व्यक्तिगत जिम्मेदारी
विचार
व्यक्तिगत जिम्मेदारी
ध्रुव शुक्ल
आम
तौर पर जब राष्ट्र के भविष्य को लेकर कोई बात होती है तो अक्सर 'मैं' की जगह 'हम'
शब्द का प्रयोग होता है. यह मेरी दृष्टि से वर्जित होना चाहिए. क्योंकि 'हिन्द
स्वराज' हिन्दुस्तान में प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत जिम्मेदारी है. यह कोई ऐसी
पुस्तक नहीं है, जो संविधान सम्मत हो या जिसे कोई प्रस्ताव पास करके पूरे देश पर
लाद दिया जाये और यह कहा जाये कि इसको मानना जरूरी है. मैं 'हिन्द स्वराज' को एक
व्यक्तिगत जिम्मेदारी की तरह लेता हूं कि मैं उस पुस्तक के सामने किस तरह खड़ा हूं?
महात्मा गांधी कहते हैं-'हिन्द स्वराज' मेरी व्यक्तिगत जिम्मेदारी है और मैं आपके
समय का एक मॉडल हूं. यह मॉडलिंग का जमाना है. अगर लोग व्यापार के क्षेत्र में तथा
दूसरे क्षेत्रों में मॉडल बन सकते हैं तो संसार के भविष्य के लिए और भी मॉडलिंग की
जरूरत है. संभवत: हमारे समय के ऐसे सबसे महत्वपूर्ण मॉडल महात्मा गांधी थे,
जिन्होंने एक तरह की मॉडलिंग करके हमें दिखाई.
धर्मपालजी ने अपनी एक छोटी-सी पुस्तक 'भारतीय चित्ता, मानस और काल' में एक सवाल
उठाया है. अक्सर हमारे लिए जो योजनाएं बनायी गई हैं या बनायी जाती हैं, वे हमारे
देश के काल की अवधारणाओं के अनुरूप नहीं बनायी जातीं. मतलब कि हम कलिकाल में रहते
हैं और योजनाएं हम बीसवीं शताब्दी की या इक्कीसवीं शताब्दी की बनाते हैं. समय का
हमसे जो संबंध है उसे समझे बिना हमारे लिए समय गिना दिया है कि हमारे जीवन में अमुक
काम के लिए कितना समय है, और हम ऐसे अपना एक जीवन जीते चले जाएंगे. लेकिन समय ऐसा
तो नहीं होता. एक ही क्षण में चारों युग भी विराजमान हो सकते हैं. चारों युगों की
अनुभूति एक साथ हो सकती है.
संभवत: महात्मा गांधी की किताब हमारे जीवन के उस कांपते हुए क्षण पर खड़ी है कि जहां
हम कलिकाल में रहते हुए भी उस युग का पुनर्स्मरण कर सकें जो सतयुग है, द्वापर है,
त्रेता है. वह पृथ्वी पर मनुष्य की प्रवृत्तियों को सूचित करने वाली पुस्तक है.
हमारे सामने कोई पूर्व निर्धारित प्रयोजन नहीं रखती. मैं बार-बार धर्मपाल जी को तंग
करता रहा कि कोई प्रारूप है आपके पास, कोई योजना है, हो तो बताइए. क्या करना है. वे
कहते हैं, यह सब हमारा काम नहीं है, क्योंकि 'हिन्द स्वराज' में जो है वह हमारी
व्यक्तिगत जिम्मेदारी है.
मैं जो दबाव 'हिन्द स्वराज' को पढ़ते हुए, और इस व्यवस्था में रहते हुए महसूस करता
हूं वह शायद यही कि धर्म की बात तो हमारे समाज में पैदा होती है, लेकिन धर्म के रूप
अनेक हैं, सूक्ष्म से लेकर स्थूल रूप. उनके अनन्त रूप हैं, अगम्य भी हैं. न जाने
उसके बारे में क्या क्या कहा जाता है, और ठीक ही कहा जाता है. लेकिन अगर हम एक
व्यवस्था को रचना चाहते हैं, 'हिन्द स्वराज' के संदर्भ में एक कार्ययोजना बनाना
चाहते हैं, तो हमें धर्म के तीनों प्रकारों को समझ लेना चाहिए जो स्थूल किस्म के
प्रकार हैं.
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एक सामान्य धर्म है जिसमें हमारे जीने की संभावनाएं निरंतर कम होती जा रही हैं. एक
विशिष्ट धर्म है जो कुछ लोगों को सौंपा गया है. जो उस विशिष्ट धर्म का पालन करने
में असमर्थ होते जा रहे लोग हैं और लगातार एक आपद धर्म में जीने को विवश हैं. और
हमें एक आपाद धर्म में डाल जाती है, यानि एक अघोषित आपातकाल हमको घेरे हुए हैं, जो
धर्महीन है, धर्मसंगत नहीं है. जो कभी भी किसी भी कुतर्क को रच कर हमारे जीवन के
आसपास बाड़ की जगह लगाया जा सकता है. हम अपनी ही बनाई हुई व्यवस्था में बंदी हो गए
लोग हैं. मैं यह महसूस करता हूं कि मैं अपने सामान्य धर्म का भी पालन करने में
लगातार असमर्थ होता जा रहा हूं.
दूसरी एक बात 'समाज' शब्द को लेकर. श्री गोविंद चंद्र पाण्डेय ने अपनी 'भारतीय
परंपरा के मूल स्वर' नामक पुस्तक में 'समज' और 'समाज' को बहुत सुस्पष्ट ढंग से
परिभाषित किया है. वे कहते हैं कि 'समज' पशुओं का समूह है और 'समाज' मनुष्यों का
समूह है. लेकिन एक तरह की प्रवृत्तिमूलक परतंत्रता जो है, वह पशुओं और मनुष्यों में
एक साथ हुआ करती है. उससे मनुष्य मुक्ति पाता है और उसने एक विवेकमूलक स्वतंत्रता
को हासिल नहीं किया है. नहीं कर सकता है, तो वह एक प्रवृत्तिमूलक परतंत्रता में
हमेशा जिएगा. 'हिन्द स्वराज' इसी ध्वनि से हमें पुकारती है. अपनी प्रवृत्तिमूलक
परतंत्रता से मुक्त होने का कोई व्यक्तिगत उपाय क्या आपके पास है? गांधीजी कहते हैं
कि मुझे सब की परवाह नहीं है. आप अपनी सोच लीजिए मैं अपनी सोच लूंगा.
23.11.2009, 14.22(GMT+05:30) पर प्रकाशित