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कम से कम एक दरवाज़ा

माओवादी सिनी सय की कहानी

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सुनो शाहरुख खान

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

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हिन्द स्वराज और आज की उपेक्षाएं

विचार

 

हिन्द स्वराज और आज की उपेक्षाएं

डॉ. इन्द्रनाथ चौधरी

हमारी सबसे बड़ी अपेक्षा है कि हम अपनी आधुनिकता को परिभाषित करें. 1909 में जब 'हिन्द स्वराज' लिखा गया तो उसके पीछे यही उद्देश्य था कि हम अपनी आधुनिकता को परिभाषित करें. हमारी आधुनिकता क्या है? कोई भी उत्तर नहीं दे सकता कि हमारी अपनी आधुनिकता के तत्व क्या हैं. जो कुछ भी आप आधुनिक कहेंगे वह विदेश से आयातित आधुनिकता के तत्व होंगे.

हिंद स्वराज

'हिन्द स्वराज' में गांधीजी ने लिखा था, हमें अंग्रेजी राज्य तो चाहिए पर अंग्रेजी नहीं चाहिए. आप हिन्दुस्तान को अंग्रेजी बनाना चाहते हो. भारत की अपनी आधुनिकता को रेखांकित करने की जो कोशिश उस वक्त विवेकानन्द, रवीन्द्रनाथ ठाकुर या दूसरे किसी ने भी की, 'हिन्द स्वराज' लिखकर गांधीजी ने उसी को रेखांकित करने की कोशिश की.

उन दिनों आधुनिकता का मतलब था विदेशी सभ्यता, विदेशी टेक्नालॉजी, विदेशी पार्लियामेन्टरी पद्धति. उनका अनुकरण हम कर रहे हैं, और सोच रहे हैं कि आधुनिक बन रहे हैं. परन्तु हमारी आधुनिक बनने की प्रक्रिया में कुछ भीतर ऐसा घट रहा था कि आधुनिकता ग्रहण करने के बाद भी उसके मूल्य और फलाफल के संबंध में हमारे मन में संशय बना हुआ था. उससे बीस-तीस साल पहले बंगाल के एक महत्वपूर्ण विद्वान राजनारायण बसु ने एक छोटी-सी पुस्तिका लिखी थी एकाल शैकाल. उसमें उन्होंने सात मुद्दे उठाये थे, शरीर-दीक्षा, शिक्षा, उपजीविका, समाज, चरित्र, राज्य और धर्म.

इन सातों की बात करते हुए उन्होंने यह प्रमाणित किया कि आज के संदर्भ में प्राचीनकाल के लोग (प्राचीन से उनका मतलब था सोलहवीं, सत्रहवीं, अठारहवीं शताब्दी) निश्चित रूप से इन सात स्थितियों में ज्यादा अच्छे थे. उन्होंने कहाः आज शारीरिक दृष्टि से मनुष्य दुर्बल हो गया है, नैसर्गिक प्रकृति में परिवर्तन आ गया है. उसका कारण उन्होंने कहा कि खाद्य के नाम पर हम कुखाद्य खा रहे हैं. समाजतंत्र पर आज राजतंत्र अधिकार किये हुए बैठा है. हम दिल से छोटे हो गये हैं. बात सिर्फ 1873 में राजनारायण बसु नहीं कह रहे हैं. सन् 1992 में, 1989 में और 1975 में भी लोग कह रहे हैं. इसका कारण क्या है?

इससे एक महत्वपूर्ण अर्थ निकलता है कि देश, काल, समाज से निरपेक्ष ऐसी एक प्रकार की कोई आधुनिकता नहीं हो सकती है. अगर आप अपनी आधुनिकता की बात करना चाहते हैं, तो आपके देश-काल समाज से जुड़ी आधुनिकता हो सकती है. एक और अर्थ भी निकलता है कि विशेष अवस्था के अनुसार आधुनिकता के विशिष्ट रूपों का निर्धारण, अर्थात तर्क, विचार और बुद्धि का उपयोग कर आधुनिकता के कौन से प्रकरण हमारे लिए उपयुक्त हैं, इसका निवारण ही यथार्थ आधुनिकता है अर्थात् आधुनिकता का कोई सार्वभौम रूप नहीं है. यह सामान्य संज्ञा नहीं हो सकती. उसके लिये हमें अपने देश-काल और समाज के आधार पर उसकी परिभाषा निर्धारित करनी होगी.

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ने एक निबंध लिखा था-''स्वदेशी समाज.'' रवीन्द्रनाथ ने लिखा था: 'राष्ट्र प्रधान देश में राष्ट्र तंत्र के भीतर देश का मर्म स्थान विशेष रूप से आबद्ध रहता है. समाज प्रधान देश में सर्वत्र समाज तंत्र व्याप्त रहता है. पाश्चात्य राज्य शासन ने भारत को यहां आघात किया है. राज्य शासन ने उस पर अधिकार कर लिया, यानी विदेशी आधुनिकता ने हमारे मर्म स्थान पर आघात किया.' गांधीजी ने इसी विचार को उठाकर 'हिन्द स्वराज' में अपनी बातें प्रस्तुत कीं.

विवेकानन्द भी उन्हीं दिनों लिख रहे हैं कि 'इमिटेशन इज नाट सिविलाइजेशन.' बिल्कुल स्पष्ट रूप से कह रहे हैं. कह रहे हैं कि मैं 'आर्थोडॉक्स' हूं. जिस तरह से गांधी 'आर्थोडॉक्सी' की बात कर रहे हैं. 'आर्थोडॉक्सी' में बड़ी दुर्घटनाएं हो सकती हैं. परन्तु 'आर्थोडॉक्स', आदमी को आदमी की पहचान कराता है. 'आर्थोडॉक्स' यह बताता है कि आदमी में विश्वास है. वह बताता है कि आदमी अपने पैरों को जमीन पर टेक कर खड़ा हो सकता है. इसलिए मैं इस आर्थोडॉक्सी को स्वीकार करने को तैयार हूं. इस पृष्ठभूमि में 'हिन्द स्वराज' रचा गया था.

विवेकानन्द की तरह महात्मा गांधी भी बिल्कुल 'एक्स्ट्रीम पोजीशन' लेते हैं. उनके अंदर यह सामर्थ्य है कि वह 'एक्स्ट्रीम पोजीशन' लें, वह आत्यंतिक बात कह दें. मुझे ब्लेक की वह पंक्ति याद आती है कि ''आल एक्स्ट्रीम्स ओपन द गेट ऑफ हेवन.'' हम लोग जब यह सुनते हैं कि ''उसकी साँस के सौरभ से पाषाण भी गल जाता है.'' तब तो हम सवाल नहीं उठाते कि इस तरह की झूठी बात क्यों कही जा रही है, परन्तु जब महात्मा गांधी अपने ढंग की एक्स्ट्रीम पोजीशन लेते हैं तब हम सवाल उठाते हैं, और कह देते हैं कि गांधी जी ने जो कुछ कहा वह गलत कहा.
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