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हिन्द स्वराज की सभ्यता दृष्टि
विचार
हिन्द स्वराज की सभ्यता दृष्टि
रमेशचंद्र शाह
गांधीजी का 'हिन्द स्वराज' और श्री अरविन्द का 'फाउण्डेशन ऑफ इण्डियन कल्चर' लगभग
आस-पास की ही, बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों की ही रचनाएं हैं. दोनों में एक चीज
उभयनिष्ठ है और वह है, दोनों में व्याप्त सांस्कृतिक आत्म-विश्वास का स्वर. इस
सांस्कृतिक आत्म-विश्वास की पीठिका पर ही दोनों के भीतर से वह अंतर्वस्तु आकार
ग्रहण करती और मुखरित होती है, जिसे हम सभ्यता-समीक्षा कह सकते हैं.
एक आक्रान्त सभ्यता द्वारा आक्रामक सभ्यता को दिया गया ऐसा प्रत्युत्तार जो उस
आक्रामक सभ्यता के दिग्विजयी अहंकार को उसकी ऐतिहासिक यात्रा में ही नहीं, प्रत्युत
उसके मूलाधार में ही चुनौती देता प्रतीत होता है. लगता है, जैसे एक समूची राष्ट्रीय
अस्मिता अपने अपमान और जलन की पराकाष्ठा के बिंदु पर ही सहसा उठकर खड़ी हो गई है और
संभवत: अपने सुदीर्घ इतिहास में पहली बार इस तरह स्वचेतन होकर अपने को और दूसरे को
पहचानने और परिमापित करने का उपक्रम कर रही है.
निश्चय ही वह उपक्रम अभी बीजावस्था का ही है: उसका भरपूर बौद्धिक विमर्श अभी होना
है. किन्तु बीजरूपी आलोचना में, विशेषकर अपनी परस्पूरक अंतर्दृष्टियों के चलते जैसा
विचार-मंथन इन बीजग्रंथों के निमित्ता से संभव और अपेक्षित था, वैसा
स्वातंत्र्योत्तार युग में हुआ नहीं दिखता. यह उदासीनता अपने आप में हमारे
बुद्धिजीवन की प्रामाणिकता पर बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह है. मानने को मन करता है कि
'हिन्द स्वराज' पर पुनर्विचार करने का प्रसंग इसी प्रश्न का उत्तर पाने का उपक्रम
है.
'हिन्द-स्वराज' की मूल चिंता को उसके अनुरूप शोध और विद्वता के स्तर पर जिलाए रखने
के प्रयत्न में जुटे श्री धर्मपाल ने अपने एक व्याख्यान में कहा है, ''समय-समय पर
विभिन्न सभ्यताओं को अपनी मौलिक मान्यताओं को फिर से समझकर अपने भविष्य की दिशा
ढूंढ़ने का काम करना पड़ता है. भारतीय सभ्यता के इतिहास में अनेक बार ऐसा हुआ होगा.''
'हिन्द स्वराज' ऐसे ही काम का आरंभ था-उसका निर्देशक बीजसूत्र था. बहुत से लोग
होंगे जो श्री अरविन्द के 'फाउंडेशन ऑफ इंडियन कल्चर' में भी उसी तरह की प्रेरणा
देखेंगे. जाहिर है कि ऐसा काम एक सामूहिक प्रयत्न की ओर निरन्तर अन्वेषण-पुन्यवेषण
की मांग करता है. जाहिर है कि आत्मविस्मृति के कारण ही नहीं, एक सचमुच के
दुर्निवार्य दुचित्तेपन के चलते न केवल स्वातंत्र्योत्तार काल में, बल्कि स्वयं
हमारे स्वाधीनता संग्राम के दौर में ही इस अनिवार्य कर्तव्य की उपेक्षा हुई.
उपन्यासकार ई.एम.फॉस्टर ने सन् 1924 और सन् 1944 के अपने भारत प्रवासों का उल्लेख
करते हुए इस बात पर खासी हैरानी जताई थी कि यहां के बुद्धिजीवी वर्गों में उन्हें
अपने देश के आर्थिक और सांस्कृतिक प्रश्नों के बारे में किसी प्रकार की कोई सजगता
क्यों नहीं दिखाई देती? देश के नव निर्माण का किसी प्रकार का भी कोई नक्षा उनके
दिमाग में क्यों नहीं है? सिवाय राजनीति के और कोई बात नहीं करना चाहिये, ऐसा क्यों
है? राजनीति के प्रति जगा यह नया-नया उत्साह भी अगर अपने लिए उपयुक्त और सही
राजनीति की खोज से जुड़ा होता, तो भी एक बात थी. परन्तु जैसा कि बाद के घटनाचक्र से
साबित हुआ, वह वैसा भी नहीं था.
जहां आरंभ बिन्दु पर ही अपनी सभ्यता के संकट और स्वधर्म का ऐसा बोध और आर्थिक और
सांस्कृतिक प्रश्नों से, प्रत्यासन्न समस्याओं से इतना गहरा जुड़ाव और मूलगामी मंथन
प्रकट हुआ हो, जैसा 'हिन्द स्वराज' के गांधी और 'फाउंडेशन्स ऑफ इंडियन कल्चर' के
लेखक श्री अरविन्द में दिखाई देता है और दोनों ही अपने लिए उपयुक्त सही राजनीति की
खोज भी अपने-अपने ढंग से करते रहे हों, वहां बुद्धिजीवी वर्ग में ऐसे विचलन और
गतिरोध का क्या कारण हो सकता है? विशेषकर, जबकि सांस्कृतिक आत्मविश्वास के वे दोनों
स्त्रोत, जो गांधी और अरविन्द में सक्रिय दिखते हैं, आपस में कहीं गहरे में जुड़े
होकर भी काफी अलग थे.
श्री अरविन्द के आत्मविश्वास का स्त्रोत प्राचीन भारत के सांस्कृतिक आध्यात्मिक
आभिजात्य में, उसकी शाश्वत सार्वभौम आत्म-संस्कृति में था, जिसकी अवरुद्ध
सृजनात्मकता को फिर से जगाया जा सकता है. जबकि गांधी के आत्मविश्वास का स्त्रोत ठेठ
वर्तमान में जी रहे हिन्दुस्तान के निरक्षर किन्तु संस्कारी कोटि-कोटि जन हैं.
उन्हीं के शब्दों में, ''हिन्दुस्तानी महासागर के किनारे पर मैल जमा है. उस मैल से
जो गंदे हो गए हैं, उन्हें साफ होना है. बाकी करोड़ों लोग तो सही रास्ते पर ही
हैं.'' इससे क्या यह नहीं लगता कि उन्हें बुद्धिजीवियों पर भरोसा नहीं था?
'हिन्द स्वराज' में कहीं-कहीं तीखा व्यंग्य भी मिलता है जिसकी धार बुद्धिजीवियों के
मत्थे ही तेज की गई है. जैसे, एक जगह प्रश्नकर्ता पूछता है, ''राष्ट्र से आप क्या
कहेंगे?'' उत्तर में प्रतिप्रश्न किया गया है-''राष्ट्र कौन है?'' तो प्रश्नकर्ता
समझता है, ''वही, जो लोग यूरोप की सभ्यता में रंगे हुए हैं और स्वराज की आवाज उठा
रहे हैं.'' एक जगह आता है कि ''जहां-जहां यह चांडाल सभ्यता नहीं पहुंची है, वहां
हिन्दुस्तान आज भी वैसा ही है. उस पर न अंग्रेज राज कर सके, न आप कर सकेंगे.''
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फिर भी, इसे असली राष्ट्र मानने और ''दूसरों के सीखने लायक नहीं, दूसरों को सिखाने
लायक'' बताने के बावजूद, गांधीजी अंग्रेजी शिक्षा के कारण पैदा हुए जोश को निरर्थक नहीं मानते, उपयोगी मानते
हैं. दंभी और स्वार्थी धर्माचार्यों तथा हिन्दुस्तानी रॉकफेलरों में सद्बुद्धि
जगाना भी इन बुद्धिजीवियों के सहयोग के बिना संभव नहीं है-यह भी उन्हें साफ दीखता
है. आखिर स्वयं गीता के एक भाष्यकार होने के नाते वे गीता के इस कॉमन सेंस को कैसे
नकार सकते थे कि ''समाज के श्रेष्ठ जन जैसा आचरण करते हैं, वैसा ही आचरण देर-सवेर
बाकी लोग भी करने लगते हैं.''
श्रेष्ठजन जिन मूल्यों को अपनाते हैं, वे चाहे जैसे हों, सामान्य लोग भी उन्हीं का
अनुकरण करने लगते हैं. इसलिए वे जहां एक ओर डंके की चोट पर यह घोषित करते दीखते हैं
कि ''हम शिक्षित गुलाम हैं-सारा हिन्दुस्तान नहीं'', वहीं-उसी सांस में वे यह भी
जोड़ने को अन्तर्विवश होते हैं कि ''फिर भी चलो, हमारी गुलामी सारे देश की गुलामी
है, ऐसा मानना ठीक है.''
फिलहाल हम उस सभ्यता-समीक्षा को ही थोड़ा आंख गड़ाकर देखें जो 'हिन्द-स्वराज' को उसके
वादी-संवादी-विवादी सुरों के साथ अद्यावधि जीवन्त और प्रासंगिक बताती है और गहरे
मतभेदों के बावजूद अन्य चिंतनधाराओं से गहरे में जोड़ती है. 'मैंने जो कुछ कहा
है.....'-गांधीजी इस सुदीर्घ संवाद का समापन करते हुए कहते हैं,.....'वह अंग्रेजों
के प्रति द्वेष होने के कारण नहीं, उनकी सभ्यता के प्रति द्वेष होने के कारण कहा
है.' अंग्रेज की सभ्यता से उनका आशय यूरोप की सभ्यता से और उसमें भी आजकल की सभ्यता
से है.
पुस्तक के छठे अध्याय में, जिसका शीर्षक हिन्दी अनुवाद में 'सभ्यता का दर्शन' रखा
गया है, लेखक यूरोप की इस आधुनिक सभ्यता को स्वयं कुछ विवेकवान यूरोपीय लेखकों के
ही मूल्यांकन के मुताबिक 'एक तरह का रोग' बताता है, जिसकी पहचान यह है कि 'वह बाहरी
खोजों में और शरीर के सुख में ही अपनी सार्थकता और पुरुषार्थ मानती है.' सर्वविदित
है कि सारोकिन सरीखे समाजशास्त्रियों ने भी आधुनिक यूरोपीय संस्कृति को ऐन्द्रिक
संस्कृति ही निरूपित किया है. मानवीय पुरुषार्थ की विडम्बना स्वरूप इस आधुनिक
सभ्यता के लक्षण लेखक जिस तरह एक के बाद एक गिनाना शुरू करता है, वह थोड़े में ही
देखने लायक है:
जाहिर है कि यहां लेखक की दृष्टि मानवीय बुद्धि की तत्काल फल देनेवाली चमत्कारिक
उपलब्धियों पर न जाकर उस मूल्य विपर्यय और पुरुषार्थ-विडम्बना पर टिकी है जो
प्रत्यक्ष को परोक्ष में बदल देता है, और दूर को पास ले आने, दूरी को ही मिटा डालने
के यांत्रिक दंभ को प्रश्रय देकर वास्तविक निकटता को, आत्मसर्जित निकटता को ही मिटा
डालने का खतरा पैदा कर देता है. अकारण ही नहीं कि गांधीजी इस सभ्यता को प्रोफेटिक
धर्मों की शब्दावली में ''शैतानी सभ्यता'' और अपने सनातन धर्म की शब्दावली में
''निरा कलियुग'' बताते हैं.
यह भी निरा संयोग नहीं कि हिन्दुस्तानी सभ्यता के लिए जल के महासागर का रूपक
इस्तेमाल करने के बाद उन्हें इस आधुनिक यूरोपीय सभ्यता के लिए जो रूपक सूझता है, वह
आग का रूपक है. कहते हैं: ''यह सभ्यता ऐसी है कि अगर हम हाथ पर हाथ धरके बैठे
रहेंगे तो इस सभ्यता की चपेट में आए हुए लोग खुद की जलाई हुई आग में जल मरेंगे.''
यह आग वही तृष्णा की आग है जिसका उल्लेख महात्मा बुद्ध के ''फायर सर्मन'' में हुआ
है (आनन्द, ''सारा संसार इस आग में जल रहा हैः चक्षु और चक्षु का विषय, कान और कान
का विषय.....सारी इन्द्रियां और सारे ऐन्द्रिय विषय इस भट्ठी को भड़काने में लगे हुए
हैं, आनंद!'')
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इस प्रकार गांधीजी को दु:स्वप्न सता रहा है. यह अपने लोगों, अपनी सभ्यता के इस
ऐन्द्रिक-भोगमूलक सभ्यता के चक्र में फंस जाने का दु:स्वप्न है. उन्हें जो चिन्ता
इस सदी की शुरुआत में पश्चिम और पश्चिमी मानवता के अपने साक्षात अनुभव के भीतर से
व्याप्त रही है- वह यह है कि हमारा बुद्धिजीवी वर्ग अपने नए-नए जोश में कहीं इस
प्राणवान किन्तु मूल्यान्ध सभ्यता की संक्रामकता का खुद ही शिकार न हो जाए. उन्हें
पता है कि जहां कभी कोई बीमारी नहीं होती, वहीं संक्रामक रोग सबसे घातक असर करता
है.
आसन्न संकट का यह दुर्निवार्य अहसास ही उन्हें 'हिन्द स्वराज' में इस आधुनिक सभ्यता
के आमूलचूल बहिष्कार की भाषा में बात करने को, रोग की भयंकरता का ही समानुपाती
आत्यंतिक इलाज सुझाने को प्रेरित करता है. दुर्भाग्य की बात है कि गांधीजी के पास
दूरदृष्टा विवेक से प्रतिष्कृत होने के बजाए उनके समकालीन उस आत्यंतिक इलाज की
आक्षरिकता में, उसके ब्यौरों में ही उलझकर रह गये. उसे 'सभ्यता-समीक्षा' की तरह
देखने के बदले, उसमें अपनी परखने और मुकाबला करने की शक्ति को संगठित करने की
चुनौती पढ़ने के बदले, उसमें मात्र एक पलायनेच्छा, मात्र एक सतही आधुनिकता-विरोध,
मात्र एक सरल मनमाना चिन्तन पढ़कर उसे अनदेखा-अनसुना करने में ही अपनी कुशलता समझते
रहे.
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इस तरह उन्होंने अपने आचरण से 'हिन्द स्वराज' में व्यक्त गांधी के इस मूल्यांकन पर
ही मुहर लगा दी कि पश्चिम का प्रबुद्ध वर्ग हमारे प्रबुद्ध वर्ग की तुलना में कहीं
अधिक योग्य और दायित्व बोध सम्पन्न है और अपने पैदा किए हुए रोग से खुद लड़ने में
सक्षम है.
जहां एक ओर वे यूरोप की इस वस्तुस्थिति को साफ और सचेष्ट ढंग से सामने रखते हैं कि
''यह अधर्मी सभ्यता यूरोप में इस कदर फैल गई है कि वहां के लोग आधे पागल नजर आते
हैं, उनमें सच्ची कुव्वत नहीं है. वे नशा करके अपनी ताकत कायम रखते हैं. अपने साथ
दो घड़ी भी अकेले रह जाने से उन्हें भारी भय लगता है.'' वहीं, साथ में वे यह कहना भी
नहीं भूलते कि ''वर्तमान चाहे जैसा हो, उनका भविष्य भी अंधकारमय हो, यह जरूरी नहीं
है. ये काबिल प्रजा है और इसलिए किसी दिन उस जाल से निकल भी आएंगे. वे साहसी और
मेहनती हैं. यह सभ्यता उनके लिए कोई अमिट रोग नहीं हैं. भले अभी वे उस रोग में फंसे
हुए हैं.''
स्पष्ट ही, गांधीजी को अपने समकालीनों के बारे में, स्वराज की मांग करनेवाले अपने
साथियों-अनुयायियों के बारे में भी कोई भ्रांति नहीं थी. उनके आत्मविश्वास के
स्त्रोत की भी प्रदूषणीयता को नजरअंदाज नहीं कर सकते थे. यदि हम 'हिन्द स्वराज' को
केवल आधुनिकता के विरुद्ध जेहाद की तरह, मात्र एक व्यतीत युग में लौट जाने के
आव्हान की तरह देखना चाहें तो वह आज भी हमें उसी तरह दीखेगा. मगर तब हम उस जमीन पर
खड़े होकर उसे नहीं देख रहे होंगे, जहां खड़े होकर गांधी ने यूरोपीय सभ्यता को देखा
था और उसके अपनी समझ से श्रेष्ठतम सर्जकों-प्रतिनिधियों से संवाद कायम करने की
कोशिश की थी.
यह बात बिलकुल दूसरी है कि वे टॉल्स्टॉय के अन्तर्द्वन्द्व और आन्तरिक विग्रह को भी
समझ सके थे या नहीं. योरोपीय धर्मदृष्टि और ज्ञानदृष्टि के मौलिक अन्तर्विरोधों को
भी यथावत् देख सके थे या नहीं. किन्तु इतना तो स्पष्ट है ही कि 'हिन्द स्वराज' के
लेखक का आत्मविश्वास एक ऐसी सभ्यता के प्रामाणिक प्रतिनिधि का आत्मविश्वास है, जो
आत्म-प्रतिष्ठा को ही वास्तविक प्रतिष्ठा और आत्म-ज्ञान को ही सब ज्ञानों का ज्ञान
और प्रमाण मानकर चलता है.
हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि 'हिन्द स्वराज' और उस तरह गांधी जीवन-दर्शन के भी
सभी आलोचक खुद गांधीजी के मुहावरे के कठोर-हृदय बुद्धिजीवी ही न थे और न हैं.
उन्हें गांधीजी और गांधीवादियों की दृष्टि असंतुलित लगती हैं. यहां तक कि जो विचारक
गांधीजी को रमण महर्षि या श्री अरविन्द की ही तरह भारतीय परम्परा की अटूट जीवनी
शक्ति का प्रमाण मानते हैं, वे भी 'हिन्द स्वराज' में सुझाए गए आधुनिक सभ्यता के
विकल्प को गंभीरतापूर्वक विचार करने योग्य नहीं पाते. ऐसा क्यों है, इस पर भी सोचना
चाहिए.
इतिहास बोध की कमी का जो आरोप हम पर आता है और गांधीजी ने अपने ढंग से इसके जवाब
में न सही, इस पुस्तक के संदर्भ में जो कुछ कहा है, उस पर भी विचार करना चाहिए.
मसलन, गांधी जी की दो स्थापनाएं गौरतलब हैं. एक तो यह कि हिस्ट्री अस्वाभाविक बातों
को दर्ज करती है, सामान्य प्रजा अपने स्वाभाविक मात्रा-ज्ञान और सत्याग्रह के बूते
जीती है, वह सत्याग्रह हिस्ट्री में दर्ज नहीं होता. इसलिए हिस्ट्री पर भरोसा करना
या उसके आधार पर निष्कर्ष निकालना गलत होगा. दूसरी उनकी स्थापना यह है कि
हिन्दुस्तान का बल सत्याग्रह या आत्मबल या करुणा बल है. इसलिए दूसरे इतिहासों से
हमारा कम संबंध है. दूसरी सभ्यताएं मिट्टी में मिल गईं, जबकि हिन्दुस्तानी सभ्यता
को आंच नहीं आई है.
इतिहासकारों के कथनानुसार प्रत्येक संस्कृति या सभ्यता का एक जीवनचक्र होता है. कोई
भी सभ्यता अजर-अमर नहीं होती. उत्कर्ष के चरम बिन्दु पर पहुंचने के बाद उसका ह्यास
अवश्यंभावी है. यह जरूर हो सकता है कि उसकी ज्ञानात्मक-कलात्मक उपलब्धियां बाद की
संस्कृतियों को भी अनुप्राणित करें. उदाहरण के लिए प्लेटो-अरस्तू का इस्तेमाल ईसाई
धर्माचार्यों ने अपनी धर्मदृष्टि की पुष्टि के लिए किया. फिर पुनर्जागरण के युग में
ईसाई विश्वदृष्टि की जकड़न को तोड़ने के लिए उसी यूनानी ज्ञान का उपयोग धर्मनिरपेक्ष
आत्म-विस्तार और ज्ञान विकास के प्रयोजन से हुआ.
प्रश्न उठता है कि पुरातात्विक संरक्षण के प्रति सर्वथा उदासीन भारतीय संस्कृति
जीवतात्विक स्तर पर कैसे दूसरी प्राचीन सभ्यताओं की तुलना में अपना नैरन्तर्य कायम
रख सकी? ''कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी'' में कवि के इस दावे में बात क्या
है. क्या वह वही बात है जो अंग्रेजों के प्रख्यात उपन्यासकार, 'ए पैसेज टू इंडिया'
के लेखक ई.एम. फार्स्टर ने इसी हिन्दुस्तानी जीवनधारा को परिभाषित करते हुए कही थी:
'ए लो बट इन्डिस्ट्रक्टिबल फॉर्म ऑफ लाइफ'', अर्थात जीवन की एक उपेक्षाकृत निचली
किन्तु अवध्य संरचना.
इस परिभाषा में ''लो'' का अभिप्राय मूल्य-निर्णयात्मक है या मात्र 'कीपिंग ए लो
प्रोफाइल' की तर्ज पर लक्षणात्मक? क्या इसमें यह आशय भी पढ़ा जा सकता है कि वही
सांस्कृतिक परम्परा सबसे ज्यादा टिकाऊ हो सकती है, जिसमें संस्कृति और प्रकृति के
विग्रह का पहले ही शमन कर लिया गया हो, जिसमें पुरुषार्थ-चिंतन उच्चतम कोटि का होते
हुए भी स्वयं मानवीय जीवन की व्यवस्था सर्वथा प्रकृति सम्मत हो जैसा कि आनन्द कुमार
स्वामी ने भारतीय संस्कृति के ही अन्तर्निहित संतुलन को रेखांकित करते हुए उसे मानव
स्वभाव के सर्वथा अनुरूप बताते हुए कहा था ''हमारी बनावट ही कुछ ऐसी है कि हम अपनी
अंतर्मुखता में 'आर्केटाइपल' हैं और अपनी बहिर्मुखता में 'फिनोमिनल' (नामरूपात्मक).
इसलिए वही संस्कृति सर्वश्रेष्ठ है जो मानव-प्रकृति के किसी पक्ष को नहीं नकारती,
उच्चतर और निम्नतर, पारमार्थिक और लौकिक के बीच सामंजस्य स्थापित करती है.''
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तो क्या भारतीय सभ्यता इसी सामंजस्य को सिद्ध करने के कारण सारे ऐतिहासिक झंझावातों
के बावजूद टिकी रह सकी है? निश्चित ही, यदि पुरुषार्थी के अनुचिंतन को जीवन प्रणाली
में चरितार्थ किया जा सके, तो जिस प्रकार प्रकृति अपना ऋतुचक्र नहीं भूलती, उसी
प्रकार वह संस्कृति भी सारे परिवर्तनों के बावजूद अपने स्तर पर अजर-अमर ही रहेगी.
जैसा कि 'हिन्द स्वराज' के लेखक का भी कहना है कि 'बहुत से अक्ल देने वाले आते-जाते
रहते हैं. मगर हिन्दुस्तान अपनी जगह अडिग बना रहता है. वह उसका लंगर है.'
मगर यदि अंग्रेजों के आने के बाद भी वस्तुस्थिति यही बनी रहती तो भला गांधी जी को
'हिन्द स्वराज' लिखने की क्या जरूरत थी? वहां जो खतरे की घंटी सुनाई देती है, वह
'सत्यार्थप्रकाश' के लेखक अथवा रामकृष्ण् मिशन के जन्मदाता को सुनाई देने वाली घंटी
से क्या काफी अलग नहीं है? ठीक है कि विजातीय सभ्यता का जो आक्रमण अंग्रेजों के
आक्रमण से पहले हुआ था, जिसमें आक्रांता मंदिरों और पुस्तकालयों पर ही सबसे पहले
आकर टूटा था, उसके बावजूद भारतीय संस्कृति व सभ्यता उसी 'लो बट इंडिस्ट्रक्टिबल
फॉर्म ऑफ लाइफ' के कारण न केवल बची और बनी रही, बल्कि उसी निम्नस्तरीय जीवन और उसकी
भाषाओं के अंतराल से एक समूचा पुनर्जागरण भी भक्ति आंदोलन को संभव कर ले गई. मगर
इसके बाद का वह यूरोपीय और ईसाई आक्रमण न तो मंदिर तोड़ता है, न पांडुलिपियां भस्म
करता है. उलटे उनकी रक्षा और पुनरुध्दार करना सिखाता है. अलावा इसके अपनी स्वार्थ
पूर्ति की गरज से ही सही, केन्द्रीय प्रशासन, ठग-पिंडारियों का सफाया, रेल-तार, छपी
किताब और जाने क्या-क्या नियामतें जुटाता है.
पश्चिमी सभ्यता के इन सारे उपादानों से उच्च वर्गीय शिक्षित शरतीयों को अपनी
परम्परा के लिए खतरा दीखे भी तो कैसे? वह तो उनकी दृष्टि से सड़ी-गली जीवनरोधी
रूढ़ियों से मुक्ति है, प्रगति है और अंतत: राजनीतिक स्वाधीनता का अस्त्र भी. गांधी
को और केवल गांधी को यह दिखाई दे रहा है कि यह एक तथाकथित ऊंची जीवन प्रणाली यानि
इंद्रियभोगमूलक सभ्यता का सीधा और सफल हस्तक्षेप है-एक तथाकथित नीची किन्तु
आत्म-संयम की संस्कृति से परिभाषित जीवन-संरचना में. उस संरचना पर ही यह मर्माघात
है जो अन्य किसी भी वस्तु की अपेक्षा भारतीय सभ्यता और परम्परा का लंगर और सबसे
कालजयी दुर्ग है. यह जीवन-विधि और संरचना ही अगर नष्ट हो गई तो फिर संस्कृति तो
नष्ट ही है. किसी जीवित परम्परा को पुरातत्व में बदलने का इससे ज्यादा कारगर औजार
और क्या होगा?
जिसे हम भारतीय पुनर्जागरण कहते हैं-उसमें दो आवाजें हैं. एक तो राममोहन राय से
तिलक तक गूंजती सुनाई पड़ती है. उसमें अतीत गौरव का पुनराव्हान है. उसके नैरन्तर्य
का वेदान्ती उद्धोष है और पश्चिम की ज्ञान-सम्पदा से लाभ उठाते हुए अपने नवीनीकरण
की आकांक्षा भी. माक्र्सीय शब्दावली में कहें तो यह दौर हिन्दुस्तानी तहजीब का अपने
'सुपरस्ट्रक्चर' की ओर ध्यान देने का दौर है. दूसरा दौर वह है जिसकी शुरुआत का
षंखनाद 'हिन्द स्वराज' में सुनाई देता है. यहां वेद-वेदांत की दुहाई नहीं है,
यहां संस्कृति के 'सुपरस्ट्रक्चर' की जगह उसके 'इन्फ्रास्ट्रक्चर' का आव्हान किया
जा रहा है. बल्कि इस दौर में वह 'इन्फ्रास्ट्रक्चर' ही जैसे मूर्तिमान होकर बोलने
लगा है. नीरद चौधरी तक ने अपनी आत्मकथा में महात्मा गांधी को भारत के 'इंटरनल
प्रोलेतरियत' का सबसे गहरा, सबसे प्रामाणिक प्रतिनिधि स्वीकार किया है. 'हिन्द
स्वराज' में गूंजते इस ओजस्वी स्वर के पीछे वह विराट और प्रवंचित जीवन परम्परा है
जो लेखक के शब्दों में असली भारत है.
''उस पर न अंग्रेज राज कर सके,......न आज राज कर सकेंगे''......''हिन्दुस्तानी सागर
के किनारे पर ही मैल जमा है''.......''अनीति से पैसे वाला बना हुआ हिन्दुस्तान
गुलामी से कभी नहीं छूटेगा''......यह उस हिन्दुस्तान की......उसी ''लो, बट
इंडिस्ट्रक्बिल फॉर्म ऑफ लाइफ'' की आवाज है जो निरक्षर होते हुए भी संस्कारी है, जो
नालन्दा, हरप्पा और वेद के मैक्समूलरी संस्करणों से अनभिज्ञ होते हुए भी भारतीय
संस्कृति के आधारभूत मूल्यों से चिपका हुआ है.
तभी लेखक कह सकता है इसी आत्मविश्वास के बल पर कि ''हिन्दुस्तान के हितचिन्तकों को
चाहिए कि वे हिन्दुस्तान की सभ्यता से, बच्चा जैसे मां से चिपटा रहता है, वैसे
चिपटे रहें.'' इसलिए, कि यह एक ऐसी सभ्यता है, जिसका बल सत्याग्रह का, आत्मबल का या
करुणा का बल है. जैसा कि डॉ. गोविन्द चन्द्र पाण्डे ने भी अपने ग्रन्थ ''भारतीय
परम्परा के मूल स्वर'' में एक जगह कहा है-'सामान्य जनता तक ज्ञान का अर्थ आत्मज्ञान
समझे, न कि व्यावहारिक ज्ञान, यह भारत की ही विशेषता है.'
इसी विशेषता के चलते 'हिन्द स्वराज' का लेखक उस यूरोपियन सभ्यता की आधुनिक परिणति
को चुनौती देने को अन्तर्विवश हुआ है, जिसकी ज्ञान, दृष्टि और एक माने में तो
धर्मदृष्टि भी अनासक्तियोग से नहीं बल्कि रजोमुखी आसक्ति से परिचालित जान पड़ती है.
संभवत: इसलिए कि वह चेतना के मनोमय स्तर से आगे नहीं जा सकी. उस स्तर पर अपनी तर्क
बुद्धि के चरम विकास पर उसके लिए सबसे बड़ा पुरुषार्थ विश्वविजयी अभियान चलाने
अर्थात् समूचे विश्व का अवधारणात्मक वशीकरण भी बन जाता है.
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मानवीय पुरुषार्थ की ऐसी समझ, सृष्टि और मनुष्य के बारे में एकदम अलग प्रकार की
अनुभूति और समझ को जीवन में चरितार्थ करने वाली दूसरी पार्थिव सभ्यताओं के प्रति
असहिष्णु और आक्रामक हो उठे तो इसमें आश्चर्य की बात क्या है? अपनी आंतरिक चालक
शक्ति के तर्क से ही ऐसी सभ्यता अन्य पावनतामूलक सभ्यताओं के उनकी अपनी धुरी पर
टिके रहने में बाधक होगी. अभी तक हम दूसरी संस्कृति और धार्मिक परम्पराओं को जिस
दृष्टि से टटोलते रहे हैं, वह उनके साथ हमारी समानता के बिंदु खोजने या उसमें हमारी
बुनियादी अंतर्दृष्टियों को ही सही साबित होते देखने की दृष्टि रही है.
निश्चय ही, इस तरह देखने सोचने की प्रेरणा ही हमें अपनी सभ्यता की आंतरिक विशेषता
या प्रतिभा से मिलती रही. किन्तु अब समय आ गया है कि हम समान बिन्दुओं की तलाश करने
के बजाय हमारे उनके बीच जो वास्तविक विभेद हैं, उन पर ध्यान केन्द्रित करें और उन
दूसरी सभ्यताओं के सत्य से सीधी मुठभेड़ की प्रक्रिया अपनाएं. अतीत के एकालाप को एक
वास्तविक संवाद में बदलें.
पाश्चात्य सभ्यता ने अपने सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक चिंतन के जरिए अपने संगठन,
उद्योग और प्रशासन की आधुनिक अवधारणाओं के बूते बौद्धिकों की एक अंतर्राष्ट्रीय
बिरादरी को उपजाया है. यह आधुनिक बौद्धिक परम्परा है जो अब शरत में उसकी परम्परागत
बौद्धिकता के सामने खड़ी है. एडवर्ड शिल्जे सरीखे लोगों का कहना है कि यह आधुनिक
परम्परा भारत में अभी मजबूत नींव नहीं डाल सकी है तो भी, चूंकि आधुनिकीकरण की
प्रक्रिया तो हमारे यहां चल ही रही है, इसलिए हमारे भीतर इन दो धाराओं के बीच तनाव
उत्पन्न होना अवश्यंभावी था और है.
तनाव के साथ-साथ अपने सांस्कृतिक अतीत से दूरी और अलगाव भी इस सदी के प्रारंभिक दशक
की तुलना में बढ़ा ही है, घटा नहीं. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने रवीन्द्रनाथ
ठाकुर द्वारा मृत्यु से कुछ ही समय पूर्व उनसे हुई बातचीत का एक जगह उल्लेख किया
है. वह यह कि .......'भारत में जो सबसे बड़ी दुर्गति इस वक्त मुंह बांए खड़ी है, वह
है भारतवासी के भीतर घर करती जा रही भयानक आत्मविच्छेद, अलगाव की शवना........यह
विदेशी सभ्यता हमारा क्या लूट ले गई है, यह मै जानता हूं.' सारे मतभेद के बावजूद
रवीन्द्रनाथ की यह प्रतीति और 'हिन्द स्वराज' के लेखक की चिंता यहां क्या एक ही
नहीं जान पड़ती?
यूं देखा जाए तो लगेगा कि हमारे परिवेश में बुद्धिजीवी होना भी उसी का सार्थक है जो
आत्मजीवी पहले हो. मगर जो अपनी संस्कृति के मूल शक्ति-केन्द्र से विच्छिन्न हो चुका
है, वह उसका प्रतिनिधित्व कैसे करेगा? परंपरा अपनी मर्मोद्धाटक ऊर्जा में उसके लिए
प्रकट और प्रासंगिक होगी ही कैसे? श्री अरविन्द की बात याद आती है कि, 'एक सामान्य
यूरोपीय अपने मार्गदर्शक विचार दार्शनिक बुद्धि से नहीं, किन्तु प्रत्यक्ष मूलक
व्यावहारिक बुद्धि से ही प्राप्त करता है. वह अपने दार्शनिक को सराह श्ले ले, उन पर
विश्वास नहीं करता. इसके ठीक विपरीत शरतीय मानस की मान्यता यही रही है कि
आध्यात्मिक सत्य का चिंतक और द्रष्टा ही जीवन का सर्वोत्तम मार्गदर्शक होता है, न
केवल धार्मिक नैतिक जीवन का, बल्कि व्यावहारिक जीवन का भी.'
'हिन्द स्वराज' का लेखक भी यही मानकर चलता प्रतीत होता है. परंपरागत शरतीय मानस के
बारे में तो यह बात सोलह आना सच है. किन्तु क्या आज के शरतीय मानस के बारे में हम
यही बात इतने ही आत्मविश्वास के साथ कह सकते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि संस्कृति के
मूलाधार अलग और बेमेल यह बुद्धि और उसकी उपज इसी बेमेलपन के कारण इस परिवेश में
निष्प्रभावी हो जाती है, या अनिष्ट परिणाम उपजाने लगती है?
ऐसा भी तो नहीं कि हम पश्चिमी परंपरा को ही आत्मसात् करके उसके साथ जाने वाले
दायित्व-बोध और अनुशासन को स्वायत्ता कर सके हों. ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि हम
अपनी सभ्यता के बीचों बीच पड गई दरार की गहरी अवगति के फलस्वरूप इसके मूल्यों का
पुनर्मूल्यांकन करने की जरूरत के भीतर से ही एक बौद्धिक संस्कृति में दीक्षित होने
की ऐतिहासिक अनिवार्यता अनुभव कर रहें हों.
क्या सार्वजनिक, क्या व्यक्तिगत जीवन में बार-बार यही देखने में आता है कि हमारी
तर्कबुद्धि हमें जहां ले जाती है, वहां तक जाने का जोखिम भी हम उठाना चाहते हैं और
दोनों दुनियाओं का लाभ उठाना चाहते हैं. तब फिर हमारे बुद्धिजीवन की प्रामाणिकता
क्या है? दो असमंजस मूल्य-दृष्टियों का जैसा-तैसा घालमेल तो एक खच्चर सरीखा बांझपन
ही उपजा सकता है. हमारे वास्तविक गुणों को हमारे भीतर ही पातालवास दे देने वाली और
निकृष्टतम प्रवृत्तिायों को ही उधाड़ने-उभारने वाली इस आरोपित सभ्यता ने हमारे
युवावर्ग और वयस्कजन दोनों को एक साथ सिनिकल और मूल्यमूढ़ बना दिया है. इसी मूल्यमूढ़
उदासीनता के चलते जीवन के हर क्षेत्र में समाज की स्वत:स्फूर्ति पहल का ह्यास हुआ
है और सरकारी हस्तक्षेप हर जगह आमंत्रित किया जाने लगा है.
नियामक स्थानों पर बैठे हुए लोग खुद अपने अंतर्जीवन और अपने परिवेश की वास्तविकताओं
से कटते चले गये हैं. जो कुछ वे अपनी उलटी खोपड़ी पर उपजाते हैं, उसका समर्थन मूल्य
भी वे अपने समाज से नहीं, बाहर से प्राप्त करना चाहते हैं. शायद वे अपनी अंतरात्मा
में गहरे कहीं अनुभव भी करते होंगे कि उनकी यह उपज अपने लोगों के काम की नहीं है और
उनकी सांस्कृतिक कद्रोकीमत को एक सूत भी बढ़ाने वाली नहीं है.
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'हिन्द स्वराज' सरीखे बीजग्रंथ में रेखांकित इस स्पष्ट तथ्य के प्रति भी जैसे
जान-बूझकर आंखें मूंद ली गई हैं कि दुनिया भी उसी की कद्र करती है जो अपनी और अपनों
की कद्र करना जानता है और अपने समाज तथा अपनी सभ्यता का सच्चा प्रतिनिधित्व करता
है. मगर जो अपनी सभ्यता के स्त्रोत और केन्द्र से ही जाने अनजाने कट चुका है, वह
उसका प्रतिनिधित्व करेगा कैसे? सारी सार्थक रचना और आलोचना तो वहीं से आती है.
इसलिए तात्कालिक आवश्यकता इस समाज में ही अर्न्तनिहित किन्तु दबी-घुटी मूल्य-दृष्टि
और मात्रा-ज्ञान को उभारने-जगाने की है. वैचारिक स्वराज की बहस को आज के जीवन
संदर्भो के बीचोबीच उठाये जाने की है. उन लावारिस से प्रतीत होने वाले
जीवन-मूल्यों, को जिन्हें 'हिन्द स्वराज' के लेखक ने पहचान कर अपने सामने अपनी
सभ्यता के मानदंड की तरह रखा था, और जिन्हें हमने अपने बौद्धिक और राजनीतिक आचरण
से लगातार क्षरित ही होने दिया है. उन अद्यावधि कहीं न कहीं विद्यमान मूल्यों को
हमारी, बुद्धिजीवियों की, प्रतिभा का ठोस वैचारिक आधार मिलना चाहिए. उन
बुद्धिजीवियों का जो, गांधीजी के ही नहीं गांधी और श्री अरविंद के, गांधी और
रवीन्द्रनाथ के बीच के रचनात्मक द्वन्द के भी सीधे उत्तराधिकारी हैं.
जीवन्त पारस्परिक क्रिया-प्रतिक्रिया का वृत्त बने, तभी जो एक दुष्चक्र सा बन गया
है, इस समाज का बौद्धिक और भावनात्मक शोषण करने वालों का, उसके टूटने की सम्भावना
बनेगी. अन्तत: समूचे समाज और समूची सभ्यता की ओर से अपने स्वार्जित ज्ञान और विवेक
के बल बूते सोचने वाला ही बुद्धिजीवी कहलाने का अधिकारी है, न कि किन्हीं अमूर्त और
परोपजीवी अवधारणाओं को लेकर जुआ खेलने वाला. इसके लिए सांस्कृतिक आत्मविश्वास की
दरकार होती है, वैसे सांस्कृतिक आत्मविश्वास की, जो 'हिन्द स्वराज' में कूट-कूट कर
भरा हुआ है.
'हिन्द स्वराज' से जो असल चीज जज्ब करने की है, जो उसे हमेशा प्रासांगिक बनाये रखने
वाली वस्तु है, वह यही है: सांस्कृतिक आत्मविश्वास. किन्तु जहां हमारी अपनी सभ्यता
की समझ का ही नहीं, उसके वर्तमान संकट को हल करने की चुनौती का प्रश्न है, हमें
स्वीकारना होगा कि आज की दुनिया में रहने वाले लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत के अलावा
कुछ अन्य शक्तियों के द्वारा भी बढ़े जा रहे हैं.
आज की वैज्ञानिक-तकनीकी जरूरतें और उनको धारण करने वाली विचार-दृष्टि, जिसे
आधुनिकता के नाम से अभिहित किया जाता है, हमें चारों ओर से लपेटे हुए है. इस
शताब्दी के आरंभिक वर्षों में महात्मा गांधी की तरह श्री अरविंद भी पाते हैं कि,
'अपने केन्द्र, निजी आधार को ढूंढना ही उध्दार का एक मात्र उपाय है'. परन्तु वे साथ
ही साथ यह भी स्पष्ट देखते और कहते हैं कि, 'हर प्रभाव को बहिष्कृत करना ना तो संभव
है, न वांछनीय.....'
आजकल वैसी अलगाववादी उदासीनता संभव भी नहीं है. हमारे लिए यूरोपीय आक्रमण से पहले
की स्थिति में लौटने का प्रयत्न असफल होगा. काल-प्रभाव हमारे ऊपर से ही नहीं
गुजरता, हमें बहा ले जाता है. हमारे विचारने-बोलने का ढंग अतीत आदर्शों का हमारा
निरूपण भी नये विचार और अनुभव के अस्तित्व के कारण ही बदल चुका होता है. हम उन्हें
नये दृष्टि-बिन्दुओं की बढ़ी हुई शक्ति के द्वारा सम्पुष्ट करते हैं. श्री अरविंद की
यह चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी तब थी. अपने उसी ग्रन्थ में श्री
अरविंद कहते हैं, जिसका उल्लेख हमने आरंभ में ही किया था, कि 'हमें आधुनिक जगत का
पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना होगा नहीं तो हम जीवित नहीं रह सकते.'
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'हिन्द स्वराज' का लेखक-ऐसा लग सकता है कि इससे बिल्कुल उल्टी बात कह रहा है. मगर
गौर करने की बात है कि वह किस आधुनिकता का विरोध कर रहा है और क्यों कर रहा है.
उसका आधुनिकता विरोध जिस चीज का विरोध है. उसे क्या श्री अरविन्द नहीं जानते? बखूबी
जानते हैं. यह गांधीजी का नहीं, श्री अरविन्द का कथन है कि ''आधुनिक जगत पर यूरोपीय
मनोवृत्ति और सांस्कृतिक मूल्यों का प्रभुत्व पुन:स्थापित करने का दावा करते हैं पर
यह तभी हो सकता है, जब भारत इन सभ्यताओं का सामना करके इनका एक ऐसा हल निकाले जो
उसके अपने आदर्शों के मूलभाव का समर्थन करे.''
क्या यह गहरे से कहीं 'हिन्द स्वराज' के गांधीजी के ही मन की बात नहीं? निश्चय ही
दोनों की भाषा भिन्न है. पर क्या इसीलिए दोनों की दृष्टियां भी परस्पर विसंवादी और
असंगत हो जाती हैं? समसामयिक जीवन के हमारे बदले हुए संदर्भ का ही तकाजा है कि हम
अपनी परम्परा को नये सिरे से पहचानें और उसे स्वायत्त करें. यह काम हमें तथाकथित
परम्परावादी पुनरुत्थान के लिए नहीं करना है बल्कि इसलिए, कि जो आवाज कभी सुनाई
देती थी, जो घटना कभी घटी थी, उसको फिर से पकड़ पाने का प्रयत्न हमें एक ऐसे खुले
भविष्य के परिप्रेक्ष्य में करना है जो हमारा हो सकता है. यही वह मार्ग है जिसका
अवलम्बन करके हम अपने वास्तविक वर्तमान में मुक्त हो सकते हैं और उस वर्तमान की
सृजनात्मक संभावनाओं को भी चरितार्थ कर सकते हैं.
23.11.2009, 14.22(GMT+05:30) पर प्रकाशित
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