए महादेव महतो का. 35 साल के महादेव महतो यहां सामुदायिक शिक्षक के तौर पर पिछले पांच सालों से अपनी सेवा दे रहे हैं. इससे पहले कुछ और लोग भी बतौर सामुदायिक शिक्षक बिरहोरटंडा पहुंचे पर न तो उनमे ऐसा जज्बा था और न धीरज. किसी को स्कूल का भवन नहीं होने की शिकायत थी तो कोई बिरहोर आदिवासियों के बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रेरित ही नहीं कर पाया.

दरअसल यहां के बिरहोरों की ये पहली पीढ़ी थी जिसे पढ़ाने की पहल हो रही थी. अनपढ़ और बेहद गरीब होने के चलते यहां के बिरहोर समुदाय में शिक्षा के प्रति तब जागृति की भी कमी थी जिसके चलते बच्चों को पढ़ाई-लिखाई के लिए प्रेरित कर पाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा था. लेकिन महादेव महतो बेहद जीवट निकले और उन्होंने बिरहोर बच्चों को पढ़ाने की चुनौती अपने हाथों में ली. वो चाहते थे कि बिरहोर बच्चे भी पढ़े-लिखें और होशियार बनें.

वाकई जो बच्चे केवल खेलने में लगे रहते थे और नेवले-खरगोश की तलाश में या फिर लकड़ी वगैरह इकट्ठा करने के लिए जंगलों में दिन-दिन भर भटका करते थे उन्हें दस बजे सुबह से शाम चार बजे तक पढ़ने के लिए बिठा पाना आसान काम नहीं था. महादेव महतो बताते हैं कि जब वो यहां पढ़ाने आने लगे तो बच्चे भाग खड़े होते थे.

दरअसल इन बच्चों के अभिभावक भी पढ़ाई-लिखाई को इतना अहम नहीं मानते थे. ऐसे में महादेव महतो ने सबसे पहले यहां के बिरहोर लोगों को समझाने की कोशिश की और फिर बच्चों से दोस्ती गांठनी शुरू की. कई महीने तो बच्चों और उनके अभिभावकों को समझाने-बुझाने में ही निकल गए. आखिरकार उन्होंने वर्ष 2004 में 15 बच्चों को लेकर पिपराडीह बिरहोरटंडा में शिक्षा गारंटी केंद्र (ईजीएस सेंटर) चलाना शुरू किया. पेड़ के नीचे ही रोज स्कूल खुलने-चलने लगा.

यह सब आसान नहीं था. महादेव महतो बताते हैं कि इन लोगों से संवाद कर पाना भी मुश्किल था क्योंकि भाषा की दिक्कत थी. बिरहोर आदिवासी संथाली बोली का इस्तेमाल करते हैं जबकि महादेव महतो को संथाली आती नहीं थी. बड़े लोग तो थोड़ी-बहुत हिंदी समझ लेते थे लेकिन बिरहोर बच्चे तो बिलकुल समझ नहीं पाते थे. ऐसे में क्षेत्रीय बोली खोरठा ने सेतू का काम किया.

खोरठा एक तरह से हिंदी का अपभ्रंश और देसी रूप था. खोरठा बोली में बिरहोर भी बात कर लेते थे और महादेव महतो भी. हालांकि बच्चों को खोरठा में भी दिक्कत हुआ करती थी क्योंकि आपसी बोलचाल में बच्चे अपने परिवार और साथियों से संथाली में ही बात करते थे. उनका हिंदी-खोरठा से वास्ता ही नहीं पड़ता था. लेकिन महादेव महतो ने खोरठा बोली के तौर पर इस मामले का हल निकाला और फिर बच्चों के साथ संवाद स्थापित करने में थोड़ी सहूलियत भी होने लगी. समझाने के लिए संथाली का इस्तेमाल किया जाता और लिखने-पढ़ने के लिए हिंदी का.

पिपराडीह से कोई तीन-चार किलोमीटर दूर कानाडीह बस्ती के बाशिंदे हैं महादेव महतो. शुरुआती दिनों में बच्चे उन्हें साइकिल से आते हुए दूर से ही देख लेते थे तो जंगल की तरफ भाग खड़े होते थे. पढ़ने के लिए बहुत जोर-जबर्दस्ती करने पर बच्चे गाली-गलौज तक कर बैठते थे. ये सब सुनाते हुए महादेव महतो पहले तो ठठाकर हंसते हैं, फिर गंभीर होकर कहते हैं- “एक समय ऐसा भी आया जब बच्चे पढ़ाई के प्रति इतने जागरूक हो गए कि रविवार के दिन भी महादेव मास्टर की राह तकने लगे. तब बच्चों को पता नहीं होता था कि दिन कौन-सा है और रविवार को छुट्टी का दिन होता है.”


बच्चों ने पढ़ना शुरू किया तो उनके गरीब अभिभावकों ने उन्हें पढ़ाने-लिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. और आज आलम ये है कि पेड़ के नीचे एक ही साथ पहली से पांचवीं क्लास लगती है और कुल 45 बच्चे तालीम हासिल कर रहे हैं. पिछले ही साल पांचवीं क्लास पास करके यहां से छह बच्चों के एक बैच ने पिपराडीह मिडिल स्कूल में दाखिला लिया है.

अपने बच्चों के प्रदर्शन से बिरहोर लोग बेहद गदगद हैं. बच्चों को पढ़ते-लिखते देख उन्हें अपनी संतानों पर गुमान भी होता है और इसके लिए वो महादेव महतो के शुक्रगुजार भी हैं. ग्राम शिक्षा समिति के अध्यक्ष जटू बिरहोर तो यहां तक कहते हैं, “महादेव महतो हमारे लिए सिर्फ मास्टर ही नहीं हैं बल्कि भगवान समान हैं.”

जटू बिरहोर की इस बात को आगे बढ़ाते हुए गिरधारी बिरहोर कहते हैं कि मास्टर साहब ने हमारे बच्चों को पढ़ने-लिखने के काबिल बनाया इसलिए हम उनके कर्जदार हैं. लेकिन उनकी बात काटते हुए महादेव महतो सिर्फ ये कहते हैं, “मैं तो सिर्फ अपना फर्ज निभा रहे हैं.”

गरीबी की वजह से महादेव महतो की पढ़ाई इंटर के बाद छूट गई थी. उन्हें खेती का पुश्तैनी धंधा संभालना पड़ा. उनकी जिंदगी की एकमात्र ख्वाहिश थी कि वो शिक्षक बनें लेकिन ना तो वे ग्रेजुएट थे और ना ही उन्होंने बीएड ही किया था. लेकिन सर्व शिक्षा अभियान के तहत जब सामुदायिक शिक्षकों के लिए चयन शुरू हुआ तो उन्होंने पिपराडीह बिरहोरटंडा में पढ़ाने के लिए आवेदन दे दिया. जब उन्होंने साल 2004 में ये आवेदन दिया तो कई लोगों ने उनका मजाक भी उड़ाया कि ‘जंगलियों’ को कैसे पढ़ाओगे.

लेकिन महादेव महतो ने साबित कर दिया कि लगन हो तो कुछ भी हो सकता है. शिक्षण को मिशन मानने वाले महादेव महतो की मेहनत रंग लाई और फिर यहां के ईजीएस सेंटर को 2006 में उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय के तौर पर अपग्रेड भी कर दिया गया. महादेव का हाथ बंटाने के लिए एक और सामुदायिक शिक्षक मुश्ताक अहमद भी आ गए. सबसे बड़ी दिक्कत स्कूल में कमरों के ना होने से थी. जब इस तरफ आरटीआई एक्टिविस्ट प्रकाश चंद्र चंदन की नजर गई तो उन्होंने इस मामले को स्थानीय विधायक और युवा नेता बिनोद सिंह के पास उठाया.

इस बीच ये पता चला है कि शिक्षा विभाग की भी आंखें खुली और अगस्त 2009 में स्कूल के भवन निर्माण के लिए ग्राम शिक्षा समिति के खाते में फंड भेज दिया गया.

महादेव महतो की ही निगरानी में पिपराडीह बिरहोरटंडा में स्कूल भवन का काम शुरू हुआ है. बनते हुए स्कूल को देखकर बच्चे बेहद उत्साहित हैं और वो महादेव मास्टर से रोज पूछते हैं कि ‘सर, कहिया नौका ई स्कूल में बैठेंगे?’ तब महादेव सर बस इतना कह पाते हैं कि थोड़ा और इंतजार करो.

 

18.11.2009, 16.34 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Durgesh Thakur (shatabditimes@rediffmail.com) Kawardha

 
 बहुत ही अच्छा लेख है, मेरी शुभकामनाएं. 
   
 

prabhu mujalde (prabhu86msw@gmail.com) dewas

 
 सर जी, आपने बहुत ही अच्छा काम किया है. इसलिए मुझे आप पर गर्व है. 
   
 

smita mugdha delhi

 
 सर, आपको बहुत बहुत बधाई.  
   
 

ramesh kumar (rk140676@gmail.com) azamgarh

 
 इस बाज़ारवाद के दौर में जब सब कुछ बाज़ार के हवाले हैं, महादेव महतो जैसे लोग सम्मान के हकदार हैं. मेरा शत शत नमन. 
   
 

vivek sanyal (vvksanyal@gmail.com) Mumbai

 
 पत्रकारिता का बेहतरीन नमूना है यह लेख. कोई इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को पढ़ाए और बताए कि असली पत्रकारिता क्या होती है. लेखक को मेहनतकश लेख के लिए कोटिशः बधाई. 
   
 

kumar krishnan (kkrishnan@gmail.com) ranchi. jharkhand

 
 तालीम की रोशनी जलाने का एक सार्थक प्रयास है. लेखक का रचनात्मक नज़रिया है. 
   
 

करुणा (karuna.tanwar@yahoo.in) दिल्ली

 
 सच में सलाम मेरी तरफ से। महादेव सर की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है और आपको भी सलाम।  
   
 

ranjeet new delhi

 
 बहुत खूब लिखा है आपने...इस तरह की बाते वही लिख सकता है, जिसने इस तरह की 16 मेले से रुबरु हुआ हो ..वाकई... 
   
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