टूटते भारत में हमारे हिस्से के गांधी
विचार
टूटते भारत में हमारे हिस्से के गांधी
कृष्ण कुमार
सूत की माला मुझे मिलने से अपने बचपन की कई स्मृतियां
एकाएक जाग जाती हैं. सौभाग्य से मुझे ऐसी बुनियादी तालीम के स्कूल में पढ़ने को मिला
जो अपेक्षाकृत ईमानदार स्कूल था और हम लोग, महीने में एक बार तकली से सूत की माला
बनाने का प्रयास करते रहते थे. काफी लम्बा सिलसिला उसमें होता था क्योंकि सूत
बार-बार टूटता था और रह रहकर माला को छूते रहने का जो अनुभव हमारे लिये था कि
देखें, अब यह कितनी मोटी हो गई-ऐसा एक लालच रहता था. इस तरह का मांसल अनुभव बाद की
शिक्षा में लगभग समाप्त होता चला गया. बल्कि मांसलता को शिक्षा से जुदा करने का
राष्ट्रीय घटनाचक्र साठ के दशक से हमने जो देखना शुरू किया वह अब तीव्रतर होता चला
जा रहा है.
इस प्रकार अपने बचपन को याद करने और उसके बाद की दुनिया को
टूटने बिखरने के ऊपर यह एक विलाप का समय है क्योंकि सचमुच आज़ादी के ठीक बाद के
वर्षों में पैदा हुए हम लोगों के संस्कार उस दशक में जैसे बने, वह हम लोगों की
जवानी तक आते-आते. हम लोगों की आंखों के सामने बड़ी आसानी से, बड़ी निर्ममता के साथ
टूटे. एकाएक टूटते तो शायद हम लोग एक नए तरह के दौर से गुजरते, हमें ज्ञान होता.
लेकिन वह धीरे-धीरे टूटा और इसलिए वह हमें लगातार उस टूटन
के प्रति समाहित करता गया. हमें आदत डाली गई कि वह सब टूटता चला जाय और हम जीते चले
जायें. और जो बचा है, उसमें भी सब टूटने के हम आदी होते चले जायें. भारत 26 जून,
1975 को टूटा. फिर बहुत सा वह नवम्बर, 1984 के शुरू में टूटा और फिर जो बाकी बचा
हुआ था वह 6 दिसम्बर, 1993 को टूटा. अब सचमुच हमारी ही पीढ़ी के लिए जो कि आज़ादी के
बाद के वर्षों में पैदा हुई थी, यह लड़ाई, एक तरह से पूछती है कि गांधी का सपना
किसने तोड़ा था?
हम सब धीरे-धीरे उस सपने के टूटने के बाद बचे हुए को बर्दाश्त करने और बर्दाश्त
करने की आदत डालने के एक तरह से प्रत्यक्ष प्रमाण हैं. सचमुच यह गलत होगा, यदि इस
अवसर पर केवल विलाप किया जाये. गांधी विलाप का नाम नहीं है. मैंने गांधीजी को नहीं
देखा. उनके जाने के बाद मेरा जन्म हुआ. मेरे लिए गांधीजी का कोई मूर्तमान स्वरूप
मेरे जीवन में आया तो वह जयप्रकाश नारायण के रूप में ही आया. उनके साथ मैंने कुछ
दिन बिहार में लेखक की हैसियत से बिताने का प्रयास किया था.
वह उस आदमी की शख्सियत को करीब से देखने तथा समझने का एक व्यक्तिगत शैक्षिक अनुभव
था. लोग कहेंगे कि जयप्रकाश नारायण को देखकर गांधी को समझाना पूरी तरह संभव नहीं
है. हो सकता है. लेकिन हमारे हिस्से में जो कुछ आया, हम उसी से गुजारा करने के लिए
अभिशप्त थे, ऐसा मानकर चलिए. मुझे लगता है कि अब गांधीजी के जीवन का सन्देश निश्चित
रूप से बीते हुए को सोचकर या भारत के गलत दिशा में चले जाने इत्यादि की बातें कहकर
उस पर पश्चाताप या कि जिन्होंने ऐसा किया उन पर दोषारोपण या इस तरह की प्रवृत्ति
में आगे चले जाने का, बहते चले जाने का मौका नहीं देता.
हम 'हिन्द स्वराज' देखें. 'हिन्द स्वराज' मूलत: एक संवाद है. उसकी विषयवस्तु अपनी
जगह है. लेकिन उसकी संरचना, जो कि बड़ी महत्वपूर्ण चीज है, वह एक संवाद की है. संवाद
की विशेषता यह होती है कि वह विपरीत विचार के बिना नहीं हो सकता. आपको अपने से
विपरीत सोचने वाले को इसीलिए जीवित रखना पड़ेगा. बल्कि पूरा आदर देकर जीवित रखना
होता है जिससे कि आप अपनी बात उसके बहाने से कह सकें. वरना आपकी बात कैसे जन्म
लेगी? विपरीत बात का, विपरीत बुद्धि का इसमें आदर है.
'हिन्द स्वराज' की संरचना का अगर कोई अर्थ है तो मेरी समझ में यही है. वह जिन बातों
से लड़ रहा है, संपादक वे बातें उठाने वाला है. संवाद की यह विशेषता है कि वह अपने
विपरीत मत का समावेश करने का निरंतर प्रयास करता है. उस सिलसिले में मुझे लगता है
कि हमें गांधी के अपने जीवन को 'हिन्द स्वराज' से एक लम्बा संवाद देखते हुए समझने
का प्रयास करना चाहिए. उसको किसी एक घटना में बांधकर देखना गलत है. गांधी के जीवन
का संक्षेप न केवल उन परिस्थितियों में है जिनमें वे सफल सिद्ध हुए, और न ही उनके
जीवन का यह संक्षेप, यह संवाद जो उन्होंने स्वयं अपनी कृति से किया, उन घटनाओं में
है जिनमें वे निराशामय दौर में घिर गये और असफल हुए. और असफल वह न भारत के विभाजन
में हैं और न नमक सत्याग्रह की सफलता में हैं.
गांधी के जीवन को संवाद और उदारता से पूरी सजगता के साथ समझना होगा. यह संक्षेप जिस
दिन हमें छूने की हालत में मिल जायेगा, मैं समझता हूं कि गांधी की उपयोगिता, गांधी
की बात करने की जरूरत हमारे सामने और स्पष्ट प्राथमिकता ग्रहण कर लेगी. छोटा सा
प्रयास भी हम कर सकते हैं या उसकी शुरुआत करने का दावा कर सकते हैं.
गांधीजी के उस संवाद का पहला बिन्दु है रचना का. गांधीजी रचना के प्रतीक हैं. रचना,
जिसकी सबसे बड़ी खासियत या उस शब्द की वैधता ही इसमें है कि जैसी एक बात हो चुकती
है, वैसी ही वह दुबारा नहीं हो सकती. अगर हम गांधीजी को रचनाकार के रूप में
परिभाषित करने को तैयार हैं, तो हमें यह मानना पड़ेगा. यह उन प्रतीकों को
पुनर्स्थापित करना नहीं हो सकता जिनको उन्होंने अपने जीवन में ईजाद किया.
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गांधीजी की प्रतिष्ठा हम अपनी रचनाशीलता और कल्पनाशीलता से ही कर सकते हैं. इसका
अर्थ होगा कि हम वैसा कुछ नहीं करने का प्रयास करेंगे जैसा गांधीजी ने सब किया
होगा. हम गांधीजी की शैली पर, उनके जीवन के विषय पर ध्यान देंगे. रचनाशीलता गांधी
के लिए हमेशा संघर्ष में से पनपी. रचना का एक ही अर्थ था, किसी से टकराव. उस टकराहट
में से जो कुछ निकलेगा उसी में हमारी कल्पनाशीलता की परीक्षा होगी.
गांधीजी के जीवन में इस तरह की टकराहट के नाटकीय रूप से सफल क्षण हैं. इनमें से
अजीब सी रोशनी निकलती है. पढ़ते हैं तो लगता है कि आप हबीब तनवीर का कोई नाटक देख
रहे हैं. उसमें अचानक एक परिस्थिति उत्पन्न होती है. वही मंच, कोई साज-सज्जा नहीं
है. वह एकाएक मंदिर में तब्दील हो जाता है. कभी मंदिर की जगह पुलिस का थाना बन जाता
है. तस्वीर बदल जाती है. गांधीजी के जीवन के ऐसे कई प्रसंग हैं, जिनमें उनकी शिरकत
में एक सम्पूर्ण परिदृश्य वैसा नहीं रहा जैसा वह था.
जब मैं सोचता हूं कि हमारे प्रदेश में इस तरह के सम्पूर्ण परिदृश्य को बदल देने
वाली शिरकत का क्या अर्थ होगा, तो मेरे सामने मेधा पाटकर का संघर्ष याद आता है. मैं
सोचता हूं कि अगर आज के दिन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री घोषणा कर दें कि बांध नहीं
बनेगा, तो आपके जीवन का संघर्ष सफल हो गया. मैं समझता हूं कि परिदृश्य परिवर्तित
होगा. कोई नेता अपनी सत्ता को एकाएक बहुत बड़े खतरे में रख देने को तैयार हो जाए यह
बात शायद कांग्रेस पार्टी की अपनी संस्कृति में एक हड़कम्प मचा देगी. सारे के सारे
राज्य में एकाएक ऐसी परिस्थिति पैदा हो जायेगी जिसके लिए कोई नेता, किसी भी पक्ष
का, तैयार नहीं है.
हम कहें कि हाँ, हमने संवाद में हिस्सा लिया, जो बीस वर्षों से चल रहा है. नर्मदा
का बांध बनना चाहिए. मैं यह भी जानता हूं कि दोनों पक्षों के लोगों की अपनी कुव्वत
क्या है, किस तरह का चरित्र है, किस तरह की नैतिकता है, किस तरह एक पीटे हुए इतिहास
के नक्शे को आगे बढ़ाने का प्रयास है. हम इस संवाद को सुन चुके हैं. अब हमारे लिए
निर्णय का क्षण है. अगर हम इस परिदृश्य को बदलना चाहते हैं, तो खड़े होकर कहना पड़ेगा
कि हम इस जमीन पर, मध्यप्रदेश की जमीन पर बांध बनने नहीं देंगे, गुजरात में जो
होगा, वह गुजरात जानेगा. मैं जानता हूं कि यह दिवास्वप्न है.
सपना देखने में कोई बुराई नहीं है. इन सपनों की मदद से हम उन परिस्थितियों की
कल्पना कर सकते हैं जिन्हें हम आसानी से नहीं पढ़ सकते, क्योंकि हमें सुविधाओं, अपनी
जगह, हैसियत को थोड़ा भी छूना बर्दाश्त नहीं है. आधुनिक जीवन का सार ही यही है कि जो
कुछ मिला है उसको बचाने का प्रयास करें. यही हमारी मुख्य विशेषता है. इसको तोड़ने के
लिए बड़ी घटनाएँ, बहुत बड़े संघर्ष हमारे सामने हो रहे हैं, रोज हो रहे हैं, लेकिन हम
उनमें हस्तक्षेप के लिए खुद को तैयार नहीं पाते. शायद इसलिए, कि हम उसके बाद की
परिस्थितियों का सपना देखने को तैयार नहीं हैं.
अब दूसरी बात पर आएं. गांधीजी के जीवन की दूसरी प्रमुख बात अड़े रहने की है. ठीक है,
डंकल प्रस्ताव पर दस्तखत हो गए, संसद को तीन दिन रोके रखा. तो चौथे दिन क्या हुआ?
चौथे दिन डंकल प्रस्ताव हस्ताक्षरित हो गया. अब महाविनाशलीला शुरू करने के लिए
गतिविधियां हो रही हैं. क्या आप शतरंज का खेल खेलना फिर शुरू कर देंगे? ऐसी कमजोर
जिद का नाम निश्चित रूप से गांधी से नहीं जुड़ता-इस तरह की जिद, जो तीन दिन बाद खत्म
हो जाए.
हमारे सभी राजनीतिक दल आज एक तरह की सीमा मानते हैं कि तीन दिन हमने संसद को रोक
लिया, तो एक बहुत बड़ा राष्ट्रीय उपक्रम हो गया. चौथे दिन से कार्यवाही शुरू होगी.
शून्यकाल फिर होगा, प्रश्नकाल फिर होगा, और नये सिरे से एक जीवन शुरू हो जाएगा. जिस
चीज के लिए हम लड़े वह अब बेमानी हो जायेगी. आप पूछें, उस जिद का क्या अर्थ है?
मैं, जो कि बच्चों की तालीम से संबंध रखता हूं, सोचता हूं कि 625 करोड़ रूपया जो
यूरोपियन यूनियन से प्राथमिक शिक्षा में सुधार के लिए मिले हैं उसको वापस कर देने
की जिद ऐसी जिद हो सकती है. दूसरी तरह का सपना हो सकता है, जैसे नर्मदा बांध को ना
कह देने का. यह राशि मध्यप्रदेश सरकार को अस्वीकार कर देना चाहिए. राज्य सरकार की
नौकरशाही तो इसे स्वीकार कर चुकी है कि हम-आप जो भी कर सकते हैं वह विदेशी सहायता
और ऋण से ही कर सकते हैं. सभी इस बात को स्वीकृत कर चुके हैं. कई जगह 'हिन्द
स्वराज' में इस तरह की बातों का जिक्र है. इस पैसे को वापस कर दीजिए. मध्यप्रदेश का
माथा इससे ऊंचा ही उठेगा, नीचा नहीं होगा.
आइये हम सब लोग मिलें, एक जिला चुनें, बतायें कि बिना इस पैसे के कैसे पचास गुना
बेहतर कार्य कर सकते हैं. यह कार्यक्रम हमारी शिक्षा की जड़ों को नष्ट कर देगा.
गांवों तक के तंत्र को भ्रष्टाचार के कीचड़ में पूरी तरह से उलझा देगा और जो छ: वर्ष
का कार्यकाल पूरा होने के बाद एक बहुत बड़ा बियाबान छोड़ जाएगा, उसमें हमें पता नहीं
होगा कि अब क्या करें. इससे कुछ विधायक और मोटे हो चुके होंगे. कई जगहों पर गाड़ियां
दौड़ रही होंगी, जहां आज सायकल भी नहीं हैं, कई चीजें हो रही होंगी. लेकिन यदि इसे
अस्वीकार कर देते हैं तो हमारे बच्चों का भविष्य वैसा उजाड़ नहीं होगा, जैसा भवानी
बाबू ने एक बार अपनी खिड़की से देखा था-एक सपने में ही शायद, 'देख रहा हूं अपने देश
का उजाड़.'
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बहुत आसान है उसको रोक देना. आप कहिए कि हमें शिक्षा के इस काम के लिए विदेशी पैसा
नहीं चाहिए. हम इसके बिना ही अपनी गरीब शिक्षा को ठीक करेंगे. इस तरह के कई अभियान
हमारे बीच हैं. अभियान करने वाले हमारे बीच हैं. हम उनकी मदद से ऐसी घोषणा कर सकते
हैं. इससे क्या सरकार गिर जायेगी? क्या वर्ल्ड बैंक गिर जायेगा? कुछ नहीं होगा.
केवल हमारा आत्मसम्मान हमारे पास लौटेगा. पर वह जिद करनी हमने छोड़ रखी है. हम
दो-तीन दिन जिद करते हैं, दो-एक लेख लिख लेते हैं, उसके बाद कहते हैं कि चलो भाई एक
रास्ता है, चलो उसमें शामिल हो जाओ. गांधी ने हमारे सामने जीवन का नजारा रह-रहकर,
लिखते हुए दिखाया था.
गांधीजी अराजक व्यक्तित्व हैं. अगर गांधीजी का कोई इस्तेमाल हमारे जीवन में है, तो
यह है कि सत्ता के केन्द्रों की वाणी को चिन्तन के केन्द्रों से अलग रखिए.
स्वतंत्रता के गुण को, विचार को, केन्द्र से अलग रखिए. विचार के लिए जगह बनाइए. उस
जगह के लिए राष्ट्र से पैसा लीजिए. मेहरबानी करके विचार और सत्ता को साथ-साथ बैठने
मत दीजिए, नहीं तो आप विचार को नष्ट कर देंगे.
विचार और सत्ता का जब आमना-सामना होता है तो उसमें विचार ही नष्ट हो जाते हैं.
सत्ता की नगरी में विचार हिचकिचाहट-सा हो सकता है, अमूर्त ही हो सकता है, कभी
स्पष्ट नहीं हो सकता. स्पष्ट कहने वाला आपको हर बार बाहर से बुलाना पड़ेगा और वह
अपनी बात कहकर चला जायेगा. और फिर चर्चा की एक जरूरत आपके पास रह जायेगी. आप
बार-बार वह नहीं कहलवा पायेंगे. जो सत्ता के ठीक नीचे रहते हैं उनकी बहुत बड़ी
समस्या यह है कि इस अराजक व्यक्तित्व का क्या किया जाये.
गांधीजी का अराजक व्यक्तित्व उनको कांग्रेस पार्टी तथा स्वतंत्रता के बाद के भारत
में एक बड़ा अटपटा व्यक्तित्व बनाता था. बड़ी मुश्किल यह है कि क्या यह विचारधारा कभी
केन्द्र में रह सकती है? यह हमेशा केन्द्र से बाहर बनी रहेगी और वह सब बताती रहेगी
कि आप उसमें कितने भ्रष्ट हो गये हैं. हमेशा एक पैमाना दिखाती रहेगी. इस विचारधारा
का शायद इतिहास के लिए यही उपयोग है. उस विचारधारा को किसी रूप में लोहिया ने और
जयप्रकाश ने समझा था. इन सत्ता केन्द्रों पर भी सक्रिय आवाजें रहनी चाहिए.
हमें यह मानना पड़ेगा कि वह दूसरी आवाज, 'हिन्द स्वराज' वाली आवाज, स्वतंत्र विचार
को सुरक्षित रखती है. सम्पादक लगातार प्रश्नकर्ता को प्रश्न करने का मौका देता है
कि भाई तुम हमला करो मुझ पर ताकि मैं अपनी बात कह सकूं. विचार की यही जगह है. लेकिन
हमारे यहाँ स्थिति तो यह है कि आज देश में ऐसा एक भी पुस्तकालय नहीं बचा, राष्ट्रीय
पुस्तकालयों समेत, जहां पर 'पहल' से लगाकर 'न्यू साइंटिस्ट' तक हर पत्रिका मिल सकती
हो. हम एकदम अक्षम स्थिति में हैं. इसलिए यह विलाप का क्षण नहीं है, पहचानने का
क्षण है. एक अराजक व्यक्तित्व का क्या करें? ऐसे व्यक्तित्व का ऐसी नगरी में क्या
करें?
यहां अगर आप राजसत्ता के निकट नहीं हैं तो आपके लिए एक पते को ढूंढ़ना भी मुश्किल
है. आपके लिए कहीं कोई टेलीफोन करना भी मुश्किल है. जब तक आप न बता सकें कि आप
फलाने साहब हैं, कौन आपको पूछता है? इन वंचितों की दुनिया में हम सब लोग थोड़ी-थोड़ी
सत्ता का उपभोग करने वाले कुछ क्षणों के लिए एकदम ताकत से आवेश महसूस करने लगते
हैं.
गांधीजी के अराजक व्यक्तित्व को, अराजक स्वरूप को, जो उनको जीवन भर गलत आत्मविश्वास
देता आया, गोली से जूझने का आत्मविश्वास, स्वयं गोली जैसा आत्मविश्वास उस अराजक
व्यक्तित्व को समझने की कोशिश हम कहां से करें? मुझे लगता है कि गांधीजी के जीवन को
समझने के ये बिन्दु हैं. उस जीवन का संक्षेप ढूंढ़ने की दिशा में कुछ आगे बढ़ते हुए
मुझे लगता है कि वह संक्षेप 'हिन्द स्वराज' और गांधीजी के जीवन के बीच का संक्षेप
है. वह एक किताब है. किताबों का उपयोग यही होता है कि वह विचार विनिमय करती है, कुछ
चीजें याद दिलाती रहती हैं.
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आप सच मानिए अगर भोपाल शहर की लायब्रेरी में बाकायदा ढंग से 'हिन्द स्वराज' को
ढूंढ़ने निकलिए, आप नहीं ढूंढ़ पायेंगे. अन्तत: आपको किसी अधिकारी को फोन करना ही
पड़ेगा कि मुझे 'हिन्द स्वराज' की प्रति चाहिए, कहीं से दिलवा दीजिए. फिर वह आपको
अपने माध्यमों का उपयोग करते हुए 10-12 प्रतियाँ तक निकलवा देगा. हमारी पूरी
व्यवस्था टूट चुकी है. हम सिर्फ राज्य की मदद से कुछ कर पा रहे हैं. ऐसी स्थिति में
बुद्धि का साम्राज्य, चर्चा का, चिंतन का साम्राज्य, यानी एक अलग साम्राज्य बनाने
के लिए जो राज्य के साधन हैं, उनसे कुछ अलग खड़ा करना होगा.
सही अर्थ में हम ब्राम्हण हों. उस अर्थ में नहीं जिसमें ब्राम्हणों को आरक्षण नहीं
है, बल्कि उस अर्थ में ब्राम्हण, जिस अर्थ में भारतीय सभ्यता के प्राचीनकाल से वह
सत्ता से लोहा लेता रहा है. कहता रहा है, 'तुम्हारे पास जमीन की सत्ता है, मेरे पास
नैतिक सत्ता है.' वाणी के केन्द्र ऐसा कहने का दम उसी दिन भर सकेंगे जिस दिन वह
गांधीजी की तरह अराजक होने के लिए तैयार होंगे. अराजक का अर्थ यह नहीं कि आप बाहर
सड़कों पर निकल जायें, बल्कि राजसत्ता के बगैर भी गुजारा कर सकें. उसके बगैर रहकर
दिखा सकें और अपने महत्व को स्थापित कर सकें.
23.11.2009, 14.22(GMT+05:30) पर प्रकाशित
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