नोबेल की नाकाम अदा
बहस
नोबेल की नाकाम अदा
हॉवर्ड ज़िन
अनुवादः भारतभूषण तिवारी
मैं बहुत निराश हुआ जब मैंने सुना कि नोबेल शांति पुरस्कार ओबामा को दिया गया है. जो राष्ट्रपति दो लड़ाइयाँ जारी रखे है उसे शांति पुरस्कार दिया जाये यह विचार वास्तव में धक्कादायक है. पर तब तक ही जब तक यह याद न आए कि वूड्रो विल्सन, थियोडोर रूज़वेल्ट और हेनरी किसिंजर इन सभी को नोबेल शांति पुरस्कार मिल चुका है. नोबेल समिति अपने छिछले आकलन के लिए जानी जाती है जो रेटरिक और निष्फल प्रयासों से प्रभावित हो जाता है. विश्व शान्ति को भंग करने के घनघोर प्रयासों को नज़रअंदाज़ करने के लिए भी यह समिति मशहूर है.
हाँ, विल्सन को लीग ऑफ़ नेशन्स के गठन के लिए श्रेय दिया जाना चाहिए. लीग ऑफ़ नेशन्स वह अप्रभावी संस्था थी जिसने युद्ध रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया. मगर विल्सन ने मेक्सिको के तट पर बम बरसाए थे, हैती एवं डोमिनिकन गणराज्य पर कब्ज़ा जमाने के लिए सेनाएँ भेजी थीं, और अमेरिका को पहले विश्व युद्ध के दौरान योरप के बूचडखाने में दाखिल करवाया. पहला विश्व युद्ध मूर्खतापूर्ण और भयंकर लड़ाइयों की सूची में निस्संदेह सबसे ऊपर है.
हाँ, थियोडोर रूज़वेल्ट ने जापान और रूस के बीच सुलह करवाई थी. मगर वे भी युद्ध-प्रेमी थे. स्पेन से मुक्ति दिलाने के बहाने उन्होंने क्यूबा पर हुई अमेरिकी चढ़ाई में हिस्सा लिया और इस तरह उस छोटे से द्वीप पर अमेरिकी शिकंजा कसते रहे. रूज़वेल्ट ने राष्ट्रपति के तौर पर फिलिपीन्स के नागरिकों को परास्त करने के लिए रक्तरंजित युद्ध छेड़ा था, यहाँ तक कि फिलिपीन्स में छह सौ असहाय ग्रामीणों का क़त्ल करवाने वाले अमेरिकी जनरल को मुबारकबाद भी दी थी. नोबेल समिति ने रूज़वेल्ट की भर्त्सना करने वाले और युद्ध की आलोचना करने वाले मार्क ट्वेन को या एंटी-इम्पेरिअलिस्ट लीग के नेता विलिअम जेम्स को नोबेल पुरस्कार नहीं दिया.
और हाँ, समिति ने हेनरी किसिंजर को शांति पुरस्कार देना उचित समझा क्योंकि उन्होंने वियतनाम युद्ध रोकने के अन्तिम शांति समझौते पर दस्तखत किये थे जबकि वे स्वयं वियतनाम युद्ध के प्रमुख निर्माताओं में एक थे. वही किसिंजर जो युद्ध को फैलाने की निक्सन की उस योजना में सिर झुकाए शामिल रहे जिसमें वियतनाम, लाओस और कम्बोडिया के खेतिहर गाँवों पर बम बरसाना शामिल था. किसिंजर को, जो कि युद्ध अपराधी की परिभाषा से एकदम मेल खाते हैं, नोबेल शांति पुरस्कार दे दिया गया.
किसी को शांति पुरस्कार वादों के आधार पर नहीं (जैसे वादे ओबामा अपने वाकचातुर्य से करते हैं) बल्कि युद्ध रोकने की दिशा में हुई वास्तविक उपलब्धियों के लिए दिए जाने चाहिए. और ओबामा ने तो इराक़, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में चल रही रक्त-रंजित और अमानवीय सैन्य कार्रवाई को जारी रखा है.
नोबेल समिति को चाहिए कि वह संन्यास ले ले और अपनी अकूत सम्पदा को ऐसे किसी अन्तर्राष्ट्रीय शांति संगठन को को दे दे जो स्टारडम और रेटरिक से अभिभूत न होती हो और इतिहास की थोड़ी-बहुत समझ रखती हो.
यह तर्क ज़्यादातर दिया जाता है कि नोबेल समिति ने यह समझा कि ओबामा की वास्तविक उपलब्धियाँ पुरस्कार का औचित्य सिद्ध नहीं करतीं परन्तु चुनाव अभियान के दौरान और उसके बाद किये गए उनके वादों से यह उम्मीद बंधती है कि पुरस्कार उन्हें उन वादों को पूरा करने के लिए प्रेरित करेगा. दरअसल खुद ओबामा बड़े आदर के साथ यह पुरस्कार ग्रहण करते वक़्त विनम्रता की प्रतिमूर्ति बने हुए थे. अपनी उपलब्धियों का कोई भी दावा किये बिना उन्होंने इस पुरस्कार को विश्व शांति के लिए उठाये गए क़दमों के लिए मिले प्रोत्साहन के तौर पर देखा.
परिस्थिति का अधिकतम लाभ उठाने की उत्कट इच्छा समझ में आती है पर इस बात की सम्भावना बहुत क्षीण है कि इस पुरस्कार का वांछित असर पड़ेगा. इस विचार के प्रणेता यह मानते हैं कि इस पुरस्कार से ओबामा का विवेक जागृत होगा मानो वे एकमात्र अभिनेता हैं जिसके पास इस उदार भेंट का प्रतिफल देने की स्वतंत्रता है. पर वे एकमात्र अभिनेता नहीं है. हाँ वे सर्वोच्च व्यक्ति हैं पर वे सत्ता के ऐसे पिरामिड के उच्चतम बिंदु पर हैं जो परत दर परत कार्पोरेटवादियों और सैन्यवादियों से बना है.
इस पिरामिड को ढहाने की उन्होंने कोई कोशिश नहीं की है. इसके उलट उन्होंने आक्रामक हिलरी क्लिंटन और जो बाइडन को नियुक्त किया, और जॉर्ज बुश के पिछले दोनों कार्यकालों में विदेश सचिव रहे रॉबर्ट गेट्स को भी पकड़े रखा. उनके किसी भी सलाहकार ने निर्भीकतापूर्वक युद्ध और सैन्यवाद से परे जाने की चाह नहीं दर्शाई है.
हाँ, ओबामा लच्छेदार भाषण दे सकते हैं पर उन भाषणों को कृति में बदलने में वे कामयाब नहीं हो पाए हैं. क्योंकि सत्ता के इस पिरामिड को बरक़रार रखने हेतु वे खुद भी ज़िम्मेदार हैं.
सेना हटाने के सांकेतिक कदमों के बावजूद इराक़ में लड़ाई जारी रखकर और निजी सेनाओं को हटाने के लिए कुछ भी न करके ओबामा ने वास्तव में बुश की नीतियों को बल ही दिया है. |
क्या एक शान्ति पुरस्कार उन्हें अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपति की नीतियों को और स्वयं की भी नीतियों को, जो उनके पूर्ववर्ती से बहुत मिलती-जुलती हैं, उलटने के लिए आवश्यक ताकत दे सकता है. मुझे इस बात में गहरा सन्देह है.
सोचिये क्या होता अगर नोबेल समिति ने 1965-66 में लिंडन जॉनसन को इस बिना पर शांति पुरस्कार देने का निर्णय लिया होता कि इससे उन्हें वियतनाम से हटने की प्रेरणा मिलेगी? क्या कोई कल्पना कर सकता है कि यह युक्ति काम करती? जॉनसन को युद्ध और तेज़ करने का आग्रह कर रहे सेनाधिकारियों के समूह और युद्धोन्मादी सलाहकारों को यह नाकाम अदा (और पुरस्कार अक्सर ही सत्ता और मुनाफे की कठोर दुनिया में दिखाई गई नाकाम अदाओं की तरह होते हैं) क्या ही अपने स्थान से डिगा पाती?
तर्क यह भी दिया जाता है कि ओबामा को पदभार ग्रहण किये अभी एक साल से भी कम समय हुआ है और बुश की नीतियों के भारी बोझ से निबटने के लिए यह अवधि पर्याप्त नहीं है. इस बोझ को कम करने की दिशा में एक छोटा सा कदम (शब्दों और वादों से परे) भी दिखाई पड़े तो इस तर्क से प्रभावित हुआ जा सकता है. सेना हटाने के सांकेतिक कदमों के बावजूद इराक़ में लड़ाई जारी रखकर और निजी सेनाओं को हटाने के लिए कुछ भी न करके ओबामा ने वास्तव में बुश की नीतियों को बल ही दिया है. फायदेमंद ठेके उठाए ये निजी सेनाएँ इराक़ी जनता का दमन करने वाली एक प्रमुख शक्ति है.
अफगानिस्तान और पाकिस्तान इन दोनों जगहों पर हिंसक कार्रवाई करने में ओबामा दरअसल बुश से भी आगे बढ़ गए हैं. अफगानिस्तान में उन्होंने और अधिक सैन्य टुकडियाँ भेजी हैं और वहाँ हमारे बमवर्षकों के हवाई हमले मासूमों की जान ले रहे हैं. पद ग्रहण करने के तुरंत बाद पाकिस्तान में उन्होंने सीमा पार से चालक-रहित मिसाइलें भेजीं जिससे सैकड़ों नागरिकों की जानें गईं. 'संदिग्ध आतंकवादियों' को मार गिराने के नाम पर पाकिस्तान में आज भी यह भक्षक मिसाइलें बरसाई जा रही हैं और वहाँ के नागरिक मारे जा रहे हैं.
अब तक के अपने छोटे से कार्यकाल में भी ओबामा के पास 6000 करोड़ डॉलर से ज़्यादा के सैन्य बजट को थोड़ा तो कम करने अवसर था. इसके उलट उन्होंने बजट को बढ़ा दिया. अगर ओबामा बुश की नीतियों को जारी रखते हुए उन्हें और आगे बढ़ा रहे हैं तो यह कहने में कोई मतलब नहीं है कि उनके पास उन नीतियों से पार पाने का पर्याप्त समय नहीं था.
मुझे लगता है कि कुछ प्रगतिशीलों ने डेमोक्रेटिक पार्टी का इतिहास भुला दिया है. हर बार मुश्किलों के दौर में जनता ने इस पार्टी पर भरोसा किया और उन्हें बाद में निराश होना पड़ा. हमारा राजनीतिक इतिहास दर्शाता है कि केवल विशाल जन-आन्दोलन ही कार्पोरेट और सैनिक सत्ता के पिरामिड को हिलाने में और थोड़े समय के लिए ही सही पर दिशा परिवर्तन करने में कामयाब हुए हैं. तीस और साठ के दशक में इन जन-आन्दोलनों ने अपनी बेधड़क कार्रवाइयों द्वारा देश में जागृति पैदा की और व्यवस्था को तगड़ी चुनौती दी.
साहसिक परिवर्तन की माँग करने वाले ऐसे किसी राष्ट्रीय आन्दोलन को जॉर्ज बुश के मुकाबले ओबामा द्वारा तरजीह दिए जाने की सम्भावना ज़्यादा है. आज ऐसे ही किसी प्रयास की ज़रूरत है. उन्हें पुरस्कार देना, उनकी भाषणबाज़ी की प्रशंसा करना किसी भी सूरत में ऐसे आन्दोलन की जगह नहीं ले सकता.
(विख्यात इतिहासकार हॉवर्ड ज़िन अमेरिकी सरकारों की साम्राज्यवादी नीतियों के प्रखर आलोचक रहे हैं. ज़िन नागरी अधिकारों के लिए और युद्ध-विरोधी अनेक आन्दोलनों में भी सक्रिय रहे हैं. उनकी पुस्तक 'पीपुल्स हिस्ट्री ऑफ़ यूनाइटेड स्टेट्स' मॉडर्न क्लासिक का दर्जा हासिल कर चुकी है. यह आलेख मूल अंग्रेजी में अमेरिकी राजनैतिक पत्रिका 'दि प्रोग्रेसिव' के दिसम्बर 2009 अंक में प्रकाशित हुई है.)
29.11.2009,
19.20 (GMT+05:30) पर
प्रकाशित