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नए गांधीवाद की ज़रूरत

विचार

 

नए गांधीवाद की ज़रूरत

मकरन्द परांजपे

 

हम सबको इसका निश्चय करना चाहिए कि 'हिन्द स्वराज' के मूल बिन्दु क्या हैं, और उसे समझना चाहिए. जहां तक मेरा अंदाज है 'हिन्द स्वराज' के मूल बिन्दु ये हैं कि हमें किस तरह की सभ्यता चाहिए. क्या हमें एक लालच की सभ्यता चाहिए या हमें सभ्यता चाहिए जो मनुष्य की जरूरतों को पूरा कर सके. गांधीजी ने स्वयं यही बात कही थी. मैं जो सवाल उठाना चाह रहा हूं, वह यह कि हमारा उद्देश्य क्या है. हम चर्चा तो करते हैं 'हिन्द स्वराज' की, पर इसके आगे इसको लेकर क्या करेंगे. किस तरह से हम इसको अपने जीवन में ला सकें या इससे कुछ कर सकें यह सवाल मैं जरूर करना चाहूंगा.

महात्मा गांधी द्वारा लिखित हिंद स्वराज पुस्तक

मतलब यह है कि या तो हम 'हिन्द स्वराज' की चर्चा करके एक बुद्धिजीवी वर्ग के सेमिनार में जैसा होता है, वैसे उसका विश्लेषण करें. अलग-अलग तरीकों से उसको देखें या अलग-अलग दृष्टिकोण से उसको समझें, समझाएं और फिर अपने-अपने व्यवसाय में फिर से लगे रहें. अथवा फिर हम इसको लेकर एक एजेण्डा बनाएं कि क्या क्या किया जाना चाहिए जैसे कि विश्वविद्यालयों में क्या करना चाहिए, या कहीं और भी क्या करना चाहिए. हर जगह जाकर सबको समझाते रहें कि 'हिन्द स्वराज' के अंदर क्या है. क्या हमारा यह कर्तव्य है कि हम इसको पढ़ते रहें, इसको आत्मसात् करते रहें और इसके जरिए या इसका मार्गदर्शन लेकर हमारा जीवन बदल दें.

ये दो तीन जो पर्याय हैं हमारे पास, इसमें से कौन सा लेकर 'हिन्द स्वराज' को किस तरह पढ़ें ताकि हम इसको टेक्स्चुलाइज कर दें. जैसे आज किसी भी ग्रंथ को लेकर बहुत सारी चर्चा टीका हो सकती है. क्या हम सब मिलकर दो-तीन मामलों में सहमत हो सकते हैं? सहमति को लेकर हम भी एजेण्डा बना सकते हैं या सिर्फ चर्चा ही करते रहें. बहुत वर्षों तक ऐसी चीजों पर चर्चा हुई है.

भारतीय संस्कृति क्या है? इसका पश्चिमी संस्कृति से क्या नाता है, और क्या वहां से हमको सीखना चाहिए? ये सब बातें बहुत वर्षों से हो रही हैं. मैं यह जानना चाहता हूं कि इसका निष्कर्ष क्या है. इससे हम क्या निकालना चाहते हैं. आज विश्व में एक संकट फैला हुआ है. हमारे सामने अलग-अलग तरह का संकट है. इस संकट से निपटने के तरीके सुझाए गए हैं, जैसे विकास. हर जगह 'डेवलपमेंट' का नारा चलता आ रहा है. वर्षों से हम हर जगह विकास लाने की कोशिश कर रहे हैं. ये सारे डेवलपमेंट के जो मॉडल हैं इनमें भी बहुत बड़ा संकट है.

मेरी पीढ़ी के लोग पाते हैं कि जो गांधी जी के नाम पर संस्थाएं चलाई गयीं इनमें कुछ जगह तो कितना अच्छा काम हो रहा है. लेकिन गांधी जी की विचारधारा अपनाने वालों से जिस तरह का हम नेतृत्व चाहते हैं वह हमें मिला नहीं है. आज हम देखते हैं कि गांधीजी के नाम पर जो संस्थाएं हैं वे एक निद्रा अवस्था में हैं. जो हमारे विश्वविद्यालय और अन्य बुद्धिजीवी फोरम हैं, वहां गांधीजी की बातें बहुत कम होती हैं. इसकी क्या वजह है? क्या इसका पुनर्जीवन किसी तरह से हो सकता है?

जो एक पारंपरिक किस्म का गांधीवाद है-क्या वह हमारा मार्गदर्शन कर सकता है? या हमें नये गांधीवादी-'न्यू गांधियन'-बनने की जरूरत है. यह मैं प्रश्न करना चाहूंगा. 'न्यू गांधियन' का मायने मैं यह कहूंगा कि जैसे आज कल पर्यावरण को लेकर, 'इकॉलाजी' को लेकर 'न्यू एज' को लेकर बहुत चिंतन हो रहा है. दुनिया भर के लोग सोच रहे हैं कि इक्कीसवीं सदी में किस तरह क्या होना चाहिए. कैसी संस्कृति होनी चाहिए? लोगों ने यह भी कहा है कि विश्व का बचाव नहीं हो सकता जब तक कि-देयर इज ए स्प्रीरिचुअल रीन्युअल ऑफ दि वेस्टर्न मेन, क्योंकि सत्ता उनके हाथ में है. उनके ऊपर किस तरह से दबाव डाला जाए.

मैं यह पूछना चाहता हूं कि क्या पारंपरिक गांधीवाद ने रास्ता दिखाया? अगर नहीं, तो क्या कोई नई गांधीवादी धारा है जो सक्षम हो? मैं यह भी पूछना चाहता हूं कि क्या यह जरूरी नहीं कि आज कल के विश्वविद्यालय या ऐसी अन्य जगहों में जो लोग काम करते हैं, उनको इस पारंपरिक गांधीवाद से मिलाया जाये और उनसे कुछ सीखा जाये ताकि एक किस्म के सेतु बनाए जायें?

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मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि मध्यप्रदेश एक प्रगतिशील राज्य है जो भारतीय संस्कृति और सभ्यता का सभ्य जीवंत क्षेत्र है. लेकिन क्या हम यह कार्यक्रम किसी राज्य से जोड़ सकते हैं? राज्य की संस्थाओं से हम अपेक्षा कर सकते हैं कि वे हमारा मार्गदर्शन करें? क्या यह ऊपर से आएगा या नीचे से आएगा? इसमें क्रांतिकारी कौन सा होगा? क्या हम होंगे, या मध्य वर्ग होगा? मुझे तो आशा सिर्फ मध्य वर्ग से है. जैसे गांधीजी ने किसी दिन कहा था कि हर मध्यवर्गीय परिवार में वे एक विद्रोही रखना चाहते थे, जो 'मध्यवर्गीय नैतिकता' से विद्रोह करे.

आजकल जो 'मध्यवर्गीय नैतिकता' हमारे देश में है, वह तो उपभोक्तावाद की है. तो क्या हम प्रत्येक परिवार में एक विद्रोही नहीं पैदा कर सकते या निर्माण कर सकते? दो लड़के हों, या एक लड़का, एक लड़की हो, तो मां-बाप को मिलाकर तीन लोग तो उपभोक्तावाद की ओर जायें. एक बैंक मैनेजर हैं, एम.बी.ए. है. वह पैसे कमाए, पर एक बेचारा जो साहित्य में है या इतिहास में है, जिसे ज्यादा आमदनी नहीं मिलने वाली, तो क्या इसे पकड़ कर विद्रोही नहीं बना सकते? यह मेरा सवाल है. 'हिन्द स्वराज' तो खुद से शुरू करने का रास्ता है.


23.11.2009, 14.22(GMT+05:30) पर प्रकाशित


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