गांधी दर्शन का मौलिक सूत्र
विचार
गांधी दर्शन का मौलिक सूत्र
रामेश्वर मिश्र 'पंकज'
'हिन्द स्वराज' का अध्ययन कई तरह से किया जा सकता है और किया गया है. अनेकों ने तो
उसे मशीनी सभ्यता के सम्पूर्ण अस्वीकार अथवा भौतिकवाद के अस्वीकार के रूप में ही
देखा है. लेकिन यदि केवल बात इतनी ही होती अथवा साथ ही और बातें भी होतीं, तो भी
'हिन्द स्वराज' का कोई महत्व नहीं होता. लेकिन सच्चाई तो यह है कि 'हिन्द स्वराज'
गांधीजी के जीवन दर्शन का मौलिक सूत्र है और अन्तिम समय तक गांधीजी उसे ऐसा ही
मानते रहे. प्राय: गांधीजी के इस मौलिक बौद्धिक स्वरूप को हल्का करने की कोशिश की
जाती है.
गांधीजी ने सत्ता के स्वरूप, सत्य और उसकी साधना, समकालीन जीवन में परिव्याप्त
गुण-दोष, समकालीन विश्व में भारत की भूमिका और भारत का स्वधर्म, तथा राज्य और समाज
के आपसी संबंधों, समाज के मर्म तथा विस्तार की गहरी मीमांसा 'हिन्द स्वराज' में
प्रस्तुत की है. गांधीजी देख रहे थे कि इन दिनों मानव सभ्यता एक आंतरिक क्रूरता की
दिशा में बढ़ रही है और उसकी आंतरिक कोमलता की कुर्बानी देकर तथाकथित सभ्यता का ठाठ
रचा जा रहा है. इसलिए गांधीजी ने यह बार-बार कहा कि ''मानव परिवार को आंतरिक कोमलता
का बलिदान नहीं करना चाहिए.''
गांधीजी का मानना था कि समकालीन सभ्यता में युद्ध को सभ्यता का अनिवार्य घटक माना
जाता है. इस युद्ध को दूसरों के उद्धार के लिए दवा के रूप में पेश किया जाता है. कई
बार राज्य भी समाज के विरुद्ध समाज के ही नाम पर ऐसा युद्ध लड़ते देखे जाते हैं,
जिसमें राज्यकर्ताओं की इच्छा के अनुसार सारे समाज को धर्मान्तरित यानी रूपांतरित
किया जाए. गांधीजी इसे बहुत बड़ा पाप मानते थे.
गांधीजी ने सदा यह माना कि समाज राज्य से बड़ा है और राज्य समाज की सेवा के लिए है.
इसी प्रकार उन्होंने यह भी माना कि समाज और मनुष्य की सेवा के लिए उद्योग हैं.
उद्योग का विस्तार और उद्योगवाद में बहुत बड़ा फर्क है. उद्योगवाद का अर्थ है, किसी
खास तरह के उद्योग-तंत्र को ही मानव जाति का लक्ष्य मान लेना. व्यवहार में इसका
अर्थ यह होता है कि एक खास तरह की उद्यमशीलता यानी पुरुषार्थ के पक्ष में शेष सब
तरह के पुरुषार्थों की यानी उद्यमशीलता की स्वतंत्र संभावनाओं को नष्ट कर देना और
इस प्रकार मानव समाज के स्वत्व का अपहरण कर उसे मुट्ठी भर लोगों की अधीनता में ले
आना.
गांधीजी ऐसी उद्योगवादी सभ्यता को शैतानी सभ्यता और पापपूर्ण सभ्यता कहते हैं. इसी
प्रकार जो राज्य समाज की सेवा का एक माध्यम न होकर स्वयं ही लक्ष्य बन जाए, वह
राज्यवादी राज्य कहलाएगा और उसकी रक्षा तथा विस्तार के लिए कोशिश में जुटे लोग
राष्ट्रभक्त नहीं बल्कि राज्यवादी राज्यभक्त कहलाएंगे. यह राज्यवाद भी पापपूर्ण ही
है. इस अर्थ में भारत के सभी बड़े संगठित दलों के अधिकांश लोग पापनिष्ठ ही हैं. वे
राज्यभक्त तो हैं, पर राष्ट्रभक्त नहीं.
गांधीजी भारतीय समाज का मर्म भाग किसानों को मानते हैं. वे किसानों के ज्ञान,
विवेक, वीरता, सदगुण और श्रेष्ठ संस्कारों की 'हिन्द स्वराज' में और अन्यत्र बराबर
चर्चा करते हैं. वे कहते हैं-''हमारे किसान तो मौत का तकिया बनाकर सोते हैं.'' वे
यह भी कहते हैं कि ''जब तक लोग अरजदार हैं तभी तक राज करने वाले की मर्जी चलती है.
अगर लोग अरजदार नहीं रहेंगे तो राज्य करने वाले की मर्जी उसके आसपास तीन गज से
ज्यादा दूर तक चलेगी ही नहीं.''
इस तरह शासित के मन में जब तक हीनता और आत्मदैन्य है, तभी तक शासक का आत्मदर्प
फूलता-सूजता रहता है. स्वस्थ प्रजा कभी भी शासक में ऐसी मनोविकृतियां फैलने नहीं दे
सकती. राज्यकर्ता विनम्र रहें और अपनी मर्यादा समझते रहें, तथा जनता द्वारा की जाने
वाली प्रशंसा को अपने सद्गुणों के प्रोत्साहन के लिए की जा रही तारीफ और पुरस्कार
समझें, तभी तक वे स्वस्थ हैं. जब वे स्वयं को भाग्यविधाता मानने लगते हैं तो वे
मनोरोगी हो जाते हैं.
'हिन्द स्वराज' का उद्देश्य एक स्वस्थ समाज और उसके प्रतिनिधि सेवक के रूप में
स्वस्थ राज्य का आधार प्रस्तुत करना है. जब गांधीजी मशीनों की गुलामी का विरोध करते
हैं, तो वह साफ तौर पर मशीनों की गुलामी का ही विरोध है. जो लोग उसे मशीनों का
विरोध बताते हैं, वे दरअसल मशीनों के गुणदोष का परीक्षण करने का समाज को अधिकार
देना नहीं चाहते. मुख्य बात यही है कि रेल हो या हवाई जहाज, या कम्प्यूटर या अन्य
आधुनिकतम संचार माध्यम, उसमें लगने वाली पूंजी और ताकत तथा उनके कारण दूसरों की
छीनी जाने वाली शक्ति और साधन स्त्रोतों का भी विचार साथ-साथ किया जाए.
राजा की स्तुति को सामंती या पिछड़ा कहकर, राज्यकर्ता वर्ग के द्वारा समाज के साधन
स्त्रोत एक खास दिशा में झोंक देने की कार्यवाही की स्तुतियां करना तो राजा की
स्तुति से कहीं बहुत घटिया चीज है. राजा की स्तुति तो फिर भी एक मनुष्य के वास्तविक
और अतिरंजित गुणों की स्तुति ही है. लेकिन एक खास तरह के उद्योगवाद की स्तुति तो
राज्यकर्ताओं की बनाई गई पद्धति विशेष की अंधभक्ति मात्र है.
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इसमें जनता में एक तरह की विवेकहीनता, गुण-दोष की समीक्षा की शक्ति का विनाश, और एक
विचित्र तरह का उन्माद जगाने की ही कोशिश है. राजा के गुणों की स्तुति से तो वैसे
गुणों के अपनाने की ही प्रेरणा मिलेगी. झूठी स्तुति होने पर भीतर आत्मवंचना का
अनुभव होगा, जो कभी न कभी नैतिक ग्लानि भी जगाएगा.
उद्योगवाद की स्तुति तो वृहत समाज को शक्तिहीन, पुरुषार्थहीन, विवेकहीन, न्याय
भावना विहीन और निस्सहाय ही बनाने वाली सिद्ध होती है. अत: उद्योगवाद की स्तुति
भयंकर पाप है. उसके द्वारा समाज में एक उन्माद तथा अविवेक ही जगता है. साथ ही
छीनाझपटी और लूट में हिस्सा हड़पने की लोभवृत्ति तथा पिशाचवृत्ति प्रबल होती है. यह
वह महत्वपूर्ण पक्ष है जो रेल आदि की समीक्षा से उभरता है. उसे किसी तरह दकियानूसी
बताना अथवा सभ्यता से मुंह मोड़ने वाली प्रतिगामिता बताना बहुत बड़ी आत्मवंचना और
असभ्यता है.
गांधीजी बार-बार समाज को आत्मनिर्भर, पुरुषार्थी और शक्तिशाली बनाने पर ही जोर देते
हैं. यह अवश्य है कि लोभ का फैलाव और अन्तहीन तृष्णा कभी भी मनुष्य को शक्तिशाली
नहीं बनाती. गांधीजी ने तो हमेशा यह बात याद दिलाई कि यह धरती सबकी जरूरत के लिए
भरपूर देती है लेकिन एक आदमी के भी लोभ के सामने यह धरती छोटी पड़ सकती है. इसीलिए
ऐसे बौद्धिक उन्माद अथवा मनोविकार को गांधीजी व्यक्ति और समाज का शक्तिशाली होना
नहीं मानते, बल्कि उसका कमजोर होना ही मानते हैं. गांधीजी मनुष्य और समाज तथा राज्य
की कमजोरियां दूर कर उन्हें स्वस्थ, सबल और विवेक संपन्न बनाना चाहते हैं. 'हिन्द
स्वराज' का मुख्य लक्ष्य ऐसी ही सभ्यता का निर्माण है.
गांधीजी जब यह कहते हैं कि सभी धर्म एक ही वृक्ष की शाखाएं हैं और दुनिया में अनेक
धर्म सदा से रहे हैं और सदा रहेंगे, तब भी वे जीवन और पुरुषार्थ की इसी विविधता पर
बल दे रहे होते हैं. हमारा उद्योग तंत्र भी जीवन और पुरुषार्थों की विविधता को
बनाये रखने वाला होना चाहिए. जब कुछ खास तरह के उत्पादनों और उत्पादन विधियों के
लिए समाज के अधिकांश साधन स्त्रोत छीनकर झोंक दिए जाते हैं, तब उससे पुरुषार्थ और
उद्योगों की यह विविधता तथा समाज की स्वाधीनता ही समाप्त हो जाती है. इसी अर्थ में
उद्योगवाद शैतानी सभ्यता या पापमय सभ्यता का अंग है.
गांधीजी तेज, शील और वीरता को व्यक्ति और समाज के मुख्य सद्गुण मानते हैं. लेकिन यह
भी स्पष्ट है कि उनकी दृष्टि में तेज का अर्थ है बौद्धिक, नैतिक और आत्मिक तेज. शील
का अर्थ है सदाचार की प्रवृत्ति, और वीरता का अर्थ है श्रेष्ठ लक्ष्यों और गुणों के
लिए साहस तथा आत्मबल के साथ कष्ट सहन.
भारत के स्वभाव के बारे में गांधीजी की कुछ निश्चित धारणाएं हैं. उनका कहना है कि
भारत में सत्याग्रह के मार्ग पर चलने की योग्यता है. इसमें अहिंसा को आत्मशक्ति के
रूप में पहचानने की क्षमता है. अहिंसा आत्मबल है और सच्ची वीरता है. गांधीजी का
मानना था कि कायर व्यक्ति अहिंसक नहीं हो सकता. कई महत्वपूर्ण लोगों का मानना है कि
अहिंसा के सद्गुण की अति के कारण ही भारत का अध:पतन हुआ. गांधीजी इसका सप्रमाण खंडन
करते हैं. वे कहते हैं कि भारत ने सदा वीरता का परिचय दिया है और युद्ध से यहां के
लोग कभी भी डरे नहीं हैं.
गांधीजी ने यह तक कहा कि भारत के श्रेष्ठ ग्रंथों में युद्धों का उत्साहपूर्ण वर्णन
है. स्वयं भगवान राम और भगवान कृष्ण पापियों के संहारक के नाते प्रसिद्ध हैं. हर
देवता शस्त्रास्त्र से सुसज्जित है. मुसलमानों से हिन्दू कुछ कम वीर या कम लड़ाकू
नहीं थे. यह अलग बात है कि उन्होंने पूरी तरह से एक जूट होकर आक्रामक इस्लामवादियों
का मुकाबला नहीं किया. अत: अहिंसा पर श्रद्धा रखने वाला भारत वीरता और युद्ध से कभी
भी विरत नहीं रहा.
गांधीजी अहिंसा को उच्चतर वीरता मानते हैं. वीरता निश्चित लक्ष्य के लिए कष्ट सहन
और निरन्तर पराक्रम का ही नाम है. अहिंसा स्वेच्छा से अपने आदर्श के लिए कष्ट सहने
का ही नाम है. इसमें विरोधी पक्ष पर शारीरिक वार इसलिए नहीं किया जाता क्योंकि
विरोधी में भी एक आत्मशक्ति की चिनगारी मौजूद मानी जाती है और यह समझा जाता है कि
सामने वाले को अपने आदर्श के लिए कष्ट उठाते देखकर विरोधी के मन में कभी उस
आत्म-शक्ति का प्रकाश उभर सकता है, जिससे उसे लगेगा कि यह अहिंसक व्यक्ति सही पक्ष
के लिए लड़ रहा है और उसे इससे अलग करने की मेरी कोशिश गलत है.
इस प्रकार अहिंसा केवल शारीरिक ही नहीं, मानसिक और बौद्धिक तथा नैतिक वीरता है.
लेकिन अगर कोई अहिंसा के नाम पर अन्याय का विरोध नहीं करता और दब जाता है, तो
गांधीजी उसे कायर ही कहते हैं. वे बार-बार यह कहते हैं कि ऐसी कायर अहिंसा से तो
वीरतापूर्ण हिंसा ही बहुत ऊंची चीज है. जिसमें वीरता है और विरोधी पर चोट कर सकने
की पूरी ताकत है, फिर भी जो कहते हैं कि हिंसा केवल शरीर पर पहुंचती है, जबकि
अहिंसा ठेठ हृदय तक पहुंचती है. अत: केवल बौद्धिक तथा आत्मिक बल से परिपूर्ण
व्यक्ति ही सचमुच अहिंसक हो सकता है. कायरों की अहिंसा से वीरता भरी हिंसा ऊंची चीज
है और उससे भी कहीं ऊंचा है वीरतापूर्ण अहिंसा धर्म.
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गांधीजी मानते हैं कि इस अहिंसा को सच्चे रूप में केवल भारत ही समझ सकने की योग्यता
रखता है. गांधीजी ने बार-बार कहा कि यदि अहिंसा को एक बौद्धिक मतवाद बना डाला जाए
तो फिर उसे मानने वाले तो आलसी, प्रमादी, जड़, कायर और हताश लोग ही बन जाएंगे. मन
में बैर, विरोध रखते हुए वीरतापूर्ण हिंसा न करना कायरता है. वैसे भी शारीरिक हिंसा
करने वाले बड़े वीर सामान्यत: अपनी इन्द्रियों और अपने मन को संयमित रखकर ही सच्ची
विजय प्राप्त कर पाते हैं. अत: एक सीमा तक सच्चे हिंसक वीर भी आंतरिक अहिंसा का ही
पालन करते हैं क्योंकि वे चित्ता को शांत और जागृत रखना जानते हैं. उत्तोजित,
क्षुब्ध और चपल बुद्धि व्यक्ति तो हिंसक वीर भी नहीं बन सकता.
इसी प्रकार भारत के स्वभाव के बारे में गांधीजी की मान्यता का एक प्रमाण यह भी है
कि वे 'हिन्द स्वराज' के परिशिष्ट 2 में विदेशी विद्वानों के ऐसे साक्ष्य उद्धत
करते हैं जिसमें भारत के स्वभाव का पता चलता है. वे ब्रिटिश सांसद जे.सी.मोर का यह
उद्धरण देते हैं-''हमने पाया कि भारत एक प्राचीन सभ्यता है, जो वहां हजारों सालों
से रह रही अतिशय बुद्धिमान जातियों के चरित्र का अंग बन चुकी है. उस सभ्यता ने भारत
को राजनैतिक संरचना तो दी है. समाज और परिवार के जीवन को चलाने वाली अनेकों
विविधतापूर्ण और सम्पन्न संस्थाएं भी दी हैं. अपनी इन संस्थाओं के कारण हिन्दू जाति
का चरित्र उन्नत है. वे कुशल व्यापारी हैं, बुद्धिमान विचारशील और समीक्षाबुद्धि से
सम्पन्न हैं, कमखर्च हैं, उदार हैं, संयमी हैं, धर्म पर चलने वाले और नियमों को
मानने वाले हैं, मधुर व्यवहार वाले हैं, दयालु हैं, विपत्ति में धैर्यशील हैं और
मातापिता की आज्ञा मानने वाले हैं.''
टॉमस मुनरो के अनुसार, ''भारत के हर गांव में ऐसी पाठशालाएं हैं जो गणित और साहित्य
सिखाती हैं. भारत में खेती की श्रेष्ठ पद्धति और उत्तम कारीगरी है. यहां के लोग
स्त्रियों के प्रति गहरे आदर, विश्वास और कोमलता का व्यवहार रखते हैं.'' विक्टर
कज़िन के अनुसार, ''भारत का दार्शनिक चिन्तन गहरे सत्य का साक्षात्कार करने वाला
है.'' इस प्रकार गांधीजी की भारतीय समाज के इतिहास और स्वभाव के बारे में बहुत ऊंची
धारणा है. जब तक आप बिना पर्याप्त प्रमाण के इस धारणा को यों ही ठुकराते रहते हैं,
तब तक आप गांधीजी की विचारधारा को मानने वाले नहीं हो सकते.
गांधीजी मानव स्वभाव की जो व्याख्या करते हैं, उसके अनुसार समाज में अमीर और गरीब
तथा तथाकथित उच्च और निम्न जाति और वर्ग के बीच स्थित प्रभावशाली माने जाने वाले
लोगों का अनुसरण ही शेष लोग करते हैं. जब किसी समाज में उसके शक्तिशाली और
प्रभावशाली लोग अत्यधिक विकृत हो जाते हैं, तो संपूर्ण समाज में व्याप्त एक ग्लानि
के भाव के भीतर से कोई नैतिक नवोन्मेष संभव होता है. किसी भी स्थिति में समाज में
परस्पर पूर्ण विरोधी वर्ग और वर्ग-स्वार्थ जैसी कोई चीज नहीं होती.
गांधीजी के सारे ही राजनैतिक और सांस्कृतिक दर्शन में यह मूलभूत मान्यता निहित थी
कि सम्पूर्ण समाज में एक आंतरिक एकात्मता है और रहती है. जो व्यक्ति संपूर्ण समाज
से प्रेम नहीं करता और समाज के किसी एक वर्ग को सारी बुराइयों का मुख्य स्त्रोत तथा
किसी दूसरे वर्ग को निरीह और निर्दोष शिकार मात्र मानता है, वह किसी भी स्थिति में
गांधी दर्शन का अनुयायी नहीं है.
यदि वह गांधी दर्शन का अनुयायी नहीं भी हो, तब भी उसमें कम से कम इतनी ईमानदारी तो
होनी ही चाहिए कि वह यदि सम्पूर्ण समाज में नैतिक चेतना और न्याय भावना जगाने की
इच्छा और योजना रखता है तो फिर उसे कम से कम अपने आस पड़ोस अथवा अपने वर्ग या अपने
समुदाय में यानी जिनसे उसकी सबसे अधिक अंत:क्रिया होती है, उनके भीतर नैतिक चेतना
फैला सकने की संभावना अवश्य माननी चाहिए.
इसका अर्थ यह है कि भिन्न भिन्न दलों के नेताओं को एक दूसरे के भीतर नैतिक चेतना और
न्याय भावना पैदा कर सकने की संभावना सबसे अधिक माननी चाहिए क्योंकि सभी बड़े दलों
के मुख्य नेता और कार्यकर्ता जीवन में, दैनन्दिन सामाजिक व्यवहार में, मेलजोल,
आने-जाने और शिष्टाचार में, शादी-ब्याह में, लेन-देन और विचार विमर्श में एक दूसरे
के अधिक नजदीक होते हैं, बनिस्वत समाज में अन्य वर्गों के.
यदि वे सम्पूर्ण समाज में नैतिक भावना और सामाजिक न्याय का प्रसार करने के इच्छुक
हैं, तो फिर उन्हें आपस में तो एक दूसरे के भीतर नैतिक भावना फैला सकने योग्य स्वयं
को मानना ही चाहिए. वे गांधीजी के सत्य और अहिंसा के आदर्श को तो नहीं मानते. वे
भारतीय स्वभाव के भी प्रतिनिधि संगठन नहीं हैं. इतना ही नहीं, वे स्वयं अपने ही
दृष्टिकोण से सुसंगत नहीं हैं क्योंकि जब वे सारे समाज में नैतिक चेतना फैलाने की
अपनी सामर्थ्य जताते हैं, तो उन्हें अपनी बिरादरी यानी विभिन्न दलों में काम कर रहे
भारतीय राजनीति के समकालीन सक्रिय लोगों के साथ तो अपनी वह सामर्थ्य आजमाकर देखनी
ही चाहिए.
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गांधीजी ने तो अंग्रेजों की नैतिक भावना को छूने की कोशिश करते हुए अपनी राजनीति
आगे बढ़ाई, लेकिन स्वाधीन भारत के एक ही वर्ग के प्रतिनिधि भिन्न-भिन्न दलीय नेता और
कार्यकर्ता एक दूसरे के बारे में आरोप और निर्णय से कम में बात शुरू ही नहीं करते.
इससे स्पष्ट है कि वे स्वयं अपनी ही मौलिक मान्यताओं से विसंगत हैं.
स्वराज पाने का बल हिन्दुस्तान के पास कौन सा और कितना है, इसका विश्लेषण करते हुए
गांधीजी दिखलाते हैं कि आत्म-बल और सत्याग्रह ही हिन्दुस्तान का मूल बल है और
हिन्दुस्तान का यह बल असाधारण है. इस बल के वाहक भारत के सर्व साधारण लोग हैं, और
इस बल से रहित हैं, अंग्रेजीदां भारतीय लोग. इस प्रकार गांधीजी आधुनिक शिक्षित
लोगों को दीनहीन, विपन्न और आत्मबल से रहित बताते हैं. फिर वे इन दीनहीनों को अपनी
दीनता से छुटकारे का रास्ता दिखाते हैं.
इसी क्रम में वे मशीनों के बारे में भी अपनी दृष्टि स्पष्ट करते हैं और यह प्रमाणित
करते हैं कि मशीन और उससे मिलने वाली सुविधाओं के नाम पर असल में नव सम्पन्न लोग
अनीति से पैसे कमाने का ही मुख्य लक्ष्य रखते हैं, और अपने इस अनैतिक धन लोभ को
छिपाने के लिए मशीन की महिमा गाते हैं. जो कि दरअसल अपनी अनैतिक आमदनी के मुख्य
जरिए की ही महिमा का कीर्तन है.
गांधीजी यह भी संकेत देते हैं कि नए काम की शुरुआत जमी हुई मशीनों को निकाल बाहर
करने की इच्छा और योजना से नहीं हो सकती. उसके स्थान पर पहल ऐसे लोगों को करनी
होगी, जो पहले स्वयं मशीनों की गुलामी और अनैतिक आमदनी वाली जिन्दगी से भीतर से
विरक्ति पा लें. इसलिये वे मुख्य बल इसी पर देते हैं कि इन मशीनों के प्रति हमारी
नजर कैसी है. अगर इनके प्रति मुग्ध हैं, तो फिर इनसे छुटकारे की बात पाखण्ड है. अगर
मुग्ध नहीं है, तो सहज आत्मविश्वास से भरी मशीनी दासता से मुक्त जीवन जीने की पहल
करनी होगी.
गांधीजी यह भी स्पष्ट करते हैं कि देश के अधिकांश लोग तो सदा से स्वराज में हैं ही.
इस प्रकार पूरा भारत कभी भी गुलाम नहीं हुआ. गुलाम तो केवल नए-नए धनी और शिक्षित
बने ही हुए हैं और स्वराज उन्हें ही पाना है. अत: स्वराज के लिए आवश्यक त्याग
उन्हें करना होगा. इस प्रकार यह बहुत स्पष्ट है कि गांधीजी की दृष्टि में
पश्चिमीकृत हो चुके लोगों को ही स्वदेशी की पहल करनी है. इस दृष्टि से इन दिनों उठ
रहे स्वदेशी आंदोलन गांधीजी के स्वदेशी आंदोलन से न केवल अलग हैं, बल्कि उलटे हैं.
गांधीजी तो स्वदेशी छोड़ चुके लोगों को दीनहीन और आत्मबलहीन मानते हैं जबकि आज का यह
नया स्वदेशी आंदोलन इन लोगों को अद्भुत शक्ति सम्पन्न और असाधारण आत्मबल का स्वामी
मानता है.
नया स्वदेशी आंदोलन साधारण भारतीयों को इन लोगों से डराता है. उनके बारे में आतंक
पैदा करता है कि वे देश को बेच देंगे. इसका अर्थ है कि देश पूरी तरह निरीह हो चुका
है और उसे थोड़े से शासक जब चाहे खरीद-बेच सकते हैं. यह करोड़ों भारतीयों का अपमान
है, और उन्हें दीनहीन तथा असहाय मानना है. फिर साथ ही ऐसे दीनहीन लोगों से केवल यह
अपेक्षा की जाती है कि वे थोड़े से नए लोगों को शासक पदों पर बैठा लें और फिर
निश्चिंत हो जाएं. इस तरह साधारण भारतीयों के पास केवल शासक बदलने का ही एक मात्र
रास्ता बचा हुआ बताया जाता है.
वृहत् भारतीय समाज को दीनहीन बताना, उसकी शक्ति, उसके सद्गुणों और उसकी
जिम्मेदारियों सभी की अनदेखी करना है. एक स्वतंत्र समाज में हजारों वर्षों के
श्रेष्ठ संस्कारों को संजोए हुए लोग अगर अपनी इच्छा के मुताबिक अपना राज नहीं बना
और चला रहे हैं तो इसमें उनकी जिम्मेदारी भी है. समाज को शासकों से ही डर नहीं है.
स्वयं शासकों को भी समाज से डर है.
सच तो यह है कि अधिकांश आधुनिक राजनैतिक और आर्थिक कदम समाज की शक्ति से डर कर उसे
भटकाने और बिखराने के लिए ही उठाये जाते हैं. अत: समाज के आत्मबल को फिर से उभारने
की कोशिश ही प्रधान होनी चाहिए, न कि उसे डराने और घबराहट से भरने की.
आधुनिक असीमित उपभोग की वस्तुओं के प्रति ललक समाज का स्वभाव नहीं बल्कि उसका
उन्माद है. उन्माद का उपचार प्रशान्त विवेक को जगाने में है न कि उसे और ज्यादा
भड़काने में. आधुनिक राजनैतिक दल जनता में नया-नया उन्माद भड़काने की कोशिश करते हैं.
ऐसे में जनता में एक नया बुखार और बदहवासी फैलती है और वह अपनी आत्मशक्ति की
अनुभूति नहीं कर पाती. गांधीजी का स्वदेशी आंदोलन वृहद् भारतीय समाज को आत्म शक्ति
की अनुभूति से सम्पन्न बनाने का प्रयास है.
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स्वतंत्र भारत में यूरोपीय सभ्यता नाम की कोई सीधी चीज नहीं है. यदि स्वयं गांधीजी
की बात को मानें तो सभ्यता का अर्थ है श्रेष्ठ आचरण की शक्ति. लेकिन दूसरी ओर वे यह
भी दिखाते हैं कि यूरोपीय सभ्यता तो अधर्म और विकृति को ही बढ़ाती है. अत: स्पष्ट है
कि सभ्यता का अर्थ है आचरण की शक्ति. इसलिए स्वाधीन भारत में जो लोग आज जैसा आचरण
कर रहे हैं वह समकालीन भारतीय सभ्यता की ही शक्ति या विकृति है. यह शक्ति या विकृति
यूरोप से सीखी हुई हो सकती है, लेकिन सीखने वाले भारतीय ही हैं. अत: उनका दोष
समकालीन भारतीय सभ्यता का ही दोष है.
गांधीजी के समय में यूरोपीय सभ्यता के शारीरिक प्रतिनिधि प्रत्यक्ष रूप से भारत के
शासक थे और वे अपनी बौद्धिक योजनाओं के अनुसार भारत को ढालना चाह रहे थे. इसलिए उन
प्रयासों का विरोध करने को, गांधीजी ने आधुनिक भारतीय सभ्यता से हिन्दुस्तानी
सभ्यता की टकराहट कहा. लेकिन स्वाधीन भारत में ऐसी किन्हीं दो सभ्यताओं की टकराहट
देखना असत्य और गलत है.
भारत में आज भारतीय सभ्यता के ही अच्छे और बुरे, श्रेष्ठ और निकृष्ट रूपों के बीच
टकराहट है. इसीलिए इस टकराहट को पहले से भी अधिक बौद्धिक तथा संवादपूर्ण होना
चाहिए. भारत के विभिन्न राजनैतिक दलों को आपस में उससे अधिक बातचीत करते दिखना
चाहिए जितनी कि उन दिनों भारतीय राजनैतिक दल अंग्रेजों से करते दिखते थे. सच्चाई तो
यह है कि आज के बड़े राजनैतिक दल आपसी बातचीत का केवल अवैध या छिपा हुआ रिश्ता ही
रखते हैं.
समाज के सामने तो वे बैरभाव, गाली-गलौज, घृणा, अभियोग और निन्दा का ही रिश्ता रखते
हैं. यह आपसी समस्याओं को न सुलझा पाने की उनकी स्थिति दर्शाता है. अत: स्पष्ट है
कि आधुनिक राजनैतिक दल बौद्धिक रूप से अक्षम हैं और वे केवल शारीरिक या हिंसात्मक
रूप से ही आपसी व्यवहार की इन समस्याओं का हल निकालना चाहते हैं.
समकालीन भारत के बड़े लोगों की यह अक्षमता भारतीय समाज की ही समकालीन अक्षमता है और
यह आज की भारतीय सभ्यता की इस कमी को दूर करने की पहल, सूझ और उपायों की है. स्पष्ट
है कि यह पहल गहरी सूझबूझ और विचार सामर्थ्य की अपेक्षा रखती है. यह वैचारिक झगड़ा
नहीं है, बल्कि शील और व्यवहार की कमी का मामला है.
एक ही देश के एक ही वर्ग के भाई-बहन आपस में भिन्न-भिन्न समस्याओं पर भिन्न-भिन्न
दृष्टियों के बीच सुलह अथवा संवाद की स्थिति न पैदा कर पा रहे हों, तो इससे व्यवहार
की उनकी कमी ही दिखती है. अपनी इस कमी को विचारधारा या वैचारिक मतवाद का रंग देना
मानसिक, बौद्धिक और नैतिक कमजोरी को ढकना है.
प्रश्न उठता है कि यदि यह सब सही भी हो तो आगे क्या रास्ता होना चाहिए. जाहिर है कि
इसमें सही राह उन लोगों की पहल ही हो सकती है, जिन्हें गांधीजी हिन्दुस्तान का असली
बल और असली अधिकारी मानते हैं. वे हैं भारत के किसान. भारत के किसानों को और उन
किसानों के बौद्धिक प्रतिनिधियों को ऐसी पहल करनी चाहिए कि जिससे उनके ये बेटे-भारत
के विभिन्न राजनैतिक दल-आपस में शील और मर्यादा के साथ व्यवहार करना सीखें और समाज
के सामने अपनी अपनी सूझ, विनम्रता और शिष्टता के साथ रहना सीखें क्योंकि अंतत:
उन्हें इस समाज की ही सेवा करनी है.
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अपने-अपने लठैत जैसे अथवा सिपाही या फौजी जैसे कार्यकर्ताओं के जत्थे इकट्ठे करके
आपस में इस तरह लठ चलाने, मारकाट करने और गाली-गलौज करने का उनका जो स्वभाव बन गया
है, उसे कैसे सुधारा जाए और राजनैतिक दलों को सामाजिक, शिष्ट और विनय सम्पन्न तथा
मर्यादित कैसे बनाया और रखा जाए इसकी चिन्ता किसानों तथा उन सब समझदार लोगों को
करनी चाहिए जो भारत के शील, संस्कार, विवेक और सदाचार की शक्ति में आस्था रखते हैं.
यह दलों को समझने की जरूरत है. उन्हें समाज की सेवा कर सकने की अपनी योग्यता का
परिचय और प्रमाण पूरी मर्यादा तथा शिष्टता के साथ पेश करना चाहिए.
फिर भी यह निवेदन करता हूं कि कम से कम 'हिन्द स्वराज' की इस बहस से भी और जीवन के
अनुभव से भी अब तक इतना तो हम लोग बार-बार जान ही चुके होंगे कि विनम्रता के साथ
में अपनी बात कहनी चाहिए. दर्द के बारे में कविवर भवानी प्रसाद मिश्र का सुपरिचित
टुकड़ा है-
दर्द जब गुमसुम फैलेगा.
तभी इस्पात बन ढलेगा॥
हम सब लोग सामाजिक जीवन में तथा जो निजी तौर पर भी आदर्श जीवन जी रहे हैं, उनके
जीवन में भी बहुत सारे दर्द होंगे, बहुत सी व्यथाएं होंगी, लेकिन वे दर्द बाहर न
लायें. हो सके तो कुछ उत्साह और उल्लास बांटें, कुछ ठोस सुझाव दें और वास्तविक
जिज्ञासाएं सामने लाएं. दर्द तो हमारे सबके जीवन में किसी आदर्श के रूप में साकार
हो ही रहा होगा.
22.11.2009, 14.22(GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | deepak chauhan (dipakadramaartist@yahoo.com) gorakhpur | |
| | आज की तारीख में गांधी जी को एक ब्रांड बनाकर use किया जा रहा है, जिसको मौका मिल रहा है इस गांधीजी ब्रांड का फायदा उठा रहा है. | |
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| | ops309@gmail.com (om prakash shukla) lucknow | |
| | गांधीजी का हिंद स्वराज अतीत का दस्तावेज़ से अधिक मायने नहीं रखता जिसमें अनायास अपने को महान बनाने की कोशिश की गई है. सारी दुनिया जानती है कि हिंदुस्तान एक या दो शताब्दी नहीं पूरे हज़ार साल तक पिटता रहा. इस तरह की चंदूखाने की गप भगवान रजनीश जैसे बाबाओं के यहां खूब चलती रहती है लेकिन वास्तविकता के धरातल पर आज या पौराणिक युग में भी लोग तपस्या करते थे उन्नत किस्म का हथियार वरदान में मांगते थे.
गांधीजी को हम लोगों ने आलोचना के परे कर दिया है. नहीं तो देखते की उनका एक भी प्रयास धरती पर नहीं दिखाई देता है, चाहे चरखा हो, अहिंसा हो या सादगी. आखिर उनके जीते जी नेहरू पेरिस में कपड़ा धुलवाते थे. तब कहां थी ये सादगी? ये सारा कुछ पाखंड था जब तक गांधी रहे चलता रहा वो गए तो सब चला गया. अब लकीर पीटने से कुछ नहीं होने वाला. बस लिख कर नाम और नामा पा लें. | |
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| | Durgesh Thakur (shatabditimes@rediffmail.com) Kawardha | |
| | बहुत ही अच्छा लेख है, मेरी शुभकामनाएं. | |
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