'हिन्द स्वराज' का सार तत्व
विचार
'हिन्द
स्वराज' का सार तत्व
पुषराज जैन
गांधी जी 'हिन्द स्वराज' को एक धार्मिक पुस्तक की कोटि में रखते थे, जिसमें
भारतीयों को किस प्रकार का स्वराज अपेक्षित है, इसका विवेचन किया है. 'हिन्द
स्वराज' में पश्चिमी सभ्यता की, वहां के लोकतंत्र की, वहां की अंग्रेजी
शिक्षा-व्यवस्था की, ब्रितानी शासन प्रणाली की कोई गुंजाइश नहीं है. वहां तो
राम-राज्य का मार्ग समझाया गया है, और साथ ही साथ रावण-राज्य से सावधान किया गया
है.
एक सवाल बार-बार उठता रहा है कि 'हिन्द स्वराज' का सार तत्व क्या है. उसे थोड़ा
विस्तार देकर पूछें कि गांधीजी के चिंतन का सार तत्व क्या है. यदि एक शब्द में जवाब
देना चाहे तो कहेंगे कि वह सत्य है. सत्य अर्थात् ईश्वर. महात्मा गांधी के चिंतन
में सत्य और ईश्वर को अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है. पूरा का पूरा गांधीजी
का दर्शन, गांधीजी का कर्म, सत्य के चारों ओर चक्कर काट रहा है.
स्वयं गांधीजी ने बार बार कहा कि मेरे जीवन का लक्ष्य है सत्य के साथ साक्षात्कार
करना, ईश्वर के साथ साक्षात्कार करना, मोक्ष को प्राप्त करना, हरि दर्शन की
अभिलाषा. बहुत तरह से उन्होंने अपने जीवन के लक्ष्य को स्पष्ट किया था. जब हम सत्य
को अपना लक्ष्य मानते हैं तो फिर देश सेवा, समाज सेवा, राजनीति का ऐसा कोई क्षेत्र
नहीं रहता जो उसमें न आता हो.
आज स्थिति क्या है? हम समाज शास्त्र के ढंग से, या राजनीति के ढंग से, या अर्थ
शास्त्र के ढंग से देखते हैं. खण्ड-खण्ड में चीजों को देखने की यह प्रवृत्ति शायद
आधुनिकता है. गांधीजी समग्रता में पूरी सृष्टि को देखने की बात करते हैं, और जब हम
ईश्वर के संदर्भ में बात करते हैं तभी ऐसा कर सकते हैं.
'हिन्द स्वराज' में जब गांधीजी हिन्दुस्तानी और पश्चिमी सभ्यता का प्रमुख भेद
बतलाते हैं तो वे यही कहते हैं कि पश्चिम की सभ्यता निरीश्वरवादी है और हिन्दुस्तान
की सभ्यता ईश्वर को मानने वाली है. अपनी आत्मकथा में गांधीजी ने लिखा है-'मैं अपने
जीवन के इन तीस वर्षों में जिस लक्ष्य को प्राप्त करने की कोशिश कर रहा हूं और जो
मेरे जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा रही है, वह आत्म साक्षात्कार है. मैं परमात्मा के
साक्षात् दर्शन करना चाहता हूं. मेरे जीवन का उद्देश्य मोक्ष को प्राप्त करना रहा
है. मैं इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जीवित हूं और मेरा सारा कार्य इसी ओर
अभिमुख है.' गांधीजी की मोक्ष की इच्छा, आत्मदर्शन की अभिलाषा, और हरि दर्शन की
इच्छा ने ही उन्हें सत्याग्रह आश्रम को स्थापित करने के लिए प्रेरित किया था.
गांधीजी के शब्दों में-'मैंने यह आश्रम आत्मदर्शन के लिए बनाया है. सेवा इसका
बहुमूल्य अंग है.'
सत्याग्रह आश्रम में गांधीजी ने एक ऐसे समूह को तैयार किया था जो लगातार नियमों का
पालन करते हुए अपनी आत्म-शुद्धि में संलग्न था. आत्म-शुद्धि के द्वारा इन साधकों ने
अपने आप को इस प्रकार शुद्ध कर लिया था कि वे सत्य के लिए, न्याय के लिए, देश सेवा
के लिए, अपने प्राणों की बाजी भी लगाने के लिए तैयार थे. इन आश्रमवासियों के मार्फत
गांधीजी ने 'हिन्द-स्वराज' के अलावा और भी प्रसंगों पर स्वराज को कई तरह से
व्याख्यायित किया था, जिसमें धर्म और अर्थ में सत्य की, स्वराज और सुराज में
सर्वराज की, देशहित और सर्वहित की बात कही थी.
'स्वराज' को उन्होंने पवित्र वैदिक शब्द कहते हुए बताया था कि उस का अर्थ है
स्वशासन, स्वयं-नियंत्रण, न कि नियंत्रणों से मुक्ति, जैसा कि बहुधा 'इंडिपेन्डेंस'
शब्द का अर्थ कर दिया जाता है. स्वराज की बहुत ही स्पष्ट व्याख्या गांधीजी ने 1936
में दिए गए अपने एक भाषण में की थी. इस भाषण में गांधीजी ने कहा था-स्वराज का अर्थ
है, विदेशी शासन से पूर्ण स्वतंत्रता और पूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता. इस प्रकार स्वराज
में एक सिरे पर राजनीतिक स्वतंत्रता है, तो दूसरे सिरे पर आर्थिक स्वतंत्रता. इसके
दो सिरे और हैं, तीसरा सिरा नैतिक एवं सामाजिक, और चौथा है धार्मिक.
गांधीजी कहते हैं कि 'धर्म' शब्द का प्रयोग यहां मैं उसके उच्चतम अर्थ में कर रहा
हूं. इसमें हिन्दू धर्म, इस्लाम, ईसाई धर्म इत्यादि सभी धर्मों का समावेश है, लेकिन
यह सभी धर्मों में श्रेष्ठ है. आप इसे सत्य कह सकते हैं. सत्य का अर्थ साधक की
ईमानदारी नहीं है कि आप सत्य भाषण करें. वह तो जीवन का सत्य है जो सर्व व्यापक है,
और किसी भी विनाश लीला और किसी भी परिवर्तन या काया पलट में नष्ट नहीं होता. नैतिक
और सामाजिक उत्थान को हम अपनी वह संज्ञा भी दे सकते हैं और वह है अहिंसा. यहां
स्वराज में सत्य है, अहिंसा है.
गांधीजी कुछ रेखा गणित की भाषा में समझा रहे हैं: 'हम इसे स्वराज का चतुर्भुज
कहेंगे, जिसके आकार का एक भी कोण गलत हो जाता है तो चतुर्भुज का आकार बिगड़ जाएगा.'
'राजनीतिक स्वतंत्रता क्या है? उसका आशय इसमें विस्तार से बताता हूं. राजनीतिक
स्वतंत्रता से मेरा आशय ब्रिटिश कॉमन सभा, रूस की सोवियत शासन की या इटली के
फासिस्ट या जर्मनी के नाजी राज्य की नकल नहीं है. उन्होंने अपनी परिस्थितियों, अपने
विचारों के अनुकूल व्यवस्थाएं बनाई हैं.
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हमारी व्यवस्था हमारी अपनी परिस्थितियों और विचारधारा के अनुकूल होनी चाहिए. यह
व्यवस्था ठीक-ठीक कैसी हो सकती है यह मैं नहीं बतला सकता. मैंने उसे 'राम-राज्य' की
संज्ञा दी है, अर्थात् शुद्ध नैतिक सत्ता पर आधारित जनता की पूरी प्रभुता कहा है.'
नागपुर और बम्बई के कांग्रेस के अधिवेशन में पारित संविधान में इस प्रकार के स्वराज
को परिभाषित करने का प्रयास किया गया और गांधी जी कहते हैं 'इसमें मुख्यतः मेरी ही
संकल्पना है.'
इस प्रकार गांधीजी ने स्वराज की जो रूपरेखा तैयार की थी और उस स्वराज के बारे में
समय-समय पर जो कुछ बतलाया था, उससे यह पता चलता है कि वे भारतवर्ष में भारतीय
विचारों और परिस्थितियों के अनुरूप शासन व्यवस्था स्थापित करना चाहते थे. यह शासन
व्यवस्था पश्चिमी देशों की नकल में नहीं बनाई जा सकती थी. पश्चिमी सभ्यता और शासन
प्रणाली के बारे में गांधीजी ने जो विचार 1909 में 'हिन्द स्वराज' में स्थिर कर लिए
थे, उस पर वे अंत तक दृढ़ रहे. बीच-बीच में जब उनसे 'हिन्द स्वराज' के बारे में अपनी
राय प्रगट करने के लिए कहा गया तो उन्होंने कहा-उसमें मैं कुछ भी हेर-फेर बदल करने
की जरूरत नहीं समझता हूं. सन् 1945 में जवाहर लाल नेहरू को गांधीजी ने 'हिन्द
स्वराज' की याद दिलाई थी. उन्होंने कहा था-स्वतंत्र भारत को वे 'हिन्द स्वराज' के
बताए गए मार्गों पर आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं.
22.11.2009, 14.22(GMT+05:30) पर प्रकाशित