पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ

चुनावी मसाले की सोंधी महक

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

यह सबके लिये चेतावनी है

थप्पड़ के नाम पर

ये कहां आ गये हम

तब तो मतलब है चुनाव आयोग का

मनमोहन सिंह को अब आई शर्म ?

भूमि-सुधार के अनसुलझे सवाल

जल, जंगल, जमीन, जिंदगी... सब बर्बाद !

बुरी नज़र वाले तेरा डैम फूल

लुप्त होने के कगार पर हैं असुर

भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

चुनावी मसाले की सोंधी महक

आरटीआई के बारे में नहीं जानते हम

मैं आदमखोर नहीं था

रामकथा पर रार क्यों ?

आत्महत्या की फसल

 
Photobucket
 पहला पन्ना > हिंद स्वराज > सौ सालPrint | Send to Friend | Share This 

टूटते भारत में हमारे हिस्से के गांधी

विचार

 

टूटते भारत में हमारे हिस्से के गांधी

कृष्ण कुमार

सूत की माला मुझे मिलने से अपने बचपन की कई स्मृतियां एकाएक जाग जाती हैं. सौभाग्य से मुझे ऐसी बुनियादी तालीम के स्कूल में पढ़ने को मिला जो अपेक्षाकृत ईमानदार स्कूल था और हम लोग, महीने में एक बार तकली से सूत की माला बनाने का प्रयास करते रहते थे. काफी लम्बा सिलसिला उसमें होता था क्योंकि सूत बार-बार टूटता था और रह रहकर माला को छूते रहने का जो अनुभव हमारे लिये था कि देखें, अब यह कितनी मोटी हो गई-ऐसा एक लालच रहता था. इस तरह का मांसल अनुभव बाद की शिक्षा में लगभग समाप्त होता चला गया. बल्कि मांसलता को शिक्षा से जुदा करने का राष्ट्रीय घटनाचक्र साठ के दशक से हमने जो देखना शुरू किया वह अब तीव्रतर होता चला जा रहा है.

महात्मा गांधी की हिंद स्वराज पुस्तक

इस प्रकार अपने बचपन को याद करने और उसके बाद की दुनिया को टूटने बिखरने के ऊपर यह एक विलाप का समय है क्योंकि सचमुच आज़ादी के ठीक बाद के वर्षों में पैदा हुए हम लोगों के संस्कार उस दशक में जैसे बने, वह हम लोगों की जवानी तक आते-आते. हम लोगों की आंखों के सामने बड़ी आसानी से, बड़ी निर्ममता के साथ टूटे. एकाएक टूटते तो शायद हम लोग एक नए तरह के दौर से गुजरते, हमें ज्ञान होता.

लेकिन वह धीरे-धीरे टूटा और इसलिए वह हमें लगातार उस टूटन के प्रति समाहित करता गया. हमें आदत डाली गई कि वह सब टूटता चला जाय और हम जीते चले जायें. और जो बचा है, उसमें भी सब टूटने के हम आदी होते चले जायें. भारत 26 जून, 1975 को टूटा. फिर बहुत सा वह नवम्बर, 1984 के शुरू में टूटा और फिर जो बाकी बचा हुआ था वह 6 दिसम्बर, 1993 को टूटा. अब सचमुच हमारी ही पीढ़ी के लिए जो कि आज़ादी के बाद के वर्षों में पैदा हुई थी, यह लड़ाई, एक तरह से पूछती है कि गांधी का सपना किसने तोड़ा था?

हम सब धीरे-धीरे उस सपने के टूटने के बाद बचे हुए को बर्दाश्त करने और बर्दाश्त करने की आदत डालने के एक तरह से प्रत्यक्ष प्रमाण हैं. सचमुच यह गलत होगा, यदि इस अवसर पर केवल विलाप किया जाये. गांधी विलाप का नाम नहीं है. मैंने गांधीजी को नहीं देखा. उनके जाने के बाद मेरा जन्म हुआ. मेरे लिए गांधीजी का कोई मूर्तमान स्वरूप मेरे जीवन में आया तो वह जयप्रकाश नारायण के रूप में ही आया. उनके साथ मैंने कुछ दिन बिहार में लेखक की हैसियत से बिताने का प्रयास किया था.

वह उस आदमी की शख्सियत को करीब से देखने तथा समझने का एक व्यक्तिगत शैक्षिक अनुभव था. लोग कहेंगे कि जयप्रकाश नारायण को देखकर गांधी को समझाना पूरी तरह संभव नहीं है. हो सकता है. लेकिन हमारे हिस्से में जो कुछ आया, हम उसी से गुजारा करने के लिए अभिशप्त थे, ऐसा मानकर चलिए. मुझे लगता है कि अब गांधीजी के जीवन का सन्देश निश्चित रूप से बीते हुए को सोचकर या भारत के गलत दिशा में चले जाने इत्यादि की बातें कहकर उस पर पश्चाताप या कि जिन्होंने ऐसा किया उन पर दोषारोपण या इस तरह की प्रवृत्ति में आगे चले जाने का, बहते चले जाने का मौका नहीं देता.

हम 'हिन्द स्वराज' देखें. 'हिन्द स्वराज' मूलत: एक संवाद है. उसकी विषयवस्तु अपनी जगह है. लेकिन उसकी संरचना, जो कि बड़ी महत्वपूर्ण चीज है, वह एक संवाद की है. संवाद की विशेषता यह होती है कि वह विपरीत विचार के बिना नहीं हो सकता. आपको अपने से विपरीत सोचने वाले को इसीलिए जीवित रखना पड़ेगा. बल्कि पूरा आदर देकर जीवित रखना होता है जिससे कि आप अपनी बात उसके बहाने से कह सकें. वरना आपकी बात कैसे जन्म लेगी? विपरीत बात का, विपरीत बुद्धि का इसमें आदर है.

'हिन्द स्वराज' की संरचना का अगर कोई अर्थ है तो मेरी समझ में यही है. वह जिन बातों से लड़ रहा है, संपादक वे बातें उठाने वाला है. संवाद की यह विशेषता है कि वह अपने विपरीत मत का समावेश करने का निरंतर प्रयास करता है. उस सिलसिले में मुझे लगता है कि हमें गांधी के अपने जीवन को 'हिन्द स्वराज' से एक लम्बा संवाद देखते हुए समझने का प्रयास करना चाहिए. उसको किसी एक घटना में बांधकर देखना गलत है. गांधी के जीवन का संक्षेप न केवल उन परिस्थितियों में है जिनमें वे सफल सिद्ध हुए, और न ही उनके जीवन का यह संक्षेप, यह संवाद जो उन्होंने स्वयं अपनी कृति से किया, उन घटनाओं में है जिनमें वे निराशामय दौर में घिर गये और असफल हुए. और असफल वह न भारत के विभाजन में हैं और न नमक सत्याग्रह की सफलता में हैं.

गांधी के जीवन को संवाद और उदारता से पूरी सजगता के साथ समझना होगा. यह संक्षेप जिस दिन हमें छूने की हालत में मिल जायेगा, मैं समझता हूं कि गांधी की उपयोगिता, गांधी की बात करने की जरूरत हमारे सामने और स्पष्ट प्राथमिकता ग्रहण कर लेगी. छोटा सा प्रयास भी हम कर सकते हैं या उसकी शुरुआत करने का दावा कर सकते हैं.

गांधीजी के उस संवाद का पहला बिन्दु है रचना का. गांधीजी रचना के प्रतीक हैं. रचना, जिसकी सबसे बड़ी खासियत या उस शब्द की वैधता ही इसमें है कि जैसी एक बात हो चुकती है, वैसी ही वह दुबारा नहीं हो सकती. अगर हम गांधीजी को रचनाकार के रूप में परिभाषित करने को तैयार हैं, तो हमें यह मानना पड़ेगा. यह उन प्रतीकों को पुनर्स्थापित करना नहीं हो सकता जिनको उन्होंने अपने जीवन में ईजाद किया.
आगे पढ़ें

Pages:

[an error occurred while processing this directive]
 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in