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स्वधर्म की खोज

विचार

 

स्वधर्म की खोज

नंद किशोर आचार्य

 

यह माना गया कि पुनर्जागरण और औद्योगिक क्रान्ति के बाद समाज मनुष्य-केन्द्रित हो गया, और यूरोप में तो खास तौर से. भारत वर्ष में वह धर्म-केन्द्रित है. अगर आगे जाकर कहें तो ऋत् केन्द्रित है. इसमें जो धर्म केन्द्रित है, न वहां मनुष्य भी उसका एक हिस्सा है. उसी ऋत् का उसी धर्म का एक हिस्सा है, उसके मुताबिक उसे अपने जीवन को चलाना है. एक जो केन्द्रीय बात 'हिन्द स्वराज' में लगती है और जिसे स्पष्ट शब्दों में कहना मैं पसंद करूंगा, वह यह कि गांधीजी इस पुस्तक में सभ्यता के बरक्स धर्म को रखते हैं.

महात्मा गांधी द्वारा लिखित हिंद स्वराज पुस्तक


इस बात को बहुत साफ-साफ समझ लेने की जरूरत है. वे सभ्यता शब्द का प्रयोग जरूर करते हैं. कभी-कभी उसे पश्चिमी सभ्यता, तो कभी सच्ची सभ्यता कहते हैं. लेकिन ''वास्तव में मुझे भारत वर्ष की गुलामी की उतनी चिंता नहीं है, जितनी इस बात की चिंता है कि वह अधर्म की चपेट में आ गया है.'' उन्हीं के ये शब्द हैं. अधर्म की चपेट में आ गया है तो अधर्म क्या है? हम उसको आज की अपेक्षाओं के साथ में रखकर देखें और यह देखें कि फिर वह धर्म क्या है यानी कि हमारा स्वधर्म क्या है जो आज की अपेक्षाओं में हमें कुछ करने का रास्ता सुझा सकता है?

गांधीजी जब धर्म और अधर्म की बात करते हैं, तब वे किसी ऐतिहासिक, किसी पैगम्बरी, किसी उपासना पद्धति की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि कहते हैं कि मैं सभी धर्मों का जो धर्म है, उसकी बात कर रहा हूं. उसे एक धार्मिक अनुभूति के रूप में, एक ईश्वरीय अनुभूति के रूप में देखता हूँ और इसका व्यावहारिक रूप मानता हूं-अहिंसा. यदि ईश्वरीय अनुभूति का कोई व्यावहारिक रूप है तो वह अहिंसा है. दूसरी ओर वे कहते हैं कि मैं आध्यात्मिक और नैतिक को अलग नहीं मानता हूं और उसे दैनंदिन जीवन से अलग नहीं मानता. यह गौर करने वाली बात है. आध्यात्मिक शब्द को बड़ा संशय होता है. 'आध्यात्मिक' को लोग मान लेते हैं कि कोई अलग से चीज है, जिसका हमारे भौतिक जीवन से कोई संबंध नहीं है.

गांधीजी बहुत स्पष्ट कहते हैं कि मैं उसे अपने दैनंदिन जीवन से अलग नहीं मानता और मानता हूं कि मुझे ईश्वर कहीं और किसी तरीके से प्राप्त होता, हिमालय की गुफा वगैरह में जाकर ज्ञान से, साधना से, मंदिर से तो शायद मैं वैसा करता. लेकिन वह मुझे लोगों के बीच ही प्राप्त होता है. यानी इसी दुनिया में रहते हुए प्राप्त होगा, जिसके मायने समाज में काम करते हुए, समाज के लिए काम करते हुए ही मुझे वह प्राप्त होगा. इसीलिए वे आध्यात्मिक और भौतिक को सामने खड़ा नहीं करते हैं, बल्कि भौतिक को ही उसका एक आध्यात्मिक रूपांतरण कह देते हैं.

जो हमारा भौतिक जीवन है वह ऐसी आध्यात्मिक प्राप्ति का ही एक साधन हो जाय. यह जो आध्यात्मिक प्राप्ति का साधन हो जाता है, तो नैतिकता और आध्यात्मिकता में हम भेद नहीं करते हैं. समाज की सभी संस्थाओं को वे सत्य की तलाश का एक माध्यम बनाना चाहते हैं.

यह सवाल बार-बार उठता है कि वे विज्ञान के विरोधी थे या यंत्रों के विरोधी थे. गांधीजी ने भी उसका उत्तर दिया है और उसके साथ यह भी समझने की जरूरत है कि एक क्षण के लिए अगर हम यह मान लें कि उसमें रेल का जिक्र नहीं होता. 'हिन्द स्वराज' में कहीं डॉक्टर और वकीलों का जिक्र नहीं होता तो आपको स्वीकार था कि नहीं था? जो रेल के जिक्र से एतराज करते हैं, डॉक्टर और वकीलों के जिक्र का एतराज करते हैं उनसे मैं पूछना चाहता हूं. एक मिनिट के लिए उन अंशों को निकाल दीजिए जो रेल का अंश हैं, डॉक्टर का अंश हैं, वकील का अंश हैं. फिर यह बताइए कि उसके बाद तो आप को 'हिन्द स्वराज' स्वीकार है, या नहीं है? यह बात साफ साफ कहिए. अगर उसके बाद आपको 'हिन्द स्वराज' स्वीकार है तो आप यह पाएंगे कि इसमें रेल, डॉक्टर, वकील का स्थान नहीं होगा.

यह तर्क जो उसमें है, वह तर्क यह है कि अगर आपको अपने जीवन को सुखमय बनाना है, (सुख का अर्थ गांधी का है) तो उसमें जो चीजें सहयोग करती हैं, उनको जुटाइए. जो नहीं करतीं, वे आवश्यक चीजें नहीं हैं. दूसरा यह कि औद्योगिक सभ्यता की कोई कल्पना कर सकते हैं? क्या ये सभी चीजें उसी के उपकरण नहीं है? उसी का यह 'इंफ्रास्ट्रक्चर' नहीं है? तो यह इसका 'इंफ्रास्ट्रक्चर' है तो अब इनके बिना क्या हम उस सभ्यता को ला सकते हैं? उसी सभ्यता की वजह से तो उनकी जरूरत पड़ती है. अन्यथा जरूरत पड़ती ही नहीं. हमें पंखे को चलाना ही पड़ेगा. इसलिए चलाना पड़ेगा कि आपने सभ्यता के अनुकूल यह भवन बनाया है. नहीं तो शायद नहीं चलाना पड़ता. अगर आपने ऐसा भवन बनाया होता जिसमें पंखों की जरूरत नहीं होती, तो नहीं चलाने पड़ते. लेकिन वह शायद इस सभ्यता के अनुकूल नहीं होता.
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