स्वधर्म में भारत की कल्पना
विचार
स्वधर्म में भारत की कल्पना
डॉ. जी शिवराम कृष्णन
महात्मा गांधी ने 'हिन्द स्वराज' में और अन्यत्र भी वही बताया, जो स्वामी
विवेकानन्द ने भी बताया था कि वे क्या चीजें हैं जो भारत को महान बनाती हैं.
उन्होंने कहा-भारत 'स्थिर' है. इसे डिगाया नहीं जा सकता. यह इतिहास के द्वारा
हिलाया डुलाया नहीं जाता. यह तो अपनी जगह पर ही टिका रहता है. अडिग रहता है. अटल
रहता है. यही इसका इतिहास है, यही इसका सनातन तथ्य है. यही इसका गौरव है, भव्यता
है, शान है.
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आधुनिकतावादी लोग तो मानते हैं कि परिवर्तन, स्वयं में महत्वपूर्ण है. जो नहीं
बदलता, वह दोषपूर्ण है. सरकारें, स्वयंसेवी संगठन, गांधीवादी लोग, स्वैच्छिक संगठन
सभी लोग आज 'परिवर्तन' के लिए समर्पित हैं. 'परिवर्तन' के लिए हस्तक्षेप को आज
गरिमामंडित किया जाता है. सम्पूर्ण बदलाव ही आज इन सब का लक्ष्य है. लेकिन गांधीजी,
विवेकानंद और भारत के श्रेष्ठ साधु, संत, महापुरुष तो कुछ और ही बात कहते हैं. वे
तो आत्मा की, सनातन आदर्श की, अडिग और अटल रहने की, स्वधर्म में स्थित रहने की बात
करते हैं. अन्तर बहुत स्पष्ट हैं.
दोनों में बोध और दर्शन का यह जो भेद है, वह दोनों की संपूर्ण जीवन शैली में स्पष्ट
होता है. आहार-विहार के नियम, जीवन की मान्यताएं सभी में यह भिन्नता स्पष्ट है.
दोनों के विज्ञान और दोनों की प्रौद्योगिकी के स्वरूप में भी भिन्नता स्वाभाविक है.
'हिन्द स्वराज' हमें स्वधर्म का बोध देता है. स्मरण कराता है और मार्गदर्शन देता
है, तथा परधर्म से, 'शैतानी सभ्यता' से, बदलाव की हवा में बहते रहने से दूर रहने
की, विरत रहने की चेतावनी भी देता है. वह यह भी स्पष्ट करता है कि भारत के अधिकांश
लोग तो इस स्वधर्म को जानते ही हैं.
केवल आधुनिक शिक्षित वर्ग ही परधर्म को अंगीकार कर चुका है. बदलाव की बेचैनी जिस
'एक्टिविजम' को जन्म देती है, वह विवेक को सुला देता है और व्याकुलता, उद्वेग एवं
अहंकार को बढ़ाता है. 'हिन्द स्वराज' हमें एक प्रशान्त, मननशील और सार्थक सभ्यता की
स्मृति से सम्पन्न करने का प्रयास है.
22.11.2009, 14.22(GMT+05:30) पर
प्रकाशित