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रुदाकी की कविता का भाषांतर

भाषांतर

आयी मुझ तक

रुदाकी

874-940/41 , पर्सियन कवि. अनुवाद: पीयूष दईया


आयी मुझ तक-
कौन ?
वह.


कब ?
भोर में , भयभीत.


किस से ?
अंगार.


किस का ?
उसके पिता का.


मान लो !
उसे चूमा मैंने दोबारा.


कहां ?
उसके भीगे मुख पर.


मुख ?
नहीं.


तब , फिर ?
श्रृंगार.


यह कैसा था ?
शिरीन.

 

18.05.2008, 07.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
 

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Chandra(cdu_78@gmail.com)

 
 What was That? What was it all about? 
   
 

Alok (editor@raviwar.com)

 
 अगर आप भी अपनी रचनाएं भिजवाना चाहें तो हमें उपरोक्त मेल पर भिजवा सकते हैं. 
   
 

Virendra deepak

 
 acchi kavitayen hain. lekein agar enki kuchh aur kavitayen hoti to accha hota. 
   
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