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गांधी दर्शन का मौलिक सूत्र

विचार

 

गांधी दर्शन का मौलिक सूत्र

रामेश्वर मिश्र 'पंकज'

 

'हिन्द स्वराज' का अध्ययन कई तरह से किया जा सकता है और किया गया है. अनेकों ने तो उसे मशीनी सभ्यता के सम्पूर्ण अस्वीकार अथवा भौतिकवाद के अस्वीकार के रूप में ही देखा है. लेकिन यदि केवल बात इतनी ही होती अथवा साथ ही और बातें भी होतीं, तो भी 'हिन्द स्वराज' का कोई महत्व नहीं होता. लेकिन सच्चाई तो यह है कि 'हिन्द स्वराज' गांधीजी के जीवन दर्शन का मौलिक सूत्र है और अन्तिम समय तक गांधीजी उसे ऐसा ही मानते रहे. प्राय: गांधीजी के इस मौलिक बौद्धिक स्वरूप को हल्का करने की कोशिश की जाती है.

हिंद स्वराज

गांधीजी ने सत्ता के स्वरूप, सत्य और उसकी साधना, समकालीन जीवन में परिव्याप्त गुण-दोष, समकालीन विश्व में भारत की भूमिका और भारत का स्वधर्म, तथा राज्य और समाज के आपसी संबंधों, समाज के मर्म तथा विस्तार की गहरी मीमांसा 'हिन्द स्वराज' में प्रस्तुत की है. गांधीजी देख रहे थे कि इन दिनों मानव सभ्यता एक आंतरिक क्रूरता की दिशा में बढ़ रही है और उसकी आंतरिक कोमलता की कुर्बानी देकर तथाकथित सभ्यता का ठाठ रचा जा रहा है. इसलिए गांधीजी ने यह बार-बार कहा कि ''मानव परिवार को आंतरिक कोमलता का बलिदान नहीं करना चाहिए.''

गांधीजी का मानना था कि समकालीन सभ्यता में युद्ध को सभ्यता का अनिवार्य घटक माना जाता है. इस युद्ध को दूसरों के उद्धार के लिए दवा के रूप में पेश किया जाता है. कई बार राज्य भी समाज के विरुद्ध समाज के ही नाम पर ऐसा युद्ध लड़ते देखे जाते हैं, जिसमें राज्यकर्ताओं की इच्छा के अनुसार सारे समाज को धर्मान्तरित यानी रूपांतरित किया जाए. गांधीजी इसे बहुत बड़ा पाप मानते थे.

गांधीजी ने सदा यह माना कि समाज राज्य से बड़ा है और राज्य समाज की सेवा के लिए है. इसी प्रकार उन्होंने यह भी माना कि समाज और मनुष्य की सेवा के लिए उद्योग हैं. उद्योग का विस्तार और उद्योगवाद में बहुत बड़ा फर्क है. उद्योगवाद का अर्थ है, किसी खास तरह के उद्योग-तंत्र को ही मानव जाति का लक्ष्य मान लेना. व्यवहार में इसका अर्थ यह होता है कि एक खास तरह की उद्यमशीलता यानी पुरुषार्थ के पक्ष में शेष सब तरह के पुरुषार्थों की यानी उद्यमशीलता की स्वतंत्र संभावनाओं को नष्ट कर देना और इस प्रकार मानव समाज के स्वत्व का अपहरण कर उसे मुट्ठी भर लोगों की अधीनता में ले आना.

गांधीजी ऐसी उद्योगवादी सभ्यता को शैतानी सभ्यता और पापपूर्ण सभ्यता कहते हैं. इसी प्रकार जो राज्य समाज की सेवा का एक माध्यम न होकर स्वयं ही लक्ष्य बन जाए, वह राज्यवादी राज्य कहलाएगा और उसकी रक्षा तथा विस्तार के लिए कोशिश में जुटे लोग राष्ट्रभक्त नहीं बल्कि राज्यवादी राज्यभक्त कहलाएंगे. यह राज्यवाद भी पापपूर्ण ही है. इस अर्थ में भारत के सभी बड़े संगठित दलों के अधिकांश लोग पापनिष्ठ ही हैं. वे राज्यभक्त तो हैं, पर राष्ट्रभक्त नहीं.

गांधीजी भारतीय समाज का मर्म भाग किसानों को मानते हैं. वे किसानों के ज्ञान, विवेक, वीरता, सदगुण और श्रेष्ठ संस्कारों की 'हिन्द स्वराज' में और अन्यत्र बराबर चर्चा करते हैं. वे कहते हैं-''हमारे किसान तो मौत का तकिया बनाकर सोते हैं.'' वे यह भी कहते हैं कि ''जब तक लोग अरजदार हैं तभी तक राज करने वाले की मर्जी चलती है. अगर लोग अरजदार नहीं रहेंगे तो राज्य करने वाले की मर्जी उसके आसपास तीन गज से ज्यादा दूर तक चलेगी ही नहीं.''

इस तरह शासित के मन में जब तक हीनता और आत्मदैन्य है, तभी तक शासक का आत्मदर्प फूलता-सूजता रहता है. स्वस्थ प्रजा कभी भी शासक में ऐसी मनोविकृतियां फैलने नहीं दे सकती. राज्यकर्ता विनम्र रहें और अपनी मर्यादा समझते रहें, तथा जनता द्वारा की जाने वाली प्रशंसा को अपने सद्गुणों के प्रोत्साहन के लिए की जा रही तारीफ और पुरस्कार समझें, तभी तक वे स्वस्थ हैं. जब वे स्वयं को भाग्यविधाता मानने लगते हैं तो वे मनोरोगी हो जाते हैं.

'हिन्द स्वराज' का उद्देश्य एक स्वस्थ समाज और उसके प्रतिनिधि सेवक के रूप में स्वस्थ राज्य का आधार प्रस्तुत करना है. जब गांधीजी मशीनों की गुलामी का विरोध करते हैं, तो वह साफ तौर पर मशीनों की गुलामी का ही विरोध है. जो लोग उसे मशीनों का विरोध बताते हैं, वे दरअसल मशीनों के गुणदोष का परीक्षण करने का समाज को अधिकार देना नहीं चाहते. मुख्य बात यही है कि रेल हो या हवाई जहाज, या कम्प्यूटर या अन्य आधुनिकतम संचार माध्यम, उसमें लगने वाली पूंजी और ताकत तथा उनके कारण दूसरों की छीनी जाने वाली शक्ति और साधन स्त्रोतों का भी विचार साथ-साथ किया जाए.

राजा की स्तुति को सामंती या पिछड़ा कहकर, राज्यकर्ता वर्ग के द्वारा समाज के साधन स्त्रोत एक खास दिशा में झोंक देने की कार्यवाही की स्तुतियां करना तो राजा की स्तुति से कहीं बहुत घटिया चीज है. राजा की स्तुति तो फिर भी एक मनुष्य के वास्तविक और अतिरंजित गुणों की स्तुति ही है. लेकिन एक खास तरह के उद्योगवाद की स्तुति तो राज्यकर्ताओं की बनाई गई पद्धति विशेष की अंधभक्ति मात्र है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

deepak chauhan (dipakadramaartist@yahoo.com) gorakhpur

 
 आज की तारीख में गांधी जी को एक ब्रांड बनाकर use किया जा रहा है, जिसको मौका मिल रहा है इस गांधीजी ब्रांड का फायदा उठा रहा है. 
   
 

ops309@gmail.com (om prakash shukla) lucknow

 
 गांधीजी का हिंद स्वराज अतीत का दस्तावेज़ से अधिक मायने नहीं रखता जिसमें अनायास अपने को महान बनाने की कोशिश की गई है. सारी दुनिया जानती है कि हिंदुस्तान एक या दो शताब्दी नहीं पूरे हज़ार साल तक पिटता रहा. इस तरह की चंदूखाने की गप भगवान रजनीश जैसे बाबाओं के यहां खूब चलती रहती है लेकिन वास्तविकता के धरातल पर आज या पौराणिक युग में भी लोग तपस्या करते थे उन्नत किस्म का हथियार वरदान में मांगते थे.

गांधीजी को हम लोगों ने आलोचना के परे कर दिया है. नहीं तो देखते की उनका एक भी प्रयास धरती पर नहीं दिखाई देता है, चाहे चरखा हो, अहिंसा हो या सादगी. आखिर उनके जीते जी नेहरू पेरिस में कपड़ा धुलवाते थे. तब कहां थी ये सादगी? ये सारा कुछ पाखंड था जब तक गांधी रहे चलता रहा वो गए तो सब चला गया. अब लकीर पीटने से कुछ नहीं होने वाला. बस लिख कर नाम और नामा पा लें.
 
   
 

Durgesh Thakur (shatabditimes@rediffmail.com) Kawardha

 
 बहुत ही अच्छा लेख है, मेरी शुभकामनाएं. 
   
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