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क्या यह सब सलवा जुड़ूम है ?

बहस

 

क्या यह सब सलवा जुड़ूम है ?

खगेंद्र ठाकुर



गत 10 और 11 जुलाई को रायपुर में प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान की ओर से प्रमोद वर्मा की स्मृति में साहित्यिक आयोजन किया गया. उसमें मैं भी गया था. उसके बारे में मैं बहुत देर से अपनी प्रतिक्रिया लिख रहा हूँ, हालाँकि तथाकथित क्रांतिकारियों ने जो लिखा और कहा, उससे मैं अवगत रहा हूँ. लेकिन देख रहा हूँ कि इस अभियान ने एक दुष्चक्र का रूप ले लिया है.

रायपुर के आयोजन के मुख्य संयोजक थे विश्वरंजन. वे अभी नेशनल बुक ट्रस्ट के द्वारा पटना में 7 से 15 नवम्बर तक पुस्तक मेला संगठित किया गया, उसमें ‘लेखक से मिलिये’ कार्यक्रम में आमंत्रित थे. वे आये थे. उनसे एक दिन पहले डॉ. नामवर सिंह उसी कार्यक्रम में शामिल हुए. उसी डॉ. नामवर सिंह ने दो पुस्तकों का लोकार्पण किया - एक श्री अभिषेक रौशन की पुस्तक ‘बालकृष्ण भट्ट और हिन्दी आलोचना’ का प्रारंभ का और दूसरी पुस्तक ‘आती है बहुत अंदर से आवाज़’ ( विश्वरंजन का कविता संग्रह ).

मैं कुछ अस्वस्थ रहते हुए भी नामवर सिंह को सुनने मेला में पहुँचा. मेला-प्रागंण में प्रवेश करते ही संयोग से विश्वरंजन मिल गये. मैं उनसके साथ ही पंडाल (सभागार) की ओर जा रहा था, तभी हिन्दी का एक युवा कथाकार मिल गया, जिसने मुझसे कहा– आप भी सलवा जुडूम में....... वह इतना ही बोला. मतलब साफ़ था – आप भी सलवा जुडूम में शामिल हो गये.

थोड़ी ही देर बाद ऐसा हुआ कि बालकृष्ण भट्ट पर लिखी पुस्तक का लोकार्पण करते उन्होंने उस पुस्तक के प्रकाशन और प्रकाशक जो वही कथाकार है, की कुछ अतिरंजित तारीफ़ कर दी. बात माईक पर हो रही थी, इसलिए वह प्रकाशक-कथाकार दौड़ा हुआ आया और मंच पर चढ़कर नामवर जी के पैर छुए और उसकी बगल में बैठ भी गया. जब वह दौड़ा आ रहा था तो मैंने समझा कि वह विश्वरंजन की कविता-पुस्तक का लोकार्पण करने के जुर्म में नामवरजी के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी करेगा, लेकिन उसने तो पैर छू लिये. यह क्या है ? यह भी क्रांतिकारिता है क्या ? यह सलवा-जुडूम का विरोध है क्या ?

जिस दिन ‘पहल’ के संपादन से डॉ. कमला प्रसाद का नाम ज्ञानजी ने हटा दिया था, उसी दिन ज्ञानजी ने व्यवाहारिक रूप से अपने को प्रलेस की गतिविधियों से अलग कर लिया था. तन था प्रलेस में और मन प्रलेस के विरोधियों के साथ. 


जब उस कथाकार ने मुझसे उपर्युक्त बातें कहीं तो मुझे महसूस हुआ कि मामला गंभीर हैं. लेकिन मैं पहली बात यही कहना चाहता हूँ कि प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह में शामिल होने पर मुझे बेहद ख़ुशी है. प्रमोद वर्मा प्रगतिशील कवि और लेखक थे. उनसे मेरी मुलाक़ात कई बार हुई थी. उनको पढ़ने और सुनने का अवसर मिला था. उन्हें दिवंगत हुए बहुत दिन हो गये. अचानक उनको याद करने का आयोजन हुआ तो मैंने समझा कि इससे अच्छा और क्या हो सकता है ! लेकिन कुछ लोग तो हैं जो प्रगतिशील आन्दोलन के जन्मजात विरोधी हैं, उनको विरोध करना ही है. कुछ नये लोग हैं जो जानते ही नहीं कि प्रगतिशील आन्दोलन क्या चीज़ है और हिन्दी ही नहीं, भारतीय साहित्य के आधुनिक विकास में उसकी क्या भूमिका है !

मैंने एक पत्रिका में प्रणयकृष्ण का लेख और एक दैनिक अख़बार में डॉ. रविभूषण का भी लेख पढ़ा. मैं उनके बारे में कुछ नहीं कहकर नागार्जुन की कविता की एक पंक्ति उन्हें समर्पित कर रहा हूँ – ‘मुझे मालूम है तुम्हारे पाँव कहाँ-कहाँ जाते हैं ?’

यह भी पता चला कि ज्ञानरंजन ने इसी बात पर प्रलेस की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया. इस पर मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि जिस दिन ‘पहल’ के संपादन से डॉ. कमला प्रसाद का नाम ज्ञानजी ने हटा दिया था, उसी दिन ज्ञानजी ने व्यवाहारिक रूप से अपने को प्रलेस की गतिविधियों से अलग कर लिया था. तन था प्रलेस में और मन प्रलेस के विरोधियों के साथ. वे जबलपुर में रहकर परसाईजी के यहाँ नहीं जाते थे, बल्कि उनके ख़िलाफ़ बोलते रहते थे. वे तो सलवा-जुडूम के समर्थक नहीं थे. एक बार एक पर्चा उन्होंने छपाकर वितरित किया, मेरे पास भी भेजा था, जिसमें डॉ. नामवर सिंह और राजेन्द्र यादव के ख़िलाफ़ अनर्गल बातें लिखी थीं. क्यों ? इसलिए कि ज्ञान ने किसी सेठ से पहले सम्मान की राशि ली थी, जिसकी आलोचना उन लोगों ने की थी. इसीलिए ज्ञानजी के मुख्य दुश्मन बन गये थे.

मैंने ज्ञानजी को 1980 में जबलपुर-सम्मेलन के बाद प्रलेस के राष्ट्रीय सम्मेलन में कभी नहीं देखा, बल्कि वे महेश योगी के अख़बार से कुछ दिन जुड़े थे. अतः ज्ञानजी के इस्तीफ़े का रायपुर-समारोह से कोई संबंध नहीं है, कहावत है– रोने का मन तो था ही, आँख में काँटा गड़ने का बहाना मिल गया.

हिन्दी के बहुतेरे लेखक अभी किसी-न-किसी आयकर आयुक्त से दोस्ती गाँठते हैं और उनकी जैसी-तैसी रचनाएँ छापकर साधन जुटाते हैं. यह क्या है ?
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

amit patna

 
 नहीं कॉमरेड, ये सलवा जुडूम नहीं हैं.

बेफिक होकर काम करते रहिए. किसी की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है. पगतिशीलता को, जनसंस्कारों को और नई दुनिया के सपनों को दफनानेवालों में आपका नाम लिखने के मामले में आगे आने वाली पीढ़ी भी अपना काम करेगी. उसकी चिंता करने की भी आपको ज़रूरत नहीं है.
 
   
 

Mrityunjay Allahabad

 
 संस्कृति के महारथी, आप किस ओर हैं?

खगेंद्र जी ने आत्मालोचना की जगह कोतवाल को डांटने वाली मुद्रा अख्तियार की है. बधाई! जब इतना सब कुछ कह ही रहे थे तो उस महान प्रगतिशील कथाकार का नाम धाम भी उवाच ही देते जिसने "फलाने जी के पैर छू लिए". वामपंथ के लिए रोने वाले इतने कमज़ोर नहीं हो सकते कि साफ साफ कह भी न सके. आपने नागार्जुन की कविता याद की है.

मुझे तो लगता है कि इस मसले पर मुक्तिबोध ज्यादा मौजूं हैं. क्योंकि इस नगरी में शैतानों के जबड़े बच्चों की तादाद बढ़ती जाती है. गद्दे तकिया तोषक चिलमन चितवन सब कुछ भनाभन बनते जा रहे हैं. इसीलिए अपनी जगह के बारे में एक बार तो सोचें.

खगेंद्र जी के लिए ये सादर पेश है

उनको डर लगता है
आशंका होती है
कि हम भी जब हुए भूत
घुग्घू या सियार बने
तो अभी तक यही व्यक्ति
ज़िंदा क्यों?
उसकी वह विक्षोभी सम्पीड़ित आत्मा फिर
जीवित क्यों रहती है?
मरकर जब भूत बने
उसकी वह आत्मा पिशाच जब बन जाए
तो नाचेंगे साथ-साथ सूखे हुए पथरीले झरनों के तीरों पर
सफलता के चंद्र की छाया में अधीर हो।
इसीलिए,
इसीलिए,
उनका और मेरा यह विरोध
चिरंतन है, नित्य है, सनातन है।
 
   
 

arun dev (www.samvadi.blogspot.com) najibabad

 
 विचारधारा से जुङे लेखको को विचार के साथ आचार का भी खय़ाल रखना चाहिए. 
   
 

ashutosh kumar (ashuvandana@gmail.com) aliharh

 
 नहीं कामरेड, यह सब सलवा जुडूम नहीं है/ सलवा जुडूम तो जंगलों में है/ और ये पुस्तक मेले/ ये कविता समारोह/ ये स्मृति उत्सव राजधानियों में हैं.

राजधानी में है संसद/ सरकार/ लोकतंत्र/ समझ करार/ ये सब नहीं है सलवा जुडूम/ नहीं है भ्रष्टाचार/ नहीं है सशस्त्रबलों का बदनाम विशेषाधिकार.

कविता राजनीति नहीं है/ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद सांप्रदायिक फासीवाद नहीं है/ अटल बिहारी बाबु बजरंगी नहीं है/ यह तो शीशे की तरह साफ़ है/ है न कामरेड?

आप की यह ख़ुशी कितनी सच्ची है/ कि आप उस मंच पर थे/ जिस मंच पर था बलबन जो
की नहीं है बलबन/ और जिस के विचारों से आप ने/ फिर भी असहमति जाहिर की थी जैसा की आप कहते हैं/ उतनी ही जितनी प्यारी है उमा भारती की ख़ुशी/जो उस मंच पर थी
जहाँ से उठती थी ललकार/ उस ढांचे को एक धक्का और देने की/ जो नहीं थी कोई पुरानी मस्जिद और/ जिस ललकार से असहमति जाहिर की थी आडवानी ने/ जैसा की वो कहता ही है.

यूं सच तो यह है कामरेड/ कि सलवा जुडूम भी नहीं है सलवा जुडूम/ वह तो आदिवासियों का आतंकवाद के खिलाफ एक जनयुद्ध है/ जैसा की कहते हैं विश्वरंजन/ जो की नहीं हैं श्रीकांत वर्मा

फिर क्या है/ इस सलवा जुडूम में/जिस से आप के इस/ भव्य प्रगतिशील ललाट में पड़ जाती हैं/ चिंता की रेखायें ?
 
   

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