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इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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रुदाकी की कविता का भाषांतर

भाषांतर

आयी मुझ तक

रुदाकी

874-940/41 , पर्सियन कवि. अनुवाद: पीयूष दईया


आयी मुझ तक-
कौन ?
वह.


कब ?
भोर में , भयभीत.


किस से ?
अंगार.


किस का ?
उसके पिता का.


मान लो !
उसे चूमा मैंने दोबारा.


कहां ?
उसके भीगे मुख पर.


मुख ?
नहीं.


तब , फिर ?
श्रृंगार.


यह कैसा था ?
शिरीन.

 

18.05.2008, 07.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Chandra(cdu_78@gmail.com)

 
 What was That? What was it all about? 
   
 

Alok (editor@raviwar.com)

 
 अगर आप भी अपनी रचनाएं भिजवाना चाहें तो हमें उपरोक्त मेल पर भिजवा सकते हैं. 
   
 

Virendra deepak

 
 acchi kavitayen hain. lekein agar enki kuchh aur kavitayen hoti to accha hota. 
   
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