गांधीजी के पास स्पष्ट उत्तर है
विचार
गांधीजी के पास स्पष्ट उत्तर है
वागीश शुक्ल
अगर आप यह कहते हैं कि
रेलवे हमें तेजी से अपने गंतव्य तक आने-जाने में मदद करती है, इसलिये रेलवे वांछनीय
है, तो गांधीजी उससे इंकार नहीं करते. पूछते हैं कि आप जाना ही क्यों चाहते हैं? आप
क्यों तेज रफ्तार से कहीं जाना चाहते हैं? या उससे भी आगे बढ़कर पूछते हैं कि क्यों
कहीं भी जाना चाहते हैं? जहां आप पैदल नहीं जा सकते वहां क्यों जाना चाहते हैं? इसी
प्रकार इस बात से कतई इंकार नहीं करते कि सर्जरी से आपका स्वास्थ्य सुधर सकता है.
लेकिन वे जो सवाल पूछते
हैं, वह बहुत असुविधाजनक प्रश्न है. वे यह जानना चाहते हैं कि आप जीना ही क्यों
चाहते हैं-अगर आप बायपास सर्जरी के बिना नहीं जी सकते. सबसे पहले एक बात जो बार-बार
बीच में उठती रही, रेलवे, अस्पताल और डॉक्टर की, इस सिलसिले में गांधीजी ने जो बात
कही उसके विरोध में मैं भी तर्क दे सकता हूं, लेकिन इन तर्कों का भी गांधीजी के पास
जवाब है.
उन्होंने केवल आधुनिक चिकित्सा पद्धति की निन्दा नहीं की है, उन्होंने वैद्यों के
लिए भी उतनी ही भर्त्सनापूर्ण भाषा में लिखा है. उन्होंने साफ लिखा है कि अब मैं
समझता हूं कि हमारी भारतीय समाज व्यवस्था में वैद्यों का स्थान इतना न्यून क्यों
रखा गया. गांधीजी का प्रश्न जो आपसे है, वह यह है कि जो आप खुद नहीं कर सकते, खुद
से मतलब है जो भी हाथ-पांव दिये गये हैं, उनसे आगे क्यों आप कुछ करना चाहते हैं?
क्यों आप ऐसी खेती करना चाहते हैं जो आप हाथ से बोकर, खोदकर जोत कर नहीं कर सकते?
क्यों आप ऐसी चीजें उगाना चाहते हैं जो आप अपने आप या दस-पांच लोग मिलकर नहीं उगा
सकते? यह जो उनका कहना है इसके साथ में हमें सच्चाई से खड़ा होना है, भयभीत नहीं
होना चाहिए. अगर हम भयभीत होंगे तो फिर उस सवाल का सामना नहीं कर रहे होंगे जो
गांधीजी ने उठाया है.
इस बात से हमें डर है कि
'आत्मनिर्भरता' का जिस अर्थ में वे उपयोग करते हैं, वह अभाव या गरीबी की तरफ ले
जाती है. इस बात में संदेह नहीं है कि जिस रूप में वे आत्मनिर्भरता की वकालत करते
हैं, वह हमें भुखमरी की तरफ तो नहीं पर निश्चित रूप से गरीबी की ओर ले जाती हैं. उस
गरीबी को स्वीकार करना पड़ेगा. वह जानना चाहते हैं कि आप क्यों गरीब नहीं रहना
चाहते. क्यों आप आर्थिक रूप से ही समृद्ध होना चाहते हैं? इस तरह के सवाल 'हिन्द
स्वराज' में उठाते हैं. आप क्यों गाय को बचाना चाहते हैं, अगर आप अपनी जान देकर
उसको नहीं बचाने को तैयार हैं? इस तरह के सवाल 'हिन्द स्वराज' में उठाये गये हैं.
शहर के बारे में उन्होंने जो कहा उसका तात्पर्य यह है कि मैत्रीपूर्ण समाज की इस
परिकल्पना में भारत को उसके पुराकालिक गौरव पर वापस ले आने की बात है. वह पुराकालिक
गौरव वैशाली और उसकी नगरवधू को बरकरार करते हुए, वैदिक पशुयज्ञों को अस्वीकार करते
हुए, कौशेय और सम्पन्न वस्त्रों का परित्याग करते हुए हासिल किया गया है. जैसा कि
टी.एस. इलियट ने कहा है-जब एक ईसाई से राजशक्ति के शत्रु के रूप में व्यवहार किया
जाता है तब उसका मार्ग बहुत कष्टकर किन्तु अपेक्षाकृत सीधा हो जाता है. इस सीधे
रास्ते पर चलने के लिए इतिहास और समाज की बहुत सी बातों को भुला देना पड़ेगा. लेकिन
हम यह नहीं कह सकते कि सभ्यताओं के टकराव का जो प्रश्न गांधीजी ने उठाया था उसका
कोई भी जवाब देने की शुरुआत हुई हो. गांव और शहर दो अलग-अलग चीजें हैं. इस बात को
गांधीजी ने अपनी इस पुस्तिका में बार-बार उठाया है.
जो संसार का प्रथम हत्यारा है, वही शहर का संस्थापक है. शहर और हत्या ये दोनों
पश्चिमी चिंतन में बहुत पहले से जुड़े हुए हैं. गांधीजी के मन में भी कुछ-कुछ वही
बातें हैं. 'परिवर्तन' की बात भी उठाई गई थी. गांधीजी ने यही नहीं किया कि वे उस
'परिवर्तन' के खिलाफ हैं, जो समाज में बुरी बातें ले आएगा. वे तो 'परिवर्तन' के ही
खिलाफ हैं. परिवर्तन अपने में ही बुरा है. भारत इसलिए बचा रहा है कि वह
अपरिवर्तनशील है. वह अपनी जगह से हिला नहीं. अटल रहा है. इसमें कोई नार्मेटिव
अभिप्राय उनके नहीं हैं.
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अटल होना अपनी जगह पर
किसी संदर्भ में बहुत अच्छा भी हो सकता है और किसी संदर्भ में जड़ता का भी प्रतीक हो
सकता है. उन दोनों संदर्भों को स्वीकार करते हुए गांधीजी परिवर्तन को मूलभूत रूप से
एक खराब चीज मानते हैं. ये बातें ऐसी हैं जो कि 'हिन्द स्वराज' के तल में जाने पर
हमें मिलेंगी. उन्हीं का हमें सामना करना है. क्यों हम कुछ भी ऐसा चाहते हैं जो कि
हम उन साधनों के आधार पर नहीं कर सकते जो साधन हमें जन्म के साथ मिले थे? क्यों हम
परिवर्तन, तकनीक या अन्य किसी माध्यम से अपनी षक्ति, प्रभुता, सामर्थ्य और जीवन
स्तर को सुधारना चाहते हैं? ये गांधीजी के सीधे, सच्चे, मूल प्रश्न हैं.
'हिन्द स्वराज' में गाँव सभ्यता और नगर सभ्यता का विवेचन है. उनका कहना है कि हमारे
पूर्वजों ने छोटे-छोटे गांवों को अधिक महत्व दिया था और वे यह जानते थे कि जैसे ही
शहर आयेगा, तमाम बुराइयां आयेंगी. उसमें रेलवे भी है, डॉक्टर भी हैं, वकील भी हैं,
आदि आदि. लेकिन यह 'डिटेल्स' की बातें हैं. नगर और गांव के इस संघर्ष में जो
शब्दावली है, 'शैतान का साम्राज्य', 'ईश्वर का साम्राज्य', उसके मॉडल ढूंढ़ने के
लिये हमें जो प्रयास करने पड़ेंगे, उसमें तथ्यात्मक अन्वेषण बहुत फायदेमंद नहीं
साबित हो सकता. यह बात यहां पर कहने का तात्पर्य है कि ऐसे बहुत से तर्क दिये जा
सकते हैं जिनसे हम यह साबित कर सकें कि गांधीजी ने जो यह कहा था कि हमारे पूर्वजों
ने छोटे-छोटे गांव में रहने को एक आदर्श माना था, वह सही नहीं है. इसे ऐतिहासिक
तथ्यों के अतिरिक्त कुछ अन्य वाचनात्मक तथ्यों से भी सिद्ध किया जा सकता है. उदाहरण
के लिए हमारे भक्ति साहित्यकार राधाजी को नागरी कहते रहे हैं, जबकि राधाजी तो गांव
की ही थीं.
नगर होना एक विशेष प्रवृत्ति का द्योतक रहा है जिसका विरोधी हमारा प्राचीन समाज
नहीं रहा है. दूसरी तरफ जिसे हम उपभोक्तावादी संस्कृति कह सकते हैं उसके विरोध के
बीज 'बिब्लिकल राइटिंग्स' में मौजूद हैं. यह शब्दावली भी काफी हद तक बिब्लिकल है,
'शैतान का साम्राज्य', 'ईष्वर का साम्राज्य'. नगर के बारे में-जैसा कि ओल्ड
टेस्टामेंट बतलाता है कि जो आदम का सबसे बड़ा लड़का था और जिसने अपने भाई की हत्या
की, उसने संसार का सबसे पहला शहर-केन बसाया है. जिस समय टॉलस्टाय या अन्य विचारक इस
प्रकार की बातें करते हैं, उनके दिमाग में शहर के नाम से एक पूरा सांस्कृतिक इतिहास
गूंजता है. ऐसा कोई इतिहास, उस पृष्ठभूमि से जो लोग नहीं आते हैं, उनके लिए गूंजे
यह आवश्यक नहीं है.
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महात्मा गांधी ने इस शब्दावली का जब प्रयोग किया, तो यह संभव है कि उन्होंने
टालस्टाय या रस्किन या तमाम अन्य लेखकों, जिनको पढ़कर वे प्रभावित हुए थे, के शब्दों
का इस्तेमाल किया हो. लेकिन उसके नितांत बुनियादी 'एसेन्शियल्स' को उन्होंने लिया
है. इसलिए उन्होंने केवल धर्मों में ही नहीं, धार्मिक चेतनाओं में परस्पर जो कुछ
भेद चले आये हैं, उनको अस्वीकार कर दिया. उनके हिसाब से संसार के सारे धर्मों के
संत लगभग एक बात कहते रहे हैं. यह पूरी तौर पर समझ पाना, मान पाना आसान नहीं है.
जैसे कि अगर हम कबीर भी पढ़ते हैं तो जो कुछ आनन्द की कल्पना है उसमें एक सतखण्डा
महल है, सहस्त्रार चक्र है. मतलब जो भी कल्पनाएँ हैं उसमें सतखण्डे महल आते हैं,
तमाम नगर आते हैं, जिनको कि लूट लिया जाता है. महात्मा लोग हर विचारधारा और हर धर्म
में हुए हैं और निष्चय ही उपभोक्तावादी संस्कृति का विरोध सभी ने किया है.
भगवान बुद्ध ने जिस समय
यह प्रश्न उठाया था कि वे महात्मा, वे ऋषि, वे ब्राम्हण, वे संत आज नहीं हैं
क्योंकि इनके पहले जिनका नाम लिया जाता रहा है वे 'तेमन' नहीं खाते थे. 'तेमन' का
अर्थ है बहुत अच्छे ढंग का पुलाव. या 'कौशेय वस्त्र' नहीं पहनते थे. लेकिन आज कल के
जो उनके समकालीन ब्राम्हण, महात्मा या ऋषि हैं वे कौशेय वस्त्र पहनते हैं. तो एक
तरह से, शहर और गांव का यहां विरोध देखा जा सकता है. यहां पर 'शैतान का साम्राज्य'
और 'ईश्वर का साम्राज्य' की बात अगर नहीं है तो अंतत: जिस ओर हमें शून्यतावादी
दर्शन ले जाता है, उसमें सारे प्रकार के साम्राज्य का अभाव है. उसमें शैतान भी नहीं
है और ईश्वर भी नहीं है. मेरा एक प्रश्न आप लोगों के सम्मुख है कि क्या 'हिन्द
स्वराज' की कामना इस तरह भी की जा सकती है?
22.11.2009, 14.22(GMT+05:30) पर प्रकाशित