हिन्द स्वराज को उठाएं
विचार
हिन्द स्वराज को उठाएं
राजीव वोरा
'हिन्द स्वराज' पर आम तौर पर अलग से विचार-विमर्श बहुत कम होता है. आधुनिक युग में
मानव विकास के लिए बाधक तथा साधक तत्वों का निरूपण करने वाले गांधी-दर्शन का यह
बीज-ग्रन्थ होने के कारण किसी भी धर्म पुस्तक की तरह पवित्र तथा नियमित और निरंतर
स्वाध्याय के योग्य है. गांधीजी के दर्शन पर विचार होता है, लेकिन बहुधा खण्ड-खण्ड
में ही किया जाता है.
इतना ही नहीं, जिस प्रकार से विचार-विमर्श होता है वह इसी बात का प्रमाण है कि अभी
तक हम गांधीजी के विचार की देह को ही पकड़ पाये हैं. इसीलिए अमूमन उसके विभिन्न
अवयवों को ही वर्णित करने तक या उनको पहचानने तक ही बातें होती हैं. कभी केवल
अहिंसा, तो कभी विकेन्द्रीकरण, कभी स्वदेशी तो कभी ग्रामस्वराज, कभी विश्व शांति तो
कभी गरीबी.
इसी प्रकार की मोटी-मोटी रूप रेखाओं तक ही अधिकतर ऐसे विमर्श सीमित रहते हैं और इन
पर गांधीजी के कथनों की पुनरुक्ति की जाती है. गांधीजी के साथ हमारा परिचय तब तक
बालसहज ही रहेगा जब तक कि गांधीजी के दर्शन तथा प्रज्ञा के मूल आधारों पर हम
केन्द्रित नहीं होंगे तथा उसके अनुरूप जीवन के विविध पक्षों की व्याख्या तथा
विश्वेषण करने की सामर्थ्य नहीं जुटा लेते.
गांधीजी के विचार के मर्म तक पहुंचने के लिए 'हिन्द स्वराज' कुंजी रूपी ग्रन्थ है.
इस पर अधिक से अधिक विचार होना चाहिए तथा इसके विभिन्न भाष्य होने चाहिए. गांधीजी
की तीन सौ से अधिक जीवनियां लिखी गईं हैं. नि:सन्देह इस समय दुनिया भर में किसी एक
व्यक्ति विशेष पर सर्वाधिक चिन्तन मनन हो रहा हो तो गांधीजी पर ही हो रहा है. लेकिन
भारत की अपनी प्रमाण-भूत विचार परंपरा शक्तिहीन हो गई है. इसलिए गांधीजी जैसे
शक्तिशाली व्यक्ति के विचारों को उसी सनातन भारतीय मनीषा से सम्बध्द देखने में एक
प्रकार की मानसिक कठिनाई रही है.
गांधीजी के जीवन दर्शन का सार रूप 'हिन्द स्वराज' ग्रन्थ हमारे बौद्धिक वर्ग के लिए
एक समूह को उलझन में डालने वाला रहा है. यह बौद्धिक वर्ग, भारत के समस्त बौद्धिक
जगत का पर्याय नहीं है, बल्कि उनमें से एक सम्प्रदाय भर है. लेकिन अंग्रेजी
साम्राज्य के उद्देश्यों को बरकरार रखने के उनके कत्ताव्य के एवज में उसी साम्राज्य
से मिली तथा मिलती रहती सत्ता-सुविधा-शिक्षा-दीक्षा के कारण यह वर्ग भारत के स्पष्ट
सत्य, उसके धर्म-बोध से वंचित रहा है. अत: उसे 'हिन्द स्वराज' इतना उलझाती रही है
कि उसकी जीवन-दृष्टि, सभ्यता-बोध को नकारने के लिए उसे नये शब्द या नई दलीलें तक
नहीं सूझ पाती है.
यह वर्ग दलीलों में घूमता रहता है. उनसे आगे बढ़ ही नहीं पा रहा है. जो तर्क और
दलीलें 'हिन्द स्वराज' को भारत के राष्ट्रीय विचार से दूर रखने के लिए जवाहरलाल
नेहरू ने गांधीजी के समक्ष रखी थीं, वे ही दलीलें, उस हद तक समान रूप से आज दोहराई
जाती हैं. शब्द भी मोटे-तौर पर वे ही होते हैं.
'हिन्द स्वराज' पर कांग्रेस में विचार न करने के कारण के रूप में 1945 में जवाहरलाल
नेहरू ने गांधीजी को लिखा था कि इससे देश भ्रमित हो जाएगा. यही बात आज के
नेहरूवादी-गांधीवादी भी इन्हीं शब्दों में कहते हैं. नेहरू तथा उनकी समस्त मंडली का
मानना था कि ऐसा भ्रम फैलने से लोगों को प्रगति के जिस पथ पर वे चढ़ाना चाहते थे,
उसमें बाधा पैदा होगी. भारत की प्रगतिशील शक्ति क्षीण हो जाएगी. अगर स्वाधीनता का
सच्चा अर्थ समझ लिया और रास्ते पर चल दिये तो शरत के लोग उनके काम के नहीं रह
जायेंगे.
रेल, डाक्टर, वकील, संसदीय तंत्र इत्यादि को न केवल नकारने वाला बल्कि उनके विषय
में बेहद कड़वा तथा कठोर सत्य कहने वाला विचार इस पुस्तक को, उसके दर्शन को पचाना इस
संप्रदाय के लोगों के लिए असंभव सा बनाता है. इसीलिए उसे भ्रम का कारण भी बताने को
विवश होते हैं. उनका डर बोलता है. गांधीजी द्रष्टा, धर्म-गोप्ता (इस शब्द का प्रयोग
श्रीकृष्ण के लिए कन्हैया लाल माणिकलाल मुंशी ने किया है) न कि आधुनिक सभ्यता के
सलाहकार-'एडवाइजर'.
अत: 'हिन्द स्वराज' को आधुनिक सभ्यता की आलोचना भर मानकर चलना पूरी तरह ठीक नहीं
दिखता. आधुनिक सभ्यता के आलोचक की भाषा आम तौर पर वह जिसकी आलोचना करता है उसी की
ज्ञान-मीमांसा से फलित तथा उसी पर आधारित होती है. 'हिन्द स्वराज' में आधुनिक
सभ्यता की आलोचना है. यह जितना स्पष्ट है इतना सत्य यह भी है कि उसकी भाषा आधुनिक
पाश्चात्य ज्ञान परंपरा की नहीं है.
बहुत से पाश्चात्य या भारतीय विद्वान आधुनिक सभ्यता तथा उसके तंत्र की आलोचना तो
शायद गांधीजी से भी अधिक अकाटय प्रमाणों के साथ दे सकते हैं. तब भी वे यह तो नहीं
ही कह सकते, न ही कहते हैं कि 'इनमें धर्म और नीति की तो बात ही नहीं है.' इसी एक
वाक्य से गांधीजी ने स्पष्ट कर दिया कि एक विशेष धर्म-दृष्टि से ही वे आधुनिक
सभ्यता को तौल रहे हैं. किसी शांतिवादी, समतावादी, मानवतावादी, पर्यावरणवादी,
अर्थात् किसी समाज-शास्त्रीय, राजनैतिक या आर्थिक विचार धारा से नहीं.
एक बार नहीं लेकिन बार-बार गांधीजी इस सभ्यता को 'शैतानी', 'चाण्डाल', 'आसुरी' तथा
'रावण का राज्य' कहते हैं. स्पष्ट है कि गांधीजी इस सभ्यता के किसी एक उपांग या अंग
की बात नहीं करते हैं. इसके किन्हीं विशेष पक्षों की भी अलग से बात नहीं है. जहां
है भी वहां यही बताने के लिए है कि इसका मूल स्वभाव, मूल प्रवृत्ति ही शैतानी,
चाण्डाल, राक्षसी है. वे यह नहीं कहते कि राक्षस है लेकिन अगर उसके हाथ-पैर ठीक कर
दिये जाएं तो उसके समस्त कारोबार भी ठीक हो जाऐंगे.
आगे पढ़ें
बहुत लोग हैं, जो मानते हैं कि अगर टेक्नालॉजी को ठीक कर दिया जाए या संसदीय
प्रणाली को चुस्त और दुरुस्त कर दिया जाय, या विकास के कामों में कुछ हिस्सेदारी
बढ़ा दी जाए तो सब ठीक हो जाएगा. गांधीजी ने यह तो नहीं कहा है कि इसके हाथ-पैर
शैतान के हैं बाकी मन और दिमाग देव के हैं. इस सभ्यता को राक्षसी, शैतान, चाण्डाल,
आसुरी कह कर ही उन्होनें स्पष्ट कर दिया कि इसके साथ जीने का अर्थ भक्ष्य ही बनना
है. बहुत से बहुत हुआ तो भक्ष्य मानी और बनाई गई जातियों में से कुछ लोगों को आसुरी
तंत्र की दलाली तथा मेहनताने के रुप में भक्षक बनने का भी मौका मिल सकता है.
जितना ध्यान गांधीजी की रामराज्य की भविष्य मूलक कल्पना पर दिया गया है, इतना ही
अगर वर्तमान-मूलक रावण राज्य पर भी दिया जाता-उसके समग्र बौद्विक, सांस्कृतिक और
आध्यात्मिक निहितार्थ के साथ, तो हो सकता है कि रामराज्य के अनुकूल साधनों का
निर्माण करने की दिशा में कुछ सार्थक हो पाता और हमारी बौद्विक समेत समग्र शक्ति
एकांगी दिशा पकड़कर केवल राजनैतिक साधनों की सीमाओं में उलझकर मूल उद्देश्य के लिए
निरर्थक-सी न हो जाती, तथा गांधीजी की तत्व-दृष्टि के अनुकूल बौद्विक सजगता भी आती.
'स्वराज' तक को एक राजनैतिक पद भर मान लिया गया है. यही क्या इस एकांगी दृष्टि का
प्रमाण नहीं?
केवल पाश्चात्य सभ्यता का अध्ययन गांधीजी से ऐसा नहीं बुलवा सकता. वे मूल में तो
मानव विकास की यात्रा को आसुरी और दैवी पक्षों में देखते हैं, जो हमारी समस्त
धर्मदृष्टि का सहज लक्ष्य है. इसी लिए गांधीजी पश्चिम को आसुरी सम्पद् तथा भारत को
मूल में दैवीसम्पद् युक्त मानते और बताते हैं. 'हिन्द स्वराज' गांधी-विचार का
बीज-ग्रंथ है, तो वह उनकी भाषा का भी प्रमाण-ग्रंथ है. जब तक इस विचार-बीज और उसके
भाषायी तत्व को इस दृष्टि से नहीं समझेंगे तब तक, तथा 'हिन्द स्वराज ' को आधुनिक
सभ्यता की आलोचना भर बताने से उनकी दृष्टि में जिसका प्रकाष है. उससे ही हम वंचित
रहेंगे.
हिन्द स्वराज में अगर गांधी जी ने अपने विचारों को योजनापूर्वक रखा है, तो इसके
पहले उन्होंने सत्याग्रह के शस्त्र की भी साधना कर ली है. उस शस्त्र के साथ वे उठे
हैं-दूसरे हाथ में 'हिन्द स्वराज' को लेकर. उसका स्पष्ट अर्थ यह है कि अभय की नींव
पर खड़ा है 'हिन्द स्वराज.' अभय ही है स्वराज्य की प्राणशक्ति अर्थात दैवी संपदा की
आधारशिला. गीता में दैवी सम्पद् के वर्णन में सर्वप्रथम अभय को स्थान देकर गीतकार
ने धर्मराज्य-रामराज्य-स्वराज्य की स्थापना में अभय के उस महत्व को दर्शाया है.
'हिन्द स्वराज' आधुनिक समय में विचारों में अभय की प्राप्ति का साधन भी है, तथा जो
'हिन्द स्वराज' की जीवनदृष्टि को मानते हैं, उनके लिए वैचारिक-बौद्धिक-सांस्कृतिक
अभय का प्रमाण भी है.
सत्याग्रह का शस्त्र और 'हिन्द स्वराज' साथ-साथ हैं अर्थात् शस्त्र उनके हाथ में है
जो धर्मदृष्टि से सम्पन्न है. इसलिए गांधीजी ने कभी भी सत्याग्रह को अनाड़ियों के
भरोसे नहीं छोड़ा. यहां तक कि व्यक्तिगत सत्याग्रह में नेहरू प्रथम सत्याग्रही बनना
चाहते थे, फिर भी उन्हें वह स्थान नहीं दिया. सत् की दिशा में जो ले जाए, वही सत्य
है. इस अर्थ में गांधीजी 'हिन्द स्वराज' के माध्यम से सभ्यता के विषय में हमारा
संशय दूर करके मर्म की बात कर देते हैं.
अभय, अहिंसा, प्रेम तथा ईश्वर-निष्ठा को पर्यायवाची बताने के बावजूद ईश्वर-निष्ठा
को गांधीजी सर्वाधिक आधारभूत क्यों मानते हैं? स्वराज के निर्माण के लिए जो कुछ भी
उन्होंने प्राथमिक रूप से आवश्यक बताया, उससे भी आगे बढ़कर क्यों उन्होंने अपनी
शक्ति और प्रज्ञा का स्त्रोत ईश्वर-निष्ठा को बताया? 'हिन्द स्वराज' में
ईश्वर-निष्ठा की चर्चा भले ही नहीं है, लेकिन नैष्ठिक असुर, नैष्ठिक शैतान, नैष्ठिक
राक्षस यानी आसुरी निष्ठा और राक्षसी निष्ठा की बात तो है ही.
गांधीजी के समक्ष शायद यह स्पष्ट रहा है कि केवल मानव के रूप में मनुष्य आसुरी
शक्तियों और प्रवृत्तियों का मुकाबला और खण्डन नहीं कर सकता. ऐसा करने के लिए उसे
खुद को परम सत्ता के अंश के रूप में देखना पडेग़ा तथा सत्ता का अंश बनने की दिशा में
साधना करनी पडेग़ी. अर्थात दैवी गुणों के विकास से ही आसुरी शक्ति का मुकाबला किया
जा सकता है. इसलिए आसुरी सभ्यता के निराकरण के लिए किसी प्रकार के कोरे मानवतावाद
ने उन्हें आकर्षित नहीं किया. 'मैं समाजवादी भी हूं' कहने के बावजूद भी कभी यह नहीं
कहा कि 'मैं समाजवादी ही हूं'. वे समझते थे कि आधुनिक सभ्यता तथा उसमें एक तरह की
सुविधा पैदा करने वाले समस्त मतवाद निरीश्वरवाद की नींव पर खड़े हैं. इस संदर्भ में
आधुनिक बुद्धि को समझने के लिए हिन्द स्वराज मनन योग्य है.
|
|
 |
'हिन्द स्वराज' दर्शन-शास्त्र की पुस्तक नहीं है कि गांधीजी कोई दार्शनिक विवेचन
में उलझ जाते, जो कि कुछ शिक्षित दार्शनिकों को ही समझ में आता. द्रष्टा प्रथम सत्य
का दर्शन कराता है. बताता है कि उसे क्या दिखता है. वह क्यों ऐसा देखता है. अर्थ तो
वह धीरे-धीरे ही प्रसंगवश खोलता है. 'हिन्द स्वराज' पुस्तक आधुनिक समय में आसुरी
सम्पद् का वर्णन करती है तथा असुर लोगों का पद, पता, ठिकाना भी बताती है, उसकी
प्रसव-भूमि ही नहीं, बल्कि उसका क्रीड़ा स्थल भी बताती है. वह बताती है कि असुर कौन
है या कौन असुर बन रहे हैं,कौन मानव है तथा कौन देवत्व की ओर अग्रसर हैं. मानव समाज
को गांधीजी इन्हीं श्रेणियों में देखते हैं, अमीर-गरीब जैसी श्रेणियां तो इन मूलभूत
श्रेणियों के आपसी बलाबल का परिणम मात्र वे मानते हैं.
'हिन्द स्वराज' धर्म पुस्तक है ही, लेकिन गांधीजी अपने सम्पूर्ण जीवन के दरम्यान एक
धर्मशास्त्र भी हमारे लिए रच गये हैं. 'हिन्द स्वराज' तो उसी प्रकार की स्थितियों
में से पैदा हुआ ग्रंथ है, जिस प्रकार संग्राम भूमि के बीचोबीच भगवद्गीता का जन्म
हुआ था. वह भगवद्गीता का उसी से प्रेरित ही अंश है. इसलिए वह किसी जाति विशेष या
किसी मत विशेष के लोगों तक सीमित ग्रन्थ नहीं है और साथ ही उसकी शक्ति और उसका
माहात्म्य उसकी समग्रता में ही है.
22.11.2009, 14.22(GMT+05:30) पर प्रकाशित