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रणेन्द्र

 
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हिंद स्वराज के सौ साल

महात्मा गांधी के दर्शन की बीज पुस्तक कही जाने वाली हिन्द स्वराज को प्रकाशित हुये 100 साल हो गये हैं और गांधीजी की यह कालजयी कृति एक बार फिर से विमर्श के केंद्र में है. 3 व 4 अक्टूबर 1995 को हिन्द स्वराज को केंद्र में रख कर महात्मा गांधी 125वीं जयंती समारोह ने भोपाल में एक महत्वपूर्ण आयोजन किया था. यहां प्रस्तुत आलेख उसी समारोह में व्यक्त किये गये विचारों के संपादित अंश हैं, जिसे हमें उस आयोजन के संयोजक व गांधीवादी चिंतक कनक तिवारी ने उपलब्ध कराया है.

गांधी दर्शन का मौलिक सूत्र

हिन्द स्वराज गांधीजी के जीवन दर्शन का मौलिक सूत्र है और अन्तिम समय तक गांधीजी उसे ऐसा ही मानते रहे. वे देख रहे थे कि मानव सभ्यता एक आंतरिक क्रूरता की दिशा में बढ़ रही है.

रामेश्वर मिश्र  पंकज के विचार

दस्तक देता दस्तावेज

विचार के क्षेत्र में विचार से ज्यादा वैचारिक दृष्टि का महत्व होता है. आज की तारीख़ में हमें गांधीजी के संदर्भ में प्रचलित सफलता या असफलता जैसी कसौटी और परिभाषा को भी छोड़ना होगा.

नरेश मेहता के विचार

हिन्द स्वराजः कार्य योजना और नैतिक चेतना

यह एक विचित्र बात है कि संविधान सभा में गांधी जी का उल्लेख नहीं था. न ही उन्होंने किसी प्रकार का उसमें भाग लिया, जिस तरह की संवैधानिकता पर वर्तमान भारतीय व्यवस्था टिकी हुई है. प्रश्न उठता है कि ऐसी स्थिति में गांधीजी के विचारों का क्या संकलन हो सकता है?

गोविन्दचंद्र पांडे के विचार

गांधी

स्वधर्म की खोज

एक जो केन्द्रीय बात 'हिन्द स्वराज' में लगती है और जिसे स्पष्ट शब्दों में कहना मैं पसंद करूंगा, वह यह कि गांधीजी इस पुस्तक में सभ्यता के बरक्स धर्म को रखते हैं.

नंद किशोर आचार्य के विचार

Gandhi

टूटते भारत में हमारे हिस्से के गांधी

'हिन्द स्वराज' मूलत: एक संवाद है. उसकी विषयवस्तु अपनी जगह है. लेकिन उसकी संरचना एक संवाद की है. संवाद की विशेषता यह होती है कि वह विपरीत विचार के बिना नहीं हो सकता. कृष्ण कुमार के विचार

 


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