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विचार

 

मानव मन और शहर का जल-थल

मनोज कुमार झा


प्रख्यात लेखक बोर्खेज ने अपनी डायरी में लिखा है कि मुझे व्यूनेस आयर्स की आदत लग गई है जैसे कि मुझे मेरे देह की आदत हो. वाकइ हमारी बसावट हमारी जिस्म की मानिंद होती है कभी अपने होने से हमको खुश करती तो कभी अपने होने के पेंचोखम से हम को झुंझलाती. मनुष्य ने अपने बसावट के इतिहास की लंबी दूरी तय की है और नए किस्म के औहयोगिक शहर उसका आधुनिकतम पड़ाव हैं. शहर पहले भी अस्तित्व में रहे हैं मगर आधुनिक शहरों से उसकी तुलना करें तो वे अपनी उपस्थिति में मधुमक्खी की छत्ता की तरह या चीटिंयों की बांबी की तरह होंगे.
 

शिक्षा

कृषि-काल में मनुष्य प्रकृति के लय-ताल से बँधा था, मगर यही प्रकृति उसे बार बार अकाल, सुखे के द्वारा छका भी जाती थी. उस लय-ताल का अपना सौंदर्य है मगर यह लय गति की उड़ान को रोकने वाली था. शहरों ने दिया हमें गति - हम इस गति के झूले पर आंनंदित हो झूमते रहे पर कई वार सर चकराने का डर भी सिर पे मंडराता रहा. मनुष्य ने अपनी यात्रा में जिन चीजों को रचा है जरूरी नहीं कि वे उसके चाबुक के इशारे पर या मनुहार के संकेतों पर ही चलता रहे. वह चीजें अपनी आंतरिक गति-तत्व भी हासिल कर लेती है और अपनी जड़ें तथा शाखाओं का विन्यास फैला देती हैं.

सभ्यता के विकास-क्रम में शहर बना तो, लेकिन वह हमारे मन के जल-थल के लिए कैसा होगा इसका कोई मुकम्मल तस्वीर बना पाना मुश्किल रहा. फिर अलग अलग क्षेत्र की सृजनशील में मेधाऔं ने इसे शब्दों में, खयालों में, चित्रों में बाँधना प्रारंभ किया. शहर के उदय के जश्न भी हुए, और इसको लेकर आशंकाओं की लहरें भी चिंतन-तट से टकराई. शहर का जीवन एक नए तरह का जीवन था. जहाँ संवेदना को उद्दीपित करने बाले तत्व की सघनता एवं बारंबारता अभूतपूर्व थी.

प्रसिद्ध समाजशास्त्री जार्ज सिमेल ने कहा है कि इन तत्वों के कारण मनुष्य को प्रतिरक्षी मानसिक काया का निर्माण करना पड़ा जिससे कि वह उद्दीपक तत्वों के निरंतर प्रहार से अपनी आंतरिक सुसंगति को बचा सके. अब वह भावना के डपर तर्क को तरजीह देने लगा. माइकेल विन्सहीन ने कहा है कि मनुष्य के आंतरिक सुसंगति को शहर की कठिन वस्तुनिष्ठ संस्कृति के चलते अलग तरह की जीवन की तकनीकों का सृजन करना पड़ा.

शहर में बहुत सी लघु-घटनाएं अलग अलग तीव्रताओं एवं आवृतियों के साथ मनुष्य के मन पर दस्तक देती रहती है इसलिए मनुष्य की मानसिक काया को एक तरह का प्रतिरक्षा-तंत्र विकसित करना पड़ता है जिससे कि वे अपनी आंतरिक जीवन को सहेज सके और लगातार हो रही उत्तेजना-तत्त्वों की बमबारी को झेल सके.

डीडीएलजे का वह डॉयलॉग यहाँ याद आता है कि बड़े बड़े शहरों में छोटी-छोटी बातें होती ही रहती है. जिंदगी की तकनीक में बुद्धि का अधिक दखल के कारण लोगों ने इसे मनुष्य के संवंदना को सूखने के क्षेत्र के रूप में भी देखना शुरू कर दिया और बार-बार इसे कंक्रीट का जंगल कहा गया. डेस्मंड मौरिस तो एक कदम आगे बढ़कर शहरों को मनुष्य के लिए चिड़ियाघर की संज्ञा दी और 1969 में छपी उनकी किताब हयूमेन जू काफी चर्चित रही जिसमें उन्होंने कहा कि जंगल तो प्राकृतिक परिवेश को इंगित करता है.

शहर दरअसल चिड़िया घर है जहाँ मनुष्य प्रकृति से कटकर ऊब और अकेलापन से जूझता है. इन ख्यालातों में शहर को लेकर एक भय सा दिखता है जो प्रायः हर नई चीज के उद्भव के साथ उत्पन्न होता है. मगर हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि शहर में आकर प्रकृति भी अपना एक नया रूप धरती है जहाँ मनुष्य और प्रकृति के रिश्ते की तर्जुमानी के लिए नये तरह के भावबोध की जरूरत होती है जो हमारे अनुभव लोक में नयी कीमियायें घोल देती हैं.

शहर ने मानव-जीवन को बुद्धि की वरीयता और गति की तीव्रता के बल पर सृजन-उपवन के उन फूलों पास तक ले गया जो दूसरे तरह की जीवन की तकनीक के द्वारा संभव ही नहीं था. शहर में जब बुद्धि पर अधिक बल देने की बात की जाती है तो यह जेह्न में रहता है कि बुद्धि का उपयोग तो वनों में और गाँवों में भी था ही मगर जीवन के दैनंदिन व्यापार में शहर में आकर उसकी दखल बढ़ गयी.

शहर हमें गति देती है और देती है स्वतंत्रता. स्वतंत्रता नए लोगों से मिलने की, नई गलियों में जाने की, जीवन के नए कोणों के तलाश की. मगर जैसा कि कई चिन्तकों ने कहा है स्वतंत्रता का भी दबाव होता है मन पर अब हम अपनेी इच्छा को किसी समूह की समवेत इच्छा की छतरी में छुपा नहीं सकते. ऐसा अक्सर होता है कि जो चीज हमें बल देती है वहीं आघात भी पहुँचा सकती है.

आखिर जो समुद्र हमारी यात्रा की राह में बाधक था वही जब जहाज आया तो यात्रा का हाइवे बन गया और फिर इसी ने उपनिवेशवाद को भी संभव बनाया और ऐसी ही एक शै है समूह से अलग होकर एक व्यक्ति के रूप में हमारा अस्तित्व.

आखिर अब हम निर्णय लेने को ज्यादे स्वतंत्र हैं इसलिए इस स्वतंत्रता से उदभूत निर्णयों का उत्तरदायित्व भी हमारे ही उपर है. शहर ने कुछ और चीजों से भी हमारे मन को बावस्ता किया है जैसे कि अकेलापन और भीड़. भीड़ तो रहती है मगर उससे एकात्म होने का रास्ता अक्सर नहीं मिलता, आदमी अंततः अकेला ही रहता है.

‘‘सख्त सर्दी है. सड़कें ठिठुरी हुई है और कोहरे के बादल को चीरती हुई कारें और बसें हॉर्न बजाते हुई भाग रही हैं. सड़कों और पटरियों पर भीड़ है, पर कुहरे में लिपटा हुआ हर आदमी भटकती हुई रूह की तरह लग रहा है. वे रूहें चुपचाप धुंध के समुद्र में बढ़ती जा रही है’’ (कमलेश्वर, दिल्ली में एक मौत)

हों चेहरों का अपरिचित होने उसके समूह को धुंध में बदल देती है. शहर में बाहर से आने वाले प्रवासियेां के लिए अकेलापन में एक मूर्तता रहती है मगर जब परिचित भी अपरिचिय की ओर बढ़ने लगता है तो इस अकेलापन में एक दमघोंटू अमूर्तन आ जाता है और हम ऊब एवं बेचैनी जैसे मनःस्थितियों का सामना करते हैं.

पर मन को आशावाद के तल पर ले जाकर भीड़ को देखें तो यह आनन्दित भी करेगा- जैसे तरह तरह के लोगों का पुष्प-गुच्छ जहाँ हर फूल दूसरे फूल को स्वतंत्र छोड़ रहा.

भीड़ डर और घृणा पैदा करती रही है और यह 19वीं सदी में लोकतंत्र के विरोध के साथ नत्थी हो जाता था जैसा कि अंग्रेेजी उपन्यास परंपराओं के निर्माता में से एक डैनियल डिफो के उपन्यासों में मिलता है. मगर गौर से देखेंगे तो भीड़ का डरा हुआ अस्तित्व भी दिखेगा. आखिर हम भी भीड़ के हिस्से हैं, शहर के परेशनियों से अभिशिप्त भीड़ में हम अकेला होने के अभिशाप को घुला सकते हैं यह भीड़ भी हमारी तरह अपने काम्यों के जज्द्दोजहद में मुब्बिला प्यारे लोगों को समूह है जो खुद भी डरा हुआ, जैसा कि ‘रघुवीर सहाय’ कहते हैं -

यहाँ पँचकुइयों से शीला सिनेमा तक
थूक ही थूक है रात के दस बजे
भीड़ अब नहीं हैं, वे सब कहाँ गये,
बीमार फेफड़े, हाँफते लपकते हुए
फेंककर आए हैं जो दिल्ली के हाजिरी खाते में दस्तखत
ज़रा ज़रा दूर पर.

पूछो, सवाल है लोग कहाँ लोप हो गए हैं ?
हसन से हाँककर तुमने उन्हें कहाँ बन्द कर दिया
जीवन से जूझते फेफड़ों के सबूत
जिनके दिखे थे अभी यहीं आते हुए.

तो यह भीड़ भी अपने मन और तन के फेफड़ों से एक एक साँस के लिए जूझते हमारे जैसा लागों का समूह है.

जहाँ गाँव में बिजली की आमद का इंतजार लालटेन के शीशों की कालिमा को साफ करते हुए की जाती है तो वहीं प्रकाशमय शहर में शहद की गाढ़ी झील जैसी काली अंधियाली रात देखने की लालसा रहती है. गाँव हो या शहर अपनी मानसिक काया को पूर्णतायुक्त अखंडता सौंपना हमारे लिए आह्लादक होता है हालाँकि अपूर्णता ही कदाचित जीवन का सबसे करीबी रूपक है.

22.11.2011, 19.39 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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