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गरीबों को लूटने का सरकारी तंत्र

मुद्दा

 

गरीबों को लूटने का सरकारी तंत्र

देविंदर शर्मा


जरा सोचिए, अगर अत्यंत गरीब महिला बकरी खरीदना चाहती है तो उसे लघु वित्त संस्थान से ऋण मिल जाएगा. वह बकरी खरीदती है, जो उसके लिए जीविकोपार्जन का जरिया बनती है और इस प्रकार उसे सुरक्षा प्रदान कर उसकी जीवनरेखा बन जाती है. इसके बदले उसे 24 प्रतिशत की भारी ब्याज दर का ऋण चुकाना पड़ता है. दूसरी तरफ शहर में अगर आप एक कार खरीदना चाहते हैं तो किसी भी बैंक में चले जाइए, आपको 8 प्रतिशत ब्याज दर पर आसानी से ऋण मिल जाएगा. किश्तों पर टीवी या फ्रिज आदि खरीदना तो और भी सस्ता है. यह अकसर बिना किसी ब्याज के मिल जाता है. शहर में बैंक ऋण विशुद्ध रूप से व्यावसायिक व्यवहार है, जबकि गांव में इसे गरीबों के सशक्तीकरण के नाम पर दिया जा रहा है.

ऋण के नाम पर छल


निश्चित तौर पर अगर गरीब महिला को न्यूनतम दर यानी 4 फीसदी पर बकरी खरीदने के लिए ऋण मिल जाता तो वह साल के अंत तक नैनो कार में बैठी हुई नजर आती. चूंकि ऐसा नहीं होने दिया जा रहा है, इसलिए मैं कभी-कभी हैरान रह जाता हूं कि लघु वित्तीय सहायता का उद्देश्य गरीबों को गरीबी के चंगुल से निकालना है या फिर बैंकों का स्वास्थ्य सुधारना. अगर गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले गरीबों के सशक्तीकरण के लिए 24 प्रतिशत की भारी ब्याज दर पर वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है तो शहरों में रहने वाले अधिक साधन संपन्न लोग खुद के सशक्तीकरण के लिए इतनी ही ब्याज दर पर ऋण क्यों नहीं ले सकते? अगर गांवों में रहने वाले गरीब इस ब्याज दर पर अपना धंधा चला सकते हैं तो शहरों में रहने वाले ऐसा क्यों नहीं कर सकते. गरीबों को छोटे ऋणों के लिए तीन गुना ब्याज क्यों देना पड़ रहा है?

हमें नहीं भूलना चाहिए कि गांवों में रहने वाले 15 करोड़ अत्यंत गरीब लोग, जो लघु वित्तीय संस्थानों से ऋण लेते हैं, संभवत: नरेगा योजना के तहत काम करते हैं, जिसमें उन्हें मात्र 60 से 80 रुपये प्रतिदिन मिलता है और वह भी साल भर में सौ दिन के लिए. इस परिप्रेक्ष्य में क्या 24 प्रतिशत ब्याज दर वसूलना आपराधिक कृत्य नहीं है?

इसलिए यह बिल्कुल स्पष्ट है कि गरीबी एक बड़ा और संगठित व्यवसाय बन गई है. अगर आप पढ़े-लिखे हैं और एक लाभदायक व्यावसायिक उद्योग की तलाश में हैं और अगर आप अनिवासी भारतीय हैं तो और भी अच्छा. फिर तो लघु वित्त अवसर आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं. इससे बेहतर कोई और विकल्प हो ही नहीं सकता. लघु वित्त संस्थान में सुनिश्चित लाभ है और वह भी सौ फीसदी वसूली के साथ.

आर्थिक असुरक्षा के दौर में लघु वित्त सुनिश्चित लाभ का व्यवसाय है. इसमें कोई हैरानी नहीं है कि मोंसेंटो, सिटीकार्प, एबीएन एमरो, आईसीआईसीआई, नाबार्ड, संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय संस्थानों के परिचारक मोटे तौर पर 12-13 प्रतिशत ब्याज दर पर लघु वित्त संस्थानों को ऋण दे रहे हैं. ये लघु वित्त संस्थान, जिनमें गैर सरकारी संगठन और अन्य अलाभकारी इकाइयां भी शामिल हैं, 24 प्रतिशत की मोटी ब्याज दर वसूल कर रहे हैं. लघु वित्त व्यवसाय चौतरफा फल-फूल रहा है.

इंडिया माइक्रोफाइनेंस रिपोर्ट 2009 हमें बताती है कि लघु वित्त व्यवसाय 97 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है और इस सेवा का लाभ उठाने वालों की संख्या में 60 फीसदी वृद्धि हुई है. एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, एसकेएस माइक्रो फाइनेंस उड़ीसा, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में करीब 24 प्रतिशत ब्याज वसूल रहा है, इक्विटास माइक्रो फाइनेंस 21 से 28 प्रतिशत ब्याज हासिल कर रहा है और बेसिक्स माइक्रोफाइनेंस लघु ऋण 18 से 24 प्रतिशत ब्याज दर पर दे रहा है. लघु वित्त के क्षेत्र में अभूतपूर्व संवृद्धि हमें बताती है कि खेल के नियम बदलने पर भी गांवों के गरीबों का शोषण पूर्ववत जारी है.

लघु वित्त संस्थानों ने ऋण कथा के खलनायकों-साहूकारों का धंधा एक नए संगठित महाजन तंत्र के हाथों में सौंप दिया है. ये कोई साधारण साहूकार नहीं हैं, बल्कि सुशिक्षित व्यावसायिक वर्ग है, जो मार्केटिंग के तमाम हथकंडों से लैस है. इतना भारी ब्याज वसूल करके लघु वित्त संस्थान वस्तुत: गरीबों की कमर तोड़ देते हैं.

भारतीय रिजर्व बैंक के महज मूकदर्शक बने रहने पर हैरत होती है. प्रकट रूप में आरबीआई को केवल बैंकों के स्वास्थ्य की चिंता है, क्योंकि उपभोक्ता का आधार बनाए बिना ही वे 12 प्रतिशत की सुनिश्चित आय हासिल कर लेते हैं. मुझे इसमें कोई कारण नजर नहीं आता कि आरबीआई बैंकों को अधिकतम दो प्रतिशत ब्याज वसूलने को बाध्य न कर सके और लघु वित्त संस्थानों को गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों से अधिकतम अतिरिक्त दो प्रतिशत ब्याज लेने की अनुमति दे. कोई भी लघु वित्त संस्थान यदि गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों से 4 प्रतिशत से अधिक ब्याज दर वसूल करता है तो इसे अपराध माना जाए.

 
फिलहाल, लघु वित्त संस्थान निश्चित ही आचार संहिता का पालन करते हैं, लेकिन हैरानी की बात है कि कुछ संस्थान लगभग सामान्य ब्याज दर पर लोगों को ऋण कैसे उपलब्ध करा रहे हैं, जबकि दूसरे यही काम नहीं कर पा रहे हैं. उदाहरण के तौर पर सोसाइटी फार रूरल इंप्रूवमेंट केरल में मात्र 10 से 15 फीसदी ब्याज दर पर ऋण मुहैया करा रहा है. यह दर उन संस्थानों से व्यावसायिक बैंकों द्वारा वसूल की जाने वाली ब्याज दर से महज दो से तीन प्रतिशत ही अधिक है, जबकि बड़े खिलाड़ी जिस दर पर ऋण लेते हैं उसमें अतिरिक्त 12 प्रतिशत ब्याज देते हैं.

यह कहना कि कम से कम लघु वित्त संस्थान गरीबों को ऋण तो मुहैया करा रहे हैं, गरीबों का खून पीने का एक बहाना ही है. यद्यपि लघु वित्त संस्थान ऋण देते समय चल-अचल संपत्ति जैसे मकान या खेत गिरवी नहीं रखते, फिर भी यह ऋण महिलाओं के सामाजिक समूह के माध्यम से दिए जाते हैं, जहां ऋण की वसूली के लिए तमाम तरह के सामाजिक दबाव डाले जाते हैं. कोई भी समझ सकता है कि ये सामाजिक दबाव प्रताड़ना के अलावा और कुछ नहीं होते. इस प्रकार के अनेक मामले हैं कि सामाजिक दबाव का सामना न कर पाने के कारण ऋण लेने वालों ने आत्महत्या कर ली है.

पिछले कुछ सालों के दौरान लघु वित्त संस्थान बहुराष्ट्रीय कंपनियों का सामान बेचने का औजार भी बन गए हैं. जिन स्वयं सहायता समूहों को सरकार जोर-शोर से प्रोत्साहित कर रही है वे वस्तुत: उपभोक्ता वस्तुओं को बेचने का एक तंत्र बन गए हैं. उदाहरण के लिए मोबाइल कंपनियां लघु वित्त संस्थानों का इस्तेमाल आसान किस्तों में गरीबों को हैंडसेट बेचने में कर रही हैं. यह गरीबों की कीमत पर अधिकतम लाभ कमाने का बढ़िया धंधा बन गया है.

गरीबों का खून चूसने वाले इन लघु वित्त संस्थानों को अब अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. इसके लिए भारी बदलाव करने पड़ेंगे, किंतु सरकार को गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों को उचित ब्याज दर पर ऋण मुहैया कराने के उपाय करने चाहिए. इस व्यवस्था में सुधार लाए जाने पर मैं यह पक्के तौर पर कह सकता हूं कि ऋण लेने के कुछ सालों में ही गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले भी कार चलाते देखे जा सकेंगे.


04.12.2009, 22.57 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Neeraj Pasvan (neerajdada2007@gmail.com) Delhi/ Sasaram

 
 ये एक बहुत ज़रूरी और महत्वपूर्ण लेख है. इसे जन-जन तक पहुँचाना चाहिए. 
   
 

संदीप दीवान (sandeepdeewan@yahoo.co.in) रायपुर, छत्तीसगढ़

 
 यह आलेख बेहद संजीदा है। आपके इस लेख से लोगों की आंखे खुलेंगी। इस लेख के लिए आप बधाई के पात्र हैं। इस लेख के लिए आपको साधुवाद।  
   
 

एम अखलाक (analhaque2007@gmail.com) मुजफ्फरपुर, बिहार

 
 भई, ये तो मालूम ही नहीं था। इसके नीति के खिलाफ तो आंदोलन होना चाहिए। साथ ही तमाम मीडियाकर्मियों को चाहिए कि इस मुद्दे को स्‍थानीयता के बोध के साथ उठायें। बिना बगावत कुछ भी संभव नहीं। देविन्‍दर शर्मा जी और रविवार को बधाई। 
   
 

uday prakash GHAZIABAD

 
 यह एक आंख खोलने वाला आलेख है। पूंजी के भीतर अंतर्निहित हिंसा को खोलने वाली। नयी अर्थनीति के साथ-साथ लघु और विराट पूंजी के कार्पोरेट कारगुजारियों का दायरा फैलता जा रहा है। लघु वित्त व्यवसाय अगर गांवों के गरीबों और छोटे किसानों को लूटने का काम कर रहा है, तो बड़ा या विराट वित्त व्यवसाय (बिग कार्पोरेट कैपिटल)राष्ट्र-राज्य को। लघु वित्त व्यवसाय पर निगरानी रखी जानी चाहिये और रिजर्व बैंक को तत्काल इस पर कार्रवाई करनी चाहिये।

बड़े कार्पोरेट घरानों की लूट तो किसी बड़े नागरिक-राजनीतिक जनांदोलन की प्रतीक्षा में है। देवेंदर शर्मा जी का आलेख प्रकाशित करने के लिये बधाई। इसे ज़ारी रखें।
 
   
 

vivek sanyal (vvksanyal@gmail.com) Mumbai

 
 अगर ये आँकड़े सही हैं, तो यह वाकई दुख की बात है. इसीलिए कि RBI ने बैंकों के साथ मिलकर बहुत सी स्कीमें निकाली हैं. उदाहरण के लिए स्वर्ण जयंती शहरी रोज़गार योजना(SJSRY), स्वर्ण जयंती ग्रामीण रोज़गार योजना(SGSY), NRY, PMRY इत्यादि. इनमें ब्याज की दर काफी कम है. interest का moratorium period है, trainings हैं, DRDA, Corporations का participation हैं. बैंको को ये targets RBI से मिलते हैं, जो उन्हें पूरे करने ही पड़ते हैं.

आवश्यकता है ऐसी priority sector landing schemes को आम आदमी तक पहुँचाने की. ये जनसंप्रक कार्यालय का failure है जो आम जनता के बीच में इन स्कीमों का प्रचार नहीं होता और बैंको को बदनाम किया जाता है.
 
   
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