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यंत्रः तारक और मारक

विचार

 

यंत्रः तारक और मारक

डॉ. रामजी सिंह

 

1909 में जब बापू ने हिन्द स्वराज लिखी थी तो अनेक लोगों ने प्रश्न उपस्थित किये थे. लेकिन मूल प्रश्न था कि 'हिन्द स्वराज' विज्ञान विरोधी और प्रगति अवरोधक है. दुर्भाग्य था, उस मानसिकता से बापू के सबसे प्रिय पंडित नेहरू भी ग्रसित थे और अब तो यह पत्राचारों में बिल्कुल प्रकट हो चुका है. प्रश्न है कि विज्ञान मनुष्य के लिए है या मनुष्य विज्ञान के लिए? जहां सम्पूर्ण विश्व का प्रश्न आता है, कुछ लोग कहते हैं कि विज्ञान ने बहुत सारी उपलब्धि दी. कौन अस्वीकार करता है? अभी हमारे भाई शल्य जी ने कहा कि मनुष्य का शरीर भी तो यंत्र है. बापू यंत्र के विरोधी नहीं थे.

 

हिंद स्वराज पुस्तक का कवर

यंत्र के तीन प्रकार होते हैं. जो विध्वंसक यंत्र है बापू उसके विरोधी थे और जो इसका समर्थक है वह सब कुछ हो सकता है-वह मनुष्य नहीं हो सकता. यह प्रकार जो यंत्र का था, वह बस मारक यंत्र था. अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों के द्वारा हाइटेक के द्वारा जो बेरोजगार पैदा करने का ठेका हमने ले लिया है, वह यंत्र बापू को स्वीकार्य नहीं था. लेकिन तारक यंत्र, सिंगर मशीन की उन्होंने उपमा दी है कि किसी प्रकार अपनी पत्नी के कष्ट को, त्रासदी को दूर करने के लिए उन्होंने सिंगर मशीन का आविष्कार किया है. ऐसे यंत्र चाहिए.

इसीलिए कौन कहता है कि बापू यंत्र के विरोधी थे? टेक्नालॉजी का प्रश्न तो है कि टेक्नालॉजी और आइडयालॉजी अलग-अलग नहीं हो सकते हैं. बापू का संघर्ष न तो साम्यवाद से है, न पूंजीवाद से है. साम्यवाद और पूंजीवाद दोनों टेक्नालॉजी के मामले में एक ही हैं और टेक्नालॉजी ही उनको इस तरह से अमानवीय बना चुकी है. टेक्नालॉजी के दो पक्ष होते हैं. एक मैकेनाइजेशन. मनुष्य के शरीर और बल को प्रस्थापित करता है. और एक है जो मनुष्य के दिमाग के बदले कम्प्यूटर, यह सारे जो तत्व हैं, उपस्थित करता है.

भारत जैसे देश में जहां 100 करोड़ की आबादी हो, हाइटेक की बात करने वाला मानव विरोधी होगा, विज्ञान विरोधी होगा, वह और कुछ नहीं हो सकता. इसलिए प्रश्न है कि यंत्र इस प्रकार हमें कहां ले जाता है? यह सभ्यता का सारा संकट यंत्रों के द्वारा दिया हुआ है. यंत्र को तो कोई दिमाग है ही नहीं कि दर्शन दे सके. बापू को यंत्र विरोधी मानना ऐसा नहीं हो सकता.

यंत्र की मर्यादाएँ हैं, कौन यंत्र चाहिए, कौन नहीं. शुमाखेर ने जब स्माल इज ब्यूटीफुल लिखा तो कब वह किस यंत्र का विरोधी था, समझना चाहिए. जब क्लब ऑफ रोम की रिपोर्ट में लिमिट्स टू ग्रोथ लिखा गया तो यह सीमा कहां है? प्रश्न है. सभ्यता के विशारद यहां पर बैठे हुए हैं. मूल प्रश्न है कि हमारी सभ्यता का उद्देश्य क्या है? यंत्र सभ्यता की प्रगति के लिए है क्या इसीलिए बापू यंत्रों के विरोधी नहीं थे, कौन कहता है कि बापू यंत्र के विरोधी थे? वह तो सचमुच में कहते थे कि चाहे मोटर-रेल-वायुयान चाहे जो चढ़ो. कौन कहता है कि गांधीजी यंत्र के शत्रु थे या विज्ञान के, वह तो मनुष्य मात्र से इतना ही कहते थे कि रेल-मोटर वायुयान चाहे जो चढ़ो लेकिन याद रखो आखिर तुम्हें जाना कहां है. प्रश्न को हम भूल गये, अपनी दिशा को भूल गये. इसीलिए प्रश्न है कि हम दिशा भूल गये.

हमारी प्रगति का लक्ष्य क्या है? प्रगति को हम क्या समझते हैं? सभ्यता की प्रगति को जो समझाया गया है यह औद्योगिक सभ्यता के द्वारा स्थापित भौतिकवादी और सुखवादी सभ्यता ने प्रगति का मानदण्ड रखा है. वैभव, विलासिता और प्रगल्भ प्राचुर्य. क्या इसी से हो सकता है. अगर यही होता तो नचिकेता को जब यमराज ने कहा:-

''ये ये कामा दुर्लभा, मर्त्यलोके सर्वान् कामान् छन्दत: प्रार्थयस्व''.

(मनुष्य लोक में दुर्लभ समस्त भोगों को इच्छानुसार मांग लो.) तो क्यों नहीं मान लिया? ''इमा रामा: सरथा: सतूर्या न हीदृषा लम्भनीया मनुष्यै:''.

(ये स्वर्गीय रमणियां, ये रथ आदि सवारियां, वाद्य-संगीत, ये मनुष्य को दुर्लभ हैं)

तो नचिकेता माना क्यों नहीं? इसीलिए मूल प्रश्न है कि मानव की प्रगति क्या है? बड़े-बड़े नगर बनाये जा रहे हैं. अभी तक तो वह बीमारी मध्यप्रदेश में नहीं आई है. लेकिन यह बड़े भीमकाय नगरों का जैसा कि स्पेंगलर ने डिक्लाइन ऑफ द वेस्ट में लिखा है कि भीमकाय नगर पतोन्मुख संस्कृति के परिचायक हैं. इसीलिए प्रश्न है कि यह जो औद्योगिक सभ्यता हमारे सामने नगरों की अप संस्कृति को लाई है. इस औद्योगिक सभ्यता ने हमारे पर्यावरण को प्रदूषित किया है. इसी औद्योगिक सभ्यता ने नागासाकी और हिरोशिमा में मानव का संहार किया है.

प्रश्न है कि प्रगति क्या है? मैं तो बराबर उपनिषदों की ओर देखता हूं. जब पूछा याज्ञवल्क्य ने कात्यायनी और मैत्रेयी को, (दोनों पत्नियां थीं). जब वह वनवास जाने लगे तो सोचा कि आधा-आधा दोनों में बंटवारा कर दें. तो कात्यायनी सांसारिक थी उसने कहा कि हां-आधा बांट दीजिए. लेकिन मैत्रेयी को पूछा कि मैत्रेयी तुम्हें आधी सम्पत्ति दे दें, एक प्रश्न किया. वही प्रश्न आप पूछें और वही प्रश्न गांधी का 'हिन्द स्वराज' में खड़ा है. जब सभ्यता के संबंध में प्रश्न करते हैं कि क्या इससे मुझे सुख और शांति मिलेगी? याज्ञवल्क्य ने कहा कि इसकी तो कोई गारंटी नहीं है. तो मैत्रेयी ने हाथ जोड़कर कहा-

''ये नाहम् नामृतास्याम, किमहम् तेनकुरुर्ष्याम्''

जो लेकर मुझे स्थायी सुख और शांति नहीं मिलेगी, वह लेकर मैं क्या करूंगी?

आज जिस सभ्यता के संकट में, हम पहुंचकर गांधी की ओर बेतहाशा दौड़ रहे हैं, दूसरा विकल्प है नहीं. प्रश्न है पर्यावरण का. मैं वाइसचांसलर्स कॉन्फ्रेंस में गया था. पर्यावरण पर चर्चा हो रही थी. कहा कि कैसे पर्यावरण के संकट को मिटाया जाये. लोगों ने कहा कि कारखाने का ट्रीटमेन्ट हो. मैं तो समझता हूं कि भोपाल की त्रासदी नहीं होती तो मुख्यमंत्री जी को प्रेरणा नहीं होती कि हिन्द स्वराज पर लोगों को बुलायें. यह है- औद्योगिक सभ्यता की विकृति का स्पष्ट प्रमाण.

पर्यावरण का संकट कैसे दूर हो? ठीक है अगर हम भोगवादी सभ्यता का जीवन दर्शन अपनायेंगे, तो क्या होगा? प्रकृति का अनुचित दोहन करना होगा. तेल अस्सी वर्ष में समाप्त हो रहा है. एटॉमिक ऊर्जा से चलायेंगे तो उनका ''वेस्टेज'' कहां गिराया जाये? यह समस्या और थ्री-स्कॉच एयरकंडीशनर्स की जो संस्कृति है, पांच सितारा होटल की जो संस्कृति है, यही हमारे प्रलय का आमंत्रण है.

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ओजोन की छतरियों में छेद हो रहे हैं और नागासाकी और हिरोशिमा पर परमाणु बम जितना खतरा उपस्थित कर सकते थे, उससे कम से कम एक हजार गुना खतरनाक यह पर्यावरण का प्रदूषण है. इसका उत्तार क्या विज्ञान के पास है? नहीं है विज्ञान के पास. इसका उत्तार अध्यात्म ज्ञान के पास होगा. प्रश्न है कि कैसे होगा? जब तक हम अपने भोग विलास पर स्वयं संयम नहीं करेंगे और मांग-परिमांग पर कोई नियंत्रण नहीं होगा तो प्रकृति का अनुचित दोहन होता रहेगा और प्रकृति का अनुचित दोहन होगा तो पर्यावरण का प्रदूषण नियंत्रण विजयादशमी के दिन भगवान राम भी नहीं कर सकेंगे.

इसीलिए प्रश्न है, या तो हम गांधी की ओर लौटें या महानाश का वरण करें. इसीलिए आज हम इतना ही कहेंगे कि ''एक हाथ में कमल'',-कमल समत्व, शुध्द आत्मज्ञान का प्रतीक है, एक में धर्मदीप्त विज्ञान. जब दोनों का समन्वय होगा. सुकरात से पूछा उसकी पत्नी ने कि तुम्हारे पास इतने लोग क्यों आते हैं? कहा कि मैं तो कुछ नहीं जानता. तो कहा कि मैं भी नहीं जानती हूं. कहा कि तुम नहीं जानती हो कि तुम नहीं जानती हो. मैं नहीं जानता हूं कि मैं नहीं जानता हूं. लेकिन दूसरा सवाल कुछ मित्रों ने सुकरात से पूछा कि तुम सब दिन इतने खुश रहते हो सुकरात ने कहा कि मेरा इतना ही राज है कि मैं अपनी आवश्यकता को कितना कम कर सकता हूं.

हिन्द स्वराज में बहुत क्रांतिकारी बातें हैं. कैसे होगा, 'हिन्द स्वराज' क्योंकि इतना गतिशील व्यक्ति तो मैंने नहीं देखा होगा. सचमुच में आज हम इतना ही कहते हैं कि विज्ञान के बिना आत्मज्ञान पंगु है लेकिन आत्मज्ञान के बिना विज्ञान अंधा है. अगर विज्ञान को गांधी की दृष्टि नहीं आयेगी तो विज्ञान सत्यानाश कर देगा.

 

23.11.2009, 14.22(GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sudhanshu Shekhar (sudhanshushekhar50@yahoo.com) Bhagalpur

 
 अब समय आ गया है कि हम विकास के वैकल्पिक औऱ स्थायी रास्ते को अपनायें. इस दिशा में हिंद स्वराज हमारी मदद कर सकता है. गांधी के चिंतन को न तो हुबहू अपनाने की जरुरत है और ना ही उसे अस्पृश्य मानने की. 
   
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