पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
 पहला पन्ना > हिंद स्वराज > सौ सालPrint | Send to Friend | Share This 

हिन्द स्वराज की सभ्यता दृष्टि

विचार

 

हिन्द स्वराज की सभ्यता दृष्टि

रमेशचंद्र शाह

 

गांधीजी का 'हिन्द स्वराज' और श्री अरविन्द का 'फाउण्डेशन ऑफ इण्डियन कल्चर' लगभग आस-पास की ही, बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों की ही रचनाएं हैं. दोनों में एक चीज उभयनिष्ठ है और वह है, दोनों में व्याप्त सांस्कृतिक आत्म-विश्वास का स्वर. इस सांस्कृतिक आत्म-विश्वास की पीठिका पर ही दोनों के भीतर से वह अंतर्वस्तु आकार ग्रहण करती और मुखरित होती है, जिसे हम सभ्यता-समीक्षा कह सकते हैं.

महात्मा गांधी

एक आक्रान्त सभ्यता द्वारा आक्रामक सभ्यता को दिया गया ऐसा प्रत्युत्तार जो उस आक्रामक सभ्यता के दिग्विजयी अहंकार को उसकी ऐतिहासिक यात्रा में ही नहीं, प्रत्युत उसके मूलाधार में ही चुनौती देता प्रतीत होता है. लगता है, जैसे एक समूची राष्ट्रीय अस्मिता अपने अपमान और जलन की पराकाष्ठा के बिंदु पर ही सहसा उठकर खड़ी हो गई है और संभवत: अपने सुदीर्घ इतिहास में पहली बार इस तरह स्वचेतन होकर अपने को और दूसरे को पहचानने और परिमापित करने का उपक्रम कर रही है.

निश्चय ही वह उपक्रम अभी बीजावस्था का ही है: उसका भरपूर बौद्धिक विमर्श अभी होना है. किन्तु बीजरूपी आलोचना में, विशेषकर अपनी परस्पूरक अंतर्दृष्टियों के चलते जैसा विचार-मंथन इन बीजग्रंथों के निमित्ता से संभव और अपेक्षित था, वैसा स्वातंत्र्योत्तार युग में हुआ नहीं दिखता. यह उदासीनता अपने आप में हमारे बुद्धिजीवन की प्रामाणिकता पर बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह है. मानने को मन करता है कि 'हिन्द स्वराज' पर पुनर्विचार करने का प्रसंग इसी प्रश्न का उत्तर पाने का उपक्रम है.

'हिन्द-स्वराज' की मूल चिंता को उसके अनुरूप शोध और विद्वता के स्तर पर जिलाए रखने के प्रयत्न में जुटे श्री धर्मपाल ने अपने एक व्याख्यान में कहा है, ''समय-समय पर विभिन्न सभ्यताओं को अपनी मौलिक मान्यताओं को फिर से समझकर अपने भविष्य की दिशा ढूंढ़ने का काम करना पड़ता है. भारतीय सभ्यता के इतिहास में अनेक बार ऐसा हुआ होगा.''

'हिन्द स्वराज' ऐसे ही काम का आरंभ था-उसका निर्देशक बीजसूत्र था. बहुत से लोग होंगे जो श्री अरविन्द के 'फाउंडेशन ऑफ इंडियन कल्चर' में भी उसी तरह की प्रेरणा देखेंगे. जाहिर है कि ऐसा काम एक सामूहिक प्रयत्न की ओर निरन्तर अन्वेषण-पुन्यवेषण की मांग करता है. जाहिर है कि आत्मविस्मृति के कारण ही नहीं, एक सचमुच के दुर्निवार्य दुचित्तेपन के चलते न केवल स्वातंत्र्योत्तार काल में, बल्कि स्वयं हमारे स्वाधीनता संग्राम के दौर में ही इस अनिवार्य कर्तव्य की उपेक्षा हुई.

उपन्यासकार ई.एम.फॉस्टर ने सन् 1924 और सन् 1944 के अपने भारत प्रवासों का उल्लेख करते हुए इस बात पर खासी हैरानी जताई थी कि यहां के बुद्धिजीवी वर्गों में उन्हें अपने देश के आर्थिक और सांस्कृतिक प्रश्नों के बारे में किसी प्रकार की कोई सजगता क्यों नहीं दिखाई देती? देश के नव निर्माण का किसी प्रकार का भी कोई नक्षा उनके दिमाग में क्यों नहीं है? सिवाय राजनीति के और कोई बात नहीं करना चाहिये, ऐसा क्यों है? राजनीति के प्रति जगा यह नया-नया उत्साह भी अगर अपने लिए उपयुक्त और सही राजनीति की खोज से जुड़ा होता, तो भी एक बात थी. परन्तु जैसा कि बाद के घटनाचक्र से साबित हुआ, वह वैसा भी नहीं था.

जहां आरंभ बिन्दु पर ही अपनी सभ्यता के संकट और स्वधर्म का ऐसा बोध और आर्थिक और सांस्कृतिक प्रश्नों से, प्रत्यासन्न समस्याओं से इतना गहरा जुड़ाव और मूलगामी मंथन प्रकट हुआ हो, जैसा 'हिन्द स्वराज' के गांधी और 'फाउंडेशन्स ऑफ इंडियन कल्चर' के लेखक श्री अरविन्द में दिखाई देता है और दोनों ही अपने लिए उपयुक्त सही राजनीति की खोज भी अपने-अपने ढंग से करते रहे हों, वहां बुद्धिजीवी वर्ग में ऐसे विचलन और गतिरोध का क्या कारण हो सकता है? विशेषकर, जबकि सांस्कृतिक आत्मविश्वास के वे दोनों स्त्रोत, जो गांधी और अरविन्द में सक्रिय दिखते हैं, आपस में कहीं गहरे में जुड़े होकर भी काफी अलग थे.

श्री अरविन्द के आत्मविश्वास का स्त्रोत प्राचीन भारत के सांस्कृतिक आध्यात्मिक आभिजात्य में, उसकी शाश्वत सार्वभौम आत्म-संस्कृति में था, जिसकी अवरुद्ध सृजनात्मकता को फिर से जगाया जा सकता है. जबकि गांधी के आत्मविश्वास का स्त्रोत ठेठ वर्तमान में जी रहे हिन्दुस्तान के निरक्षर किन्तु संस्कारी कोटि-कोटि जन हैं. उन्हीं के शब्दों में, ''हिन्दुस्तानी महासागर के किनारे पर मैल जमा है. उस मैल से जो गंदे हो गए हैं, उन्हें साफ होना है. बाकी करोड़ों लोग तो सही रास्ते पर ही हैं.'' इससे क्या यह नहीं लगता कि उन्हें बुद्धिजीवियों पर भरोसा नहीं था?

'हिन्द स्वराज' में कहीं-कहीं तीखा व्यंग्य भी मिलता है जिसकी धार बुद्धिजीवियों के मत्थे ही तेज की गई है. जैसे, एक जगह प्रश्नकर्ता पूछता है, ''राष्ट्र से आप क्या कहेंगे?'' उत्तर में प्रतिप्रश्न किया गया है-''राष्ट्र कौन है?'' तो प्रश्नकर्ता समझता है, ''वही, जो लोग यूरोप की सभ्यता में रंगे हुए हैं और स्वराज की आवाज उठा रहे हैं.'' एक जगह आता है कि ''जहां-जहां यह चांडाल सभ्यता नहीं पहुंची है, वहां हिन्दुस्तान आज भी वैसा ही है. उस पर न अंग्रेज राज कर सके, न आप कर सकेंगे.'' 
आगे पढ़ें

Pages:

[an error occurred while processing this directive]
 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in