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लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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ज़मीन गरम है

मुद्दा

 

ज़मीन गरम है

पुरुषोत्तम ठाकुर, भुवनेश्वर से



नारायणपटना इलाके में इन दिनों दहशत का माहौल है. असल में पिछले महीने की 20 तारीख को उड़ीसा के कोरापुट जिले के इस नारायणपटना थाने में हुई पुलिस फायरिंग में चासी मुलिया आदिवासी संघ के नेता वाड़ेका सिंगना समेत दो आदिवासियों की मौत के बाद से ही इलाके में दहशत का माहौल है. आरोप है कि 20 नवंबर को कोई 300 लोगों ने नारायणपटना थाने पर प्रदर्शन करते हुए पुलिस के हथियार छिनने की कोशिश की, जिसके बाद पुलिस फायरिंग में दो आदिवासी मारे गये और बड़ी संख्या में लोग घायल हो गये.

चासी मुलिया आदिवासी संघ


हालांकि चासी मुलिया आदिवासी संघ का दावा है कि घटना से एक दिन पहले अर्धसैनिक बल के जवान आसपास के गांवों में कांबिग ऑपरेशन के नाम पर आदिवासियों के साथ मारपीट कर के आये थे, जिसके खिलाफ आदिवासी अपना विरोध जताने पहुंचे थे. निहत्थे आदिवासी जब नारायणपुर थाने के थानेदार से बात कर लौट रहे थे तो उन पर पीछे से गोलियां बरसाई गईं.

पुलिस आदिवासियों पर माओवादियों के उकसावे में आ कर हिंसक कार्रवाई की बात कह रही है तो आदिवासी नेताओं का आरोप है कि पुलिस हर असहमति और विरोध को ‘माओवाद’ प्रचारित कर उसका दमन करने की कोशिश कर रही है. चासी मुलिया आदिवासी संघ इस बात से साफ इंकार करता है कि उसके माओवादियों से कोई संबंध हैं.

ताज़ा घटना के बाद आज तक पुलिस ने 72 आदिवासियों को गिरफ्तार किया है और उनमें से कम से कम 15 ऐसे लोग हैं, जिन पर माओवादी होने का शक है. लगातार चल रही इन गिरफ्तारियों से गांवों में अब सन्नाटा पसरा हुआ है. गांव में मर्द और नौजवान पुलिस के डर से भाग गये हैं. हर रोज सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण थाने पहुंच रहे हैं और लिख कर दे रहे हैं कि चासी मुलिया आदिवासी संघ के साथ उनका कोई संबंध नहीं है.

विद्रोह, आंदोलन और सीएमएएस
इस साल की शुरुवात में सीएमएएस यानी चासी मुलिया आदिवासी संघ पहली बार तब चर्चा में आया, जब उसने नारायणपटना में 2000 एकड़ ज़मीन और बंधुगांव में 1500 एकड़ ज़मीन गैर आदिवासियों से ‘वापस’ छुड़ा कर उस पर कब्जा कर लिया. संघ का दावा था कि ये जमीनें गैर आदिवासियों ने ग़लत तरीके से हथियाए थे. संघ ने इन ज़मीनों को भूमिहीन लोगों को बांट दिया, जिनमें गैर आदिवासी भी थे. बाद में इन ज़मीनों पर सामूहिक खेती की गई. इन खेतों से जब धान की फसल कटाई शुरु हुई तो विवाद शुरु हो गया, जिसकी परिणति नारायणपटना थाना कांड के रुप में सामने आयी.

जिन खेतों के लिए सारा विवाद हुआ, उन खेतों में धान की फसल खेतों में ही खड़ी-खड़ी खराब हो रही है. संघ के लोग भागे-भागे फिर रहे हैं और दूसरी ओर इन ज़मीनों के गैर आदिवासी ‘मालिक’ भी खेत में घुसने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं.

आखिर संघ चाहता क्या है ? आदिवासी और गैर आदिवासियों के बीच संघर्ष के पीछे का सच क्या है ? क्या चासी मुलिया आदिवासी संघ के पीछे सशस्त्र माओवादी हैं ? कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब की तलाश में हम फायरिंग से कुछ ही दिन पहले पहुंचे थे नारायणपटना.

ज़मीन का सच
“ मैं बहुत खुश हूँ, क्योंकि मैं अब तक भूमिहीन खेतिहर मजदूर था लेकिन अब मैं भी 80 सेंट ज़मीन का मालिक बन गया हूँ.” हालांकि 80 सेंट ज़मीन, ज़मीन का एक छोटा-सा टुकड़ा भर है लेकिन एक भूमिहीन आदिवासी के लिए ज़मीन का महत्व क्या है, यह बात 50 साल के आदिवासी किसान मुसरी मादिंगी की आँखों की चमक से समझा जा सकता है.

नारायणपटना और बन्धुगाँव क्षेत्र में चासी मुलिया आदिवासी संघ की अगुवाई में हो रहे बहुचर्चित भूमि आन्दोलन के चलते जिन लोगों को फायदा हुआ है, उनमें मुसरी भी एक हैं. नारायणपटना-बन्धुगाँव मार्ग पर नारायणपटना से 2 किलोमीटर की दूरी पर पाचिंगी गाँव में सड़क के दाहिनी ओर मिटटी के एक खपरैल घर में अपनी 8 बेटियों, एक बेटे और पत्नी के साथ मुसरी रहते हैं.

उनकी एक बेटी की शादी हो चुकी है और एकमात्र बेटा नारायणपटना में ड्राईवर का काम करता है. अपने परिवार के गुजारे के लिए मुसरी दूसरे आदिवासियों की तरह सड़क के दूसरी ओर स्थित पहाड़ी पर मक्के की खेती करते हैं. वह साल दर साल इस ज़मीन पर खेती करते आ रहे हैं पर उस ज़मीन का उनके नाम कोई कागजात नहीं है.

“ पहले इस ज़मीन पर खेती करने की वजह से फारेस्टर हमें धमकी देने के साथ-साथ काफी परेशान करता रहा है, हमें कंध आदिवासी कह कर कई बार काफी गाली-गलौज किया है, लेकिन अब वह कुछ नहीं कह रहे हैं.” मुसरी काफी राहत के साथ एक लम्बी सांस लेते हुए यह सब बताते हैं.

चासी मुलिया आदिवासी संघ का आन्दोलन शुरू होने के बाद से स्थानीय आदिवासियों के प्रति दूसरे लोगों, खासतौर से सरकारी कर्मचारियों के रवैय्ये में आये बदलाव को महसुस करने वालों में मुसरी अकेले नहीं हैं.

“ यह संघ आने से बहुत अच्छा हुआ है साहब. हमारे जितने ज़मीन-जायदाद, पेड़-पौधे, डोंगर-पहाड़ सब सरकार और साहूकार मिलकर लूट कर ले जा रहे थे. उस पर रोक लग गयी है. हम आदिवासी तो डोंगर किसानी करके कमाने-खाने वाले लोग हैं, अब फिर से वह सब करके सब खुश हैं.” यह बात पट्टामांडा के आदिवासी किसान नारिमदिंगा ने कही.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

om prakash shukla (ops309@gmail.com) lucknow

 
 बहुत अच्छा लिखा है आपने. आदिवासियों की जमीन पर सबकी नजर है, खास तौर पर सरकरा भी जमीन के लिए उन्हें देश के लिए खतरा बता रही है. जू संवैधानिक रुप से उनकी जमीन नहीं ली जा सकती तो उन्हें देश के लिए खतरा बता कर ठीक करने का काम मनमोहन सिंह, चिदंबरम की जोड़ी ने करना शुरु कर दिया है. देश के लिए सबसे बड़े दुश्मन तो लोक सभा में बैठे हैं, अपराधी, घूसखोर और देशद्रोही तक इस लोकसभा में बैठे हैं. जो देश के आर्थिक मामले नहीं, विदेशी मामलों में भी खुले्आम गड़बड़ी कर रहे हैं. आखिर 75 खरबपतियों के लिए 70 करोड़ की आबादी की उपेक्षा सरकारों की नीति क्यों हैं ? वोट तो जनता से लेते हैं और उन्हीं की न्यायोचित मांगों पर उनको गोली का निशाना बनाते हैं. 
   
 

Durgesh Thakur (shatabditimes@rediffmail.com) Kawardha

 
 बहुत ही अच्छा लेख है, मेरी शुभकामनाएं. 
   
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