सत्याग्रह से सूचना अधिकार तक
मिसाल-बेमिसाल
सत्याग्रह से सूचना अधिकार तक
कुमार कृष्णन, रांची से
प्राकृतिक संसाधनों के मामले में समृद्ध झारखण्ड
आज भले नक्सल आंदोलन की हिंसा के कारण चर्चा में हो लेकिन राज्य का टाना भगत समुदाय
आज भी गांधी की राह पर चल रहा है. इसी राह पर चलते हुए इस समुदाय ने सफलतायें हासिल
की और अब इन गांधीवादियों ने सूचना के अधिकार को अपना हथियार बना कर अपनी लड़ाई
शुरु की है.
झारखण्ड के रांची, हजारीबाग, गुमला समेत राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में फैला हुआ यह आदिवासी
समुदाय देवी-देवताओं के साथ तिरंगा की पूजा करता है और देशभक्ति गीत ही इसके भजन
हैं. इनके घरों में तुलसी चौरा से सटे बांस के डंडे में तिरंगा लहराता मिलता है.
गांधी इनके आदर्श हैं और गांधी के वचन इनका धर्म. हिंसा से नफरत ऐसी कि लाल रंग की
वस्तुओं तक का इस समुदाय ने बहिष्कार कर रखा है. इस बात को 80 साल से अधिक हो गये
लेकिन कोई एक लाख की आबादी वाला यह समुदाय आज भी गांधी की राह पर चल रहा है.
रांची के बिशुनपुर ग्राम में 1913-14 में टाना सम्प्रदाय का उदय हुआ. इसी क्षेत्र का
एक ओझा भंगा उरांव टाना सम्प्रदाय के आदि प्रवर्तक थे. इसी थाने के ग्राम चिंगरी
के एक नौजवान जतरा उरांव ने महाजनों की बेगारी नहीं करने का उरांव जाति का आह्वान
किया. अंग्रेज सरकार के पिट्ठु जमींदार साहू महाजन की ज्यादती से टाना सम्प्रदाय उब
चुके थे. वे अंग्रेजों को भगाकर स्वतंत्र होना चाहते थे, इसके लिए टाना भगतों ने
अपने तरीके से असहयोग आंदोलन चलाना शुरु किया.
1924-25 में महात्मा गांधी रांची आए, जहां टाना भगतों से उनकी मुलाकात हुई. टाना भगत गांधी से तथा गांधी जी टाना भगतों के अहिंसक
आंदोलन से अत्यंत प्रभावित हुए. गांधी जी के आंदोलन और टाना भगतों के आंदोलन की
चारित्रिक विशेषताओं में समानता थी. टाना भगतों ने नारा गढ़ा- ''अंग्रेज की क्षय,
गांधी बाबा की जय हो'' गया. अंग्रेजों के खिलाफ जब आंदोलन तेज़ हुआ तो टाना भगतों
की जमीनें कुर्क कर ली गईं. लेकिन टाना भगतों का आंदोलन पूरे झारखंड में परवान
चढ़ता गया. देश आज़ाद हुआ और टाना भगतों ने सांस ली. लेकिन उनकी मुश्किलें कम नहीं
हुईं.
पूर्व विधायक गंगा टाना भगत के अनुसार "जमीन की वापसी और इसके मालिकाना हक के अभाव में
ये विकास की मुख्य धारा से दूर होते गए. इनमें आक्रोश की ज्वाला धधकने लगी. जमीन
वापसी की मांग को लेकर जब टाना भगतों ने आंदोलन किया तो बदले में इन्हें लाठियां
मिलीं."
रोज-रोज के धरना-प्रदर्शन, अधिकारियों से मुलाकातें, मंत्रियों से मिन्नतें...सरकारें आती-जाती
रहीं लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था. अलग राज्य के गठन के बाद भी सरकार ने इनके मसले
को गंभीरता से नहीं लिया. लेकिन इस बात पर यकीन करना मुश्किल है कि अपनी ज़मीन पाने
के लिए टाना भगतों के सामने सूचना के अधिकार ने सच में जादू की छड़ी की तरह काम
किया.
सूचना के अधिकार के तहत कार्यरत हस्तक्षेप समूह 'जवाब' के
प्रतिनिधियों से टाना भगतों की मुलाकात हुई तो पहली बार 'जवाब'
के प्रतिनिधि भी चौंके. संगठन के लोगों ने मुद्दे की गंभीरता को समझा
और टाना भगतों को सूचना के अधिकार की ताकत के इस्तेमाल की सलाह दी गयी.
उनकी सलाह पर पूर्व विधायक गंगा टाना भगत ने राजभवन में इस अधिकार के तहत अर्जी दाखिल की और लोक सूचना
पदाधिकारी से राजभवन को समर्पित ज्ञापन व टाना भगतों की लंबित मांगों के संदर्भ में
की जानेवाली कार्रवाईयों का ब्योरा मांगा. साथ ही बिहार भू-लगान संशोधन अधिनियम के
तहत बिहार सरकार के तत्कालीन राजस्व भूमि सुधार के सचिव एन.एन.पी. सिन्हा के
द्वारा कार्रवाई के निर्देश व र्कारवाई का ब्योरा भी मांगा. गौरतलब है कि इस संदर्भ
में उन्होंने धनबाद, बोकारो, चतरा, रांची, गुमला, गिरिडीह, खूंटी, लोहरदगा, पश्चिमी
सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम, लातेहार, पलामू, गढ़वा के उपायुक्तों को कार्रवाई का निर्देश
दिया था.
सत्रह वर्षों से यह निर्देश फाइलों के ठंडे बस्ते में पड़ा रहा. मांगी गयी सूचना
उपलब्ध कराने में भी रवैया टाल-मटोल वाला रहा. अंतत: राजभवन के लोक सूचना अधिकारी
द्वारा सूचना उपलब्ध नहीं कराए जाने के विरोध में राज्य सूचना आयोग में प्रथम तथा
द्वितीय अपील दायर की गयी. लिहाजा राजभवन के लोक सूचना अधिकारी सहित सम्बद्ध जिलों
के उपयुक्तों को आयोग ने सम्मन जारी करते हुए हाजिर होने का निर्देश दिया. आयोग की
इस कार्रवाई से प्रशासन पर दवाव बढ़ा. आयोग में ठंडे बस्ते में पड़े राजस्व भूमि
सुधार सचिव के निर्देश को पेश किया गया और उसकी प्रति अपीलकर्ता को उपलब्ध करायी
गयी. इसके बाद प्रशासन हरकत में आया और इस पूरे मामले की पहली सफलता रांची में 114 टाना भगतों को जमीन की खाता
पुस्तिका उपलब्ध कराने के रुप में सामने आई.
रांची के कलेक्टर के.के. सोन बताते हैं-
"टाना भगतों के पास न
रहने के लिए जमीन थी, न मकान. अब दोनों चीज सरकार द्वारा उपलब्ध करायी जाएगी. साथ
ही विकास की योजनाओं से भी इन्हें जोड़ा जायेगा."
लंबे अरसे के संघर्ष के बाद मिली इस जीत के बाद टाना भगतों ने हर वर्ष 30 अगस्त को मुक्ति दिवस
मनाने का फैसला लिया है. रांची के अलावा गुमला, लोहरदगा, लातेहार में 800 टाना भगत
परिवारों को जमीन का मालिकाना हक दिया जाना जाता है. टाना भगतों का कहना है कि अभी
तो उन्होंने लड़ाई के एक पड़ाव को जीता है. अस्तित्व का सवाल, राष्ट्रीय आंदोलन में
भागीदारी, बच्चों की तालीम का सवाल शेष है.
'जवाब'के अभिषेक, कुमार प्रियतम, सौरभ का कहना है कि सूचना का अधिकार जनता के हाथों
बड़ी ताकत है. आम जन को इसके अधिकाधिक इस्तेमाल के लिए प्रेरित किये जाने की
आवश्यकता है. सौरभ कहते हैं-"यह तो शुरुवात है."
29.11.2009, 21.04 (GMT+05:30) पर
प्रकाशित