ईश्वर के बहिष्कार का युग
विचार
ईश्वर के बहिष्कार का युग
रामाश्रय राय
गांधीजी के दो परिप्रेक्ष्य हैं-सामयिकता व स्वतंत्रता. हम उसी परिप्रेक्ष्य में
देखते हैं जो आज की चालू अपेक्षाओं का हैं. आज का, अभी का स्वरूप है उसके अनुसार जो
अपेक्षाएं जन्म लेती हैं, उसकी खुद महात्मा गांधी ने भर्त्सना की थी. उसका परित्याग
किया था. इसलिए हमें कुछ दूसरे 'आज' की बात करनी पड़ेगी. लेकिन वह बात तभी सार्थक
होगी, जब आज जो 'आज' है, उसकी बात हम पहले कर लें. वह 'आज' क्या है?
तीन
सौ साल पहले जो काल प्रारंभ हुआ था उसके अंधकार में हम अभी भी डूब रहे हैं. उसके
पहले भी पुनर्जागरण का काल शुरू हुआ था जो बनते-बनते ज्ञानोदय बना. उस ज्ञानोदय में
जो पहला काम हुआ-वह था ईश्वर को बहिष्कृत करने का. ईश्वर को जब बहिष्कृत कर दिया तो
बचा मनुष्य और मनुष्य के पास बची दो चीजें. लेकिन जो प्राधिकता है, वह पारम्परिक
प्राधिकता नहीं है.
यह जो बौद्धिकता है, जिसे हम अंग्रेजी में 'केलक्युलेशन' कहते हैं, साधन और साध्य
को किस तरह से निभाया जाये कि राजनीतिक सत्ता आ आये, बस इसी की परिकल्पनीयता को हम
आज की बौद्धिकता कहते हैं. लेकिन जब ईश्वर बहिष्कृत हो गया तो ये बहुत बौद्धिकता,
जिसे साधनबद्ध किया, उसका साम्राज्य नहीं हुआ, साम्राज्य हुआ वासनाओं का. हमारी
बौद्धिकता वासनाओं की चेरी बन गई. इसीलिए हम पाते हैं फेसिलिटी-सुख की खोज. सिर्फ
एक है- सुख की खोज. सुख की खोज का मतलब है- एक इच्छा के बाद दूसरी इच्छा की पूर्ति.
इसी प्रक्रिया को हम सुख का साधन मानते हैं. इसके बाद और भी दार्शनिक हुए,
जिन्होंने उसे और आगे बढ़ाया. मार्क्स तक ने इसी प्रक्रिया में सुख की खोज की. इस
प्रक्रिया में हम अपनी आंतरिक धारणाओं को पल्लवित करते हैं. हम इतिहास का दोहन करते
हैं. संस्कृति बनाते हैं. संस्थाओं को जन्म देते हैं. निर्मिति की प्रक्रिया हम
प्रारंभ करते हैं. ''सेल्फ मेकिंग ऑफ इगो''. यही मूलमंत्र है और इसका तीसरा अंग है
कि इन चीजों के बाद समृद्धि आती है.
जो उपलब्धि होती है वह समृद्धि की प्रगति के रथ को आगे बढ़ाती है. सुख की खोज
इच्छाओं की पूर्ति पर निर्भर करती है. जब हम इच्छाओं की पूर्ति की बात करते हैं तो
तीन चीजें अवश्य हमारी हो जाती हैं. मैं अपनी इच्छाओं को जानता हूं. में अपनी इच्छा
को नहीं जानता. इसलिए मैं कौन सी इच्छा पूरी करूं? इसका उत्तरदायित्व मेरे ऊपर है.
समाज को इससे कुछ नहीं करना, आपको कुछ नहीं करना, राज्य को कुछ नहीं करना.
विधि-विधान को कुछ नहीं करना. यह मेरा जिम्मा है. आत्मनिर्णय है. यहीं से
स्वातंत्र्य की, आधुनिक स्वातंत्र्य परिभाषा शुरू होती है. आज हम स्वतंत्रता का
जिक्र करते हैं. इसका मतलब होता है समाज से स्वतंत्रता, उसका मतलब होता है परंपरा
से, सब कुछ से स्वतंत्रता. पहली चीज यही है. लेकिन स्वतंत्रता का कोई मतलब नहीं, जब
समता न हो. लेकिन समता असंभव है. और इसलिए आज हम बात करते हैं अवसर की, समता की, या
ऐसी समता की जिसमें हर एक व्यक्ति को कुछ अधिकार मिले हुए हों, जिन्हें हम छीन नहीं
सकते. जिनका हम उल्लंघन नहीं कर सकते. इसी के आधार पर सभी सम हैं.
इच्छा है. इसी से हमारे प्रयोजन निर्मित होते हैं. निर्णीत होते हैं. लेकिन उसका
साधन चाहिए, और जब तक हम उन प्रयोजनों की पूर्ति नहीं करते, तब तक हमारे सुख की
उपलब्धि असम्भव है. इसलिए तीसरा अंग है इसकी क्षमता, प्रभावोत्पादकता. प्रभाव को
उत्पन्न करने के लिए हम दो रूप अख्तियार करते हैं. एक तो व्यवसायी या तकनीकी पुरुष
का, और दूसरे नागरिक का.
हमारी जितनी भी जरूरतें हैं, वे तभी तो पूरी हो सकती हैं जब हम प्रकृति के साथ
अन्त: क्रिया में यांत्रिकी का विकास करना आवश्यक बना लेते हैं. लेकिन जब यांत्रिकी
और आवश्यकता की पूर्ति का सम्मिलन होता है तो इच्छाएं दो अर्थों में अन्तहीन हो
जाती हैं. एक, हमारी इच्छाओं का कोई परम उद्देश्य नहीं, हमारी इच्छाएं खुद अपने
औचित्य का आधार हैं. दूसरे, एक इच्छा पूरी हुई नहीं कि दूसरी इच्छा खड़ी हुई. इस तरह
तीसरी, चौथी इच्छाएं हो जाती हैं. इसलिये इस परिप्रेक्ष्य में संतोष नाम की कोई चीज
है नहीं. एक तो अंश हुआ व्यावसायिक मनुष्य का, 'होमो इकॉनामिक्स', आर्थिक-व्यक्ति
का.
आगे पढ़ें
दूसरा रूप है नागरिक का. हम स्वतंत्र हैं. हम पर किसी का अधिकार नहीं. किसी का राज
नहीं. जो राज्य बनता है वह हमारी इच्छाओं से बनता है. हम उसमें अपनी सम्पति देते
हैं, तभी बनता है. जब समाज बनता है तो बनने के बाद हमसे कुछ ऊपर बहुत प्रभाव होता
है. इसीलिये हमारे लिए यह आवश्यक है कि हम उन निर्णयों के जो विपरीत परिणाम हमारे
लिए होंगे उनको रोकने की कोशिश करें.
इस अर्थ में अगर इच्छाएं अनंत हो गई हैं तो औद्योगीकरण आवश्यक हो गया है. इसलिये
आधुनिक युग में औद्योगीकरण, और जिसे हम प्रजातंत्र करते हैं, दोनों की प्रसवभूमि एक
है. इसीलिये गांधी ने दोनों को त्याज्य समझा था. अगर यह स्थिति है तो आज की स्थिति
में उन्हें फलीभूत करना चाहें तो हम दुनिया का नाश ही कर सकते हैं. इसीलिए इसमें एक
बहुत ही भिन्न विवेक सामने आता है.
अब सामने आता है स्वराज. 'स्व' के केन्द्र पर राज. क्या मतलब है? 'स्व' के दो मतलब
है. आधुनिक संदर्भ में जिसे हम 'स्व' कहते हैं, 'ईगो',अहम् है, जिसकी बात रिचर्ड
सोलोमन ने कही है. यह लोकोत्तर अहम् है जो दुनिया को सिर्फ अपना शीशा मानता है, उस
शीषे में अपना मुंह देखता है, और जो दिखाई पड़ता है उसके अनुसार दुनिया से उसकी
अपेक्षाएं होती हैं. उन अपेक्षाओं को सिद्ध करने के लिए दुनिया का वह उपयोग,
दुरुपयोग सभी करता है.
एक दूसरा 'स्व' है जिसे हम आत्मीय कह सकते हैं. जब हम आत्मीय कहते है तो हमारी
आत्मा हमारी वासनाओं पर शासन कर सकती है, अनुशासन रख सकती है. इसी अर्थ में गांधीजी
ने स्वराज की बात कही है. वैसे स्वराज्य की बात हम आज भी करते हैं. कहते हैं कि
स्वराज्य हमारे पास है. लेकिन यह स्वराज्य वह है जो लोकोत्तर अहम् के आधार पर टिका
हुआ है और इसीलिए पेचीदा हो गया है. इससे तो अलग होना है. इससे अलग होना है तो कैसे
अलग होना है?
सबसे पहली बात तो यह कि कोई भी संवाद वाद-विवाद का रूप ले लेता है क्योंकि उसमें एक
मौलिक सामंजस्य नहीं है. सहमति नहीं है. वाद-विवाद की स्थिति हो तो फिर उसके ऊपर
उठकर एक सर्वसम्मति की स्थिति कैसे पैदा की जाये?
|
|
 |
यह आज का सबसे महत्वपूर्ण विषय है. इस महत्वपूर्ण प्रश्न को सरल करने के लिए हम एक
काम कर सकते हैं. शुरू से ही हम बात करते हैं कर्म योग की लेकिन वैदिक परिप्रेक्ष्य
में. 'योगी' में योग का मतलब दो चीजों का एक जगह होना है, इसके अलावा और कुछ नहीं.
योग को हमें यज्ञ बनाना होगा, और यज्ञ का मतलब होता है, दो चीजों का परस्पर मिलन.
योग से हटकर हमें यज्ञ की बात करनी होगी. अगर हम यज्ञ की बात करते हैं तो कर्म,
ज्ञान और भक्ति इन तीनों को हम अलग अलग नहीं ले सकते क्योंकि वैदिक परिप्रेक्ष्य
में मन, प्राण, वाक्-इन समस्त को ईश्वर कहा गया है.
अगर ईश्वर की सामग्री प्राप्त करनी हो तो मन से ज्ञान, प्राण से क्रिया और वाक् से
भक्ति का योग होना चाहिए. इन तीनों का समन्वय हमें करना पड़ेगा. यह समन्वय तभी शुरू
कर सकते है जब हम खुद अपने से शुरू करें क्योंकि किसी भी समाज में व्याधि पैदा होती
है तो शीर्ष को ठीक करने का सरल तरीका है, आत्मा को वासनाओं की दासता से मुक्त
करना. यह बाहर से नहीं होगा, अन्दर से होगा. गांधी जी भी खुद कहते थे कि बाहर से
कुछ कर लो , कुछ नहीं होता. इसलिए आत्मा की व्याधि को अगर हम दूर नहीं कर पाते तो
समाज की व्याधि भी दूर नहीं होगी, और अगर समाज की व्याधि दूर नहीं होगी तो भीतर ही
मग्न है, कुछ नहीं कर पाएगी. क्योंकि विद्रोह कभी सफल नहीं हो पायेगा.
23.11.2009, 23.22(GMT+05:30) पर प्रकाशित