पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

संघर्ष को रचनात्मकता देने वाले अनूठे जॉर्

पूर्वोत्तर व कश्मीर में घिरी केंद्र सरकार

भीड़ के ढांचे का सच खुल चुका

अंतिम सांसे लेता वामपंथ

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

पूर्वोत्तर व कश्मीर में घिरी केंद्र सरकार

भीड़ के ढांचे का सच खुल चुका

रिकॉर्ड फसल लेकिन किसान बेहाल

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
 पहला पन्ना > मुद्दा > छत्तीसगढ़Print | Send to Friend 

50 किलो चावल का हौसला और सहेली से ब्याह

50 किलो चावल का हौसला और सहेली से ब्याह

रविवार संवाददाता

बिलासपुर, छत्तीसगढ़ से

यह खांड़ा गांव के लिए अनूठी बात है. इस तरह का ब्याह न तो गांव वालों ने कभी देखा और न ही सुना. आख़िर दो लड़कियों के बीच भला ब्याह कैसे हो सकता है ? गांव और आसपास के इलाके में इस ब्याह को लेकर कौतुक है, उत्सुकता है, महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों की भी खुसुर-फुसुर है और इन सब के साथ थोड़े बनावटी आक्रोश के साथ एक फिसफिसाती-सी हंसी है.


छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर से लगभग 18 किलोमीटर दूर है ग्राम खांड़ा. सीपत के थानेदार कहते हैं- “ अच्छा-अच्छा खांड़ा ! वही लड़की-लड़का-लड़की वाला मामला ? ”

हम साथ-साथ हैं

उर्वशी और सरस्वती मानती हैं कि उन्होंने आपस में ब्याह करके कोई गलती नहीं की है.


थानेदार फिर विस्तार से बताते हैं कि खांड़ा की दो लड़कियों घर से भाग गईं और एक मंदिर में जा कर ब्याह रचा लिया. उनके परिजन उन्हें थाने तक लेकर आए लेकिन उन्होंने साफ कह दिया कि दोनों साथ-साथ रहेंगी.


थानेदार इसे “ लड़की-लड़का-लड़की” वाला मामला कहते हैं.


खांड़ा की गलियों में किसी अनजान आदमी को देख कर ही गांव के लोग समझ जाते हैं कि ये “ उसी ब्याह ” के सिलसिले में आए होंगे. बड़े और बच्चों की भीड़ इकट्ठी होने लग जाती है. इस ब्याह को गांव वाले किस तरह देखते हैं ?


गांव के गलियारे में पानी ले कर जाती हुई एक बुजुर्ग महिला बार-बार पूछने पर शब्दों को लगभग चबाते हुए कहती हैं- “ ये लड़कियां गांव की दूसरी लड़कियों को बिगाड़ देंगी.”


लेकिन गांव के किनारे एक तालाब के पास झोपड़ीनुमा घर में रहने वाली उर्वशी और सरस्वती ऐसा नहीं मानतीं. मांग में सिंदूर और गले में मंगलसूत्र पहने सरस्वती कहती हैं- “ हमने रतनपुर में देवता के सामने आपस में ब्याह किया है. किसी लड़के के साथ ब्याह हो सकता है तो किसी लड़की के साथ क्यों नहीं ? ”


लड़कों की तरह छोटे बाल रखने और पैंट-शर्ट पहनने वाली उर्वशी कहती हैं- “ मैं सरस्वती का पति हूं. मैं अगर इसे पत्नी के रुप में ब्याह कर लाया हूं तो किसी को क्या दिक्कत है ? ”


“ लाया हूं या लाई हूं ? ”


इस सवाल पर उर्वशी हंसने लगती है. फिर हंसते-हंसते कहती हैं- “ लाया हूं.” और फिर हंसी...!

हम साथ-साथ है
दो लड़कियों का आपस में ब्याह करने का ख्याल कैसे आया ?


उर्वशी बताती हैं कि दोनों बचपन से ही साथ-साथ पढ़ती-खेलती रही हैं. पिछले साल लगा कि उन्हें अब साथ-साथ रहना है, सो ब्याह रचा लिया. अब अपने परिवार से अलग एक कमरे वाली झोपड़ी में दोनों रहती हैं.


उर्वशी बचपन से ही लड़कों की तरह रहती आई है. लड़कों की तरह कपड़े पहनना और उनकी ही तरह बाल. चाल-ढाल और बोलने का तरीका भी लड़कों जैसा. उर्वशी को ड्राइविंग का भी शौक है. ड्राइवर के बतौर उसने कुछ जगहों में काम भी किया है. इलाके के एक नेताजी के यहां वह उनकी गाड़ी चलाया करती थी किसी लड़के के नाम से और नेता जी को कभी पता नहीं चला कि उर्वशी लड़का नहीं लड़की है. एक दिन जाने कैसे यह राज खुल गया और फिर उर्वशी ने वह नौकरी छोड़ दी.


अब उर्वशी मज़दूरी करती हैं.


लेकिन ब्याह के बाद से वह काम भी छुटा हुआ है. फिर घर कैसे चल रहा है ?


सरस्वती अपने पैर के अंगूठे से ज़मीन को खुरचती हुई कहती है- “ 50 किलो चावल ले कर आए थे. वही खा-पका रहे हैं.”


लेकिन चावल तो एक दिन खत्म होगा ही. फिर ? इसका जवाब उर्वशी देती हैं- “ नहीं पता. आगे क्या होगा .”

किस्से और भी है
छत्तीसगढ़ में समलैगिक ब्याह का यह कोई पहला मामला नहीं है. हां, इस तरह के ब्याह के भविष्य को लेकर जवाब लगभग एक जैसे हैं-“ नहीं पता. आगे क्या होगा .”


छत्तीसगढ़ में संभवतः पहला समलैंगिक ब्याह सरगुजा में ज़िला अस्पताल की नर्स तनूजा चौहान और जया वर्मा ने रचाया था. इसे देश में समारोहपूर्वक समलैंगिक विवाह का पहला मामला बताया जाता है.

 

27 मार्च 2001 को दोनों ने वैदिक रीति से विवाह किया था. पंडित जी के सामने 35 वर्षीय तनूजा ने पति के रुप में और 25 वर्षीय जया ने पत्नी के रुप में सात फेरे लिए. इस ब्याह के अवसर पर शानदार दावत दी गई थी और ब्याह को लेकर खूब हंगामा भी मचा.


दुर्ग ज़िले में तो डॉक्टर नीरा रजक और नर्स अंजनी निषाद ने समलैंगिक विवाह के लिए जिला प्रशासन को आवेदन भी दिया लेकिन ज़िला प्रशासन ने इस आवेदन को ठुकरा कर अपना पल्ला झाड़ लिया. हालांकि दोनों के जीवन पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ा.


रायगढ़ से 40 किलोमीटर दूर एक गाँव में रहने वाली 20 साल की रासमति और 13 साल की रुक्मणी ने भी ब्याह रचाया लेकिन गांव में इस पर खूब हंगामा मचा और आखिर में दोनों को अलग-अलग रहने के लिए बाध्य कर दिया गया. बाद में इनमें से एक का ब्याह भी हुआ लेकिन जल्दी ही तलाक भी हो गया.


समलैंगिक संबंधों पर अध्ययन कर रही मुंबई की गीता कुमार कहती हैं- “ भारत में इस तरह के ब्याह के मामले बढ़े हैं लेकिन उनकी सामाजिक स्वीकार्यता अभी भी शून्य है. लेकिन इसका दूसरा पहलू ये भी है कि बिना ब्याह के भी ऐसे जोड़े भारतीय समाज में रह रहे हैं और उनकी संख्या हजारों-लाखों में है.”

11.05.2008, 05.52 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

mohd.isahaq(majnoo.banjara@yahoo.com)

 
 this is opposite rule.this is not nature rule.and nature rule is perfect rulewe cant change it.so its wrong for our sociel life. 
   
 

vaishali sinha

 
 Ye koi aisi baat nahi hai jis par etna hungama khada ho. 
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
[an error occurred while processing this directive]
 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in