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इस अंक में

 

भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ

चुनावी मसाले की सोंधी महक

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

यह सबके लिये चेतावनी है

थप्पड़ के नाम पर

ये कहां आ गये हम

तब तो मतलब है चुनाव आयोग का

मनमोहन सिंह को अब आई शर्म ?

भूमि-सुधार के अनसुलझे सवाल

जल, जंगल, जमीन, जिंदगी... सब बर्बाद !

बुरी नज़र वाले तेरा डैम फूल

लुप्त होने के कगार पर हैं असुर

भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

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आरटीआई के बारे में नहीं जानते हम

मैं आदमखोर नहीं था

रामकथा पर रार क्यों ?

आत्महत्या की फसल

 
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राज्य ही सब कुछ ना बना रहे

विचार

 

राज्य ही सब कुछ ना बना रहे

ज्योति भाई देसाई

एक बात तो यह सुनी है कि 'हिन्द स्वराज' के बारे में सोचना है, अच्छी बात है, उसके बारे में सोचना चाहिए. समय पक गया है कि सोचिए और कुछ करने की भी इच्छा है कि 'हिन्द स्वराज' के बारे में सोचना है, कुछ करना है. यह भी अच्छी बात है. कइयों ने प्रयत्न भी किया है कि कुछ करें. कितना कर पाये हैं, क्या कर पाये हैं, वह अपने-अपने इसमें हैं. तो मैं क्या कर पाया, मुझे मालूम नहीं है. पर प्रयत्न करने वाले लोग हैं तो कर सकते हैं.

हिंद स्वराज पुस्तक

यही तो गांधी जी ने कहा कि कर सकते हैं आप. अब यह ध्यान में आता है मेरे सामने. एक चीनी कार्ड की चित्रावली है. एक सांड आ रहा है, बड़ा भीषण सांड. उसको एक नौजवान सींग से पकड़ने की कोशिश कर रहा है. मानों गांधी पकड़ रहा है. इतने बड़े विकास के अंधेरों को. तो कल्पना तो यही है. यही अन्त होता है, ऊपर नीचे होता रहेगा. आखिर क्या होगा? कभी यह ऊपर, कभी वह ऊपर. और शून्य हो जायगा और शून्य तो है. सारा संसार क्या है? शून्य है. यह सारी बातें हमने सुनीं.

आज जो हम सोच रहे हैं या सोचना चाहते हैं-वह यह है कि उस सांड के ऊपर बैठ तो नहीं जायेंगे. एक शून्य, पार्लियामेण्टरी डेमोक्रेसी को हमने देख लिया कि क्या हो रहा है और हमने यह प्रोग्रेस करके भी कभी देख लिया है. अगर देखना है, अपने देश की बात नहीं कर रहा हूं, पूरे ब्रम्हाण्ड को देख लिया है. काफी सोच उठ रहा है. बदल रहा है. तो क्या करेंगे. मैं यह मानता हूं कि हमारे यहां सौराष्ट्र एक छोटा सा राज्य धीरेन्द्र ने चलाया था. ये जो राज्य चलाया था, उसमें बहुत अहम बात थी और उसमें एक सफल स्वरूप हम लोगों ने देखा था. वह यह था कि राजपूतों का बड़ा जोर था और राजपूतों ने एक धु्रुपद डाकू को काफी बढ़ाया-चढ़ाया था और इस सरकार के खिलाफ उठाया था.

आम जनता दबी हुई थी और इसलिए आम जनता की सहायता करने वाले जो रचनात्मक कार्यकर्ता थे उनको उठाया और हर प्रशासन में उनकी सहायता ली. मैं यह सुझाव पेश कर रहा हूं कि सरकार को अपना रोल समझना चाहिए. तो एक व्यवस्था चाहे वह तात्कालिक व्यवस्था की आवश्यकता न हो. ऐसा हम नहीं कह रहे हैं कि व्यवस्था के लिए चाहे आप कुछ भी करें. यह उनका काम भी नहीं है. आप यह सहायक जो हैं, जिस उद्देश्य से हम लोग मिले हैं, उस उद्देश्य की ओर जा रहे हैं कि नहीं, वह देखना उसका काम है.

सरकार की जो भूमिका है और सरकार को जो काम करना है, वह सहायक की भूमिका है. द रोल ऑफ दि गवर्नमेण्ट इज टू प्ले दैट. अब क्या चल रहा है? जो चल रहा है वह आप देख रहे हैं. वह अपने अभी के शासन के संचालक महोदय लोग हैं, वे हमारे सब कुछ हो गये हैं. हम उनकी मान रहे हैं और उनके पीछे-पीछे दौड़ रहे हैं. क्या कर रहे हैं? पर दूसरी ओर से जो अपेक्षित है गांधी जी से इसमें भी बहुत स्पष्ट है. मेरा मानना है कि जागृति का काम चले, बड़ा अच्छा लगता है.

मेरे जैसे को क्योंकि मैं नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथ काम कर रहा हूं. यहां की सरकार ने काफी सोचकर और मुझे आपके साथ, आज की सरकार के साथ टक्कर लेने का सोचा है. ऐसे कई जो लोग उठकर खड़े हैं और लोक-जागृति के काम चला रहे हैं, उनके साथ रहने का काम है. मेरा एक मुख्य काम शिक्षा का है. इसलिए सारे विस्तार में नहीं जाना चाहता हूं.

इस दृष्टि से मैं उसमें भी थोड़ा यह चाहूंगा कि गांधी की बात लीजिए कि वह वकालत नहीं करते. क्यों नहीं करते? हमारे भावनगर के कॉलेज में सामनदास कॉलेज में ओरिजनेट हुआ था, वह छोड़कर चला गया. डेढ़-दो-महीने पढ़े, छोड़ दिया. उन्होंने लिखा है, 'आत्म कथा' में कि अंग्रेजी में सब पढ़ाई होती थी. मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था. इसलिये मैंने छोड़ दिया. तो ऐसा एक लड़का जिसके बारे में आज आप हम विचार कर रहे हैं. उसको ऐसे स्कूल में रखा गया ऐसे सिस्टम में रखा गया कि वह भाग गया.

अपमानित होने के लिए, आत्मविश्वास को खोने के लिए शालाएं बनी हुई हैं. जो स्कूल बने उनमें कहां कुछ सार्थक हो रहा है, मुझे मालूम नहीं है. यह नवोदय स्कूल है. पर हम चाहेंगे कि हमारी शिक्षा में तीन बातें अवश्य हों. हमारे बच्चे निर्णय करने की शक्ति प्राप्त करें. हमारे बच्चे जिम्मेदारी उठायें. जिम्मेदारी सहन करें और आत्म सम्मान प्राप्त करें.

गांधी ने अगर आत्मविश्वास प्राप्त किया तो इस देश का ऐसा कोई बच्चा नहीं है जो शायद आत्म विश्वास प्राप्त नहीं कर सकता है. यह तो हमारे 'हिन्द स्वराज' का अवशेष है. पर ऐसा नहीं होता. मैं अनुरोध करूंगा कि दुनिया भर में हो रहा है. केवल शांति की बात नहीं है उसमें संघर्ष सुलझाने की बात हो रही है. सदन में क्या होता है? सत्याग्रह क्या होता है? कैसे होता है? देखिए क्या क्या सत्याग्रह हुआ है. निकारागुआ में जो अभी सुना मैंने. तो यह ऑस्ट्रेलिया में, जैसा 1922 में गांधी का अदालत में किस्सा हुआ वैसा ही किस्सा बिल्कुल. ऑस्ट्रेलिया से कहा कि हाँ मैंने गुनाह किया है आप दीजिए मुझे सजा, हाँ सजा दीजिए जो देनी है क्योंकि मैं मानता हूं कि ऑस्ट्रेलियन सरकार को अधिकार नहीं है कि मेरे पैसे से शस्त्रास्त्र खरीदे. मेरे पैसे से वह युद्ध करें. मैं इसमें पैसा देना नहीं चाहता. इसीलिए मैंने टैक्स नहीं भरे. जो जज थे ऑस्ट्रेलिया के उन्होंने कहा कि बात तो गम्भीर है, मनन योग्य है. तो सत्याग्रह समस्त संसार में विवेक का, अन्याय के विरोध का अस्त्र है.

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हमें बच्चों को सत्याग्रही बनाना होगा. ऐसी शिक्षा होनी चाहिए. सत्याग्रही, जिम्मेदार, आत्मविश्वास सम्पन्न, निर्णयशक्ति-सम्पन्न बच्चों को बनाने वाली शिक्षा का हमें प्रबन्ध करना चाहिए. आगे तो वे बच्चे खुद अपने समय और अपनी परिस्थितियों के अनुसार रास्ता बनाते चलेंगे. पर हम तो आत्मविश्वासहीन, सम्बलहीन, अनुकरण-परायण बच्चों को बनाने का प्रबन्ध कर रहे हैं.

तो मैं क्या कहूं कि हम ऐसी शिक्षा व्यवस्था क्यों चला रहे हैं. और ऐसी शिक्षा-व्यवस्था से हमारी क्या अपेक्षाएं हैं? 'हिन्द स्वराज' से शिक्षा के बारे में हमारी ये अपेक्षाएं हमें प्राप्त होती हैं. ऐसे ही अन्य विषयों में. पर हम उन अपेक्षाओं को अपनाएं, अपनी मानें, तो. हम तो कहीं और से ही अपनी अपेक्षाएं ग्रहण कर रहे हैं. जैसा हम चाहेंगे, वैसा ही देश बनायेंगे.

23.11.2009, 14.22(GMT+05:30) पर प्रकाशित


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