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हिन्द स्वराजः कार्य योजना और नैतिक चेतना
विचार
हिन्द स्वराजः कार्य योजना और नैतिक चेतना
गोविन्दचंद्र पांडे
यह
एक विचित्र बात है कि संविधान सभा में गांधी जी का उल्लेख नहीं था. न ही उन्होंने
किसी प्रकार का उसमें भाग लिया, जिस तरह की संवैधानिकता पर वर्तमान भारतीय व्यवस्था
टिकी हुई है. प्रश्न उठता है कि ऐसी स्थिति में गांधीजी के विचारों का क्या संकलन
हो सकता है? यह अपेक्षा कि एक कार्य योजना प्रस्तुत की जानी चाहिए, वास्तव में
नितांत आधुनिक अवधारणा है और इस बात की प्रतियोगी अवधारणा भी है. इस पर हम विचार कर
न रह जायें, किन्तु गांधी जी की दृष्टि से कार्य करने लिए उसे बनायें. गांधीजी
स्वयं कर्मयोगी थे.
कर्मयोगी अपने दृष्टिकोण को ठीक रखता है, कार्य करता है. उसके परिणाम क्या होंगे
उसका उतना ख्याल नहीं करता. इसमें कोई वास्तविक पारमार्थिक विरोध नहीं है कि
कर्मयोग की दृष्टि के साथ कार्य योजना बनाएँ, लेकिन सिर्फ कार्य योजना बनाना ही
अपर्याप्त होगा. आजकल जो 'हिन्द स्वराज' को महत्वपूर्ण मानते हैं उन्हें उस बात को
फिर से सोचना आवश्यक है कि कहां तक वे इस विरोध के साथ सहमत होंगे या कहां तक विरोध
को चरितार्थ करना चाहेंगे.
डॉ. नन्दा ने 'हिन्द स्वराज'को ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में समझाया है. उनके ख्याल
से 'हिन्द स्वराज' में पश्चिमी सभ्यता के कुछ घटकों पर तात्कालिक कारणों से आक्षेप
हैं जो कि अतिशयोक्तिपूर्ण हैं जिसमें भारतीय सभ्यता या आदर्श सभ्यता के बारे में
एक ज्ञापन, प्रार्थना प्रस्तुत है. उसका उस समय भी भारतीय बुद्धिजीवियों ने निराकरण
कर दिया था जैसे गोखले ने. उनका कहना है कि बाद में गांधीजी ने स्वयं अपना अभिमत
अनेक अर्थों में बदला था.
मैं एक ही बात कहना चाहता हूं. गांधीजी ने क्या अपने सिद्धांत वास्तव में बदले थे,
या उनके साथ समझौता किया था? या किसी रूप में यह देखते हुए कि कांग्रेस के, और बाहर
के लोग दूसरी बात सोचते हैं-उन्होंने अपने आपको अलग खींच लिया था? मैं सोचता हूं कि
यह दूसरी बात अधिक सही है, क्योंकि अनेक लोगों ने भारत विभाजन के बारे में उन्हें
नहीं माना. उनका अपना मत दूसरा था. लेकिन औरों के मत का ख्याल रखते हुए और
जनतांत्रिक भावना के अनुरूप उन्होंने अपने आपको अलग कर लिया.
मैं नहीं समझता कि गांधीजी के अपने विचारों व साधनों में मौलिक परिवर्तन आया था.
लोग ऐसा सोचते हैं. जिनका ख्याल है कि जिस संस्कृति का उन्होंने खण्डन किया है,
याने कि रेल्वे, कचहरी, अस्पताल, ये सब आवश्यक हैं, उनका विरोध कोई दूर तक कैसे कर
सकता है? उनकी उपयोगिता प्रत्यक्ष है. अगर उनका विरोध किया गया तो जीवन संकुचित हो
जाएगा. इसे संदर्भ सापेक्ष मानना चाहिए.
प्रत्यक्ष में एक चीज होती है और अप्रत्यक्ष में दूसरी चीज. मार्क्स ने विस्तार से
बताया है कि यंत्रों का विकास पूंजीवाद के विकास के साथ नहीं है. उसकी एक अन्तर्गत
व्याख्यात्मकता है जिसमें वह आगे बढ़ती चली जाती है. उसी प्रकार यह भी हो सकता है कि
उपभोक्ता उनका नियंत्रण करे या अलग बैठकर विनियंत्रण करें, लेकिन ऐसा नहीं होता. यह
यांत्रिकता अपनी गति से स्वयं अधिकाधिक तेजी से आगे बढ़ती जा रही है. यही कारण है कि
जब से औद्योगिक क्रांति प्रारंभ हुई है उसकी गति बराबर बढ़ती गई है और तेज होती चली
गई है.
रूस ने सोचा कि उसके सामाजिक हितों पर राज्य के द्वारा नियंत्रण किया जा सकता है.
वहां भी यह प्रयोग सफल नहीं हुआ, और भारत में स्वयं वही स्थिति है. नियोजन की जितनी
धारणा है, अव्यक्तप्राय है क्योंकि नियंत्रण का जो पूंजीवाद है, उसका एक मूल आधार
है. व्यक्ति के लोभ और लाभ को अधिकतम करने की धारणा से प्रेरित होकर ही नये
आविष्कार होते हैं और नये ढंग से उसमें 'रिस्क' लेते हैं. उसके बिना यह पूरी
व्यवस्था गतिहीन हो जायेगी. वह फिर नष्ट हो जायेगी. 'यांत्रिक' शब्द तो नया है,
लेकिन वैसे 'मशीन' और 'टूल' दोनों में बहुत अंतर है. सभी प्राचीन सभ्यताएं टूल्स,
उपकरणों का उपयोग करती रही हैं. उपकरण को आप संचालित करते हैं, लेकिन यंत्र से आप
संचालित होते हैं. उन दोनों में बहुत अंतर है. जो सुई का उदाहरण गांधीजी देते हैं
वह तो सभ्यता मात्र की साक्षी है.
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अत्यंत प्राचीनकाल से मनुष्य उपकरण के द्वारा ही कार्य करता रहा है किन्तु यंत्र
दूसरी चीज है. यंत्र के पीछे एक सोच है. एक में 'यूटिलिटी' होती है, और दूसरी ओर
वैज्ञानिक आविष्कार होते हैं और इन दोनों से मिलकर ही सभ्यता का विकास होता है.
वास्तव में विकास और पूंजी दोनों बातें है. विकास और आविष्कार भी दो भिन्न बातें
है. आविष्कार होना चाहिए. लेकिन भारत में आजकल अधिक आविष्कार नहीं हो रहे हैं.
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पूंजी के सहारे उधार लेकर हम चाहते हैं कि विकास हो. एक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री हैं.
उन्होंने लिखा है कि बहुत से विकासशील देशों में औद्योगिक क्रांति के पीछे सिर्फ
पूंजी होना पर्याप्त नहीं है. सिर्फ पूंजी से औद्योगिक क्रान्ति नहीं होती. वह
वास्तव में एक 'सायकॉलाजी' है. यह ऐसी चीज नहीं जो आपके मन से बाहर रखकर हो कि आप
विकास कर सकें, और आसानी से आगे बढ़ सकें. ऐसी कोई चीज नहीं है. वह तभी विकसित होती
है जब आपके मन पर हावी हो जाती है. तब वह आगे बढ़ती है. वास्तव में गति
वैज्ञानिक-पद्धति की भी प्रेरक है.
विज्ञान के बिना कोई सभ्यता नहीं है. पहले भी विज्ञान रहा है. तब ऐसा नया क्या हुआ?
यह कि सत्रहवीं शताब्दी के बाद से विज्ञान की प्रगति और गति बढ़ती चली गई. विज्ञान
एक शक्ति है, ज्ञान है. इसके साथ वह एक सामाजिक मनोवृत्ति भी है. इसमें तो कोई
संदेह नहीं है कि प्रतिदिन अवधारणा, (जो विश्वव्यापी अवधारणा है) का ज्ञान व्यापार
चल रहा है. वह ज्ञान मनुष्य को आत्मज्ञान देता है. यह अवधारणा कि ज्ञान या विज्ञान
शक्ति है-यह आधुनिक विज्ञान के साथ है. मैं यह कहना चाहता हूं कि वास्तव में जो
गांधीजी का विरोध आधुनिक सभ्यता से है, केवल बाहरी स्वरूप का विरोध नहीं,
मनोवृत्तियों को लेकर वह विरोध है. वह सिर्फ तात्कालिक रणनीति को लेकर नहीं है.
गांधीजी ने 'हिन्द स्वराज' में 'हिस्ट्री' का विरोध किया है. गांधी जी लिख चुके हैं
कि 'हिस्ट्री' का मतलब जो बीत गया वह विगत. लेकिन इतिहास सनातन दृष्टांत है. ऐसा
सत्य जिसका बार-बार उदाहरण देते रहते हैं और जिसको चरितार्थ करने के लिए मनुष्य
निरंतर साधना में लगा रहता है. ''टेस्टिंग द एक्सपीरिएंस'' के दृष्टांत से यात्री
को ठीक करना. यह दृष्ट द्वारा होता है, अदृष्ट द्वारा नहीं होता. जहां आप एक
प्रस्तावित लक्ष्य की तरफ मुड़ना चाहते हैं.
वह तो दृष्टांत से या अपने निहित स्वार्थ से उसको ठीक करते रहते हैं. लेकिन जब
अदृष्ट साध्य की साधना करते हैं, तब? आप कहां तक सच्चे हो पाएंगे? उसकी कैसे
परीक्षा होगी? जहां तक नैतिक और आध्यात्मिक आदर्श हैं, उनकी विशेषता है कि इनमें
अनुभव इनका सत्यापन नहीं करता बल्कि अनुभव इनसे सत्यापित होता है. उसको हमारे यहां
सनातन दृष्टांत कहा. उसे आप चरितार्थ कर पाएं तो आप नैतिक हैं. आधुनिक सभ्यता का जब
समर्थन किया करते हैं तो उसका जो प्रत्यक्ष वाद है उसके कारण वैसे ही नैतिक लक्ष्य
से, नैतिक धरातल से हट जाते है. नैतिक और आध्यात्मिक लक्ष्य रह ही नहीं पाते.
भारतीय इतिहास में बहुत से तत्व रहे हैं क्योंकि अभी तक, आजादी तक, कम से कम कुछ
दिनों से, आर्थिक परिवर्तन इतिहास की गति का प्रमुख कारण नहीं रहा है. एक सामाजिक
परिवर्तन की प्रक्रिया है, जो कि अविछिन्न ढंग से चली है. जिसमें पुरानी बातें, नई
बातें जुड़ती हुई आगे बढ़ती चली गई हैं. विदेशी संपर्क इस परिवर्तन का कारण रहा है.
लेकिन उससे नई बातें बनी हैं, कुछ आयाम जुड़े हैं, परन्तु मूल स्वतंत्रता की स्थिति
में परिवर्तन नहीं हुआ है. सन्तों की साधना से जरूर उसमें बीच-बीच में परिष्कार,
सुधार और अद्भुतता लाई जाती रही.
जनता का जीवन मुख्यत: कुछ मूलभूत प्रवृत्तियों में रहा है, जो जातियों के द्वारा
व्यक्त होती रही हैं. परन्तु वे आर्थिक वर्गों में विभाजित होकर नहीं रही हैं.
मनुष्य क्या होता है-मैं नहीं जानता. वास्तव में यह इतिहास के बारे में बड़ी भ्रांत
धारणा है जो आज सबसे अधिक प्रचलित है. नये भारत का हमको पता नहीं है. इतिहास में
क्या होने वाला है? इतिहास का भारत क्या है? विकासात्मक गति रही है जो आगे बढ़ती और
बढ़ती चली रही है. इसलिए पिछले तीन सौ वर्षों में सत्ता की जिस धारणा का विकास
पश्चिम में हुआ, उसकी आधारभूत बातें और सभ्यता दोनों ही इतिहास के भविष्य के द्योतक
हैं. इसलिए माना गया कि हमारा भी धर्म है उसका अनुसरण करना. पर यह धारणा ही भ्रांत
है.
इतिहास का जहां बड़ा विस्तार हुआ है, वहां जिन छ: हजार वर्षों के बारे में कुछ पता
है उससे अतीत भी तो मालूम पड़ता है. मनुष्य जो इतिहास से बहुत बड़ा है, उसके लिए
इतिहास की यह सब परिमापित प्रक्रिया उस वास्तविकता का तत्वत: जानने का कोई माध्यम
नहीं है. प्रगति की कल्पना आप कर लें. विकास की कल्पना आप कर लें. यह बात दूसरी है.
पर यह कल्पना तो वर्तमान का ही शाश्वतीकरण है.
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गांधीजी ने आधुनिक सभ्यता का जो मूलगामी विरोध किया उसके विरोध में उनके मन में
सिर्फ ऐतिहासिक सभ्यता नहीं थी क्योंकि सभ्यता की ऐतिहासिकता तो कल्पना है. भारतीय
सभ्यता का ऐतिहासिक पक्ष है. वह भी तो विविध है. उसमें बहुत सारी बातें जुड़ी हुई
है, अच्छी और बुरी. यह सही है कि सबसे बड़ा आदर्श जो भारत में स्वीकार किया जाता रहा
है, भले लोग उस पर उतना आचरण नहीं कर पायें, वह आदर्श यह है कि वह मनुष्य ज्ञानी है
जिसकी इच्छाएं-आकांक्षाएं कम से कम हों और जो त्यागी हो.
हमारे धर्मशास्त्र का यही आदर्श रहा है. यहां से प्रश्न उठता है कि किस व्यक्ति को
प्रमाण माना जाना चाहिए. हमारे यहां यह नहीं कहा जा सकता कि जो अधिक पढ़ा लिखा या
अधिक सत्तावान व्यक्ति हो- वह प्रामाणिक है और प्रमाणभूत है. बल्कि ऐसे व्यक्त्तिव
ही प्रमाण हैं जो राग-द्वेष से विहीन सज्जन पुरुष हैं. उन्हीं की बात मानी जानी
चाहिए-हमारी सभ्यता का आधार या सभ्यता का आदर्श यह है. जिस मनुष्य की इच्छाएं कम
हैं, वह संयमित और अनुशासित है. वह स्वराज की स्वाधीन मनोदशा में जीता है. तभी किसी
व्यवस्था में स्वराज समझा जा सकता है.
अपने ऊपर शासन, आत्मानुशासन, संयम, इच्छाओं को कम करना, न कि उनको बढ़ाना, विजय और
विस्तार की प्रवृत्ति नहीं बल्कि अनासक्ति की प्रवृत्ति, ये गांधीजी की अभीष्ट
सभ्यता का आदर्श है. उसका आधार, उसका मौलिक उद्देश्य हैं. पर आधुनिक सभ्यता का
आदर्श क्या है, यह समझ में नहीं आता. यह बात दूसरी है कि सभी आदर्शों की तरह कोई
आदर्श पूरी तरह से चरितार्थ नहीं हुए हैं. कोई आदर्श रह ही नहीं गये हैं. और ऐसे भी
सभी व्यक्ति गांधीजी नहीं हो सकते, और यह कहना कि गांधीजी के अनुयायियों में से कुछ
गांधीजी के आदर्श अनुसरण नहीं करते थे, तो उनके लिये कोई द्वेष नहीं है.
सभी सभ्यताओं और आदर्शों में यह होता है. आदर्श के लिए प्रयत्न करना ही वास्तव में
आदर्श का सबसे बड़ा सिद्धांत होता है. शंकराचार्य ने गीता भाष्य में भी यही लिखा है.
सारे साधन-साध्य संबंध ऐसे हैं. यहां साधन प्रतिक्षण बदलते रहते हैं और साध्य के
लिए प्रश्न होता है कि कैसे साध्य मिलें. ऐसी सारी आध्यात्मिक साधना होती है. इसलिए
आदर्श चिंतन ही साधना होती है, इसमें कोई बाहरी क्रिया साधना नहीं होती है.
गांधीजी के प्रति आदर सम्मान रखना यह एक बड़ी बात है. लेकिन आजकल आदर भाव औपचारिक
रूप से भी नहीं रह गया है. ऐसा भी ध्यान में आया है कि कुछ लोग कहते हैं कि गांधीजी
ठीक नहीं थे और गांधीजी के सत्याग्रह का अर्थ यही होता है कि जिसे आप ठीक समझते हैं
उस पर टिके रहें. वह दृष्टि और है. मैं नहीं समझता वह गलत है. पार्लियामेण्टरी
डेमोक्रेसी का आधार वास्तव में हमारे यहां नया नहीं है. पहले भी यह था, सरोकारों से
समझौता. आपस में मिलकर तय कर लें और वैसा आचरण करें. डेमोक्रेसी का आदर्श यही है.
जो डेमोक्रेसी का आदर्श प्रस्तुत किया है, उसका आधार जन-जन में रहे. राष्ट्रीय
अभिव्यक्ति लक्ष्य थी.
मुख्य बात थी कि जो बात सबकी है, उसको स्वीकार करना चाहिए. जहां बहुत से लोग मिलकर
आपस में तर्क वितर्क कर सही बात समझ सकें, ऐसा प्रायः व्यवहार में होता ही नहीं.
अत: आदर्श का पूरा व्यवहार तो हो नहीं पाता. आदर्श को आदर्श मानकर उसका चिन्तन करते
रहना, उस दिशा में प्रयास करते रहना, यही मुख्य बात है. पार्लियामेन्ट का यह दबदबा,
डेमोक्रेसी का यह अर्थ कि इसमें बहुतों को बुद्धि से सही बात पता चले, ऐसा तो रह ही
नहीं गया है. कौन कितना अधिक धन बटोर सकता है और लोगों को साथ रख पाता है, उसके बाद
और अधिक रूप से कैसे लोगों को संचालित कर सकते हो, यही जनतंत्र का अर्थ हो गया है.
जनतंत्र का यह अर्थ गांधीजी स्वीकार नहीं करते.
मैं समझता हूं कि कर्तव्य पालन,संयम, इच्छाएं कम करना, यही स्वराज्य है और यही
'हिन्द स्वराज' का मूल तात्पर्य है. मैं सोचता हूं कि इस तात्पर्य पर मनन करना एक
बड़ी चीज है. कैसे करें, किसी न किसी क्षेत्र में कहीं न कहीं यह अभिव्यक्त कैसे हो,
यह सोचना चाहिए. अगर हम इस प्रकार का मनन करने लगें तो बड़ी बात होगी. तिवारी जी
इसके लिए धन्यवाद के पात्र हैं कि उन्होंने इस तरह के समागम और विमर्श की कल्पना की
और यहां भी अपना संकल्प बताया कि इसमें हिन्द स्वराज को वास्तविक मानने के लिए वे
प्रतिश्रुत हैं. मैं यही कहना चाहता हूं कि सभी विचारशील व्यक्ति उनके साथ होंगे.
22.11.2009, 14.22(GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | chandramohan (mohanchandra309@gmail.com) lucknow | | | | गांधीजी के बारे में बात करने में डर लगता है, हम गांधी को मनुष्य नहीं रहने देना चाहते हैं. उन्हें भगवान का दर्जा देना चाहते हैं जब कि उनकी कोई भी परियोजना ऐसी नहीं है जो धरातल पर आज की तारीख में दिखाई दे. हम ये मानने को तैयार ही नहीं कि उनके प्रोग्राम एक खास अवधि में चले और उनके समय के लोगों ने अपने सामने ही दफन कर दिए.
आज जितने भी तथाकथित गांधीवादी है वो आराम से अपने ट्रस्ट में बैठकर हरामखोरी कर रहे हैं, और हम आज के समय में एक तरफ ग्लोबलाईजेशन की मलाई खा रहे हैं और दूसरी तरफ हास्यास्पद बातों में अपना समय बर्बाद कर रहे हैं. | | | | | |
| | Durgesh Thakur (shatabditimes@rediffmail.com) Kawardha | | | | बहुत ही अच्छा लेख है, मेरी शुभकामनाएं. | | | | | |
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