पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

भगवा, हरा और काला आतंकवाद

किसानों के अंत की शुरुआत

छत्तीसगढ़, जीडीपी और कुल्हाड़ीघाट

शोषण का खेल चालू है

मुस्लिम पर्सनल लॉ के संहिताबद्ध होने से डर कैसा

पीपली लाइव का सीधा प्रसारण

ब्रिटिश कंपनी से लड़ाई अभी जारी है

सामुदायिक समीकरण बनाम विकासीय समीकरण

विचारहीन प्राथमिकताओं से आजादी

अब तक नौ

हिज़ाब पर हंगामा क्यों

पिया मेंहदी लिआय दा मोतीझील से...

किसानों के अंत की शुरुआत

छत्तीसगढ़, जीडीपी और कुल्हाड़ीघाट

भगवा, हरा और काला आतंकवाद

पत्थरबाजी में कुछ टूट गया है

डा. सुभाष राय

असलियत

रणेन्द्र

 
 पहला पन्ना > हिंद स्वराज > सौ सालPrint | Send to Friend | Share This 

हिन्द स्वराजः कार्य योजना और नैतिक चेतना

विचार

 

हिन्द स्वराजः कार्य योजना और नैतिक चेतना

गोविन्दचंद्र पांडे

 

यह एक विचित्र बात है कि संविधान सभा में गांधी जी का उल्लेख नहीं था. न ही उन्होंने किसी प्रकार का उसमें भाग लिया, जिस तरह की संवैधानिकता पर वर्तमान भारतीय व्यवस्था टिकी हुई है. प्रश्न उठता है कि ऐसी स्थिति में गांधीजी के विचारों का क्या संकलन हो सकता है? यह अपेक्षा कि एक कार्य योजना प्रस्तुत की जानी चाहिए, वास्तव में नितांत आधुनिक अवधारणा है और इस बात की प्रतियोगी अवधारणा भी है. इस पर हम विचार कर न रह जायें, किन्तु गांधी जी की दृष्टि से कार्य करने लिए उसे बनायें. गांधीजी स्वयं कर्मयोगी थे.
 

हिंद स्वराज

कर्मयोगी अपने दृष्टिकोण को ठीक रखता है, कार्य करता है. उसके परिणाम क्या होंगे उसका उतना ख्याल नहीं करता. इसमें कोई वास्तविक पारमार्थिक विरोध नहीं है कि कर्मयोग की दृष्टि के साथ कार्य योजना बनाएँ, लेकिन सिर्फ कार्य योजना बनाना ही अपर्याप्त होगा. आजकल जो 'हिन्द स्वराज' को महत्वपूर्ण मानते हैं उन्हें उस बात को फिर से सोचना आवश्यक है कि कहां तक वे इस विरोध के साथ सहमत होंगे या कहां तक विरोध को चरितार्थ करना चाहेंगे.

डॉ. नन्दा ने 'हिन्द स्वराज'को ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में समझाया है. उनके ख्याल से 'हिन्द स्वराज' में पश्चिमी सभ्यता के कुछ घटकों पर तात्कालिक कारणों से आक्षेप हैं जो कि अतिशयोक्तिपूर्ण हैं जिसमें भारतीय सभ्यता या आदर्श सभ्यता के बारे में एक ज्ञापन, प्रार्थना प्रस्तुत है. उसका उस समय भी भारतीय बुद्धिजीवियों ने निराकरण कर दिया था जैसे गोखले ने. उनका कहना है कि बाद में गांधीजी ने स्वयं अपना अभिमत अनेक अर्थों में बदला था.

मैं एक ही बात कहना चाहता हूं. गांधीजी ने क्या अपने सिद्धांत वास्तव में बदले थे, या उनके साथ समझौता किया था? या किसी रूप में यह देखते हुए कि कांग्रेस के, और बाहर के लोग दूसरी बात सोचते हैं-उन्होंने अपने आपको अलग खींच लिया था? मैं सोचता हूं कि यह दूसरी बात अधिक सही है, क्योंकि अनेक लोगों ने भारत विभाजन के बारे में उन्हें नहीं माना. उनका अपना मत दूसरा था. लेकिन औरों के मत का ख्याल रखते हुए और जनतांत्रिक भावना के अनुरूप उन्होंने अपने आपको अलग कर लिया.

मैं नहीं समझता कि गांधीजी के अपने विचारों व साधनों में मौलिक परिवर्तन आया था. लोग ऐसा सोचते हैं. जिनका ख्याल है कि जिस संस्कृति का उन्होंने खण्डन किया है, याने कि रेल्वे, कचहरी, अस्पताल, ये सब आवश्यक हैं, उनका विरोध कोई दूर तक कैसे कर सकता है? उनकी उपयोगिता प्रत्यक्ष है. अगर उनका विरोध किया गया तो जीवन संकुचित हो जाएगा. इसे संदर्भ सापेक्ष मानना चाहिए.

प्रत्यक्ष में एक चीज होती है और अप्रत्यक्ष में दूसरी चीज. मार्क्स ने विस्तार से बताया है कि यंत्रों का विकास पूंजीवाद के विकास के साथ नहीं है. उसकी एक अन्तर्गत व्याख्यात्मकता है जिसमें वह आगे बढ़ती चली जाती है. उसी प्रकार यह भी हो सकता है कि उपभोक्ता उनका नियंत्रण करे या अलग बैठकर विनियंत्रण करें, लेकिन ऐसा नहीं होता. यह यांत्रिकता अपनी गति से स्वयं अधिकाधिक तेजी से आगे बढ़ती जा रही है. यही कारण है कि जब से औद्योगिक क्रांति प्रारंभ हुई है उसकी गति बराबर बढ़ती गई है और तेज होती चली गई है.

रूस ने सोचा कि उसके सामाजिक हितों पर राज्य के द्वारा नियंत्रण किया जा सकता है. वहां भी यह प्रयोग सफल नहीं हुआ, और भारत में स्वयं वही स्थिति है. नियोजन की जितनी धारणा है, अव्यक्तप्राय है क्योंकि नियंत्रण का जो पूंजीवाद है, उसका एक मूल आधार है. व्यक्ति के लोभ और लाभ को अधिकतम करने की धारणा से प्रेरित होकर ही नये आविष्कार होते हैं और नये ढंग से उसमें 'रिस्क' लेते हैं. उसके बिना यह पूरी व्यवस्था गतिहीन हो जायेगी. वह फिर नष्ट हो जायेगी. 'यांत्रिक' शब्द तो नया है, लेकिन वैसे 'मशीन' और 'टूल' दोनों में बहुत अंतर है. सभी प्राचीन सभ्यताएं टूल्स, उपकरणों का उपयोग करती रही हैं. उपकरण को आप संचालित करते हैं, लेकिन यंत्र से आप संचालित होते हैं. उन दोनों में बहुत अंतर है. जो सुई का उदाहरण गांधीजी देते हैं वह तो सभ्यता मात्र की साक्षी है.

यह भी पढ़ें


अत्यंत प्राचीनकाल से मनुष्य उपकरण के द्वारा ही कार्य करता रहा है किन्तु यंत्र दूसरी चीज है. यंत्र के पीछे एक सोच है. एक में 'यूटिलिटी' होती है, और दूसरी ओर वैज्ञानिक आविष्कार होते हैं और इन दोनों से मिलकर ही सभ्यता का विकास होता है. वास्तव में विकास और पूंजी दोनों बातें है. विकास और आविष्कार भी दो भिन्न बातें है. आविष्कार होना चाहिए. लेकिन भारत में आजकल अधिक आविष्कार नहीं हो रहे हैं.
आगे पढ़ें

Pages:
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

chandramohan (mohanchandra309@gmail.com) lucknow

 
 गांधीजी के बारे में बात करने में डर लगता है, हम गांधी को मनुष्य नहीं रहने देना चाहते हैं. उन्हें भगवान का दर्जा देना चाहते हैं जब कि उनकी कोई भी परियोजना ऐसी नहीं है जो धरातल पर आज की तारीख में दिखाई दे. हम ये मानने को तैयार ही नहीं कि उनके प्रोग्राम एक खास अवधि में चले और उनके समय के लोगों ने अपने सामने ही दफन कर दिए.

आज जितने भी तथाकथित गांधीवादी है वो आराम से अपने ट्रस्ट में बैठकर हरामखोरी कर रहे हैं, और हम आज के समय में एक तरफ ग्लोबलाईजेशन की मलाई खा रहे हैं और दूसरी तरफ हास्यास्पद बातों में अपना समय बर्बाद कर रहे हैं.
 
   
 

Durgesh Thakur (shatabditimes@rediffmail.com) Kawardha

 
 बहुत ही अच्छा लेख है, मेरी शुभकामनाएं. 
   

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   

 

  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in