औपनिवेशिक शिक्षा और रचनाशीलता
विचार
औपनिवेशिक शिक्षा और रचनाशीलता
अनिल सद्गोपाल
सवाल यह नहीं है कि गांधी जी ने 'हिन्द स्वराज' के संदर्भ में क्या विचार और
धारणाएं पेश की थीं, परंतु सवाल यह है कि हम आज की स्थिति में, आज की परिस्थिति को
बदलने की दृष्टि से क्या रचनाशीलता दिखाते हैं-यदि हम इस बात पर जोर दें कि आज जो
यथार्थ है, वह यथार्थ ही शायद सार्वभौमिक नहीं है. हालांकि सार्वभौमिकता का पुट हर
जगह दिखेगा. लेकिन यथार्थ की अपनी भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक विशिष्टता है. उसे
पहचान कर अलग सवाल उठाएं कि दुनिया के अलग-अलग इलाकों में किस प्रकार की सामाजिक
विशिष्टताएं हैं और उसे बदलने के लिए हमें अपनी रचनाशीलता का कैसे सृजन करना है.
कुछ दिन पहले ही मैं नागालैण्ड में था. वहां भूतपूर्व संसद सदस्या श्रीमती शारदा,
जो आंदोलन में जेल भी जा चुकी हैं और वहां पर काफी प्रखर व्यक्तित्व के रूप में
स्थापित हैं, उस सभा में आई थीं, जहां मुझे बोलने का मौका मिला. जब मैंने नयी तालीम
की आवश्यकता पर जोर दिया तो उन्होंने कहा-'यहां नागालैण्ड में हम लोग मुक्ति की बात
कर रहे हैं. हम आजाद नागालैण्ड की बात कर रहे हैं.' उन्होंने कहा कि उत्तर-पूर्व की
मिट्टी में उग्रवाद सुलग रहा है, उसके लिए मिट्टी बहुत उर्वर है और जहां पर ऐसा
माहौल है वहां पर भी शिक्षा की बात आप कर रहे हैं, उसका क्या लेना-देना.
मुझे लग रहा था कि उस बात का जोड़ है आज की बात से, रचनाशीलता से. मैंने उनसे इतना
ही कहा कि जब हिन्दुस्तान 1947 में आज़ाद हुआ था, तब हमारी सरकार और हमारा पूरा समाज
पूरे तरीके से आज़ाद थे, यह तय करने के लिए कि हम आगे के हिन्दुस्तान में किस प्रकार
की शिक्षा-व्यवस्था खड़ी करेंगे, उसके क्या मूल्य होंगे. परंतु हमने यह तय किया कि
हम उसी शिक्षा-व्यवस्था को बरकरार रखेंगे जिसको हमने औपनिवेशिक काल से पाया, बल्कि
उसको और अधिक विकृत कर देंगे. यह हमने तय किया.
क्या नागालैण्ड ने, नागालैण्ड के लोगों ने अपना एक नागा स्वराज या नागा-शिक्षा
दृष्टिकोण पैदा किया है? अगर किया है तो वह क्या है? बात केवल नागालैण्ड की नहीं
है. यह बात उत्तर-पूर्व के हर राज्य में बहुत तेजी के साथ सुलग रही है. इसे शायद हम
अन्यत्र बैठकर नहीं पहचान पाएंगे. वहां के हर राज्य में यह समस्या इस प्रकार से उभर
रही है कि एक ओर तो आज़ाद क्षेत्रों की मांग से जुड़ी है अपनी मुक्ति की चाहत, अपनी
पहचान, अपनी अस्मिता की चाहत, दूसरी ओर साथ ही वहां के भारत के केन्द्र से जुड़े
अभिजात्य तबके में भारत की केन्द्रीयता को पूरे तरीके से वहां पर लागू कर देने की
इच्छा.
यह इच्छा बिना किसी स्थानीय दृष्टिकोण के है. ये दोनों विरोधाभास इकट्ठा जिंदा रहते
हैं. इसलिए नागालैण्ड में आप सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ सेकेन्डरी एजुकेशन का कोर्स और भी
ज्यादा विश्वास और आस्था के साथ लागू होता हुआ पाते हैं, बनिस्बत दिल्ली या मुम्बई
के, या कोलकाता के. इसलिए आप वहां अंग्रेजी शिक्षा की यह विकृति भी पा लेते हैं कि
कक्षा एक से लेकर कक्षा बारह तक सब बच्चे एक माध्यम में पढ़ते हैं, वह है अंग्रेजी,
जबकि उन्हीं के कॉलेजों में यह भी पढ़ाया जाता है कि मातृभाषा से बेहतर कोई माध्यम
पढ़ाई लिखाई का नहीं है. इसके बावजूद वहां की अठारह भाषाओं में शिक्षा को कोई भी
स्थान नहीं मिला है. क्या कोई नागा दृष्टिकोण उभर रहा है? और अगर नागा लोगों में यह
रचनाशीलता नहीं उभर रही है तो नागा मुक्ति की मांग ठीक उसी प्रकार की होगी जैसे
भारत की आज़ादी की मांग भी थी, जिसके पीछे कोई रचनाशीलता नहीं बची थी.
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इस संदर्भ में मैं यही कहना चाहता हूं कि 'हिन्द स्वराज' से मैंने जो सीखा और पाया
है, वह यही कि 'हिन्द स्वराज' हमें बार-बार यह आगाह करता है कि हम आज के यथार्थ को
बदलने के लिए अपनी सृजनशीलता किस प्रकार से दिखायें. जब छत्तीसगढ़ के उस क्षेत्र में
जहां पर शंकर गुहा नियोगी के नेतृत्व में एक आंदोलन, संघर्ष और निर्माण के
सिध्दान्तों को प्रतिपादित करते हुए आगे बढ़ा, वहां की मजदूर बस्तियों में आप जाएं,
और अनपढ़ मजदूर के मुंह से आप पूरी व्याख्या सुनें कि अर्ध्द मशीनीकरण की तकनीक क्या
है और अर्ध्द मशीनीकरण की तकनीक किस प्रकार से छत्तीसगढ़ में नई सभ्यता को जन्म दे
सकती है, तो लगता है कि 'हिन्द स्वराज' वहां पर पैदा हो रहा है.
23.11.2009, 11.22(GMT+05:30) पर प्रकाशित